रविवार, 25 सितंबर 2022

वृन्दावन के राधा रमन मन्दिर में श्रीकृष्ण की भक्ति में ४६ वर्षों से साधनारत भक्तिन In The Radha Raman Temple of Vrindavan, The Devotee Engaged in Devotion to Shri Krishna For 46 Years

प्रस्तोता : शीतांशु कुमार सहाय 

        चित्र में जो बुजुर्ग महिला बैठी हुई है। इन का दर्शन करना भी बड़े सौभाग्य की बात है क्योंकि यह पिछले ४६ सालों से राधा रमन जी के प्रांगण में ही बैठी रहती हैं। कभी राधा रमन जी की गलियों और राधा रमन जी का मंदिर छोड़कर इधर-उधर वृंदावन में कहीं नहीं गयीं। 

     इन बुजुर्ग महिला की उमर ८१ साल हो चुकी है। जब यह ३५ साल की थीं। तब यह  जगन्नाथ पुरी से चलकर अकेली वृंदावन आयी थीं। वृंदावन पहुँचकर इन्होंने किसी बृजवासी से वृंदावन का रास्ता पूछा। उस ब्रजवासी ने इन को राधा रमन जी का मंदिर दिखा दिया। 

      आज से ४६ साल पहले कल्पना कीजिए वृंदावन कैसा होगा? वह अकेली जवान औरत सब कुछ छोड़ कर केवल भगवान के भरोसे वृंदावन आ गयीं। किसी बृजवासी ने जब इन को राधा रमन जी का मंदिर दिखाकर यह कह दिया कि यही वृंदावन है। तब से लेकर आज तक इन को ४६ वर्ष हो गये, यह राधा रमन जी का मंदिर छोड़कर कहीं नहीं गयीं। यह मंदिर के प्रांगण में बैठकर ४६ साल से श्रीकृष्ण की साधना में रत हैं और भजन गाती है। मंगला आरती के दर्शन करती हैं। कभी-कभी गोपी गीत गाती हैं। 

      जब इन को कोई भक्त यह कहता है कि माताजी वृंदावन घूम आओ, तो वह कहती है, मैं कैसे जाऊँ? लोग बोलते हैं। जब मुझे किसी बृजवासी ने यह बोल दिया कि यही वृंदावन है, तो मेरे बिहारीजी तो मुझे यहीं मिलेंगे। मेरे लिए तो सारा वृंदावन इसी राधा रमन मंदिर में ही है। 

      देखिए प्रेम और समर्पण की कैसी पराकाष्ठा है। आज के दौर में संत हो या आम जन- सब धन, रिश्ते- नातों के पीछे भाग रहे हैं तो आज भी संसार में ऐसे दुर्लभ भक्त हैं जो केवल और केवल भगवान के पीछे भागते हैं। 

     वह देखने में बहुत निर्धन हैं पर उन का परम धन इनके भगवान "राधा रमन" जी हैं। 

      हम संसार के लोग थोड़ी-सी भक्ति करते हैं और अपने आप को भक्त समझ बैठते हैं। कभी थोड़ी भी परेशानी आयी नहीं कि भगवान को कोसने लगते हैं। भगवान को छोड़कर किसी अन्य देवी-देवता की पूजा करने लग जाते हैं। हमारे अंदर समर्पण तो है ही नहीं। आज संसार के अधिकतर लोग अपनी परेशानियों से परेशान होकर कभी एक बाबा से दूसरे बाबा पर दूसरे बाबा से तीसरे बाबा पर भाग रहे हैं। और-तो-और हमारा न अपने गुरु पर विश्वास है, न किसी एक देवता को अपना इष्ट मानते हैं।  अधिकतर लोग भगवान को अगर प्यार भी करते हैं तो किसी-न-किसी भौतिक आवश्यकता के लिए। पर, इन दुर्लभ संत योगिनी को देखिये.....वह सब कुछ त्याग कर केवल भगवान के भरोसे ४६ साल से राधा रमन जी के प्रांगण में बैठी हैं, उन की साधना में लीन हैं। 

      भगवान श्रीकृष्ण की इस महान भक्तिन के श्रीचरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाण!

      जय श्री राधे कृष्ण!

