सोमवार, 6 मई 2013

रेलमंत्री पवन बंसल का निराला खेल


  
विश्व में सर्वाधिक रोजगार देनेवाला संगठन ‘भारतीय रेल’ इन दिनों कुछ ज्यादा ही चर्चा में है। यह चर्चा इसलिए नहीं कि भारतीय रेल ने कोई अनुकरणीय या प्रशंसनीय कीर्तिमान बनाया है; बल्कि इसलिए कि पहली बार रेलमंत्री का कोई इतना करीबी बड़े रिश्वत काण्ड में केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआइ) की गिरफ्त में आया है। मामला केवल रेल बोर्ड के उच्च पद पर रिश्वत लेकर नियुक्ति का ही नहीं है; बल्कि इस वर्ष रेलवे में होने वाली 51 हजार नियुक्तियों में भी अरबों का बंदरबांट होने वाला था। यदि कोल ब्लॉक मामले में सीबीआइ की सर्वोच्च न्यायालय में फजीहत न हुई होती तो यकीन मानिये कि यह रिश्वत मामला उजागर न होता। कोल ब्लॉक जांच प्रकरण में सीबीआइ पर आरोप लगा कि वह केन्द्र सरकार की कठपुतली है। सीबीआइ निदेशक रंजीत सिन्हा को सर्वोच्च न्यायालय में स्वीकारना पड़ा कि उसने एक लाख 76 हजार करोड़ रुपये के कोल ब्लॉक घोटाले में केन्द्र सरकार से मिलकर आरोप पत्र तैयार किया। अपनी इसी शर्मिन्दगी से उबरने की बौखलाहट में सीबीआइ ने रेल मंत्रालय को कटघरे में खड़ा किया। त्वरित कार्रवाई में 10 को गिरफ्तार कर 12 करोड़ रुपयों के डील में से पेशगी के 90 लाख रुपये जब्त भी किये गए। गिरफ्त में आए आरोपितों में रेलमंत्री पवन कुमार बंसल के भांजे विजय सिंगला सहित अन्य करीबी भी हैं। मजे की बात कि जिस तरह 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा की तरफदारी प्रधानमंत्री व कांग्रेस की तरफ से की गई, वैसा ही बचाव बंसल का किया जा रहा है।

    काँग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए-2 की केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार के तमाम कीर्तिमान ध्वस्त कर चुकी है। राजा तो कारावास में भी गए, इसके अलावा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनका कार्यालय सहित अश्विनी कुमार, श्रीप्रकाश जायसवाल, चिदम्बरम, सिब्बल, सलमान खुर्शीद जैसे कई केन्द्रीय मंत्रियों पर विभिन्न आरोप लगे हैं। इतने आरोपित मंत्रियों वाली यह विश्व की पहली सरकार है। ऐसे में भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावडे़कर कहते हैं कि केन्द्रीय मंत्रियों में देश को लूटने की होड़ लगी है और काँग्रेस को देश को लूटने का रोग लग गया है। आलोच्य विषय पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि रेलमंत्री बंसल के कई कदम सवालों के घेरे मेें हैं। रेल बजट में चंडीगढ़-पंजाब के आगे अन्य राज्यों की उपेक्षा पर बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल से विरोध के स्वर उभरे। रेल मंत्रालय में आते ही वीके गुप्ता को उत्तर रेलवे का महाप्रबंधक बनाया और उनसे वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी की। मंत्रालय की कारगुजारी बाहर न जाए इसलिए मीडिया सलाहकार नियुक्त ही नहीं किया। ऊपर से कुछ और, अंदर से कुछ और करते रहे। खर्च घटाने के नाम पर कुछ समितियों को भंग कर उनकी शक्तियां अपने चहेते अधिकारियों में निहित कर दी। कुछ महीनों के रेल मंत्रित्व काल में 2 बार किराया बढ़ा चुके हैं। रेल बजट से पूर्व की वृद्धि के बाद बजट में ईंधन अधिभार लगाकर पुनः किराए में वृद्धि की। बजट पूर्व की वृद्धि का मकसद बंसल समझा नहीं पाए। जब इस वृद्धि का निर्णय हुआ उस समय दिल्ली के तमाम रेल पत्रकार मुम्बई में थे। वहां उनके मोबाइल फोन पर सूचना दी गई। पत्रकारों को पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक महेश कुमार से मिलवाया गया जो अब सीबीआइ की गिरफ्त में हैं। दिल्ली आकर पत्रकारों ने इस हड़बड़ी का मकसद पूछा तो बंसल का जवाब था- मैं आपको कारण नहीं बता सकता। आखिर किसने उन्हें कारण बताने से रोका था? रेलवे बोर्ड में हाल में सदस्य बने और अब निलम्बित महेश कुमार पर बंसल की विशेष कृपा के फलस्वरूप ही इस वर्ष रेलवे में होनेवाली 51 हजार बहालियाँ उन्हीं की देख-रेख में होनेवाली थी। 12 करोड़ लगाकर इन बहालियों में अरबों कमाने के स्वप्न को सीबीआइ ने भंग कर दिया।

    इधर नई बात सामने आई है। बंसल के भांजे, भतीजे व बेटे का आपस में कारोबारी रिश्ता भी है। जेटीएल इन्फ्रा में बंसल का भतीजा व भांजा जबकि एक अन्य कम्पनी रौनक एनर्जी में बेटा व भतीजा पार्टनर हैं। अपने ऊपर लगे लांछन को आसानी से रेलमंत्री नहीं धो सकते; क्योंकि उनके घर का पता ही उनके भतीजे का पता है। तभी तो भाजपा नेता किरीट सोमैया सप्रमाण कहते हैं कि बंसल का पूरा परिवार रेल घूस काण्ड में सहभगी है। यहां ‘कमाई’ का एक अन्य स्रोत ढूँढा गया। रेलमंत्री ने अकारण ही रेलवे कैटरिंग का नया ठेका 20 मई तक देने की घोषणा कर रखी है। ऐसे में ठेकों के नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी होने से पूर्व ही रेल का खान-पान महंगा हो गया मगर इस ओर बंसल का ध्यान ही नहीं गया। ऐसे में उनका यह कहना कि वे सदा ईमानदारी का उच्च मानक कायम रखते हैं, सत्य से परे ही महसूस होता है। अपने देश मंे एक बात सदा से चली आ रही है कि किसी भी घपले में फँसने पर त्याग पत्र मांगा जाता है, उस आरोपित पर कार्रवाई की माँग नहीं होती। इस बार भी विपक्षी भाजपा व अन्य बंसल का त्याग पत्र मांग रहे हैं, उनपर कार्रवाई की बात कोई नहीं कर रहा। क्या करोड़ों-अरबों डकारने के बाद त्यागपत्र दे देेने से ही वह शख्स पाक-साफ हो जाता है?

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