गुरुवार, 23 अगस्त 2012

हिन्दू और मुसलमान के धार्मिक प्रेम Religious Love of Hindus & Muslims

 
रामचरितमानस की रचना के दौरान गोस्वामी तुलसीदास

  
    भारत में कई ऐसे अवसर आये, जब सनातन (हिन्दू) और इस्लाम (मुसलमान) के बीच सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक एकता के व्यावहारिक भाव प्रकट हुए। ये भाव दूरगामी और सकारात्मक प्रभाववाले सिद्ध हुए और हो रहे हैं। दरअसल, विश्व का सब से प्राचीन धर्म सनातन धर्म ही है, जिसे हिन्दू धर्म भी कहा जाता है। सच यह है कि सभी धर्म इसी धर्म के अंश हैं। अन्य धर्मों के जिन विद्वानों ने इस सच्चाई को माना है, उन्होंने सनातन धर्म को 'मातृधर्म' के रूप में सम्मान दिया है। यहाँ ऐसे ही कुछ मुसलमान विद्वानों की चर्चा करता हूँ :

    १. रामभक्त गोस्वामी तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' की रचना अपने प्रिय मित्र अब्दुल रहीम खानखाना, जो बनारस {वाराणसी} के गवर्नर थे, के संरक्षण में रहकर की। रहीम खानखाना वास्तव में कृष्ण भक्त थे और आज भी उन के दोहे हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। बनारस के शक्तिशाली ब्राह्मण पण्डे तुलसीदास को नुक़सान पहुँचाना चाहते थे। वे चाहते थे कि तुलसीदास 'रामचरितमानस' की रचना आम बोलचाल की भाषा अवधी में नहीं; बल्कि शुद्ध संस्कृत में करें।

    २. अवध के नवाब तेरह दिनों तक होली मनाते थे। नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में कृष्ण रासलीला खेली जाती थी। भगवान हनुमान के सम्मान के तहत राज्य में बंदरों को मारना कानूनी अपराध था। एक मुसलमान लेखक सुविख्यात नाटक ‘इन्द्र सभा’ का मंचन करता था, जिसे तमाम जनता बड़े चाव से देखती थी। जब अंग्रेज़ों ने अवध के राजा को वनवास देकर अवध से निकाल दिया, तब प्रजा रो-रोकर ‘‘राम जी को फिर हुआ वनवास’’ गीत गाती थी। नवाब का कलकत्ता का महल जिस में वह नजरबंद रहते थे,‘राधा मंजिल’ कहलाता था।   

    ३. पंजाबी सूफी कवि गुरु बाबा बुल्लेशाह का असली नाम माधव लाल हुसैन था, जो न हिन्दू और न मुसलमान नाम है। उन की सब से पसंदीदा पंक्तियां थीं :

‘‘मस्जिद ढा दे, मंदिर ढा दे,

ढा दे जो कुछ ढाहंदा,

पर किसी दा दिल ना ढाई,

रब दिलों विच रहदां’’।

    ४. अहमदाबाद की सूफी सुहागनें खुद को भगवान की दुल्हन मानती थीं। वे हिन्दू दुल्हनों की तरह शृंगार करती थीं, लाल सिंदूर लगाती थीं। आज तक लाल सिंदूर और काँच की चूड़ियाँ (उनके दरगाह पर) चढ़ाई जाती हैं।

    ५. मुगल सम्राट शाहजहाँ के प्रिय कवि का नाम जगन्नाथ पंडित था जिन्हें सम्राट ने ‘कवि राय’ की उपाधि से नवाज़ा था। कवि राय हिन्दी व संस्कृत में रचनाएँ लिखते थे। शाहजहाँ की पत्नी बेगम मुमताज़ महल की प्रशंसा में गीत लिखनेवाले मुख्य कवि वंशीधर मिश्र और हरि नारायण मिश्र थे। शाहजहाँ के काल में मनेश्वर, भगवती और बेदांग राजा नामक अन्य विद्वान भी थे जो ज्योतिष पर आधारित शास्त्रों की रचना करते थे और उन्हें सम्राट को (संस्कृत में) समझाते थे।

    ६. बादशाह शाहजहाँ के सब से बड़े पुत्र दारा शिकोह एक उच्च कोटि के संस्कृत विद्वान थे जिन्हें काशी के पंडित, सिक्ख गुरु और सूफी संत समान रूप से चाहते थे। कहा जाता है कि दारा शिकोह को एक सपना आया था जिस में भगवान राम ने उन्हें उपनिषद्, योग वासिष्ठ और भगवद्गीता को फारसी में अनूदित करने का आदेश दिया था। दारा शिकोह का यह अनुवाद मैक्सम्यूलर ने दुनियाभर में प्रचलित किया। बयालीस वर्ष की उम्र में दारा शिकोह ने फारसी में ‘मजमौल-बहरैन’ (दो समुन्दरों का मिलाप अर्थात वैदिक और इस्लामी संस्कृतियों का मिलाप) नाम के ग्रंथ की रचना की जिस में उन्होंने हिन्दू धर्म व इस्लामी सोच की समानताओं का बखान किया। इस रचना के अनुसार हिन्दू वेदान्त और इस्लामी सूफियत सिर्फ एक ही सोच के अलग-अलग नाम हैं। हिन्दू धर्म में ‘मोक्ष’ और इस्लाम में ‘जन्नत’ जाने का अर्थ एक ही है यानी मुक्ति पा जाना।

    ७. प्रसिद्ध मराठा राजा शिवाजी की फौज में हिन्दू और मुसलमान दोनों अधिकारी थे। शिवाजी सभी धर्मों को समान आदर देते थे। उन की प्रजा और सेना को सख्त निर्देश थे कि वे औरतों, बच्चों और कुरान, गीता आदि धार्मिक ग्रंथों का कभी अनादर नहीं करेंगे और न ही उन पर हमला करेंगे।

    ८. स्वर्ण मंदिर की नींव गुरु अर्जुन देव के प्रिय मित्र हज़रत मियाँ मीर ने रखी थी, जो एक मुसलमान सूफी सन्त थे। मियाँ मीर वास्तव में शाहजहाँ के पुत्र मुगल युवराज दारा शिकोह के गुरु भी थे। बचपन में गुरु अर्जुन देव ने दारा शिकोह की जान बचायी थी। जिस के कारण दोनो में बहुत स्नेह था।

    ९. गुरु नानक के जीवनभर के साथी थे मियाँ मरदाना, जो एक मुसलमान थे और रबाब वादक थे। मियाँ मरदाना गुरुवाणी गानेवाले पहले गायक हैं। कहा जाता है कि मियाँ मरदाना गुरु नानक के साथ हरिद्वार से मक्का तक घूमे। मरदाना के वंशज पाँच सौ साल तक स्वर्ण मंदिर में रबाब बजाते थे। यह किस्सा सन् १९४७ में भारत और पाकिस्तान बँटवारे के साथ खत्म हुआ।

    १०. रसखान एक मुसलमान कृष्ण भक्त थे जो एक बनिये के बेटे को कृष्ण का अवतार मानकर उस की पूजा करते थे। वे उस के नजदीक रहने के लिए वृंदावन में संन्यासी का जीवन व्यतीत करने लगे। रहीम, हज़रत सरमद, दादू, बाबा फरीद जैसे बहुत से मुसलमान कवियों ने बड़ी तादाद में कृष्ण भक्ति से ओत-प्रोत रचनाएँ कीं जिन में से कुछ 'गुरुग्रंथ साहिब' में शामिल हैं।

    ११. मुसलमान राजा बाज बहादुर और राजपूत पुत्री रूपमति के प्रेम के किस्से माण्डू (वर्तमान मध्य प्रदेश के धार ज़िले में स्थित) में आज भी सुनाये जाते हैं। माण्डू युद्ध में पराजित होने के बाद रानी रूपमति ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली; क्योंकि उन्हें बाज बहादुर से बिछड़ना गंवारा नहीं था।

    १२. गुरु गोविन्द सिंह के प्रिय मित्र सूफ़ी बाबा बदरुद्दीन थे। औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध में बाबा बदरुद्दीन ने अपनी, अपने बेटों, अपने भाइयों और अपने सात सौ शिष्यों की जान न्योछावर कर दी थी। उन के अनुसार, यह असमानता और अन्याय के खिलाफ इस्लाम द्वारा सुझाया सच्चा रास्ता है। बदरुद्दीन बाबा को गुरु गोविन्द सिंह बेहद प्यार व सम्मान देते थे। गुरुजी ने उन्हें अपना खालसा कंघा और कृपाण भेंट में दी थी। ये दोनों चीज़ें बाबा बदरुद्दीन के दरगाह ‘कंघे शाह’ में अभी तक महफूज़ रखे हैं।

    १३. सन् १८५७ ईस्वी की क्रांति में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की रक्षा उन के मुसलमान पठान जनरल गुलाम गौस खान और खुदादाद खान ने की थी। उन्होंने अपनी मौत तक झाँसी के किले की हिफाज़त की। उन के अंतिम शब्द थे, ‘‘अपनी रानी के लिए हम अपनी जान न्योछावर कर देंगे।’’

    १४. सन् १९४२ ईस्वी में सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज के नारे ‘जय हिन्द’ की रचना कैप्टन आबिद हसन ने की थी। यह नारा फौज में अभिवादन का तरीका बनाया गया और सभी भारतीयों ने इसे मूल मंत्र की तरह स्वीकारा। (समरथ पत्रिका से साभार/prawakta)

शुक्रवार, 15 जून 2012

लाचार प्रधानमंत्री की लचर सरकार

शीतांशु कुमार सहाय

दो दशकों पहले जब देश के वित्तमंत्री के रूप में आज के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने केन्द्रीय राजनीति में अपनी पारी की शुरुआत की, तभी से एक अर्थशास्त्री के तौर पर सभी ने उनका लोहा माना। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए की दूसरी पारी में अब चारों ओर से उनपर हमला हो रहा है। उन्हें ऐसे नेता के तौर पर पेश किया जा रहा है जो न तो फ़ैसला कर पाता है, न नेतृत्व देने की क्षमता रखता है और न ही उसके पास देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए कोई स्पष्ट रूपरेखा है। ऊपर से रुपए की क़ीमत लगातार गिरती जा रही है और महँगाई पर सरकार का कोई काबू नहीं है। गोदामों में अनाज सड़ रहे हैं और लोग भूखे मर रहे हैं। किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे में हर कोई सोचने को मजबूर है कि क्या अब भी मनमोहन सिंह को सफल अर्थशास्त्री कहें? 
मनमोहन सिंह असफल प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री हैं। वह गठबंधन धर्म को ऊपर और राष्ट्रधर्म को नीचे रखते हैं। उनकी ही नीतियों के बदौलत और फैसला न ले पाने की वजह से देश की दुर्दशा हो रही है। वर्ष 2009 में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के खिलाफ़ वोट देना उनके असफल अर्थषास्त्र का ही परिचायक है। इस निर्णय की वजह से ईरान ने भारत के साथ 21 अरब डॉलर का गैस समझौता ख़त्म कर दिया। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को जैसा नुक़सान हुआ वह अपूरणीय है। ऐसा ही एफ.डी.आई. के मामले में भी दिखाई दिया।


वास्तव में किसी नेता के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह किसी विषय विषेष के बारे में गहरी जानकारी रखे। नेतृत्व और विद्वत्ता दो भिन्न चीजें हैं। देश को मजबूत नेतृत्व और मनमोहन सिंह जैसे सलाहकार की जरूरत है। मतलब यह कि मनमोहन सिंह सलाहकार ही बेहतर साबित हो सकते हैं, नेतृत्व करना उनके वश की बात नहीं। वे अच्छे अर्थशास्त्री हो सकते हैं लेकिन सच्चाई यही है कि वह प्रधानमंत्री के रूप में केवल एक मूर्ति ही हैं जो न सुन सकती है, न बोल सकती है और न ही कुछ देख सकती है। तभी तो उनकी तुलना किरण बेदी ने धृतराष्ट्र से की। वैसे इसके लिए सिर्फ उन्हें जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए। मंत्रिमंडल की सलाह पर ही प्रधानमंत्री निर्णय लेता है। अगर प्रधानमंत्री देश की जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है, तो इसमें मंत्रिमंडल की भी जवाबदेही है। इस संदर्भ में महान नीतिशास्त्री चाणक्य की बात याद आती है- शासन चलाने के लिए जरूरी है कि आसपास का वातावरण सकारात्मक हो तभी सही नतीजे सामने आएंगे। पर, यहाँ तो मनमोहन सिंह के आसपास का वातावरण बेहद प्रदूषित है। वह कामयाब अर्थशास्त्री हैं पर सही कार्यान्वयन न होने की वजह से उनकी नीतियों के सही नतीजे नहीं निकल पाते। भ्रष्टाचार की वजह से वह असफल साबित हो रहे हैं। इसलिए व्यक्तिगत तौर पर उनके साफ-सुथरे होने का कोई लाभ देश को नहीं मिल पा रहा।


