बुधवार, 14 अगस्त 2013

ये भी है स्वतन्त्रता की सच्ची कहानी / TRUE STORY OF INDIAN FREEDOM


प्रस्तुति- शीतांशु कुमार सहाय / SHEETANSHU KUMAR SAHAY

मेरे प्रिय मित्रों, इसे ध्यानपूर्वक पढ़ें-

1. 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन को ब्रिटिश सरकार कुछ ही हफ्तों में कुचल कर रख देती है।
2. 1945 में ब्रिटेन विश्वयुद्ध में ‘विजयी’ देश के रुप में उभरता है।
3. ब्रिटेन न केवल इम्फाल-कोहिमा सीमा पर आजाद हिन्द फौज को पराजित करता है, बल्कि जापानी सेना को बर्मा से भी निकाल बाहर करता है।
4. इतना ही नहीं, ब्रिटेन और भी आगे बढ़कर सिंगापुर तक को वापस अपने कब्जे में लेता है।
5. जाहिर है, इतना खून-पसीना ब्रिटेन ‘भारत को आजाद करने’ के लिए तो नहीं ही बहा रहा है। अर्थात् उसका भारत से लेकर सिंगापुर तक अभी जमे रहने का इरादा है।
6. फिर 1945 से 1946 के बीच ऐसा कौन-सा चमत्कार होता है कि ब्रिटेन हड़बड़ी में भारत छोड़ने का निर्णय ले लेता है?
       हमारे शिक्षण संस्थानों में आधुनिक भारत का जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसके पन्नों में सम्भवतः इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा। हम अपनी ओर से भी इसका उत्तर जानने की कोशिश नहीं करते- क्योंकि हम बचपन से ही सुनते आये हैं- दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल। इससे आगे हम और कुछ जानना नहीं चाहते।
(प्रसंगवश- 1922 में असहयोग आन्दोलन को जारी रखने पर जो आजादी मिलती, उसका पूरा श्रेय गाँधीजी को जाता। मगर “चौरी-चौरा” में ‘हिंसा’ होते ही उन्होंने अपना ‘अहिंसात्मक’ आन्दोलन वापस ले लिया, जबकि उस वक्त अँग्रेज घुटने टेकने ही वाले थे! दरअसल गाँधीजी ‘सिद्धान्त’ व ‘व्यवहार’ में अन्तर नहीं रखने वाले महापुरूष हैं, इसलिए उन्होंने यह फैसला लिया। हालाँकि एक दूसरा रास्ता भी था- कि गाँधीजी ‘स्वयं अपने आप को’ इस आन्दोलन से अलग करते हुए इसकी कमान किसी और को सौंप देते। मगर यहाँ ‘अहिंसा का सिद्धान्त’ भारी पड़ जाता है- ‘देश की आजादी’ पर।)
       यहाँ हम 1945-46 के घटनाक्रमों पर एक निगाह डालेंगे और उस ‘चमत्कार’ का पता लगायेंगे, जिसके कारण और भी सैकड़ों वर्षों तक भारत में जमे रहने की ईच्छा रखने वाले अँग्रेजों को जल्दीबाजी में फैसला बदलकर भारत से जाना पड़ा।
(प्रसंगवश- जरा अँग्रेजों द्वारा भारत में किये गये ‘निर्माणों’ पर नजर डालें- दिल्ली के ‘संसद भवन’ से लेकर अण्डमान के ‘सेल्यूलर जेल’ तक- हर निर्माण 500 से 1000 वर्षों तक कायम रहने एवं इस्तेमाल में लाये जाने के काबिल है!)
       ***
लालकिले के कोर्ट-मार्शल के खिलाफ देश के नागरिकों ने जो उग्र प्रदर्शन किये, उससे साबित हो गया कि जनता की सहानुभूति आजाद हिन्द सैनिकों के साथ है।
इस पर भारतीय सेना के जवान दुविधा में पड़ जाते हैं।
फटी वर्दी पहने, आधा पेट भोजन किये, बुखार से तपते, बैलगाड़ियों में सामान ढोते और मामूली बन्दूक हाथों में लिये बहादूरी के साथ “भारत माँ की आजादी के लिए” लड़ने वाले आजाद हिन्द सैनिकों को हराकर एवं बन्दी बनाकर लाने वाले ये भारतीय जवान ही तो थे, जो “महान ब्रिटिश सम्राज्यवाद की रक्षा के लिए” लड़ रहे थे! अगर ये जवान सही थे, तो देश की जनता गलत है; और अगर देश की जनता सही है, तो फिर ये जवान गलत थे! दोनों ही सही नहीं हो सकते।
सेना के भारतीय जवानों की इस दुविधा ने आत्मग्लानि का रुप लिया, फिर अपराधबोध का और फिर यह सब कुछ बगावत के लावे के रुप में फूटकर बाहर आने लगा।
फरवरी 1946 में, जबकि लालकिले में मुकदमा चल ही रहा था, रॉयल इण्डियन नेवी की एक हड़ताल बगावत में रुपान्तरित हो जाती है।* कराची से मुम्बई तक और विशाखापत्तनम से कोलकाता तक जलजहाजों को आग के हवाले कर दिया जाता है। देश भर में भारतीय जवान ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर देते हैं। मद्रास और पुणे में तो खुली बगावत होती है। इसके बाद जबलपुर में बगावत होती है, जिसे दो हफ्तों में दबाया जा सका। 45 का कोर्ट-मार्शल करना पड़ता है।
यानि लालकिले में चल रहा आजाद हिन्द सैनिकों का कोर्ट-मार्शल देश के सभी नागरिकों को तो उद्वेलित करता ही है, सेना के भारतीय जवानों की प्रसिद्ध “राजभक्ति” की नींव को भी हिला कर रख देता है।