गुरुवार, 8 सितंबर 2022

पितृपक्ष में इन वस्तुओं को न खाएँ अन्यथा पितर हो जायेंगे रुष्ट Do Not Eat These Things During Pitru Paksha Otherwise The Ancestors Will Get Angry

 


-शीतांशु कुमार सहाय 

     सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्त्व है। आश्विन महीने में कृष्ण पक्ष प्रथमा अर्थात् प्रतिपदा से आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक की अवधि को पितृपक्ष कहा जाता है। माँ, पिता या घर के अन्य सदस्यों की जिस तिथि को देहान्त होता है, प्रथमा से उस तिथि तक उन्हें पितर रूप मानकर जल तर्पण करने का विधान है। 

     पितृपक्ष में पितरों को तर्पण, पिण्डदान और श्राद्ध करने से उन की आत्मा को शान्ति मिलती है। बदले में पितर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को सुख-समृद्धि और प्रगति का आशीर्वाद देते हैं।

क्या खाएँ, क्या न खाएँ...

     शास्त्र विधि के अनुसार, पितृपक्ष में चना और चने से बने पदार्थ जैसे- चने की दाल, बेसन और चने से बने सत्तू नहीं खाना चाहिए। पितृ पक्ष अर्थात् श्राद्ध पक्ष में चना वर्जित है। इस दौरान चने का उपयोग अशुभ माना जाता है। अरहर, मूँग और उड़द का उपयोग किया जा सकता है। 

     पितृ पक्ष में श्राद्ध के दौरान कच्चे अनाज का सेवन नहीं करना चाहिए। पितृ पक्ष में मसूर की दाल का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही इस अवधि में दाल, चावल, गेहूँ जैसे अनाज को कच्चा सेवन करना वर्जित है। हाँ, इन्हें उबालकर खाया जा सकता है। पर, मसूर की दाल को किसी भी रूप में श्राद्ध के दौरान प्रयोग न करें। 

     पितृ पक्ष में लहसुन और प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। लहसुन और प्याज को तामसिक भोजन की श्रेणी में रखा गया है। पितृ पक्ष में लहसुन या प्याज के सेवन से पितृ रुष्ट होते हैं और घर की प्रगति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

     पितृपक्ष में कुछ सब्जियों के सेवन से बचना चाहिए। इस अवधि में आलू, मूली, अरबी (अरूई व कन्दा) और कन्द वाली सब्जियों यानी जो भूमि के अन्दर उपजते हैं) का सेवन कदापि नहीं करना चाहिए। इन सब्जियों को श्राद्ध या पितृपक्ष में न स्वयं सेवन करें और न ब्राह्मणों या पुरोहितों को भोजन में अर्पित करें। 


बुधवार, 7 सितंबर 2022

सूने घर ताक रहे बच्चों की राह...अकेलेपन में बुजुर्गियत The Path of the Children Staring at the Deserted House...Old Age in Loneliness