अगर भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री को नाकामयाब बताते हैं, तो कांग्रेसी प्रवक्ता इसे विरोधी दल का षिगूफा कहकर खारिज करते हैं। अब तो सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियाँ भी इस सच्चाई को स्वीकारने लगी हैं। वास्तव में यह स्वीकारोक्ति दलगत राजनीति का हिस्सा नहीं है; बल्कि उसके सर्वेक्षण में जो सच्चाई सामने आई, एजेन्सी ने वही कहा। रेटिंग एजेंसी ‘मूडीज’ के विश्लेषकों के मुताबिक भारत में कमजोर केंद्रीय सरकार ही देश की तरक्की में सबसे बड़ी बाधा है। इस वजह से अर्थव्यवस्था अपनी क्षमता से कम गति से बढ़ रही है। इसके मुताबिक, वर्ष 2012 में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.5 प्रतिषत से कम रहेगी। गंभीर राजनीतिक हालात के कारण जोखिम का स्तर बना हुआ है। वर्ष 2012 की पहली छमाही के दौरान आर्थिक विकास दर छः प्रतिशत के करीब रहने की संभावना है। हालांकि दूसरी छमाही में यह 6.5 प्रतिषत तक पहुंच सकती है।
अर्थव्यवस्था की खराब हालत पर यूपीए सरकार को अब अपने सहयोगियों की भी खरी-खोटी सुननी पड़ रही है। ताजा हमला एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने किया है। कृषि मंत्री शरद पवार ने केंद्र की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि तेल की कीमतें पहले ही बढ़ जानी चाहिए थीं। जब तेल के दाम बढ़ाने चाहिए थे, तब बढ़ाए नहीं गए। नतीजा, देश की आर्थिक हालत बिगड़ी। देश के हित में सरकार को कड़े फैसले लेने चाहिए। सरकारों को देश के फायदे के लिए लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। गौरतलब है कि तेल की कीमतों पर पवार की यह उक्ति सरकार के दूसरे सहयोगी तृणमूल काँग्रेस अध्यक्षा ममता बनर्जी से बिल्कुल उलट है। तेल की कीमतें बढ़ाने के विरोध में ममता ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था। उन्होंने कोलकाता में विरोध मार्च भी निकाला था। बाद में विपक्ष के दबाव बढ़ाने पर सरकार को पेट्रोल की कीमतों में कुछ कमी करनी पड़ी। 


मनमोहन सिंह बहुत समझदार व्यक्ति हैं। वे सब कुछ समझते हैं मगर निर्णय ख़ुद ले नहीं पाते, किसी के इशारे पर चलते हैं। पिछले आठ वर्षों में ऐसा एक भी निर्णय याद नहीं आता जो मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में लिया हो। नरसिंह राव के प्रेस सलाहकार रहे एच.वाई. शारदा प्रसाद ने लिखा है कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री भले ही ‘फ़र्स्ट एमंग इक्वल्स’ हों लेकिन वह होते अव्वल ही हैं। निर्णय लेने में उनसे आगे कोई नहीं होता। पर, मनमोहन सिंह अव्वल दीखते ही नहीं।


मनमोहन सिंह ने प्रथम बार 72 वर्ष की उम्र में 22 मई 2004 से प्रधानमंत्री का कार्यकाल आरम्भ किया, जो अप्रैल 2009 में सफलता के साथ पूर्ण हुआ। इसके पश्चात् लोकसभा के चुनाव हुए और काँग्रेस की अगुवाई वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन पुनः विजयी हुआ और वह दुबारा प्रधानमंत्री बने। उनका 1992 का भाषण याद आता है। वित्तमंत्री के रूप में आर्थिक सुधार की शुरुआत करते हुए उन्होंने महात्मा गाँधी का उद्धरण देते हुए कहा था कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं, वह समाज के आखिरी आदमी के लिए है। आज जब वे प्रधानमंत्री के रूप में आठ साल पूरा कर रहे हैं तो यह देखना पीड़ादायक है कि उनकी अध्यक्षता वाला योजना आयोग को हर रोज़ 26 रुपए कमाने वाला भी ग़रीब नज़र नहीं आता। 


यूपीए-1 के लिए यूपीए-2 एक भयानक शत्रु बन गया है। इसमें घोटालों का जन्म तेज रफ्तार से हो रहा है। इस सरकार में शुरुआती सौदे काफी तेजी से हो जाते हैं। दोनों पक्षों को आपस में संवाद करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। यहां दलाली करने वाले बेहद सक्षम और योग्य हैं। अगर देरी होती है तो बस तोल-मोल में ही। दोनों पक्षों को यह मालूम होता है कि सौदा तो किया ही जाना है, इसलिए यह सब एक निश्चित समय सीमा के भीतर निबटा लिया जाता है। समय लगता है इन घोटालों पर से पर्दा हटाने में। परियोजनाओं के जमीन पर उतरने में वक्त लगता है। फिर कोई शिकायत करता है, तब इस पर जाँच शुरू होती है लेकिन निर्णय नहीं आता। वैसे यूपीए-2 का हर मंत्री ईमानदार और पवित्र होना चाहता है लेकिन मंत्री पद छोड़ने के बाद। जब वे सत्ता में हैं तो जेब का ही ख्याल रखेंगे नऽ। काँग्रेस ने यह धारणा प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत ईमानदारी पर प्रश्न खड़ा नहीं किया जा सकता। शायद ऐसा है भी। पर, यह कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि मुझे इस बावत ‘शायद’ षब्द का प्रयोग करना पड़ रहा है।


अब देखिये कि इन दिनों कोयला घोटाले का षोर बहुत ज्यादा है। शिबू सोरेन के इस्तीफे के बाद से कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री के ही पास है। अगर कोयला मंत्रालय में उनकी निगरानी में बड़ी लूट को अंजाम दिया गया, तो उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी। अगर उन्होंने देश के संसाधनों की लूट की इजाजत दी, तो उन्हें जवाब देना होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लूट का पैसा दूसरे लोग ले गए। प्रधानमंत्री की कमजोरी का आलम देखिये कि झारखण्ड से आनेवाले केन्द्रीय मंत्री सुबोध कान्त सहाय एक कम्पनी के पक्ष में प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं और उस कम्पनी को कोल ब्लॉक का आवण्टन हो जाता है।


वर्ष 2004 में जब प्रधानमंत्री ने अपना पहला भाषण दिया था तो उन्होंने संस्थागत सुधारों की बात कही थी। उन्होंने मूल रूप से नौकरशाही में सुधार की बात थी। पर, वह नौकरशाहों के सामने भी कमजोर साबित हुए और सुधार की बातं हवा-हवाई हो गई। इसी तरह अनशन के दौरान अन्ना हजारे को पुलिस हिरासत में लेना और स्वामी रामदेव के सो रहे सत्याग्रहियों पर रात में पुलिसिया कार्रवाई करवाकर अपनी कमजोरी की पराकाष्ठा उन्होंने दिखा दी। इसी सन्दर्भ में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री सहित टीम अन्ना ने जिन केन्द्रीय मंत्रियों के खिलाफ स्वतंत्र विशेष जाँच टीम से तहकीकात करवाने की माँग की है उनमें पी. चिदंबरम, शरद पवार, एस.एम. कृष्णा, कमलनाथ, प्रफुल्ल पटेल, विलास राव देशमुख, वीरभद्र सिंह, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, जी.के. वासन, फारुख अब्दुल्ला, एम.अझागिरी और सुशील कुमार शिंदे के नाम शामिल हैं। उन्होंने यह सुझाव भी दिया है कि सरकार छः अवकाष प्राप्त न्यायाधीश के एक पैनल में से तीन न्यायाधीश का चुनाव भी कर सकती है। न्यायाधीषों में न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी, ए.के. गांगुली, ए.पी. शाह, कुलदीप सिंह, जे.एस. वर्मा और एम.एन. वेंकटचेलैया शामिल हैं। यों काले धन को स्वदेश लाने के मुद्दे पर मुहिम चला रहे रामदेव ने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा है कि अगर वह वाकई में ईमानदार हैं तो काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दें। 

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

बीमारियों की जड़ पेट के कीडे़

       इस सम्पूर्ण सृष्टि में मानव शरीर सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए हर प्रकार से हमें इसकी रक्षा करनी चाहिये। परन्तु, मानव अपनी क्षणिक मानसिक तृप्ति के लिये तरह-तरह के सडे़-गले व्यंजन जो शरीर के लिये हानिकारक हैं, खाता रहता है। इससे शरीर में अनेकों तरह के कीडे़ पैदा हो जाते है और यही शरीर की अधिकतर बीमारियों के जनक बनते है। ये कीडे़ दो तरह के होते हैं। प्रथम, बाहर के कीडे़ और द्वितीय, भीतर के कीडे़। बाहर के कीडे़ सर में मैल और शरीर में पसीने की वजह से जन्मते हैं, जिन्हं जूँ, लीख और चीलर आदि नामों से जानते हैं। अन्दर के कीड़े तीन तरह के होते हैं। प्रथम पखाने से पैदा होते है, जो गुदा में ही रहते हैं और गुदा द्वार के आसपास काटकर खून चूसते हैं। इन्हे चुननू आदि अनेकों नामों से जानते हैं। जब यह ज्यादा बढ़ जाते हैं, तो ऊपर की ओर चढ़ते हैं, जिससे डकार में भी पखाने की सी बदबू आने लगती है। दूसरे तरह के कीडे़ कफ के दूषित होने पर पैदा होते हैं, जो छः तरह के होते हैं। ये आमाशय में रहते हैं और उसमें हर ओर घूमते है। जब ये ज्यादा बढ़ जाते हैं, तो ऊपर की ओर चढ़ते हैं, जिससे डकार में भी पखाने की सी बदबू आने लगती है। तीसरे तरह के कीडे़ रक्त के दूषित होने पर पैदा हो सकते हैं, ये सफेद व बहुत ही बारीक होते हैं और रक्त के साथ-साथ चलते हुये हृदय, फेफडे़, मस्तिष्क आदि में पहुँचकर उनकी दीवारों में घाव बना देते हैं। इससे सूजन भी आ सकती है और यह सभी अंग प्रभावित होने लगते हैं। इनके खून में ही मल विसर्जन के कारण खून भी धीरे-धीरे दूषित होने लगता है, जिससे कोढ़ जनित अनेकों रोग होने का खतरा बन जाता है।

      एलोपैथिक चिकित्सा के मतानुसार अमाशय के कीड़े खान-पान की अनियमितता के कारण पैदा होते हैं,जो छः प्रकार के होते है। 1- राउण्ड वर्म 2- पिन वर्म 3- हुक वर्म 5-व्हिप वर्म 6-गिनी वर्म आदि तरह के कीडे़ जन्म लेते हैं।