जबकि भारत में ब्रिटिश राज की रीढ़ सेना की यह “राजभक्ति” ही है!
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बिल्कुल इसी चीज की कल्पना नेताजी ने की थी. जब (मार्च’44 में) वे आजाद हिन्द सेना लेकर इम्फाल-कोहिमा सीमा पर पहुँचे थे। उनका आह्वान था- जैसे ही भारत की मुक्ति सेना भारत की सीमा पर पहुँचे, देश के अन्दर भारतीय नागरिक आन्दोलित हो जायें और ब्रिटिश सेना के भारतीय जवान बगावत कर दें।
इतना तो नेताजी भी जानते होंगे कि-
1. सिर्फ तीस-चालीस हजार सैनिकों की एक सेना के बल पर दिल्ली तक नहीं पहुँचा जा सकता, और
2. जापानी सेना की ‘पहली’ मंशा है- अमेरिका द्वारा बनवायी जा रही (आसाम तथा बर्मा के जंगलों से होते हुए चीन तक जानेवाली) ‘लीडो रोड’ को नष्ट करना; भारत की आजादी उसकी ‘दूसरी’ मंशा है।
ऐसे में, नेताजी को अगर भरोसा था, तो भारत के अन्दर ‘नागरिकों के आन्दोलन’ एवं ‘सैनिकों की बगावत’ पर। ...मगर दुर्भाग्य, कि उस वक्त देश में न आन्दोलन हुआ और न ही बगावत।
इसके भी कारण हैं।
पहला कारण, सरकार ने प्रेस पर पाबन्दी लगा दी थी और यह प्रचार (प्रोपागण्डा) फैलाया था कि जापानियों ने भारत पर आक्रमण किया है। सो, सेना के ज्यादातर भारतीय जवानों की यही धारणा थी।
दूसरा कारण, फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, अतः आम जनता के बीच इस बात का प्रचार नहीं हो सका कि इम्फाल-कोहिमा सीमा पर जापानी सैनिक नेताजी के नेतृत्व में युद्ध कर रहे हैं।
तीसरा कारण, भारतीय जवानों का मनोबल बनाये रखने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नामी-गिरामी भारतीयों को सेना में कमीशन देना शुरु कर दिया था। इस क्रम में महान हिन्दी लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सयायन 'अज्ञेय' भी 1943 से 46 तक सेना में रहे और वे ब्रिटिश सेना की ओर से भारतीय जवानों का मनोबल बढ़ाने सीमा पर पहुँचे थे। (ऐसे और भी भारतीय रहे होंगे।)
चौथा कारण, भारत का प्रभावशाली राजनीतिक दल काँग्रेस पार्टी गाँधीजी की ‘अहिंसा’ के रास्ते आजादी पाने का हिमायती था, उसने नेताजी के समर्थन में जनता को लेकर कोई आन्दोलन शुरु नहीं किया। (ब्रिटिश सेना में बगावत की तो खैर काँग्रेस पार्टी कल्पना ही नहीं कर सकती थी!- ऐसी कल्पना नेताजी-जैसे तेजस्वी नायक के बस की बात है। ...जबकि दुनिया जानती थी कि इन “भारतीय जवानों” की “राजभक्ति” के बल पर ही अँग्रेज न केवल भारत पर, बल्कि आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं।)
पाँचवे कारण के रुप में प्रसंगवश यह भी जान लिया जाय कि भारत के दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक दल भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश सरकार का साथ देते हुए आजाद हिन्द फौज को जापान की 'कठपुतली सेना' (पपेट आर्मी) घोषित कर रखा था। नेताजी के लिए भी अशोभनीय शब्द तथा कार्टून का इस्तेमाल उन्होंने किया था।
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खैर, जो आन्दोलन एवं बगावत 1944 में नहीं हुआ, वह डेढ़-दो साल बाद होता है और लन्दन में राजमुकुट यह महसूस करता है कि भारतीय सैनिकों की जिस “राजभक्ति” के बल पर वे आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं, उस “राजभक्ति” का क्षरण शुरू हो गया है... और अब भारत से अँग्रेजों के निकल आने में ही भलाई है।
वर्ना जिस प्रकार शाही भारतीय नौसेना के सैनिकों ने बन्दरगाहों पर खड़े जहाजों में आग लगाई है, उससे तो अँग्रेजों का भारत से सकुशल निकल पाना ही एक दिन असम्भव हो जायेगा... और भारत में रह रहे सारे अँग्रेज एक दिन मौत के घाट उतार दिये जायेंगे।
लन्दन में ‘सत्ता-हस्तांतरण’ की योजना बनती है। भारत को तीन भौगोलिक तथा दो धार्मिक हिस्सों में बाँटकर इसे सदा के लिए शारीरिक-मानसिक रूप से अपाहिज बनाने की कुटिल चाल चली जाती है। और भी बहुत-सी शर्तें अँग्रेज जाते-जाते भारतीयों पर लादना चाहते हैं। (ऐसी ही एक शर्त के अनुसार रेलवे का एक कर्मचारी आज तक वेतन ले रहा है, जबकि उसका पोता पेन्शन पाता है!) इनके लिए जरूरी है कि सामने वाले पक्ष को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाया जाय। 