 -शीतांशु कुमार सहाय 


     आप से मेरा निवेदन है कि कल सुबह उठकर एक बार इस का जायज़ा लीजियेगा कि कितने घरों में अगली पीढ़ी के बच्चे रह रहे हैं? कितने बाहर निकलकर दिल्ली, नोएडा, गुड़गाँव, पुणे, बेंगलुरु, चंडीगढ़, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, बड़ौदा जैसे बड़े शहरों में और कुछ तो विदेश में जाकर बस गये हैं?
     कल आप एक बार उन गली-मोहल्लों से पैदल निकलियेगा जहाँ से आप बचपन में विद्यालय जाते समय दोस्तों के संग मस्ती करते हुए निकलते थे।
      जरा तिरछी नज़रों से झाँकियेगा हर घर की ओर, आप को एक चुप्पी...अजीब सन्नाटा मिलेगा; न कोई आवाज़, न बच्चों का शोर, बस किसी किसी घर के बाहर या खिड़की में आते-जाते लोग को ताकते बूढ़े ज़रूर मिल जायेंगे। आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते मुहल्लों के कारण क्या  हैं?
     भौतिकवादी युग में हर व्यक्ति चाहता है कि उस का एक बच्चा और अधिक-से-अधिक दो बच्चे हों और बेहतर-से-बेहतर पढ़ें-लिखें। उन को लगता है या फिर दूसरे लोग उन को ऐसा महसूस कराने लगते हैं कि छोटे शहर या कस्बे में पढ़ने से उन के बच्चे का कॅरियर खराब हो जायेगा या फिर बच्चा बिगड़ जायेगा। बस, यहीं से बच्चे निकल जाते हैं या माँ-बाप द्वारा भेज दिये जाते हैं देश-विदेश के बड़े शहरों के छात्रावासों में।
     भले ही बड़े शहरों और उस छोटे शहर के विद्यालय में पाठ्यक्रम और किताबें समान हों मगर मानसिक दबाव आ जाता है...बड़े शहर में पढ़ने भेजने का!
     विचार कीजियेगा तो पता चलेगा कि बाहर भेजने पर भी मुश्किल से एक-दो प्रतिशत बच्चे ही IIT, PMT या CLAT वगैरह में निकाल पाते हैं! फिर वही माँ-बाप बाकी बच्चों का 'पेमेण्ट सीट' पर इंजीनियरिंग, मेडिकल या फिर बिज़नेस मैनेजमेंट में दाखिला कराते हैं। चार-पाँच साल बाहर पढ़ते-पढ़ते बच्चे बड़े शहरों के माहौल में रच बस जाते हैं। फिर वहीं नौकरी ढूंढ लेते हैं। सहपाठियों से शादी भी कर लेते हैं। आप को तो शादी के लिए हाँ करना ही है, अपनी इज्ज़त बचानी है तो, अन्यथा शादी वह करेंगे ही अपने इच्छित साथी से।
      सच तो यह है कि ऐसे बच्चे केवल त्योहारों पर घर आते हैं माँ-बाप के पास सिर्फ रस्म अदायगी हेतु। पर्व-त्योहारों की छुट्टी में घर आने पर आस-पड़ोस के कुछ 'छुट चुके' मित्रों पर बड़े शहर या विदेश (जहाँ वह फिलहाल रह रहा है) की 'भव्यता' का किस्सा गाँठकर फिर उसी शहरी भीड़ का हिस्सा बनने चल पड़ता है। आप ने अनुभव किया होगा, यही होता है नऽ।
     इधर, घर पर वीरानगी के साथ रहने को अभिशप्त माँ-बाप सभी को अपने बच्चों के बारे में गर्व से बताते हैं। किसी कम्पनी में नौकरी लगने पर दो-तीन साल तक तो पड़ोसियों को बेटा या बेटी के पैकेज के बारे में बताते हैं। एक साल, दो साल, कुछ साल बीत गये। माँ-बाप बूढ़े होते जा रहे हैं। अब वे अकेले नहीं रह सकते। सहारे की सख्त आवश्यकता आ पड़ी है लेकिन बच्चों ने ॠण लेकर बड़े शहरों में या विदेश में फ्लैट ले लिये हैं। नया घर, नये सपने, नया परिवार...अब पुराने घर में बुढ़ाते माँ-बाप की सेवा का 'जोखिम' उठाने कौन आता है! अब अपना फ्लैट हो ही गया तो त्योहारों पर भी घर जाना बन्द।