कीडे़ क्यों पैदा होते हैं- बासी एवं मैदे की बनी चीजें अधिकता से खाने, ज्यादा मीठा गुड़-चीनी अधिकता से खाने, दूध या दूध से बनी अधिक चीजें खाने, उड़द और दही वगैरा के बने व्यंजन ज्यादा मात्रा में खाने, अजीर्ण में भोजन करने, दूध और दही के साथ-साथ नमक लगातार खाने, मीठा रायता जैसे पतले पदार्थ अत्यधिक पीने से मनुष्य शरीर में कीडे़ पैदा हो जाते हैं। कीडे़ पैदा होने के लक्षण एवं बीमारियाँ  शरीर के अन्दर मल, कफ व रक्त में अनेकों तरह के कीडे़  पैदा होते हैं। इनमें खासकर बड़ी आंत में पैदा होने वाली फीता कृमि (पटार) ज्यादा खतरनाक होती है। जो प्रत्येक स्त्री-पुरूष व बच्चों के पूरे जीवनकाल में अनेक बीमारियों के जन्म देती हैं, जो निम्नवत है:-
1- आंतां में कीड़ों के काटने व उनके मल विसर्जन से सूजन आना, पेट में हल्का-हल्का दर्द, अजीर्ण, अपच, मंदाग्नि, गैस, कब्ज आदि का होना।      2- शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ना, जिससे अनेकों रोगों का आक्रमण ।     3- बड़ों व बच्चों में स्मरण शक्ति की कमी, पढ़ने में मन न लगना, कोई बात याद करने पर भूल जाना।       4- नींद कम आना, सुस्ती, चिड़चिड़ापन, पागलपन, मिर्गी, हाथ कांपना, पीलिया रोग आदि होना।    5- पित्ती, फोड़े, खुजली, कोढ़, आँखों के चारों ओर सूजन, मुँह में झंाई, मुहांसे आदि होना।     6- पुरुषों में प्रमेह, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, बार-बार पेशाब जाना आदि।     7-स्त्रियों की योनि से सफेद पदार्थ बराबर निकलना, श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर आदि।   8- बार-बार मुँह में पानी आना, अरुचि तथा दिल की धड़कन बढ़ना, ब्लडप्रेशर आदि।    9- ज्यादा भूख लगना, बार-बार खाना, खाने से तृप्ति न होना, पेट निकल आना।   10- भूख कम लगना, शरीर कमजोर होना, आंखो की रोशनी कमजोर होना।    11- अच्छा पौष्टिक भोजन करने पर भी शरीर न बनना क्योंकि पेट के कीड़े आधा खाना खा जाते है।    12- फेफड़ो की तकलीफ, सांस लेने में दिक्कत, दमा की शिकायत, एलर्जी आदि।    13- बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास में कमी आना।     14- बच्चों का दांत किटकिटाना, बिस्तर पर पेशाब करना, नींद में चौंक जाना, उल्टी होना।      15- आंतो में कीड़ो के काटने पर घाव होने से लीवर एवं बड़ी आंत में कैंसर होने का खतरा। कैंसर के जीवाणु खाना के साथ लीवर व आंत में पहुँचकर कीड़ो के काटने से हुए घाव में सड़न पैदा कर कैंसर का रूप ले लेते हैं।

      ये कीड़े संसार के समस्त स्त्री-पुरुष व बच्चों में पाये जाते है। यह छोटे-बडे 1 सेन्टीमीटर से 1मीटर तक लम्बे हो सकते हैं एवं इनका जीवनकाल 10से12वर्ष तक रहता है। यह पेट की आंतो को काटकर खून पीते है जिससे आंतो में सूजन आ जाती है। साथ ही यह कीड़े जहरीला मल विसर्जित भी करते हैं जिससे पूरा पाचन तंत्र बिगड़ जाता है। यह जहरीला पदार्थ आंतो द्वारा खींचकर खून में मिला दिया जाता है जिससे खून में खराबी आ जाती है। यही दूषित खून पूरे शरीर के सभी अंगों जैसे हृदय, फेफड़े, गुर्दे, मस्तिष्क आदि में जाता है जिससे इनका कार्य भी बाधित होता है और अनेक रोग जन्म ले लेते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है और अनेक रोग हावी हो जाते हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को प्रतिवर्ष कीड़े की दवा जरूर लेनी चाहिए। एलोपैथिक दवाओं में ज्यादातर कीड़े मर जाते हैं, परन्तु जो ज्यादा खतरनाक कीड़े होते हैं, जैसे- गोलकृमि, फीताकृमि, कद्दूदाना आदि, जिन्हें पटार भी कहते हैं, वे नहीं मरतें हैं। इन कीड़ों पर एलोपैथिक दवाओं को कोई प्रभाव नहीं पडता है, इन्हें केवल आयुर्वेदिक दवाओं से ही खत्म किया जा सकता है। ये कीड़े मरने के बाद फिर से हो जाते हैं। इसका कारण खान-पान की अनियमितता है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिये प्रत्येक वर्ष कीड़े की दवा अवश्य खानी चाहिये।

कृमि रोग की चिकित्सा- 1- बायबिरंग, नारंगी का सूखा छिलका, चीनी(शक्कर) को समभाग पीसकर रख लें। 6ग्राम चूर्ण को सुबह खाली पेट सादे पानी के साथ 10दिन तक प्रतिदिन लें। दस दिन बाद कैस्टर आयल (अरंडी का तेल) 25ग्राम की मात्रा में शाम को रोगी को पिला दें। सुबह मरे हुए कीड़े निकल जायेंगे।
2- पिसी हुई अजवायन 5ग्राम को चीनी के साथ लगातार 10दिन तक सादे पानी से खिलाते रहने से भी कीड़े पखाने के साथ मरकर निकल जाते है।
3- पका हुआ टमाटर दो नग, कालानमक डालकर सुबह-सुबह 15 दिन लगातार खाने से बालकों के चुननू आदि कीड़े मरकर पखाने के साथ निकल जाते है। सुबह खाली पेट ही टमाटर खिलायें, खाने के एक घंटे बाद ही कुछ खाने को दें।
4- बायबिरंग का पिसा हुआ चूर्ण तथा त्रिफला चूर्ण समभाग को 5ग्राम की मात्रा में चीनी या गुड़ के साथ सुबह खाली पेट एवं रात्रि में खाने के आधा घंटे बाद सादे पानी से लगातार 10दिन दें। सभी तरह के कृमियों के लिए लाभदायक है।
5- नीबू के पत्तों का रस 2ग्राम में 5 या 6 नीम के पत्ते पीसकर शहद के साथ 9 दिन खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।
6- पीपरा मूल और हींग को मीठे बकरी के दूध के साथ 2ग्राम की मात्रा में 6दिन खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

काले धन पर सरकारी प्रयास

शीतांशु कुमार सहाय
काले धन का विरोध भारत में आपातकाल के दौर से ही एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है। समस्या यह है कि विरोध करने वाले जब सरकार में होते हैं तो वे इस मामले को व्यावहारिक नजरिये से देखने लगते हैं। इसे काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में चले नागरिक आंदोलन का असर कहें या अदालतों द्वारा बात-बात पर लगाई जा रही फटकार का लेकिन भारत सरकार अभी इस बीमारी से निपटने को लेकर गंभीर होती दीख रही है।
केन्द्रीय सरकार काले धन पर संसद के वर्तमान बजट सत्र में श्वेत पत्र लाएगी। यह ऐलान वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने 16 मार्च 2012 शुक्रवार को लोकसभा में आम बजट पेश करते हुए किया। उन्होंने कहा कि पिछले साल काले धन के सृजन और उसके चलन की बुराई तथा भारत से बाहर इसके गैर कानूनी लेनदेन की समस्या का सामना करने के लिये एक पंचआयामी कार्यनीति को रेखांकित किया गया था। सरकार ने इस कार्यनीति पर अमल के लिए कई सक्रिय कदम उठाए हैं। मुखर्जी ने बताया कि दुहरे कराधान से बचने के लिये 82 तथा कर सूचना आदान-प्रदान के लिये 17 करार विभिन्न देशों के साथ किये गए और भारतीयों के विदेश स्थित बैंक खातों और परिसंपत्तियों के संबंध में सूचना हासिल होनी शुरू हो गई है। कुछ मामलों में कानूनी कार्रवाई शुरू की जाएगी। उन्होंने बताया कि केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) में आयकर आपराधिक अन्वेषण निदेशालय की स्थापना की गई है। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक ए.पी. सिंह कह चुके हैं कि विदेश में भारतीयों का 24.5 लाख करोड़ रुपए काला धन जमा है। सिंह का यह बयान सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति की रिपोर्ट के आधार पर आया था।
सेंट्रल बोर्ड आॅफ डायरेक्ट टैक्सेज, एनफोसर्मेंट डायरेक्टरेट, रेवेन्यू इंटेलिजेंस, फायनेंशल इंटेलिजेंस और कानून मंत्रालय के कई अधिकारियों को लेकर गठित एक उच्चाधिकार समिति ने काले धन पर रोक लगाने के लिए कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये हैं। आम लोगों का मानना है कि काला पैसा कमाने में राजनेताओं और नौकरशाहों का कोई सानी नहीं है लेकिन समिति का निष्कर्ष यह है कि देश में सबसे ज्यादा काला धन इस समय जमीन-जायदाद, सोना-चांदी और जेवरात के धंधे में पैदा हो रहा है। इससे निपटने के लिए रीयल एस्टेट और कमोडिटी कारोबार पर नजर रखने के कुछ ठोस उपाय सुझाए गए हैं। मसलन यह कि अचल संपत्ति की कारोबारी खरीद-फरोख्त को आयकर कानून के दायरे में लाया जाए। सबसे ज्यादा चिंता काले धन और भ्रष्टाचार के मुकदमों के लंबा खिंचने को लेकर जताई गई है।
इन्हें जल्द से जल्द निपटाने के लिए सुझाव दिया गया है कि सभी उच्च न्यायालय इन मुकदमों के लिए विशेष न्यायालय गठित करें और इनमें बैठने वाले न्यायाधीशों के लिये अलग से प्रशिक्षण और रिफ्रेशर कोर्स की व्यवस्था की जाए। समिति ने ऐसे मामलों के दोषियों को मिलने वाली सजा सात से बढ़ाकर दस साल करने का भी सुझाव दिया है। देश के बाहर जमा काले धन के बारे में कमेटी का सुझाव है कि एक निश्चित सीमा से ज्यादा धन देश से बाहर जाने की स्थिति में देसी और विदेशी, दोनों तरह के बैंकों के लिये उसका पूरा रेकॉर्ड रखना और इसकी जानकारी भारत सरकार को देना जरूरी बना दिया जाए। ये सुझाव बहुत अच्छे हैं और विभिन्न नागरिक समूहों से फीडबैक लेकर इन्हें और ताकतवर बनाया जा सकता है।
इन सुझावों का दायरा मुख्यत: महानगरीय लगता है लेकिन ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्र भी काले धन के खिलाड़ियों से कम त्रस्त नहीं हैं। एक बड़ी समस्या सरकार के नजरिये की भी है, जो कॉरपोरेट सेक्टर पर हाथ डालने से आम तौर पर कतराती है और निवेश बढ़ाने के नाम पर कुछ-कुछ समय बाद वॉलंटरी डिस्क्लोजर स्कीमें लेकर हाजिर हो जाती है। इस मामले में हमें चीनियों और अमेरिकियों से सबक लेनी चाहिए, जो बिल्कुल विपरीत विचारधारा वाले देश होने के बावजूद अपनी सरकार को चूना लगाने वालों के मामले में बिल्कुल एक-से बेरहम हैं।

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

रामदेव को व्यवसायी कहनेवाले गांधीजी को गाली तो नहीं दे रहे

शीतांशु कुमार सहाय

लगातार कांग्रेस के नेताओं के बयान आ रहे हैं कि बाबा रामदेव बिजनसमैन हैं। कांग्रेस के एक बयान पुरुष दिग्विजय सिंह ने असभ्यतापूर्ण लहजे में रामदेव के खिलाफ बयान देकर एकबार फिर अपनी असभ्यता का परिचय दिया। अगर रामदेव व्यवसायी हैं तो कांग्रेसी महात्मा गाँधी को भी व्यवसायी ही कहेंगे। विदित हो कि गाँधीजी खादी स्टोर के माध्यम से स्पदेशी वस्तुएं बेचा करते थे और दूसरों को भी इसें लिये प्रेरित किया करते थे।
बाबा रामदेव की संस्था पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट ने देश में स्वदेशी और अच्छे उत्पादों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पूरे भारत में स्वदेशी स्टोर खोलने और इनके माध्यम से देश में सस्ते मूल्य पर शुद्ध उपभोक्ता सामग्रियों को उपलब्ध कराने की योजना बनाई है। रामदेव के इस कदम से बाजार में लूट मचा रही उपभोक्ता सामग्रियों वाली कंपनियों में खलबली मच गई है। खलबली इसलिये कि बाबा ने पहले ही कई अच्छे उत्पाद बिना किसी विज्ञापन के पहले ही सफलतापूर्वक बाज़ार में ला चुके हैं।