नेहरू को एडविना प्रेमपाश में बाँधने में सफल रहती है

लेडी एडविना माउण्टबेटन के चरित्र को देखते हुए बर्मा के गवर्नर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का अन्तिम वायसराय बनाने का निर्णय लिया जाता है- लॉर्ड वावेल के स्थान पर। एटली की यह चाल काम कर जाती है। विधुर नेहरूजी को लेडी एडविना अपने प्रेमपाश में बाँधने में सफल रहती हैं और लॉर्ड माउण्टबेटन के लिए उनसे शर्तें मनवाना आसान हो जाता है!
(लेखकद्वय लैरी कॉलिन्स और डोमेनिक लेपियरे द्वारा भारत की आजादी पर रचित प्रसिद्ध पुस्तक “फ्रीडम एट मिडनाईट” में एटली की इस चाल को रेखांकित किया गया है।)

नेहरू-एडविना

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बचपन से ही हमारे दिमाग में यह धारणा बैठा दी गयी है कि ‘गाँधीजी की अहिंसात्मक नीतियों से’ हमें आजादी मिली है। इस धारणा को पोंछकर दूसरी धारणा दिमाग में बैठाना कि ‘नेताजी और आजाद हिन्द फौज की सैन्य गतिविधियों के कारण’ हमें आजादी मिली- जरा मुश्किल काम है। अतः नीचे खुद अँग्रेजों के ही नजरिये पर आधारित कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिन्हें याद रखने पर शायद नयी धारणा को दिमाग में बैठाने में मदद मिले-
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सबसे पहले, माईकल एडवर्ड के शब्दों में ब्रिटिश राज के अन्तिम दिनों का आकलन :
“भारत सरकार ने आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चलाकर भारतीय सेना के मनोबल को मजबूत बनाने की आशा की थी। इसने उल्टे अशांति पैदा कर दी- जवानों के मन में कुछ-कुछ शर्मिन्दगी पैदा होने लगी कि उन्होंने ब्रिटिश का साथ दिया। अगर बोस और उनके आदमी सही थे- जैसाकि सारे देश ने माना कि वे सही थे भी- तो भारतीय सेना के भारतीय जरूर गलत थे। भारत सरकार को धीरे-धीरे यह दीखने लगा कि ब्रिटिश राज की रीढ़- भारतीय सेना- अब भरोसे के लायक नहीं रही। सुभाष बोस का भूत, हैमलेट के पिता की तरह, लालकिले (जहाँ आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चला) के कंगूरों पर चलने-फिरने लगा, और उनकी अचानक विराट बन गयी छवि ने उन बैठकों को बुरी तरह भयाक्रान्त कर दिया, जिनसे आजादी का रास्ता प्रशस्त होना था।”
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अब देखें कि ब्रिटिश संसद में जब विपक्षी सदस्य प्रश्न पूछते हैं कि ब्रिटेन भारत को क्यों छोड़ रहा है, तब प्रधानमंत्री एटली क्या जवाब देते हैं।
प्रधानमंत्री एटली का जवाब दो विन्दुओं में आता है कि आखिर क्यों ब्रिटेन भारत को छोड़ रहा है-
1. भारतीय मर्सिनरी (पैसों के बदले काम करने वाली- पेशेवर) सेना ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति वफादार नहीं रही, और
2. इंग्लैण्ड इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी (खुद की) सेना को इतने बड़े पैमाने पर संगठित एवं सुसज्जित कर सके कि वह भारत पर नियंत्रण रख सके।
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यही लॉर्ड एटली 1956 में जब भारत यात्रा पर आते हैं, तब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल निवास में दो दिनों के लिए ठहरते हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस पी.बी. चक्रवर्ती कार्यवाहक राज्यपाल हैं। वे लिखते हैं:
“... उनसे मेरी उन वास्तविक विन्दुओं पर लम्बी बातचीत होती है, जिनके चलते अँग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। मेरा उनसे सीधा प्रश्न था कि गाँधीजी का "भारत छोड़ो” आन्दोलन कुछ समय पहले ही दबा दिया गया था और 1947 में ऐसी कोई मजबूर करने वाली स्थिति पैदा नहीं हुई थी, जो अँग्रेजों को जल्दीबाजी में भारत छोड़ने को विवश करे, फिर उन्हें क्यों (भारत) छोड़ना पड़ा? उत्तर में एटली कई कारण गिनाते हैं, जिनमें प्रमुख है नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरुप भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों में आया ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में क्षरण। वार्तालाप के अन्त में मैंने एटली से पूछा कि अँग्रेजों के भारत छोड़ने के निर्णय के पीछे गाँधीजी का कहाँ तक प्रभाव रहा? यह प्रश्न सुनकर एटली के होंठ हिकारत भरी मुस्कान से संकुचित हो गये जब वे धीरे से इन शब्दों को चबाते हुए बोले, “न्यू-न-त-म!” ”
(श्री चक्रवर्ती ने इस बातचीत का जिक्र उस पत्र में किया है, जो उन्होंने आर.सी. मजूमदार की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑव बेंगाल’ के प्रकाशक को लिखा था।)
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यह कहा जा सकता है :-

