अमित कुमार नयनन
श्रीकृष्ण भगवान की कंुडली का विवेचन अत्यंत रोचक है। उन्होंने महाभारत जैसा केवल युद्ध नहीं रचा बल्कि सारथी की ऐसी भूमिका निभाई कि बगैर शस्त्र उठाए, समस्त अधर्म का नाश कर दिया। कंुडली के अनुसार लग्न में उच्च का चंद्र उन्हें अत्यंत ही मानसिक चपल चंचल प्रबल चिंतक मनोवैज्ञानिक सह बालसुलभ स्वभाव भी देता है। लग्न मंे चंद्र के साथ स्थित केतु इस प्रभाव में ध्वज की तरह इन बातों को कई गुणा बढ़ा देता है।
लग्नेश शुक्र का षष्ठ में स्वराशि होना वह भी चर राशि में इन्हें वाहन का चालक बनाम सारथी बनाता है। लग्नेश शुक्र लग्न में उच्च के चंद्र प्रभाववृद्धि करते केतु के साथ स्वयं षष्ठ में बैठकर उच्च के शनि के साथ हैं। इस प्रकार शनि दासवृति होेने के कारण वाहन चालक की भूमिका को स्पष्ट करते हैं। वाहन चालक होने के बावजूद उव्च के चंद्र, शनि इन्हें विशिष्ट प्रकार का सारथी बनाते हैं। साथ ही यह योग चंूकि षष्ठ में बना है अतः शत्रु पर विजय तथा शनि रणनीतिक ग्रह हैं अतः रणनीतिक सफलता वगैरह को स्पष्ट करते हैं। इस प्रकार उच्च के चंद्र, उच्च के शनि और प्रभावकारक केतु का लग्न षष्ठ दशम संबंध अत्यंत ही मानसिक चातुर्य के साथ सारथी की भूमिका के रूप में उनका रणनीतिक विजय स्पष्ट करता है। इस बात की स्पष्टता इस बात से भी प्रबल होती है कि इसमे लग्नेश और दशमेश चर राशि में होकर षष्ठ में हैं इसलिए यह सफलता विशेषतः युद्ध के कारण सह युद्ध के मैदान में मिली है । तृतीयेेश बनाम पराक्रमेश चंद्र का लग्न में उच्च होना इस बात को स्पष्ट करता है कि चंद्रमा बनाम मन, मानस, मानसिक चातृर्य को ही उन्होंने साहस के रूप अपना हथ्यार बनाया जिस बल को केतु ने और भी अत्यधिक प्रभावकारक बना दिया। लग्न में यह योग होने के कारण उनके चंद्र-केतु के कारण मानसिक चातुर्य और शनि के कारण रणनीतिक-कूटनीतिक चाल की काल कालांतर में आजतक प्रशंसा होती है और सदैव होती रहेगी।
श्रीकृष्णसारथी की भूमिका महाभारत युद्ध में क्या थी किसी से छिपा नहीं है और महाभारत कोई आम युद्ध नहीं था। श्रीकृष्णसारथी को आम सारथी नहीं थे बल्कि अभूतपूर्व देवत्व और व्यक्तित्व से बने एक दिव्य इंसान एक दिव्य सारथी थे।



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