आजकल कांग्रेस के लोग बाबा रामदेव को न जाने क्या-क्या शब्दावली से नवाज रहे हैं। ऐसे कांग्रेसी महात्मा गाँधी के बारे में क्या कहेंगे? महात्मा गाँधी ने भी स्वदेशी परिकल्पना पर काम किया था और खादी एवं ग्रामोद्योग के माध्यम से देशभर में खादी स्टोर खोले थे जहां पर हर तरह की जरूरी वस्तुएं आज भी बिकती हैं। कुछ मीडिया के सुर भी कांग्रेसी टाईप के ही दीख रहे हैं। ...तो क्या मीडिया और कांग्रेसी महात्मा गाँधी को भी व्यापारी कहेगी? महात्मा गाँधी नवजीवन प्रेस के माध्यम से किताबें छापकर बेचा करते थे तो क्या कांग्रेस उन्हें व्यापारी कहेगी?
बाबा रामदेव की परिकल्पना के बारे में बाबा के मीडिया सलाहकार वेद प्रताप वैदिक के अनुसार, बाबा पूरे देश में कुटीर उद्योग के माध्यम से सहकारिता के तर्ज पर लोगों से चीजें बनवाएंगे और उन लोगों को बेचने के लिये अपने स्टोर पर उनको जगह भी देंगे। इससे देश में रोजगार बढ़ेगा। बेरोजगारों को पतंजलि ट्रस्ट ने बड़े पैमाने पर रोजगार दिया है।


इस संदर्भ में कुछ सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब कांग्रेसियों को देने ही चाहिये। क्या बाबा रामदेव का अपना कोई परिवार है जिसके लिए वे पैसा कमाने की सोच रहे हैं? रामदेव ने जो अपने पैसे से दो सौ करोड़ में पतंजलि विश्वविद्यालय और तीन सौ करोड़ की लागत से आवासीय सुविधायुक्त विश्व का सबसे बड़ा योग केन्द्र बनवाया है उसमें सरकार ने कोई सहयोग दिया है? 


नियमानुसार किसी भी ट्रस्ट का पदेन सहअध्यक्ष उस जिले का जिलाधिकारी होता है जिस जिले में ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन होता है। पतंजलि ट्रस्ट के अध्यक्ष हरिद्वार के जिलाधिकारी हैं जिनके हस्ताक्षर के बिना बाबा एक रूपये भी खर्च नहीं कर सकते। इसके अलावा बाबा के सभी ट्रस्टों के आय और व्यय का आॅडिट सरकार करवाती है। ... तो फिर ट्रस्ट की आय और व्यय के संबंध में कांग्रेसी उल्टी-सीधी बात करके जनता को भ्रमित क्यों करते हैं?


एक सच्चाई जानिये कि सोनिया गाँधी राजीव गाँधी स्मारक ट्रस्ट की मुखिया हैं। इस ट्रस्ट के पास भारत में बीस हज़ार एकड़ जमीन है। राजीव गांधी का स्मारक वीरभूमि, इंदिरा गांधी का स्मारक शक्तिस्थल, जवाहरलाल नेहरू का स्मारक शांतिवन और तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर मं बना राजीव गाँधी के मृत्यु स्थल का स्मारक इस ट्रस्ट की जागीर है। ये कुल आठ हज़ार एकड़ में हैं जिनकी कीमत आज कई लाख अरब रूपये है। 


इस ट्रस्ट का आजतक कोई आडिट नहीं हुआ है, क्योंकि इसका रजिस्ट्रेशन एक चैरिटी ट्रस्ट के रूप में हुआ है जो सिर्फ इस नेहरू खानदान के लिए चैरिटी करता है। राजीव गाँधी फाउंडेशन की भी मुखिया सोनिया गाँधी हैं। ये भी एक चैरिटी ट्रस्ट है इसको 2006 में मनमोहन सरकार ने दो सौ करोड़ रूपये दिये थे जिस पर संसद में काफी हंगामा हुआ, क्योंकि कोई भी सरकार किसी निजी ट्रस्ट को इसका कभी आॅडिट न हुआ हो उसको सरकार पैसे नहीं दे सकती। बाद में मनमोहन सरकार ने पैसा वापस ले लिया था। इस ट्रस्ट को बिना किसी नियम-कायदे के राजस्थान सरकार ने गुणगांव और फरीदाबाद में दो सौ एकड़ जमीन सिर्फ एक रूपये में दिया है। महाराष्टÑ सरकार ने मुंबई में कोहिनूर मिल की दो एकड़ और पुणे में चालीस एकड़ जमीन मुफ्त में इस ट्रस्ट को दिया है। इन मामले पर कांग्रेसी क्यों नहीं कुछ बोलते?


क्या इस देश में पैसा कमाना फिर उस पैसे को किसी अच्छे काम में लगाना अपराध है? आज कांग्रेस के नेता और खासकर दिग्विजय सिंह लोगो को संन्यासी की परिभाषा बताते हैं तो फिर वे सतपाल महाराज के बारे में कुछ क्यों नहीं बोल पा रहे हैं? सतपाल महाराज के तीन मेडिकल कॉलेज चार फिजियोथेरेपी कॉलेज और कई दूसरे कॉलेज हैं। ये कांग्रेस के बड़े नेता हैं और केन्द्र में रेल राज्यमंत्री भी रहे हैं।  उत्तर प्रदेश में सतपाल ने कांग्रेस का खूब प्रचार किया है। ...तो ये कौन से संन्यासी हैं? इन्होंने तो आजतक आम आदमी के लिए कुछ नहीं किया? असल में कांग्रेस पिछले दो सालों से बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के पीछे अपनी पूरी जाँच एजेंसियों से सब कुछ जाँच करवा लिया और अवैध कुछ भी नहीं मिला, इसलिए अब कांग्रेस अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है। मीडिया में बाबा की आलोचना के पीछे बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और कांग्रेस दोनों की मिलीभगत है, क्योकि रामदेव से दोनों बहुत डरती हैं। इसका नमूना लोगों ने तब देख लिया जब राहुल गाँधी से एक प्रत्रकार ने कालेधन पर सवाल   पूछ लिया तो उन्हें बाबा रामदेव दीखने लगे। उत्तर प्रदेश में जिस तरह से बाबा ने कांग्रेस के खिलाफ जमकर प्रचार किया। इससे कांग्रेस की हालत बहुत खराब हुई है। 

मंगलवार, 27 मार्च 2012

भारत का श्रीलंका की खिलाफत के मायने

  मुंबई में आतंकी हमले के बाद से लगातार पाकिस्तान के प्रति ढुलमुल रवैया, मालदीव मुद्दे पर ख़ामोशी और अब श्रीलंका के विरुद्ध अमेरिकी प्रस्ताव का समर्थन- ये तीन गंभीर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक मसले हैं जो वर्तमान केंद्रीय सरकार की लचर विदेश नीति के प्रमाण हैं। 
  शीतांशु कुमार सहाय
संयुक्तराष्ट मानवाधिकार परिषद यानी यूएनएचआरसी में श्रीलंका के खिलाफ 22 मार्च को लाए गए अमेरिकी प्रस्ताव के पक्ष में भारत सहित 23 अन्य देशों ने मतदान किया। बात अन्य देशों का नहीं, बल्कि भारत का है। भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर श्रीलंका की खिलाफत आसानी से गले नहीं उतरती। वैसे भी लिबरेशन टाइगर्स आफ तमिल ईलम (लिट्टे) के खात्मे के लिये तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा दिये गए सैन्य सहयोग के कारण श्रीलंकाई तमिल  अबतक भारतीय पक्ष में नहीं बोलते हैं। संयुक्तराष्ट्र के प्रस्ताव पर पक्ष में 24 मत और खिलाफ में 15 मत पड़े जबकि मतदान से आठ देश अनुपस्थित रहे। चीन और रूस ने प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया। प्रस्ताव में कोलम्बो से अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के कथित उल्लंघन से निपटने का आह्वान किया गया है। ज्ञात हो कि श्रीलंकाई सेना ने 26 वर्षों के गृहयुद्ध को समाप्त करते हुए मई 2009 में लिट्टे का सफाया कर दिया। युद्ध के अंतिम चरण में हजारों नागरिक मारे गए। प्रस्ताव में श्रीलंका से तमिल टाइगर्स के खिलाफ युद्ध के अंतिम चरण में हुए कथित मानवाधिकारों के हनन की जांच कराने का अनुरोध किया गया है। श्रीलंका से पूछा गया है कि मानवाधिकारों के कथित हनन से वह कैसे निपटेगा और युद्ध पर आंतरिक जांच की अनुशंसाओं को कैसे लागू करेगा? उल्लेखनीय है कि चीन एवं रूस ने श्रीलंका का समर्थन और प्रस्ताव का विरोध किया। मुंबई में आतंकी हमले के बाद से लगातार पाकिस्तान के प्रति ढुलमुल रवैया, मालदीव मुद्दे पर ख़ामोशी और अब श्रीलंका के विरुद्ध अमेरिकी प्रस्ताव का समर्थन- ये तीन गंभीर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक मसले हैं जो वर्तमान केंद्रीय सरकार की लचर विदेश नीति के प्रमाण हैं। यहां यह जानने की बात है कि चीन ने श्रीलंका का समर्थन कर भारत से एक और हितैषी पड़ोसी को भारत का विरोधी बना दिया। यों तीन पड़ोसी भारत के विरोधी हो गए- चीन, पाकिस्तान और अब श्रीलंका। बांग्लादेश को भी सहयोगी नहीं ही मानना चाहिये। यों उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम चारों दिशाओं के पड़ोसियों को केंद्रीय सरकार की गलत विदेश नीति ने शत्रु बना दिया। विविध स्वार्थों की पूर्ति को मज़बूरी का नाम देकर मनमोहन सरकार आंतरिक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर हो रही अंधेरगर्दी से खुद का बचाव करती है। बार-बार देशहित की बलि चढ़ाने के बावजूद केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार बनी हुई है। 2-जी घोटाले के पौने दो लाख करोड़ रुपए को काफी पीछे छोड़कर साढ़े दस लाख करोड़ रुपए का कोयला घोटाला सामने आ गया है। आतंकवाद चरम पर है, नक्सलवाद के दलदल से उबरने के बजाय धंसते ही जा रहे हैं हम, महंगाई आसमान पर है... फिर भी यह सरकार क्यों बची हुई है? कहाँ है विपक्ष ? क्यों नहीं भाजपा जैसे राष्ष्ट्रवादी दल ने श्रीलंका का समर्थन करने हेतु सरकार पर दबाव बनाया? क्यों नहीं देश की मीडिया ने श्रीलंका मसले पर राष्ष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए बहस किया? क्यों खामोश रहे हमारे बुद्धिजीवी ? बहरहाल, तिब्बत और नेपाल के बाद अब श्रीलंका के मसले पर हमारी कूटनीति की उदासीनता या नासमझी ने इन तीनों पड़ोसियों को चीन के करीब और भारत से दूर कर दिया है। यही क्रम जारी रहा तो ये भी पौराणिक-सांस्कृतिक संबंधों को भुलाकर हमारे खिलाफ चीन की शह पर उठ खड़े हो सकते हैं। इस संदर्भ में भारत ने आश्वासन दिया है कि वह श्रीलंका के साथ खड़ा रहेगा। यूएनएचआरसी में श्रीलंका के खिलाफ 22 मार्च 2012 को लाए गए अमेरिकी प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने के बाद भारत ने कोलम्बो के साथ अपने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक रिश्तों का हवाला दे उसे साधने की कोशिश की। भारत ने कहा कि वह श्रीलंका के साथ हमेशा खड़ा करेगा। कोलम्बो के खिलाफ प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करने वाले 23 अन्य देशों का साथ देने के बाद भारत ने श्रीलंका के साथ अपने मजबूत सम्बंधों का हवाला दिया। यह सच है कि भारत व श्रीलंका के बीच पौराणिक-सांस्कृतिक संबंध हैं, तो फिर लाचारी क्या थी मनमोहन सरकार की कि वह पड़ोसी के खिलाफ अमेरिका के पक्ष में मतदान को विवश हो गई? संयुक्तराष्ट्र मानवाधिकार परिषद में प्रस्ताव बहुमत से पारित होने के बाद श्रीलंका ने नाराजगी प्रकट की लेकिन इसके तुरंत बाद ही भारत सरकार की सफाई आई कि यह भारत, अमेरिका व श्रीलंका के सम्बंधों पर असर नहीं डालेगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नई दिल्ली में श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव पर भारत के मतदान को सही ठहराया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी प्रस्ताव का भारतीय समर्थन सरकार के रूख पर आधारित है। समझ में अब आया कि मनमोहन सरकार का रूख आखिर देशहित में कितना है? उन्होंने श्रीलंका से तमिलों को न्याय देने की अपील भी की। प्रधानमंत्री ने कहा, "हमें भला-बुरा देखना पड़ता है... हमने अपने रूख के अनुसार प्रस्ताव पर मतदान किया है... हम श्रीलंका की सम्प्रुभता का उल्लंघन नहीं करना चाहते लेकिन हमारी चिंताओं का समाधान होना चाहिए, ताकि तमिलों को न्याय मिले और वे सम्मानित जीवन गुजार सकें।" यों श्रीलंका में उठी भारत विरोधी बयार के बीच भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी एक बयान जारी किया। बयान को हू-ब-हू आप भी जानिये, "एक ऐसे पड़ोसी देश जिसके साथ हजारों वर्षों के मैत्रीपूर्ण सम्बंध और आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक रिश्ते हैं, हम उस देश के घटनाक्रमों से अछूते नहीं रह सकते।" विदेश मंत्रालय की बात समझ में आती है   कि भारत प्रस्ताव के व्यापक संदेश और उद्देश्यों से सहमत है परन्तु संयुक्तराष्ट्र मानवाधिकार परिषद की ओर से कोई भी सहायता श्रीलंका की सहमति से ही दी जा सकती है। मंत्रालय की बातों पर विश्वास करें तो यह विदित होता है कि भारत मानता है कि मानवाधिकारों के बढ़ावे और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी सम्बंधित देश की होती है। प्रस्ताव में श्रीलंका से अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के कथित उल्लंघन से निपटने का आह्वान किया गया है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके ने यूएनएचआरसी में श्रीलंका के खिलाफ लाए गए अमेरिकी प्रस्ताव के पक्ष में भारत के मतदान का स्वागत किया है। डीएमके ने कहा कि तमिलों को उनके अधिकार सुनिश्चित कराना महत्त्वपूर्ण है। अब पूरी तरह समझ लीजिये कि राष्ट्रहित से ऊपर है डीएमके के सहयोग से चल रही केंद्र की कांग्रेसी सरकार को बचाना। श्रीलंका के विरोध में मतदान कर मनमोहन सरकार ने यही संदेश दिया है। हाल ही में कारावास से बाहर आर्इं डीएमके की सांसद कनिमोझी ने कहा है कि तमिलनाडु के सभी दल प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करने के लिये सरकार से मांग कर रही थीं। कनिमोझी ने कहा, "भारत ने प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया, यह वास्तव में अच्छी बात है।" उन्होंने कहा कि श्रीलंका में अंतर्राष्ट्रीय कानून का पालन किया जाना महत्त्वपूर्ण है। कनिमोझी के अनुसार, तमिलों को उनके अधिकार दिलाना और उनके पुनर्वास की बंदोबस्ती महत्त्वपूर्ण है।" इस बीच श्रीलंका ने भी कहा कि उसके खिलाफ प्रस्ताव लाए जाने के बावजूद भारत व अमेरिका के साथ उसकी मित्रता पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। श्रीलंका के कार्यवाहक सूचना मंत्री लक्ष्मण यापा अबेयवर्दना ने कहा है कि भारत की आंतरिक राजनीतिक स्थिति ने भारत को श्रीलंका के खिलाफ लाए गए अमेरिकी समर्थित प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने के लिये बाध्य किया है। मतलब यह कि मनमोहन सरकार की लाचारी अब अंतर्राष्ट्रीय चर्चा का विषय हो गया है। अबेयवर्दना ने माना है कि प्रस्ताव पर भारत ने जो फैसला किया है उससे नई दिल्ली के साथ कोलम्बो के सम्बंध प्रभावित नहीं होंगे। पर, उनका यह कहना कि भारत अपनी मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर विचार करते हुए श्रीलंका पर स्वतंत्र  फैसला कर सकता है, भारत सरकार की कमजोरी ही प्रदर्शित करता है। दरअसल, केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस को हाल के विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा और अमेरिका समर्थित प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने के लिये तमिलनाडु के सभी राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर केंद्रीय सरकार पर दबाव बनाया। अबेयवर्दना के इस विश्वास पर कि भारत बाद में भी श्रीलंका को आवश्यकता पड़ने पर सहायता करेगा, खरा उतरेगा ही।