1. अँग्रेजों के भारत छोड़ने के हालाँकि कई कारण थे, मगर प्रमुख कारण यह था कि भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों के मन में ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में कमी आ गयी थी और- बिना राजभक्त भारतीय सैनिकों के- सिर्फ अँग्रेज सैनिकों के बल पर सारे भारत को नियंत्रित करना ब्रिटेन के लिए सम्भव नहीं था।
2. सैनिकों के मन में राजभक्ति में जो कमी आयी थी, उसके कारण थे- नेताजी का सैन्य अभियान, लालकिले में चला आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा और इन सैनिकों के प्रति भारतीय जनता की सहानुभूति।
3. अँग्रेजों के भारत छोड़कर जाने के पीछे गाँधीजी या काँग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों का योगदान नहीं के बराबर रहा।  सो, अगली बार आप भी ‘दे दी हमें आजादी ...’ वाला गीत गाने से पहले जरा पुनर्विचार कर लीजियेगा। (साभार)

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ Indian Independence Act, 1947


भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम १९४७ के अन्तर्गत अंग्रेजों ने हमें कहा कि अब वे भारत को 2 भागों में बाँटेंगे- भारत और पाकिस्तान। यों दोनों देशों को कथित आजादी मिली।
भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम १९४७ की भूमिका में भूमिका में लिखा है-  "An Act to make provision for the setting up in India of two independent Dominions, to substitute other provisions for certain provisions of the Government of India Act, 1935, which apply outside those Dominions, and to provide for, other matters consequential on or connected with the setting up of those Dominions". इसमें Dominion शब्द का प्रयोग किया अब कोइ भी मेरा मित्र ये जाँच ले कि Dominion का अर्थ होता क्या है।

स्वाधीनता दिवस 2013 की आपको हार्दिक बधाई!

प्रस्तुति- शीतांशु कुमार सहाय

1  आओ झुक कर सलाम करें उनको;
जिनके हिस्से में ये मुकाम आता है;
खुशनसीब होता है वो खून;
जो देश के काम आता है!
2  दिल से मर कर भी ना निकलेगी वतन की उल्फत;
मेरी मिटटी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी।

3  आओ देश का सम्मान करें शहीदों की कुर्बानियां याद करें;
एक बार फिर थामें हम युवा देश की की कमान;
आओ स्वतन्त्रता दिवस का करें सम्मान;
4  आज़ादी की कभी शाम ना होने देंगे;
शहीदों की कुर्बानी बदनाम ना होने देंगे;
बची हो जब तक एक भी बूंद लहू की रगों में;
तब तक भारत माता का आँचल नीलाम ना होने देंगे;
वन्दे मातरम!

5  यूनान-ओ-मिस्र-ओ रोमा सब मिट गए जहां से;
अब तक मगर है बाकि नाम-ओ-निशाँ हमारा;
कुछ बात है की हस्तीम मिटती नहीं हमारी;
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा;
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

6  मिलते नहीं जो हक वो लिए जाते हैं;
हैं आज़ाद हम पर गुलाम किये जाते हैं;
उन सिपाहियों को शत-शत नमन करो;
मौत के साए में जो जिए जाते हैं।
7  वतन हमारा मिसाल मोहब्बत की;
तोड़ता है, दीवार नफरत की;
मेरी खुशनसीबी है, मिली ज़िन्दगी इस चमन में;
भुला न सके कोई खुशबु इसकी सातो जनम में!
8  अब तक जिसका खून न खौला;
वो खून नहीं, वो पानी है;  जो देश के काम ना आये;
वो बेकार की जवानी है!
9  बात हवायों को बताये रखना;
रोशनी होगी चिरागों को जलाये रखना;
लहू देकर जिसकी हिफ़ज़त की हमने;
ऐसे तिरंगे को सदा दिल में बसाये रखना!
10  आन देश की शान देश की, देश की हम संतान हैं;
तीन रंगों से रंगा तिरंगा, अपनी ये पहचान है!
11  नफरत बुरी है, न पालो इसे;
दिलो में खालिश है, निकालो इसे;
न तेरा, न मेरा, न इसका, न उसका;
 ये सबका वतन है, संभालों इसे!
12  आजाद की कभी शाम नहीं होने देंगें;
शहीदों की कुर्बानी बदनाम नहीं होने देंगें;
बची हो जो एक बूंद भी गरम लहू की;
तब तक भारत माता का आँचल नीलाम नहीं होने देंगें!
13  आओ देश का सम्मान करें;
शहीदों की शहादत को याद करें;
एक बार फिर से राष्ट्र की कमान;
हम हिन्दुस्तानी अपने हाथ धरे;
आओ स्वंतंत्र दिवस का सम्मान करें!