     अब तो कोई ज़रूरी शादी या किसी पारिवारिक समारोह में ही आते-जाते हैं ऐसे 'होनहार' बच्चे। अब शादी या अन्य पारिवारिक समारोह तो बैंक्वेट हाॅल में होते हैं तो मुहल्ले में और घर जाने की भी ज़्यादा ज़रूरत नहीं पड़ती है। होटल में ही रह लेते हैं। हाँ, एक बात और है कि हाॅल वाले शादी-छट्ठी के समारोह में अगर कोई मुहल्लेवाला पूछ भी ले कि भाई अब कम आते-जाते हो तो छोटे शहर, छोटे माहौल और बच्चों की पढ़ाई का उलाहना देकर बोल देते हैं कि अब यहाँ रखा ही क्या है? वाह!
     बेटे-बहू साथ-साथ फ्लैट में बड़े शहर में रहने लगे हैं। अब फ्लैट में तो इतनी जगह होती नहीं कि बूढ़े खाँसते बीमार माँ-बाप को साथ में रखा जाये। बेचारे पड़े रहते हैं अपने बनाये या पैतृक मकानों में।
     कोई बच्चा 'बागवान' फिल्म की तरह माँ-बाप को आधा-आधा रखने को भी तैयार नहीं। 
     अब साहब, घर खाली-खाली, मकान खाली-खाली और धीरे-धीरे मुहल्ला खाली हो रहा है। अब ऐसे में छोटे शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये "प्रॉपर्टी डीलरों" की गिद्ध जैसी निगाह इन खाली होते मकानों पर पड़ती है। वो इन बच्चों को घूमा-फिराकर उन के मकान के रेट समझाने शुरू करते हैं। उन को गणित समझाते हैं कि कैसे घर बेचकर शहर में खरीदे फ्लैट का ऋण खत्म किया जा सकता है। यही नहीं, बचे पैसे से एक प्लाॅट भी लिया जा सकता है। साथ ही ये किसी बड़े निवेशक को इन खाली होते मकानों में मार्केट और गोदामों का सुनहरा भविष्य भी दिखाने लगते हैं। ये ज़मीन के दलाल बाबूजी और माताजी को भी बेटे-बहू के साथ बड़े शहर में रहकर आराम से मज़ा लेने के सपने दिखाकर मकान बेचने को तैयार कर लेते हैं।
      हर दूसरा घर, हर तीसरा परिवार सभी के बच्चे बाहर निकल गये हैं। बड़े शहर में मकान ले लिये हैं, बच्चे पढ़ रहे हैं, अब वो वापस नहीं आयेंगे। छोटे शहर में रखा ही क्या है! इंग्लिश मीडियम स्कूल नहीं है, हॉबी क्लासेज नहीं है, IIT/PMT की कोचिंग नहीं है, मॉल नहीं है, माहौल नहीं है, नाइट क्लब नहीं है...कुछ नहीं है भाई, आखिर इन के बिना जीवन कैसे चलेगा? 
     भाईसाहब! ये खाली होते मकान, ये सूने होते मुहल्ले, इन्हें सिर्फ प्राॅपर्टी की नज़र से मत देखिये, बल्कि जीवन की खोती हुई जीवन्तता की नज़र से देखिये। आप पड़ोसीविहीन हो रहे हैं। आप वीरान हो रहे हैं।
     आज गाँव सूने हो चुके हैं, शहर कराह रहे हैं।
सूने घर आज भी राह देखते हैं,
वो बंद दरवाजे बुलाते हैं
पर कोई नहीं आता!
     घर छोड़कर बड़े शहरों की भीड़ में गुम होते युवाओं से मैं पूछता हूँ कि कि क्या आप का बुढ़ापा सुगमता व्यतीत होगा या जैसा आप ने किया, वैसा ही आप की सन्तान भी करेगी। एक बार विचार अवश्य कीजियेगा और मन करे तो नीचे के कमेण्ट बाॅक्स में अपने उद्गार लिखियेगा। 