शनिवार, 24 मार्च 2012

स्वैच्छिक समलैंगिकता अब अपराध नहीं

  शीतांशु कुमार सहाय
दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में केंद्रीय सरकार के विभिन्न हलफनामों पर विचार के बाद न्यायाधीश न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी तथा न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने कहा कि केंद्र ने मामले को काफी हल्के में लिया है जिसकी निंदा किये जाने की जरूरत है। केंद्रीय सरकार ने समलैंगिक मामले पर उच्चतम न्यायालय में अपना रूख स्पष्ट करते हुए 21 मार्च 2012 को कहा कि इस मामले को अपराध के दायरे से बाहर रखने में कोई त्रुटि नहीं है। 
अब अपने देश में पुरुष का पुरुष के साथ और लड़की का लड़की के साथ का शारीरिक सम्बन्ध बनाना अपराध नहीं कहलाएगा। 21 मार्च 2012 को सर्वोच्च न्यायालय में भारत सरकार ने अपनी सफाई में ऐसा ही कहा। सरकार ने वैज्ञानिक-अध्यात्म पर आधारित समृद्ध भारतीय परम्परा को दरकिनार करते हुए समलैंगिकता को मौलिक अधिकार बता दिया।
उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर लाने के अहम मुद्दे पर ढीला रूख अख्तियार करने को लेकर 20 मार्च 2012 को केंद्र सरकार की खिंचाई की थी। इस बात पर भी न्यायाधीशों ने चिंता जताई है कि इतने अहम मुद्दों पर संसद चर्चा नहीं करती और न्यायपालिका पर सीमा लांघने का आरोप लगाती है। दिल्ली उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में सरकार के विभिन्न हलफनामों पर विचार के बाद न्यायाधीश न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी तथा न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने कहा कि केंद्र ने मामले को काफी हल्के में लिया है जिसकी निंदा किये जाने की जरूरत है। पीठ ने कहा कि भारत सरकार ने इस मामले को काफी हल्के में लिया है। केंद्र सरकार के इस बर्ताव की निंदा किये जाने की जरूरत जताई है न्यायमूर्तियों ने। जनहित के मुद्दे पर संसद की उदासीनता के बावत सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि पिछले 60 सालों के दौरान संसद ने इतने अहम मुद्दे पर चर्चा नहीं की। जब ऐसे मामलों पर न्यायालय निर्णय लेता है तो न्यायपालिका की ओर से सीमा लांघने की शिकायत करने लगते हैं सांसद।
बड़े अफसोस के साथ सर्वोच्च न्यायपालिका यानी सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वोच्च विधायिका से पूछा, ‘‘सर्वोच्च विधायिका के पास ऐसे मुद्दों के लिए वक्त नहीं है। इन मुद्दों पर विचार करने के लिये विधायिका (संसद) को वक्त मिले, इसके लिये इस देश के लोग कब तक इंतजार करेंगे?’’ अपनी टिप्पणी में पीठ ने यह भी कहा कि विधि आयोग ने भी आईपीसी की धारा 377 को खत्म करने की सिफारिश कर दी थी जिसके तहत समलैंगिक यौन संबंध को अपराध माना गया है और इसकी सजा के तौर पर अधिकतम उम्र कैद की सजा दी जा सकती है।
दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय को यह टिप्पणी तब करनी पड़ी जब जाने-माने फिल्मकार श्याम बेनेगल ने वरिष्ठ वकील अशोक देसाई के जरिये अपनी बात रखी कि विभिन्न कानूनों में सरकार संशोधन करती रही है लेकिन सरकार इसका फैसला न्यायालय पर छोड़ देती है। बेनेगल समलैंगिक यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से हटाने के पक्षधर हैं। बेनेगल ने कहा कि सरकार लंबे समय से कानूनों में संशोधन करने में नाकाम रही है।
औद्योगिक विवाद कानून में पिछले 40 साल से संशोधन नहीं किया गया है और इस अधिनियम में ‘उद्योग’ शब्द अर्थहीन हो गया है। सरकार सोचती है कि न्यायालय ही इनपर फैसला ले। इसके बाद पीठ ने कहा, ‘‘जब भी न्यायालय कुछ करता है तो वे यह भी कहते हैं कि यह न्यायिक सीमा लांघना है।’’ इससे पहले न्यायालय ने कहा कि यह खास मामला है जिसमें सरकार ने उच्च न्यायालय में मामला लड़ने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उदासीन रूख अपनाया है।
पीठ ने कहा, हमें नहीं पता कि वे कितने मामले में उदासीन हैं। यह खास मामला है जहां केंद्र उच्च न्यायालय में बहस के बाद अब उदासीन रूख अपना रहा है। सरकार मामले में तटस्थ रूख के साथ आई है। किसे स्वीकार किया जाना चाहिए, उच्च न्यायालय में जो हलफनामा दायर किया गया था उसे या शीर्ष अदालत में उदासीन रूख को?
इस बात पर भी न्यायालय की ओर से चिंता जताई गई कि विधि आयोग की सिफारिश के बावजूद पिछले 60 साल में संसद ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में संशोधन पर विचार नहीं किया है। न्यायालय ने कहा कि विधायिका के पास इन मुद्दों पर विचार के लिये समय नहीं तो आखिर आम जनता कबतक इंतजार करेगी? शीर्ष अदालत समलैंगिक अधिकार विरोधी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी जो दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले का विरोध कर रहे हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2009 में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था और व्यवस्था दी थी कि एकांत में दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बनाया गया शारीरिक संबंध अपराध नहीं है। भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) के तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध माना गया है जिसमें उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। वरिष्ठ भाजपा नेता बीपी सिंघल ने उच्च न्यायालय के फैसले को यह कहकर सर्वाेच्च न्यायालय में चुनौती दी थी कि इस तरह की गतिविधियां अवैध, अनैतिक और भारतीय संस्कृति के मूल्यों के खिलाफ हैं। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, उत्कल क्रिश्चियन काउंसिल और एपोस्टोलिक चर्चेज जैसे धार्मिक संगठनों ने भी फैसले को चुनौती दी थी।
योगगुरु बाबा रामदेव, ज्योतिषाचार्य सुरेश कौशल, दिल्ली बाल संरक्षण आयोग और तमिलनाडु मुस्लिम मुन्नेत्र कड़गम ने भी उच्च न्यायालय के फैसले का विरोध किया था। केंद्र ने पूर्व में शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि समलैंगिकों की संख्या करीब 25 लाख है और इनमें से सात प्रतिशत (1.75 लाख) एचआईवी से ग्रस्त हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने हलफनामे में कहा था कि वह अत्यधिक जोखिम वाले चार लाख लोगों, ‘पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुषों’(एमएसएम) को अपने एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के दायरे में लाने की योजना बना रहा है और यह पहले ही करीब दो   लाख लोगों को इसके दायरे में ला चुका है। एचआईवी ग्रस्त लोगों के कल्याण एवं पुनर्वास के लिये काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘नाज’ फाउंडेशन ने कहा कि समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है और कानून को उस समय हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब मामला आपसी सहमति वाले वयस्कों से जुड़ा हो। यह उन्हें समाज में अलग-थलग करने के बराबर है। वे अपनी यौन अभिव्यक्ति का खुलासा करने में सक्षम नहीं हैं, क्योंकि समाज में इसे अपराध बना दिया गया है। इसके अतिरिक्त परिवार का कोई व्यक्ति यदि यौन अपराध करता है तो इस व्यभिचार को अपराध नहीं माना गया है।
केंद्र सरकार ने समलैंगिक मामले पर उच्चतम न्यायालय में अपना रूख स्पष्ट करते हुए 21 मार्च 2012  को कहा कि इस मामले को अपराध के दायरे से बाहर रखने में कोई त्रुटि नहीं है। महान्यायवादी जीई वाहनवती ने न्यायालय से कहा कि समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर रखने के दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला उन्हें स्वीकार्य है। केंद्र ने न्यायालय से कहा कि आम सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने को अपराध मानना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