सोमवार, 12 अगस्त 2013

आईएनएस विक्रान्त : तीसरी सोमवारी का उपहार


शीतांशु कुमार सहाय
    चल रहा है इन दिनों सावन का महीना। सावन यानी भगवान शिव की उपासना का विशेष महीना। इस विशेष महीने में भी सोमवार का दिन विशेषों-में-विशेष है। तभी तो भारत सरकार ने देशवासियों को तीसरी सोमवारी को विशेष उपहार दिया। पुराने लड़ाकू जलपोत ‘आईएनएस विक्रान्त’ की याद ताजा करने के लिए सोमवार को स्वदेशी तकनीक वाले नये ‘आईएनएस विक्रान्त’ को समुद्र में उतारा गया। 10 वर्षों के अथक प्रयास और 2 वर्षों की अप्रत्याशित देरी के बाद स्वदेशी विमानवाहक पोत विक्रान्त के जलावतरण के साथ ही विश्व के उन गिने-चुने देशों में भारत शामिल हो गया जो समुद्र में तैरते हवाई अड्डे के डिजाइन, विकास और निर्माण की क्षमता रखते हैं। कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड में पल रहा देश का स्वप्न सोमवार को उस समय साकार हो गया, जब दक्षिणी नौसैनिक कमान में आयोजित समारोह के दौरान रक्षा मंत्री एके एण्टनी की उपस्थिति में उनकी पत्नी एलिजाबेथ एण्टनी ने विधिवत् विक्रान्त के जलावतरण की रस्म पूरी की। यों पोण्टून की पालकी पर सवार होकर 45 हजार टन का विमानवाहक पोत कोचिन के निकट समुद्र में उतर गया। इस तरह भारत ने अपनी नौसेना की रणनीति एवं सामरिक क्षमता को और अधिक मारक, प्रभावशाली व प्रतिरोधी बनाने की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम बढ़ाया। विक्रान्त युद्धपोत के तरण क्षेत्र का लगभग 90 प्रतिशत, संचालन क्षेत्र का लगभग 60 प्रतिशत और लड़ाकू आयुधों का करीब 30 प्रतिशत भाग स्वदेश में निर्मित है। इटली की कम्पनी फिनकेनथियेरी ने इसका प्रोपेल्शन सिस्टम बनाने में मदद की है। एविशन सिस्टम में रूस का नेवल डिजाइन ब्यूरो सहायता दे रहा है।

    भारतीयों के लिए आईएनएस विक्रान्त का नाम नया नहीं है। भारत ने सन् 1957 में ब्रिटेन से एक रनवे वाला विमानवाही पोत ‘एचएमएस हरक्यूलिस’ खरीदा था। भारत में लाकर इसका नाम रखा गया था ‘आईएनएस विक्रान्त’। आईएनएस विक्रान्त भारत का पहला विमानवाही लड़ाकू जहाज था जिसने 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में शत्रुओं के छक्के छुड़ा दिये थे। 4 मार्च 1997 को आईएनएस विक्रान्त सेवामुक्त हो गया। तब से यह मुम्बई तट पर संग्रहालय की शक्ल में खड़ा है। उसी पुराने जहाज को सम्मान देने के लिए देश ने अपने पहले स्वदेशी विमानवाही पोत का नाम भी ‘आईएनएस विक्रान्त’ ही रखा है। इसे ‘डायरेक्टोरेट ऑफ नेवल डिजाइन’ ने डिजाइन किया तथा कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड में इसका निर्माण किया गया है। 2006 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ। रक्षा मंत्री ने 28 फरवरी 2009 में इस पोत के निर्माण की विधिवत् शुरुआत की थी जबकि स्टील काटने का कार्य 2007 में ही शुरू हो चुका था। उस समय एण्टनी ने आशा की थी कि यह पोत 2014 में नौसेना में शामिल हो जाएगा। नौसेना के अनुसार, समुद्र में उतारे जाने के एक वर्ष बाद ही इसके समुद्री परीक्षण शुरू हो पाएंगे। यों 2018 तक यह नौसेना बेड़े में शामिल हो पाएगा। उस समय 2 लड़ाकू युद्धपोतों रूस से खरीदा एडमिरल गोर्शकोव यानी ‘आईएनएस विक्रमादित्य’ और स्वदेशी ‘आईएनएस विक्रान्त’ की मौजूदगी के बाद ‘आईएनएस विराट’ को सेवामुक्त किया जा सकेगा। विक्रमादित्य इस वर्ष के अन्त तक नौसेना बेड़े में शामिल होगा। जहाँ तक नये आईएनएस विक्रान्त की बात है तो यह कई विशेषताओं से भरा है। 16 हजार टन फौलाद को काटकर इसे बनाया गया है। 4 गैस टरबाइन 24 मेगावाट ऊर्जा पैदा करेंगे। पूरे कोचिन शहर की बिजली की जरूरत को पूरा करने में यह ऊर्जा सक्षम है। इसका डेक 10 हजार वर्ग मीटर का है। मतलब फुटबॉल के  2 मैदानों से भी बड़ा। इसमें लगभग 3500 किलो मीटर लम्बी केबल इस्तेमाल की गयी है जो दिल्ली से कोचिन तक पहुँच सकती है। 38 हजार टन इसका भर है जो 56 किलो मीटर प्रति घंटे की रफ्तार से समुद्र पर चल सकता है। यह अर्ली अलार्मिंग सिस्टम से भी लैस है जो शत्रुओं की पनडुब्बी के पास पहुँचने से पहले ही सूचित कर देगा। यह सतह से 50 फीट ऊँचा, 262 मीटर लम्बा और 62 मीटर चौड़ा है। इस पर एक साथ 1550 नौसैनिक तैनात होंगे। यह विमानवाहक पोत अपने साथ 35 लड़ाकू विमानों को लेकर चल सकेगा। इस पर 2 वायुयान रनवे हैं जिनसे हर तीसरे मिनट विमान उड़ान भर सकेंगे। यह मिग 29-के, स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमानों व कामोव-31 हेलीकॉप्टरों से लैस होगा। साथ ही विक्रान्त पर सतह से हवा में मार करने वाली लम्बी दूरी की एलआर सैम मिसाइलें भी तैनात होंगी।

    विश्व की 9 देशों की नौसेनाओं के पास 22 वायुयान वाहक युद्धपोत हैं जो अभी संचालन में हैं। केवल अमेरिका, रूस तथा ब्रिटेन ने ही 40, 000 टन से अधिक के विमान वाहक पोत बनाये हैं। भारत इस कतार में चौथा देश है। सितम्बर 2012 में चीन ने यूक्रेन से पहला विमानवाहक पोत खरीदकर समुद्र में परीक्षण के लिए भेजा है। सोमवारी के ‘विक्रान्त उपहार’ के लिए धन्यवाद दीजिये इसके निर्माण में लगे भारतीय अभियन्ताओं सहित अन्य सहयोगियों को।

रविवार, 11 अगस्त 2013

बेखौफ दामाद जी रॉबर्ट वाड्रा पर कार्रवाई कब होगी?



