-शीतांशु कुमार सहाय
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एआर दवे ने यह सुझाव दिया कि 'भगवद्गीता' और 'महाभारत' को पहली कक्षा से ही छात्रों को पढ़ाना शुरू कर देना चाहिए। न्यायाधीश ने नई दिल्ली में शनिवार 2 अगस्त 2014 को कहा कि भारतीय को अपनी पुरानी परंपराओं की ओर लौटना चाहिए और बच्चों को शुरुआती उम्र में ही महाभारत और भगवद्गीता पढ़ाई जानी चाहिए। वह 'भूमंडलीकरण के दौर में समसामायिक मुद्दे और मानवाधिकारों के समक्ष चुनौतियाँ' विषय पर लोगों को संबोधित कर रहे थे। दवे ने कहा-- ''जो लोग बहुत धर्मनिरपेक्ष हैं या तथाकथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष हैं, वह इस बात से सहमत नहीं होंगे लेकिन अगर मैं भारत का तानाशाह होता तो मैं गीता और महाभारत क्लास वन की पढ़ाई में शामिल करवाता। यही वह तरीका है, जिससे आप सीख सकते हैं कि जिंदगी कैसे जी जाए। मुझे नहीं पता कि लोग मुझे धर्मनिरपेक्ष कहते हैं या नहीं लेकिन अगर कोई चीज कहीं अच्छी है तो हमें उसे लेने से गुरेज नहीं करना चाहिए।'' न्यायाधीश एआर दवे ने कहा कि सभी की अच्छाई को बाहर लाकर हम हर जगह हिंसा रोक सकते हैं और उसके लिए हमें अपनी जड़ों की ओर वापस जाना होगा। यह सम्मेलन गुजरात लॉ सोसाइटी ने आयोजित की थी। जस्टिस दवे ने पहली क्लास से ही बच्चों को भगवद् गीता और महाभारत पढ़ाने का भी प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि जो बहुत ज्यादा तथाकथित धर्मनिरपेक्ष है वह सहमत नहीं होगा।
गुरु-शिष्य परंपरा से दूर होगा आतंकवाद / Guru-disciple Tradition will be away from Terrorism---
न्यायाधीश एआर दवे ने कहा, "गुरु-शिष्य परंपरा खत्म हो चली है। अगर यह परंपरा बनी रहती तो हमें हिंसा या आतंकवाद जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता। हम दुनियाभर में आतंकवाद के मामले देख रहे हैं। इनमें से अधिकतर देश लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले हैं। अगर लोकतंत्र में सभी लोग अच्छे हों तो वे जाहिर तौर पर किसी अच्छे को ही चुनेंगे। फिर वो शख्स किसी को नुकसान पहुँचाने के बारे में नहीं सोचेगा।"
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