मंगलवार, 20 मार्च 2012

मुलायम को संभालनी चाहिये तीसरे मोर्चे का कमान

शीतांशु कुमार सहाय
  मुलायम सिंह ने बेटे अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर तीसरे मोर्चे के तिकड़म के लिये अपने को स्वतंत्र रखा है। यही कारण है कि मुलायम के इर्द-गिर्द तीसरे मोर्चे का कठोर आवरण आरंभिक रूप को प्राप्त करता जा रहा है। ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, जयललिता, रामविलास पासवान और चंद्रबाबू नायडू एक नए क्षत्रप बनाम तीसरा मोर्चे के नीचे आने को तैयार बैठे हैं।
पांच राज्यों में सम्पन्न विधानसभा चुनाव परिणामों की पृष्ठभूमि में तीसरे मोर्चे की आहट सुनाई देने लगी है। मुलायम सिंह ने बेटे अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर तीसरे मोर्चे के तिकड़म के लिये अपने को स्वतंत्र रखा है। यही कारण है कि मुलायम के इर्द-गिर्द तीसरे मोर्चे का कठोर आवरण आरंभिक रूप को प्राप्त करता जा रहा है। राजनीतिक परिक्रमण तेजी से जारी है और इसके केंद्र में नजर आ रहे हैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पिता। मुलायमसिंह यदि समय के बदलाव की आहट को सुन पा रहे हैं तो उन्हें तीसरे मोर्चे की घुरी की कमान संभाल लेनी चाहिए।
वास्तव में उत्तर प्रदेश के जनादेश ने केंद्रीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस राजनीतिक भूचाल में कांग्रेस और भाजपा दोनों की नीतियां हिचकोले खा रही हैं। वैसे कांग्रेस की आर्थिक उदारवाद की महंगाई बढ़ाऊ नीतियों से जनता तो पहले से ही खफा है, अब उद्योगपतियों की नजर में भी केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियां हाशिये पर हैं। इन नीतियों को पांच राज्यों में जनता ने नकारते हुए अपना जनादेश दिया।
यह जनादेश जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर है। साथ ही इसने कांग्रेस की छद्म धर्मनिरपेक्षता और भाजपा की धार्मिक कट्टरता को भी आईना दिखाया है। भ्रष्ट आचरण के साथ मायावती जिस सामाजिक यांत्रिकी के बूते बसपा को अखिल भारतीय आधार देना चाहती थीं, उसके आकार को लघु करके मतदाता ने स्पष्ट संकेत दिया है कि राजनीतिक प्रवृत्तियों में अतिवाद अब जनता बर्दाश्त नहीं करेगी। जनता या यों कहें कि मतदाताओं की यह जागरूकता भारतीय लोकतंत्र को पुख्ता व परिपक्व बनाने वाली है। परिणामों के तत्काल बाद तृणमूल कांग्रेस ने मध्यावधि चुनाव की जरुरत बताकर केंद्रीय सरकार को डगमगा दिया।
नतीजों ने केंद्र में अनिश्चय के अंधकार को गहरा दिया है। कांग्रेस और भाजपा की नीतियां लगभग एक जैसी हैं। दोनों की वर्तमान असलियत को सबने चुनावी माहौल में देख लिया। यों अबतक  आतंकवादी निरोधी खुफिया केंद्र (एनसीटीसी) का विरोध कर रही भाजपा ने इसे 19 मार्च को लोकसभा व 20 मार्च को राज्यसभा में पारित होने दिया जबकि राज्यसभा में विपक्ष बहुमत में है। राज्यसभा में 20 मार्च को आतंकवादी निरोधी खुफिया केंद्र (एनसीटीसी) पर भारतीय जनता पार्टी का संशोधन प्रस्ताव गिर गया। प्रस्ताव के पक्ष में 77 मत पड़े जबकि विरोध में 99 मत पड़े। 
बात बसपा की करें तो पूरे पांच सालों तक काम करने का सुनहरा मौका मिलने के बावजूद बसपा ने दबंगों को लुभाने के लिये उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में आने वाले 22 प्रकार के अपराधों को संज्ञान में लेने वाले मामलों को हत्या और बलात्कार तक ही सीमित कर दिया था। उत्तरप्रदेश में भूमि अधिग्रहण का सिलसिला भी सुनियोजित और चरणबद्ध तरीके से जारी था। चिकित्सा और तकनीकी संस्थानों में प्रवेश पाने वाले दलित छात्रों का जातीय और अंग्रेजी में दक्ष न होने के आधार पर इस हद तक उत्पीड़न जारी रहा कि अबतक 18 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। ऐसे में यदि कहा जा रहा है कि मायावती का दलित वोट बैंक भी खिसका है, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं।
जनता के बुनियादी हितों और घोषणा-पत्र में किये वायदों से आंख चुराने के कारण ही मतदाता ने कांग्रेस, भाजपा और बसपा से मोहभंग होने की तसदीक कर दी। वैसे उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के बाद मायावती दलित हितों की रक्षा व सर्वजन के नारे के बूते दिल्ली की गद्दी हथियाने की दौड़ में लग गई थीं। मायावती का यह स्वप्न तो चकनाचूर हुआ ही, बहुजन समाज पार्टी को अखिल भारतीय आधार देने के मंसूबे भी धराशायी हो गए।
भाजपा को यदि गोवा, उत्तराखण्ड और पंजाब में नाक बचाने की खातिर बढ़त मिल भी गई तो वह उसके राष्टÑीय वजूद रखने वाले नेताओं की बजाए क्षेत्रीय नेताओं और स्थानीय मुद्दों के कारण मिली है। उत्तर प्रदेश में बाबूसिंह कुशवाहा को शरण देकर भाजपा ने भी मनमोहन सिंह और मायावती की राह पकड़ ली। मणिपुर जरूर इस दृष्टि से अपवाद रहा कि वहां स्थानीय मुद्दे निष्प्रभावी रहे। यह राज्य पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से उग्रवाद व अलगाववाद की चपेट में है। राज्य की भौगोलिक अखण्डता को क्षेत्रीय मुद्दे व आंदोलन चुनौती साबित हो रहे हैं। विशेष सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को हटाने की मांग को लेकर इस्पाती महिला इरोम शर्मिला पिछले 11 सालों से लगातार अनशन जारी रखी हुई हैं। उनकी इस मांग को व्यापक जनसमर्थन भी हासिल है। बावजूद इसके कोई करिश्मा  नहीं हुआ, यह अचरज में डालने वाला सवाल है। मणिपुर में कुकी बहुल क्षेत्र को नया जिला बनाने की मांग भी पिछले दिनों इतनी जबर्दस्त थी कि कुकी और नगा संगठनों ने इस पूरे पर्वतीय राज्य में मजबूत नाकेबंदी कर दी थी। इन परिस्थितियों के बाद भी कांग्रेस की मणिपुर में लगातार तीसरी बार जीत यह दर्शाती है कि व्यापक जनाधार वहां कांग्रेस का ही है। ऐसी ही स्थिति पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और सिकिकम में है।
दरअसल, पांच राज्यों के करीब 14 करोड़ मतदाताओं ने 690 विधानसभा सीटों पर अपने मताधिकार का प्रयोग करके जो निर्णय दिया है, उससे यही स्वर निकल रहा है कि राष्टÑीय दलों का हृदयविदारक क्षरण हो रहा है। जो कांग्रेस राहुल गांधी बनाम देश के भावी प्रधानमंत्री को लेकर उत्तरप्रदेश में करो या मरो की स्थिति में थी, वह मुंह   छिपाने की शर्मनाक हालत में है। उसके सांप्रदायिक हथकण्डों व निर्लज्ज चाटुकारिता को जनता ने नकार दिया है।
उत्तर प्रदेश में विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद पिछड़ी व दलित जातियों में जो राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं जगी थीं, उनका अभी लोप नहीं हुआ है। राष्टÑीय दलों के वंशवादी अहंकार को वे अभी भी कठिन चुनौती साबित हो रही हैं। नतीजतन राज्य-व्यवस्था ज्यादा-से-ज्यादा संघीय स्वरूप ग्रहण करने को व्याकुल है। इस परिप्रेक्ष्य में जहां नीतीश कुमार, ममता बनर्जी व जयललिता की तरह पंजाब में भी प्रकाश सिंह बादल को अपेक्षाकृत ज्यादा स्वायत्तता हासिल हो गई है। वे इस स्वतंत्र शासन में अपने राजनीतिक एजेंडे या घोषणा पत्र में शामिल वायदों को प्रभावी ढंग से लागू कर सकते हैं। मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी को तो मतदाता ने पूर्ण बहुमत देकर ही विधानसभा में भेजा है।
संप्रग गठबंधन में भागीदार तृणमूल कांग्रेस ने मध्यावधि चुनाव का जो संकेत ठीक चुनाव परिणामों के बाद दिया, वह निराधार नहीं है। क्षेत्रीय दलों की यह अपेक्षा बढ़ी है कि राष्टÑीय राजनीति में मुलायम सिंह महत्त्वपूर्ण भूमिका में अवतरित हों। ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, जयललिता, रामविलास पासवान और चंद्रबाबू नायडू एक नए क्षत्रप बनाम तीसरा मोर्चे के नीचे आने को तैयार बैठे हैं। लालू थोड़ा ना-नुकुर कर रहे हैं। इस संभावित तीसरे मोर्चे की पहली परीक्षा इसी साल जुलाई में होने वाले राष्टÑपति चुनाव में होने वाली है। यदि  क्षेत्रीय दल ऐन-केन-प्रकारेण अपना राष्टÑपति देश को देने में कामयाब हो जाते हैं तो इस मोर्चे के अस्तित्व की मान्यता तो प्रमाणित होगी ही, नए लोकसभा चुनाव पूर्व तीसरे मोर्चे का माहौल भी गर्माने लगेगा। तीसरे मोर्चे की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब यह तिकड़मी जातीय तिलिस्म व छद्म धर्मनिरपेक्षता के जंजाल में लिप्त दिखाई न दे। स्पष्ट विचारधारा व जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर वह जनता के बीच हाजिर हो।

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

शीतांशु कुमार सहाय व धनंजय नाथ तिवारी SHEETANSHU KUMAR SAHAT & DHANANJAY NATH TIWARI


सच्चा मित्र आप के अहंकार की परवाह किये बगैर आप को टोकेगा जरुर जब भी आपको गलत राह पर चलता हुआ पायेगा। सच्चा मित्र कभी आप के साथ उस कर्म में खड़ा हुआ नहीं दिखायी देगा जो कर्म मानवता के बुनियादी उसूलों के खिलाफ जाते हों। आप को चाहे कितना बुरा लगे, वह इस बात की परवाह किये बिना ही आप को सत्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेगा। वह आप को गलत कर्म को करने के लिए साथ होने की ऊर्जा नहीं देगा। सच्चा मित्र तो बहुत बार आपके विरोध में खड़ा दिखायी देगा; क्योंकि वह कटिबद्ध है आप को गलत मार्ग पर चलने से रोकने के लिए।

शीतांशु कुमार सहाय व धनंजय नाथ तिवारी SHEETANSHU KUMAR SAHAT & DHANANJAY NATH TIWARI