शीतांशु कुमार सहाय
    मैं करूँ तो एकदम सही, कोई और करे तो गलत। जिनकी पहुँच ऊँची है, यह उन्हीं का कथन है। कुछ इसी तर्ज पर चलते आ रहे हैं रॉबर्ट वाड्रा। ये पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी और वर्तमान प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से भी ताकतवर काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद हैं। लिहाजा उनके सारे कार्य देशभर में बेरोकटोक होते हैं, हो रहे हैं। पिछले वर्ष सितम्बर-अक्तूबर से इस वर्ष के शुरुआती महीनों तक वाड्रा काफी चर्चित रहे। चर्चा सकारात्मक नहीं, नकारात्मक ही था। याद होगा सुधी पाठकों को कि हरियाणा के भारतीय प्रशासनिक अधिकारी अशोक खेमका ने वाड्रा व डीएलएफ के बीच के जमीन सौदे को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया था। उसके बाद हरियाणा की काँग्रेसी सरकार ने 3 सदस्यों की एक जाँच समिति बनायी। समिति ने वाड्रा व उनकी जमीन खरीद को साफ-सुथरा सिद्ध कर दिया। कार्रवाई हुई खेमका पर, उनका तबादला कर दिया गया। उसी दौरान खेमका ने भी अपना जाँच प्रतिवेदन समिति को सौंपा था। उस पर हरियाणा सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। हाल ही में प्रतिवेदन की वह प्रति मीडिया को हाथ लग गयी और देश जान गया कि खेमका द्वारा लगाये गये आरोपों पर न वाड्रा पर कार्रवाई हुई और न ही डीएलएफ पर। फिर भी हरियाणा के मुख्य सचिव ने सफाई दी है कि खेमका के आरोपों की पड़ताल की जा रही है जो गले नहीं उतरता। आखिर कितनी बड़ी पड़ताल चल रही है जो रिपोर्ट प्राप्त होने के 3 माह बाद भी जारी है?

    दरअसल, हरियाणा के गुड़गाँव के शिकोहपुर गाँव में रॉबर्ट वाड्रा का भूमि सौदा एक बार फिर काँग्रेस और उनकी अध्यक्ष सोनिया गाँधी के लिए परेशानी का सबब बना है। भण्डाफोड़ करने वाले अधिकारी अशोक खेमका ने अपनी रपट में कहा है कि वाड्रा ने शिकोहपुर में 3.53 एकड़ जमीन के दस्तावेज में फर्जीवाड़ा किया और वाणिज्यिक कॉलोनी की अनुज्ञप्ति पर अवैध तरीके से बड़ा मुनाफा कमाया। हरियाणा के डिपार्टमेंट ऑफ टाउन ऐंड कंट्री प्लैनिंग यानी शहरी एवं क्षेत्रीय योजना विभाग (डीटीसीपी) ने नियमों एवं नियमन को नजरंदाज करते हुए दलालों के रूप में काम करने से सम्बधित साठगाँठ वाले पूँजीवादियों (क्रोनी कैपिटलिज्म) को फलने-फूलने की अनुमति दी। आरोप यह भी है कि डीटीसीपी की मदद से वाड्रा ने फर्जी लेन-देन किया। खेमका ने 21 मई को ही अपना जवाब 100 पृष्ठों में पेश किया था। इसमें कहा गया है कि 12 फरवरी 2008 के बिक्री के दोनों अनुबन्धों में वाड्रा की कम्पनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से जमीन खरीदी। सेल डीड में 7.5 करोड़ रुपये के चेक का जिक्र है लेकिन यह वाड्रा की कम्पनी का नहीं है। इतना ही नहीं, स्टाम्प ड्यूटी भी वाड्रा की कम्पनी ने नहीं, ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज ने भरा। वाड्रा की हैसियत के मद्देनजर डीटीसीपी ने एक माह में ही मार्च 2008 में उनकी कम्पनी को वाणिज्यिक अनुज्ञप्ति प्रदान कर दी; ताकि वाड्रा को बाजार से मुनाफा हासिल हो सके। आगे भी जारी रहा घालमेल और डीटीसीपी ने अप्रैल 2012 में स्काईलाइट को अनुमति दे दी कि वह डीएलएफ को अनुज्ञप्ति हस्तान्तरित कर सकती है। यों वाणिज्यिक अनुज्ञप्ति प्राप्त जमीन अन्ततः 18 सितम्बर 2012 को डीएलएफ से वाड्रा ने 58 करोड़ रुपये में बेच दी। एक दिन में ही 7.5 करोड़ की जमीन 58 करोड़ रुपये की कैसे हो गयी? प्रश्न यह भी है कि रजिस्ट्री डीड में कहा गया है कि कोई भुगतान नहीं किया गया तो फिर इस संदिग्ध बिक्री से जमीन का मालिकाना हक स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी के पास चले जाना कैसे सम्भव है? ऐसे में इसे बिक्री कहा नहीं जा सकता और कानूनी या नैतिक रूप से स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी जमीन की मालिक नहीं है।