रविवार, 4 सितंबर 2022

भगवान गणेश के १०८ नाम Lord Ganesh's 108 Names

 


प्रस्तोता : शीतांशु कुमार सहाय 

     किसी भी यज्ञ या पूजन कार्यक्रम में सर्वप्रथम भगवान गणेश की पूजा की जाती है। विघ्नों का नाश करनेवाले प्रथम पूज्य गणेश बुद्धि के अधिष्ठाता के रूप में पूज्य हैं। उन के १०८ नामों को जपने या ध्यानपूर्वक सुनने से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं। 

१) बालगणपति – Baalganapati

२) भालचन्द्र – Bhalchandra

३) बुद्धिनाथ – Buddhinath

४) धूम्रवर्ण – Dhumravarna

५) एकाक्षर – Ekakshar

६) एकदंत – Ekdant

७) गजकर्ण – Gajkarn

८) गजानन – Gajaanan

९) गजनान – Gajnaan

१०) गजवक्र – Gajvakra

११) गजवक्त्र – Gajvaktra

१२) गणाध्यक्ष – Ganaadhyaksha

१३) गणपति – Ganapati

१४) गौरीसुत – Gaurisut

१५) लंबकर्ण – Lambakar

१६) लंबोदर – Lambodar

१७) महाबल – Mahaabal

१८) महागणपति – Mahaaganapati

१९) महेश्वर – Maheshwar

२०) मंगलमूर्ति – Mangalmurti

२१) मूषकवाहन – Mushakvaahan

२२) निदीश्वरम – Nidishwaram

२३) प्रथमेश्वर – Prathameshwar

२४) शूपकर्ण – Shoopkarna

२५) शुभम – Shubham

२६) सिद्धिदाता – Siddhidata

२७) सिद्धिविनायक – Siddhivinaayak

२८) सुरेश्वरम – Sureshvaram

२९) वक्रतुंड – Vakratund

३०) अखूरथ – Akhurath

३१) अलंपत – Alampat

३२) अमित – Amit

३३) अनंतचिदरुपम – Anantchidrupam

३४) अवनीश – Avanish

३५) अविघ्न – Avighn

३६) भीम – Bheem

३७) भूपति – Bhupati

३८) भुवनपति – Bhuvanpati

३९) बुद्धिप्रिय – Buddhipriya

४०) बुद्धिविधाता – Buddhividhata

४१) चतुर्भुज – Chaturbhuj

४२) देवदेव – Devdev

४३) देवांतकनाशकारी – Devantaknaashkari

४४) देवव्रत – Devavrat

४५) देवेन्द्राशिक – Devendrashik

४६) धार्मिक – Dharmik

४७) दूर्जा – Doorja

४८) द्वैमातुर – Dwemaatur

४९) एकदंष्ट्र – Ekdanshtra

५०) ईशानपुत्र – Ishaanputra

५१) गदाधर – Gadaadhar

५२) गणाध्यक्षिण – Ganaadhyakshina

५३) गुणिन – Gunin

५४) हरिद्र – Haridra

५५) हेरंब – Heramb

५६) कपिल – Kapil

५७) कवीश – Kaveesh

५८) कीर्ति – Kirti

५९) कृपाकर – Kripakar

६०) कृष्णपिंगाक्ष – Krishnapingaksh

६१) क्षेमंकरी – Kshemankari

६२) क्षिप्रा – Kshipra

६३) मनोमय – Manomaya

६४) मृत्युंजय – Mrityunjay

६५) मूढ़ाकरम – Mudhakaram

६६) मुक्तिदायी – Muktidaayi

६७) नादप्रतिष्ठित – Naadpratishthit

६८) नमस्तेतु – Namastetu

६९) नन्दन – Nandan

७०) पाषिण – Pashin

७१) पीतांबर – Pitaamber

७२) प्रमोद –Pramod

७३) पुरुष – Purush

७४) रक्त – Rakta

७५) रुद्रप्रिय – Rudrapriya

७६) सर्वदेवात्मन – Sarvadevatmana

७७) सर्वसिद्धांत – Sarvasiddhanta

७८) सर्वात्मन – Sarvaatmana

७९) शांभवी – Shambhavi

८०) शशिवर्णम – Shashivarnam

८१) शुभगुणकानन – Shubhagunakaa     hnan

८२) श्वेता – Shweta

८३) सिद्धिप्रिय – Siddhipriya

८४) स्कंदपूर्वज – Skandapurvaj

८५) सुमुख – Sumukha

८६) स्वरुप – Swarup

८७) तरुण – Tarun

८८) उद्दण्ड – Uddanda

८९) उमापुत्र – Umaputra

९०) वरगणपति – Varganapati

९१) वरप्रद – Varprada

९२) वरदविनायक – Varadvinaayak

९३) वीरगणपति – Veerganapati

९४) विद्यावारिधि – Vidyavaaridhi

९५) विघ्नहर – Vighnahar

९६) विघ्नहर्ता – Vighnahartta

९७) विघ्नविनाशन – Vighnavinashan

९८) विघ्नराज – Vighnaraaj

९९) विघ्नराजेन्द्र – Vighnaraajendra

१००) विघ्नविनाशाय – Vighnavinashay

१०१) विघ्नेश्वर – Vighneshwar

१०२) विकट – Vikat

१०३) विनायक – Vinayak

१०४) विश्वमुख – Vshvamukh

१०५) यज्ञकाय – Yagyakaay

१०६) यशस्कर – Yashaskar

१०७) यशस्विन – Yashaswin

१०८) योगाधिप – Yogadhip

     भगवान गणेश की कृपा आप पर बनी रहे!