सच्चा मित्र आपके अहंकार की परवाह किये बगैर आपको टोकेगा जरुर जब भी आपको गलत राह पर चलता हुआ पायेगा। सच्चा मित्र कभी आपके साथ उस कर्म में खड़ा हुआ नहीं दिखायी देगा जो कर्म मानवता के बुनियादी उसूलों के खिलाफ जाते हों। आपको चाहे कितना बुरा लगे, वह इस बात की परवाह किये बिना ही आपको सत्य मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करेगा। वह आपको गलत कर्म को करने के लिये साथ होने की ऊर्जा नहीं देगा। सच्चा मित्र तो बहुत बार आपके विरोध में खड़ा दिखायी देगा क्योंकि वह कटिबद्ध है आपको गलत मार्ग पर चलने से रोकने के लिये।

शीतांशु कुमार सहाय व धनंजय नाथ तिवारी SHEETANSHU KUMAR SAHAT & DHANANJAY NATH TIWARI


सच्चा मित्र आपके अहंकार की परवाह किये बगैर आपको टोकेगा जरुर जब भी आपको गलत राह पर चलता हुआ पायेगा। सच्चा मित्र कभी आपके साथ उस कर्म में खड़ा हुआ नहीं दिखायी देगा जो कर्म मानवता के बुनियादी उसूलों के खिलाफ जाते हों। आपको चाहे कितना बुरा लगे, वह इस बात की परवाह किये बिना ही आपको सत्य मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करेगा। वह आपको गलत कर्म को करने के लिये साथ होने की ऊर्जा नहीं देगा। सच्चा मित्र तो बहुत बार आपके विरोध में खड़ा दिखायी देगा क्योंकि वह कटिबद्ध है आपको गलत मार्ग पर चलने से रोकने के लिये।

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

अमर हैं अश्वत्थामा

भगवान शंकर के अंशावतार थे महाभारत के प्रमुख पात्र अश्वत्थामा। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं। भगवान शंकर का यह अवतार संदेश देता है कि हमें सदैव अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए; क्योंकि क्रोध ही सभी दु:खों का कारण है। यह गुण अश्वत्थामा में नहीं था। एक और बात जो हमें अश्वत्थामा से सीखनी चाहिए, वह यह कि जो भी ज्ञान प्राप्त करें उसे पूर्ण करें। अधूरा ज्ञान सदैव हानिकारक है। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र चलाना तो जानते थे लेकिन उसका उपसंहार करना नहीं। उन्होंने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जिसके कारण संपूर्ण सृष्टि के नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो गया था। इस तथ्य से हमें यह शिक्षा मिलती है कि क्रोध तथा अपूर्ण ज्ञान से कभी सफलता नहीं मिलती। अश्वत्थामा महादेव, यम, काल व क्रोध के अंशावतार थे। वह द्रोणाचार्य के पुत्र थे। अश्वत्थामा अत्यंत शुरवीर, प्रचंडक्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। महाभारत संग्राम में अश्वत्थामा ने कौरवों की सहायता की थी। हनुमानजी आदि सात चिरंजीवियों में अश्वत्थामा का नाम भी आता है। अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम ये सातों चिरंजीवी हैं। शिवमहापुराण(शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं किंतु उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है।

सावन का संदेश

रिमझिम बूंदों का महीना है सावन। सावन की फुहारों से मिली ठंडक, हमें कुछ संदेश देती है, हमें कुछ सिखाती है। सावन केवल एक महीना नहीं है, बल्कि जीवन के हर वर्ष में आने वाला एक ऐसा महीना है जिससे हम कई बातें समझ और सीख सकते हैं। सावन के मिजाज में कई बातें हैं जो हमें जीवन की परिस्थितियों से जूझने और सुधरने का मौका देती हैं। सावन की रिमझिम हमारे शरीर को गरमी से हुए नुकसान से उबारती है और झमाझम बारिश धरती की उष्मा को खत्म कर देती है। सावन का महीना हमें जीवन प्रबंधन के कई सूत्र बता रहा है:-- सावन रिमझिम फुहारों का महीना है। आसमान पर दिनभर छाई रहने वाली घटाएं धीरे-धीरे बरसती हैं। यह हमें सिखाती है कि जीवन में हम जब भी किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए निकलें, हमारी गति शुरुआत में धीमी रहे, ताकि हम अपनी योजना के हर पहलू को देखते हुए कोई कदम उठा सकें। सावन में अधिकांश समय आसमान पर बादल रहते हैं, लेकिन बरसते कभी-कभी ही हैं। यह सिखाते हैं कि हमें अपने जीवन में किसी भी चुनौती के लिए हर वक्त तैयार रहना चाहिए, ताकि समय आने पर हमें तैयारियों में देर न लगे। यह महीना और भी कई कारणों से विशेष है, क्योंकि इस दौरान भक्ति, आराधना तथा प्रकृति के कई रंग देखने को मिलते हैं। यह महीना भगवान शंकर की भक्ति के लिए विशेष माना जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस मास में विधि पूर्वक शिव उपासना करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। सावन में ही कई प्रमुख त्योहार जैसे- हरियाली अमावस्या, नाग पंचमी तथा रक्षा बंधन आदि आते हैं। सावन में प्रकृति अपने पूरे शवाब पर होती है, इसलिए यह महीना प्रकृति को समझने व उसके निकट जाने का है। सावन की रिमझिम बारिश और प्राकृतिक वातावरण मन में उल्लास व उमंग भर देती है। सावन का महीना पूरी तरह से शिव तथा प्रकृति को समर्पित है।

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

वेदाचार्य महर्षि याज्ञवल्क्य

ज्ञानं विशिष्टं न तथाहि यज्ञा:, ज्ञानेन दुर्ग तरते न यज्ञै:। (कर्मपरक यज्ञों की अपेक्षा ज्ञान ही श्रेष्ठ है।)

 -- याज्ञवल्क्य का दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य 'शतपथ ब्राह्मण' की रचना है। इस ग्रंथ में 100 अध्याय हैं जो 14 कांडों में बँटे हैं। पहले दो कांडों में दर्श और पौर्णमास इष्टियों का वर्णन है। कांड 3, 4, 5 में पशुबंध और सोमयज्ञों का वर्णन है। कांड 6, 7, 8, 9 का संबंध अग्निचयन से है। इन 9 कांडों के 60 अध्याय किसी समय 'षटि पथ' के नाम से प्रसिद्ध थे। दशम कांड 'अग्निरहस्य' कहलाता है जिसमें अग्निचयन वाले 4 अध्यायों का रहस्य निरूपण है। कांड 6 से 10 तक में शांडिल्य को विशेष रूप से प्रमाण माना गया है। ग्यारहवें कांड का नाम 'संग्रह' है जिसमें पूर्वर्दिष्ट कर्मकांड का संग्रह है। कांड 12, 13, 14 परिशिष्ट कहलाते हैं और उनमें फुटकर विषय हैं। सोलहवें कांड में वे अनेक अध्यात्म विषय हैं जिनके केंद्र में ब्रह्मवादी याज्ञवल्क्य का महान् व्यक्तित्त्व प्रतिष्ठित है। उससे ज्ञात होता है कि याज्ञवल्क्य अपने युग के दार्शनिकों में सबसे तेजस्वी थे। मिथिला के राजा जनक उनको अपना गुरु मानते थे। वहाँ जो ब्रह्मविद्या की परिषद बुलाई गई जिसमें कुरु, पांचाल देश के विद्वान भी सम्मिलित हुए उसमें याज्ञवल्क्य का स्थान सर्वोपरि रहा।