    यदि ऐसी गलती आम व्यक्ति करता तो वह सलाखों के पीछे होता। विदित हो कि निबन्धन अधिनियम 1908 के खण्ड-82 के तहत गलत जानकारी व फर्जी दस्तावेज देने पर 7 वर्षों तक की सजा हो सकती है। केवल जमीन डीड ही नहीं, स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी की ओर से दाखिल बैलेंस शीट भी गलत है। यह कम्पनी ऐक्ट और भारतीय दण्ड विधान की धाराओं 417, 468 और 471 के तहत अपराध है। अब घोटाले के बारे में जान लेना चाहिये कि अगर व्यावसायिक कॉलोनी के लिए बाजार मुनाफा न्यूनतम एक करोड़ रुपये मान लिया जाए तो पिछले 8 वर्षों में जमीन अनुज्ञप्ति घोटाला करीब 20,000 करोड़ रुपये का होगा। खेमका ने दावा किया कि प्रति एकड़ 15.78 करोड़ रुपये के प्रीमियम पर यह राशि 3.5 लाख करोड़ रुपये जा सकती है। इतने बड़े घोटाले के बावजूद नवम्बर 2012 में प्रधान मंत्री कार्यालय ने भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वाड्रा के खिलाफ अनियमितताओं के आरोपों को झूठा बताया था। अब खेमका की रपट सार्वजनिक होने पर हरियाणा सरकार, उसकी जाँच समिति और प्रधान मंत्री कार्यालय की वाड्रा के पक्ष में दी गयी दलीलें झूठ सिद्ध हो रही हैं। ऐसे में क्या ‘दामाद जी’ पर हरियाणा सरकार कार्रवाई करेगी या उनकी बेखौफी में और वृद्धि कर दी जाएगी?

शनिवार, 10 अगस्त 2013

पंजीकरण अधिनियम, 1908 का संशोधन विधेयक 8 अगस्त 2013 को संसद में पेश


शीतांशु कुमार सहाय
       पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2013
      इस विधेयक में प्रमुख संशोधन प्रस्‍तावित है:-

·       1) वर्तमान में पुस्‍तक 4, अर्थात ‘विविध पंजीयक’ में शामिल सभी पंजीकृत दस्‍तावेजों के विवरण (वसीयत के अलावा) आम जनता के लिए उपलब्‍ध नहीं हैं। अधिक पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए पुस्‍तक चार में इन्‍हें आम जनता को देखने की सुविधा देने का प्रस्‍ताव किया गया है।
·      2)  वर्तमान में अधिनियम में सिर्फ पुत्र को गोद लेने से संबंधित दस्‍तावेजों को पंजीकृत कराने की आवश्‍यकता है। लैंगिंग समानता को सुनिश्चित करने के लिए पुत्रियों को भी गोद लेने से संबंधित दस्‍तावेजों को खण्‍ड में जोड़ा गया है।
·     3)  पंजीकरण को अब दिए गए किसी भी राज्‍य अथवा संघशासित प्रदेश में कहीं भी कराए जाने को स्‍वीकृति दी गई है। लोगों की सुविधा, पार‍दर्शिता को ध्‍यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है। इससे दस्‍तावेजों के इलेक्‍ट्रॉनिक पंजीकरण को प्रोत्‍साहन देने में भी मदद मिलेगी। देशभर में भूमि रिकॉर्डों के तेजी से बढ़ते कम्‍प्‍यूट्रीकरण को देखते हुए यह आवश्‍यक है कि दस्‍तावेजों के इलेक्‍ट्रॉनिक पंजीकरण की सुविधा प्रदान की जाए, इससे व्‍यापक पारदर्शिता को भी सुनिश्चित किया जाएगा। अधिनियम में इसी के अनुसार संशोधन को प्रस्‍तावित किया गया है।
·     4)   बिक्री अथवा अचल संपत्ति के निर्माण से संबंधित पावर एटॉर्नी, भवन निर्माताओं के समझौते और अन्‍य किसी समझौते से जुड़े दस्‍तावेजों को अब आवश्‍यक तौर पर पंजीकृत कराना होगा। दस्‍तावेजों की धोखाधड़ी से जुड़े मामलों को न्‍यूनतम करने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है।
·     5)   वर्तमान में उप-रजिस्‍ट्रार के कार्यालय को दस्‍तावेजों के पंजीकरण से इंकार करने का अधिकार नहीं है। इससे अनाधिकृत व्‍यक्तियों को झूठे पंजीकरण कराने में मदद मिलती है। इस तरह की संपत्तियों के रजिस्‍ट्रेशन को रोकने के लिए एक नया खंड 18-ए प्रस्‍तावित किया गया है। (जैसे चेरिटेबल संस्‍थान और सरकार से संबंधित)
·       7) पंजीकरण अधिनियम 1908 के खंड-28 में प्रावधान है यदि किसी व्‍यक्ति के पास एक से ज्‍यादा राज्‍यों में अचल संपत्तियां हैं, तो वह इन राज्‍यों में से किसी में भी अपने हस्‍तांतरण से संबंधित दस्‍तावेजों को पंजीकृत करा सकता है। अनैतिक तत्‍व इस प्रावधान का दुरूप्रयोग करते रहे हैं और ऐसे तत्‍व राज्‍यों में अपनी संपत्तियों को न्‍यून पंजीकरण शुक्‍ल और स्‍टाम्‍प ड्यूटी पर पंजीकृत करा लेते हैं। इससे उस राज्‍य को हानि उठानी पड़ती है, जहां वास्‍तविक रूप से संपत्ति है।