 -- इन दोनों की एकता ही उनके दर्शन का मूल सूत्र था। सूर्य की एक कला या अक्षर प्रणव () रूप से मानव के केंद्र की संचालक शक्ति है। मानव भी अमृत का ही एक अंश है। याज्ञवल्क्य का यह अध्यात्म दर्शन अति महत्वपूर्ण है। यही याज्ञवल्क्य का अयातयाम अर्थात् कभी बासी न पड़नेवाला ज्ञान है।
सूर्य विद्या एवं प्रणव
 -- वैदिक युग में अत्यन्त विद्वान महर्षि याज्ञवल्क्य हुए हैं। वे ब्रह्मज्ञानी थे। उनकी दो पत्नियां थीं। एक का नाम कात्यायनी तथा दूसरी का मैत्रेयी था। कात्यायनी सामान्य स्त्रियों के समान थीं, वह घर-गृहस्थी में ही व्यस्त रहती थीं, सांसारिक भोगों में अधिक रूचि थी। सुस्वादी भोजन, सुन्दर वस्त्र और विभिन्न प्रकार के आभूषणो में ही वह खोई रहती थीं। याज्ञवल्क्य जैसे प्रसिद्ध महर्षि की पत्नी होते हुए भी धर्म में उसे कोई आकर्षण नहीं दिखाई देता था। मैत्रेयी अपने पति के साथ प्रत्येक धार्मिक कार्य में लगी रहती थी। उनके प्रत्येक कर्मकाण्ड में सहायता देना तथा आवश्यक वस्तु उपलब्ध कराने में उसे आनन्द आता था। अध्यात्म में उसकी गहरी रूचि थी। पति के साथ अधिक समय बिताने के कारण आध्यात्मिक जगत में उसकी गहरी पैठ थी। वह प्रायः महर्षि याज्ञवल्क्य के उपदेशों को सुनती, उनके धार्मिक कर्म में सहयोग देती तथा स्वंय भी चिन्तन-मनन में लगी रहती थी। सत्य को जानने की उसमें तीव्र जिज्ञासा थी।
याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
 -- जब याज्ञवल्क्य संन्यास लेने लगे तो उन्होंने दोनों पत्‍ि‌नयों को बुलाकर कहा-'' मेरी जो भी सम्पत्ति है उसे मैं तुम दोनों में बराबर-बराबर बाँट देना चाहता हूँ।'' कात्यायनी यह सुनकर चुप रही। तब मैत्रेयी ने कहा- ''भगवन्! इस नश्वर सम्पत्ति को लेकर हम क्या करेंगी? यह तो क्षणिक है। हमें तो आप वह सम्पत्ति दें जिसके कारण आप यथार्थ सम्पत्तिवान् समझे जाते हैं। उसी सम्पत्ति की हमें अधिकारिणी बनाकर उसमें से हिस्सा दीजिये।'' याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को बहुत समझाया कि सम्पत्ति से किस तरह संसार में सुख मिलता है, किस प्रकार बिना सम्पत्ति के असुविधा होती है; किन्तु मैत्रेयी ने उसे स्वीकार नहीं किया। उसने कहा- ''भगवन्! संसारी सुख का मूल्य ही क्या है? नाशवान वस्तु के भरण-पोषण में इतनी चिन्ता की क्या जरूरत? मुझे तो वह ज्ञान दीजिये जिससे सब लालच ही विलीन हो जाय। ब्रह्मवादिनी पत्‍‌नी की बात सुनकर महर्षि अपनी पत्नी की सत्य के प्रति जिज्ञासा को जानकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे बोले- ''देवि! तुम मुझे पहले से ही बहुत प्यारी थीं, किन्तु आज इस उत्तर को सुनकर तो मैं तुम पर बहुत ही अधिक प्रसन्न हुआ। देवि! मैं तुम्हें वह ज्ञान दूंगा जिससे वास्तव में तुम्हारी आत्मा का कल्याण होगा और तुम संसार के माया-मोह से सदा के लिए मुफ्त हो जाओगी। यथार्थ बात यही है, सच्चा धन तो ब्रह्मज्ञान ही है।'' ऐसा ही हुआ, मैत्रेयी ने पति द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके ईश्वर को पा लिया और उसका मन स्थायी शांति तथा आनन्द से परिपूर्ण हो गया।
 -- एक बार महर्षि याज्ञवल्क्य और जनक आपस में बैठकर किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। तभी जनक ने जिज्ञासावश महर्षि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया, ''महर्षि, हम किसकी ज्योति से देखने की सामर्थ्य प्राप्त करते हैं?’ महर्षि बोले, ''सूर्य की ज्योति से।'' यह सुनकर जनक बोले, ''जब सूर्य अस्त हो जाता है तो हमें प्रकाश कहां से प्राप्त होता है?'' जनक का प्रश्न सुनकर महर्षि बोले, ''सूर्य के अस्त हो जाने पर चंद्रमा हमें प्रकाश देता है।'' यह जवाब सुनकर जनक फिर बोले, ''महर्षि, यदि आसमान में बादल छा जाएं और अमावस की काली रात में हम मार्ग भटक जाएं, तो उस समय प्रकाश कहां से उत्पन्न होता है और हम किस प्रकाश के सहारे भटके मार्ग से सही मार्ग पर आ पाते हैं?'' जनक के फिर से किए गए प्रश्न पर महर्षि मुस्कुराते हुए बोले, ''तब शब्दों के सहारे हमारा रास्ता प्रकाशमान होता है और शब्द हमसे कहते हैं-- भटको नहीं मैं तुम्हारे साथ हूं, मेरी आवाज को माध्यम मानकर, प्रकाश जानकर बढ़ते चलो।'' जनक यह उत्तर सुनकर फिर प्रश्न करते हुए बोले, ''यदि सूर्य, चंद्रमा तथा शब्दों का भी अभाव हो, तो उस समय हमारा मार्ग प्रशस्त करने के लिए कौन प्रकाश का रूप लेता है?'' महर्षि याज्ञवल्क्य ने जनक के इस प्रश्न पर कहा, ''जनक जी, यदि प्रकाश सब ओर से लुप्त हो जाए और अंधकार में कुछ न सूझे तो उस समय आत्मा की ज्योति सर्वोपरि होती है। हमारी आत्मा हमें विपत्तियों में, तनाव में, पथरीले मार्ग पर व हर मोड़ पर सदैव सच्चा रास्ता दिखाने को तत्पर रहती है। आत्मा जैसा निश्चल, स्वच्छ, शुभ्र प्रकाश इस पृथ्वी में अन्य कहीं भी विद्यमान नहीं है।'' महर्षि याज्ञवल्कय के इस जवाब पर (आत्मा का प्रकाश ही सर्वोत्तम है व सब प्रकाश लुप्त हो जाने पर आत्मा का प्रकाश ही मानव को राह दिखाता है और उसे जीना सिखाता है) जनक संतुष्ट हो गए और उनके सामने नतमस्तक हो गए।
आत्मा का प्रकाश ही मानव को राह दिखाता है-स्मृति-- इनके द्वारा विरचित 'याज्ञवल्क्य-स्मृति' एक महत्त्वपूर्ण धर्मशास्त्र है, जिसपर 'मिताक्षरा' आदि प्रौढ़ संस्कृत-टीकाएँ हुई हैं। याज्ञवल्क्य-स्मृति प्रसिद्ध है। इस स्मृति में 1003 श्लोक हैं। इसपर विश्वरूप कृत'बालक्रीड़ा'(800-825), अपरार्क कृत'याज्ञवल्कीय धर्मशास्त्र निबंध'(12वीं शती) और विज्ञानेश्वर कृत 'मिताक्षरा'(1070-1100) टीकाएँ प्रसिद्ध हैं। कारणे का मत है कि इसकी रचना लगभग विक्रम पूर्व पहली शती से लेकर तीसरी शती के बीच में हुई। स्मृति के अंत:साक्ष्य इसमें प्रमाण है। इस स्मृति का संबंध शुक्ल यजुर्वेद की परंपरा से ही था। इसमें तीन कांड हैं आचार, व्यवहार और प्रायश्चित। इसकी विषय-निरूपण-पद्धति अत्यंत बेहतर है। इसपर विरचित मिताक्षरा टीका हिंदू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है। मानव धर्मशास्त्र की रचना प्राचीन धर्मसूत्र युग की सामग्री से हुई, ऐसे ही याज्ञवल्क्य-स्मृति में भी प्राचीन सामग्री का उपयोग करते हुए नएसामग्री को भी स्थान दिया गया। कौटिल्य अर्थशास्त्र की सामग्री से भी याक्ज्ञवल्क्य के अर्थशास्त्र का विशेष साम्य है। वृहदारण्यकोपनिषद-- वृहदारण्यकोपनिषद में याज्ञवल्क्य का यह सिद्धांत प्रतिपादित है कि ब्रह्म ही सर्वोपरि तत्त्व है और अमृत्त्व उस अक्षर ब्रह्म का स्वरूप है। इस विद्या का उपदेश याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी को दिया था। शरीर त्यागने पर आत्मा की गति की व्याख्या याज्ञवल्क्य ने जनक से की। यह भी वृहदारण्यकोपनिषद का विषय है। जनक के उस बहुदक्षिण यज्ञ में एक सहस्र गौओं की दक्षिणा नियत थी जो ब्रह्मनिष्ठ याज्ञवल्क्य ने प्राप्त की। शांतिपर्व के मोक्षधर्म पर्व में याज्ञवल्क्य और जनक (इनका नाम दैवराति है) का अव्यय अक्षर ब्रह्मतत्त्व के विषय में एक महत्त्वपूर्ण संवाद है। उसमें नित्य अभयात्मक ब्रह्मतत्व का अत्यंत स्पष्ट और सुदर विवेचन है। उसके अंत में याज्ञवल्क्य ने जनक से कहा--''हे राजन्, क्षेत्रज्ञ को जानकर तुम इस ज्ञान की उपासना करोगे तो तुम भी ऋषि हो जाओगे। कर्मपरक यज्ञों की अपेक्षा ज्ञान ही श्रेष्ठ है (ज्ञानं विशिष्टं न तथाहि यज्ञा:, ज्ञानेन दुर्ग तरते न यज्ञै:, शांति. 306105)''वृहदारण्यक उपनिषद' ,वह भी महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा ही हमें प्राप्त है। यजुर्वेद-- भागवत और विष्णु पुराण के अनुसार याज्ञवल्क्य ने प्रत्यक्ष देव सूर्य से प्रार्थना की--''हे भगवन! मुझे ऐसे यजुर्वेद की प्राप्ति हो, जो अब तक किसी को मिली हो।'' भगवान सूर्य ने प्रसन्न हो उन्हें दर्शन दिया और अश्वरूप धारण कर यजुर्वेद के उन मन्त्रों का उपदेश दिया, जो तब तक किसी को प्राप्त नहीं हुए थे। अश्वरूप सूर्य से प्राप्त होने के कारण शुक्ल यजुर्वेद की एक शाखा 'वाजसनेय' और मध्य दिन के समय प्राप्त होने से 'माध्यन्दिन' शाखा के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। भागवत के अनुसार याज्ञवल्क्य ने शुक्ल यजुर्वेद की 15 शाखाओं को जन्म दिया। शुक्ल यजुर्वेद-संहिता के मुख्य मन्त्रद्रष्टा ऋषि आचार्य याज्ञवल्क्य हैं। उन्होंने ही हमें 'शुक्ल यजुर्वेद' दिया है। इस संहिता में चालीस अध्याय हैं। 40 अध्यायों में पद्यात्मक मंत्र और गद्यात्मक यजु: भाग का संग्रह है। इसके प्रतिपाद्य विषय ये हैं- दर्शपौर्णमास इष्टि (1-2 0); अग्न्याधान (3 0); सोमयज्ञ (4-8 0); वाजपेय (9 .); राजसूय (9-10 .); अग्निचयन (11-18 .) सौत्रामणी (19-21 .); अश्वमेघ (22-29 .); सर्वमेध (32-33 .); शिवसंकल्प उपनिषद् (34 .); पितृयज्ञ (35 .); प्रवग्र्य यज्ञ या धर्मयज्ञ (36-39 .); ईशोपनिषत् (40 .)। यज्ञीय कर्मकांड का संपूर्ण विषय यजुर्वेद के अंतर्गत आता है। आज प्राय: अधिकांश लोग इस वेद शाखा से ही सम्बद्ध हैं और सभी पूजा, अनुष्ठानों, संस्कारों आदि में इसी संहिता के मन्त्र विनियुक्त होते हैं। 'रुद्राष्टाध्यायी' नाम से जिन मन्त्रों द्वारा भगवान रुद्र (सदाशिव) की आराधना होती है, वे इसी संहिता में विद्यमान हैं। इस प्रकार महर्षि याज्ञवल्क्य का लोक पर महान उपकार है। इस संहिता का जो ब्राह्मण भाग 'शतपथ ब्राह्मण' के नाम से प्रसिद्ध है और जो '4 महत्त्वपूर्ण धर्मशास्त्र का प्रणयन हुआ-- से शास्त्रार्थ-- गार्गी, मैत्रेयी और कात्यायनी आदि ब्रह्मवादिनी नारियों से याज्ञवल्क्य का ज्ञान-विज्ञान एवं ब्रह्मतत्त्व-सम्बन्धी शास्त्रार्थ हुआ। -- महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्‍ि‌नयाँ थीं- एक तो महर्षि भरद्वाज की पुत्री कात्यायनी, दूसरी मित्र ऋषि की कन्या मैत्रेयी। मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी हुई। शुक्ल पक्ष की पंचमी को महर्षि याज्ञवल्क्य का जन्म हुआ था। यज्ञ में पत्नी सावित्री की जगह गायत्री को स्थान देने पर सावित्री ने ब्रह्मा को शाप दे दिया। वे ही कालान्तर में याज्ञवल्क्य के रूप में चारण ॠषि के यहाँ जन्म लिया। वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषियों तथा उपदेष्टा आचार्यों में महर्षि याज्ञवल्क्य का स्थान सर्वोपरि है। ये महान अध्यात्मवेत्ता, योगी, ज्ञानी, धर्मात्मा तथा श्रीरामकथा के मुख्य प्रवक्ता थे। भगवान सूर्य की प्रत्यक्ष कृपा इन्हें प्राप्त थी। पुराणों में इन्हें ब्रह्माजी का अवतार बताया गया है। श्रीमद्भागवत में आया है कि ये देवरात के पुत्र थे। याज्ञवल्क्य, वैदिक साहित्य में 'शुक्ल यजुर्वेद' की वाजसनेयी शाखा के द्रष्टा हैं। याज्ञवल्क्य का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य शतपथ ब्राह्मण की रचना है। इनका काल लगभग 1800 . पू. माना जाता है। विदेहराज जनक जैसे अध्यात्म-तत्त्ववेत्ताओं के ये गुरु रहे हैं। इन्होंने प्रयाग में भरद्वाज को भगवान श्रीराम का चरित सुनाया। इन्हें ज्ञान हो जाने पर लोग बड़े उत्कट प्रश्न करते थे, तब सूर्य ने कहा- ''जो तुमसे अतिप्रश्न तथा वाद-विवाद करेगा उसका सिर फट जायेगा।'' शाकल्य ॠषि ने उपहास किया तो उनका सिर फट गया।-- याज्ञवल्क्य वेदाचार्य महर्षि वैशम्पायन के शिष्य थे। इन्हीं से उन्हें मन्त्र शक्ति तथा वेद ज्ञान प्राप्त हुआ। वैशम्पायन अपने शिष्य याज्ञवल्क्य से बहुत स्नेह रखते थे और इनकी भी गुरु में अनन्य श्रद्धा एवं सेवा-निष्ठा थी। एक बार गुरु वैशम्पायन से इनका कुछ विवाद हो गया। गुरु रुष्ट हो गये और कहने लगे-- ''मैंने तुम्हें यजुर्वेद के जिन मन्त्रों का उपदेश दिया है, उन्हें तुम वमन कर दो।'' निराश हो याज्ञवल्क्य ने सारी वेद मन्त्र विद्या मूर्तरूप में उगल दी, जिन्हें वैशम्पायन के दूसरे अन्य शिष्यों ने तीतर पक्षी बनकर श्रद्धापूर्वक ग्रहण कर लिया और वे सुरम्य वेद मन्त्र उन्हें प्राप्त हो गये। यजुर्वेद की वही शाखा जो तीतर बनकर ग्रहण की गयी थी, 'तैत्तिरीय उपनिषद्' के नाम से प्रसिद्ध हुई। याज्ञवल्क्य ने वाष्कल मुनि से ॠगवेद संहिता और वैशम्पायन के रुष्ट होने पर भगवान सूर्य से यजुर्वेद संहिता पढ़ी।