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्‍थापना विधेयक 2012 में निष्‍पक्ष हर्जाने और पारदर्शिता अधिकार के संबंध में---
·        8) भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थास्‍थापना विधेयक 2012 में निष्पक्ष हर्जाने और पारदर्शिता के अधिकार से जुड़ी नई विशेषताओं में हर्जाने की बढी हुई धनराशि शामिल है, जिसे विस्‍थापित परिवारों को मिलने की गारंटी दी गई है।
·      9)  हालांकि इस धनराशि को तय करने के लिए पंजीकृत मूल्‍य की जगह वर्तमान बाजार मूल्‍य को आधार माना गया है। पंजीकृत मूल्‍य आमतौर पर अस्‍पष्‍ट और सही नहीं होते और पुराने भी होते हैं। यदि पंजीकरण को आवश्‍यक बनाया जाता है और इसका आम लोगों द्वारा समीक्षा/मूल्‍य संवर्द्धन किया जा सकता है, तो इससे खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में भू‍मि के मूल्‍यों में सटीकता आएगी।
·      10)  गैर-पेशेवर और तदर्थ तरीके से दर्ज किए जाने के कारण भूमि शीर्षक आमतौर पर विवाद का कारण बनते है। पंजीकरण अधिनियम में किए गए इन नये संशोधनों से लाभग्राहताओं की पहचान/निर्धा‍रण (स्‍पष्‍ट शीर्षकों के माध्‍यम से) में अधिक पारदर्शिता को सुनिश्चित किया जा सकेगा।

अल्‍पसंख्‍यकों की खिदमत में ‘खिदमत’ हेल्‍पलाइन शुरू की


शीतांशु कुमार सहाय
केंद्रीय अल्‍पसंख्‍यक कार्यमंत्री श्री के. रहमान खान ने 8 अगस्त 2013 को ‘खिदमत’ नाम की एक समर्पित निशुल्‍क हेल्‍पलाइन शुरू की। ‘खिदमत’ हेल्‍पलाइन भारत के अल्‍पसंख्‍यकों को समर्पित करते हुए उन्‍होंने आशा व्‍यक्‍त की कि यह समाज के सभी वर्गों विशेषकर वंचित वर्गों के समावेशी विकास का राष्ट्रपिता महात्‍मा गांधी का सपना साकार करेगी। इस अवसर पर रहमान खान ने कहा कि यह सेवा ताजा सूचना के माध्‍यम से अल्‍पसंख्‍यकों को सशक्‍त बनाएगी। यह हेल्‍पलाइन अब चालू हो चुकी है। शुरूआत में यह हेल्‍पलाइन सभी कार्यदिवसों के दौरान सुबह नौ बजे से शाम छ: बजे तक खुली रहेगी। इसकी सफलता और मांग को देखते हुए इसे नई सुविधाओं से युक्‍त करके 24×7 भी बनाया जा सकता है। बदलते भारत में जब फोन सेवाएं और मोबाइल देश के कोने-कोने तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में यह समर्पित हेल्‍पलाइन संभवत: विकास और कल्‍याणकारी कार्यक्रमों के बारे में सूचना देने का बेहतर विचार साबित हो सकती हैं।
समय पर मिली सही जानकारी ताकत होती है। ‘खिदमत’ हेल्‍पलाइन के माध्‍यम से सभी स्‍तरों के अल्‍पसंख्‍यकों को समान रूप से शक्ति सम्‍पन्‍न बनाने का प्रयास है।
विभिन्‍न कार्यक्रमों और योजनाओं के बारे में लक्षित आबादी में जानकारी का अभाव सबसे बड़ी रूकावट है। मंत्रालय ने यह समर्पित निशुल्‍क हेल्‍पलाइन इसलिए शुरू की है, क्‍योंकि उसका मानना है कि लक्षित आबादी को एक मंच की जरूरत है। यहाँ से वे आसान भाषा में बातचीत के माध्‍यम से नई जानकारी प्राप्‍त कर सके और उनकी अधिकांश जिज्ञासाएं शांत हो सके।
इस हेल्‍पलाइन की शुरूआत के साथ ही किसी गांव या दूरदराज के इलाके में बैठा कोई छात्र छात्रवृत्ति योजनाओं के बारे में तत्‍काल सूचना प्राप्‍त कर सकता है। किसी बेरोजगार अल्‍पसंख्‍यक नौजवान को मंत्रालय की ओर से चलाए जाने वाले कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा रोजगार के अवसरों के बारे में तत्‍काल जानकारी प्राप्‍त हो सकती है।

आरटीआई आवेदनों के लिए ऑनलाइन वेब पोर्टल की शुरूआत


शीतांशु कुमार सहाय
भारत सरकार ने आरटीआई आवेदनों के लिए ऑनलाइन वेब पोर्टल की शुरूआत की है। भारतीय नागरिक सूचना का अधिकार (आरटीआई) के आवेदन अब ऑनलाइन भर सकते है। इनमें विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। आरटीआई आवेदन पत्र ऑनलाइन भेजने की विस्‍तृत प्रक्रिया इस प्रकार है:-
भारतीय नागरिक आरटीआई ऑनलाइन वेब पोर्टल www.rtionline.gov.in के जरिये आरटीआई आवेदन ऑनलाइन कर सकते है। आरटीआई आवेदनों के लिए निर्धारित फीस भी ऑनलाइन अदा की जा सकती है। इसके लिए भारतीय स्‍टेट बैंक और इसके सहायक बैंकों की इंटरनेट बैंकिंग के जरिये मास्‍टर/वीजा के डेबिट/क्रेडिट कार्डों का इस्‍‍तेमाल भी किया जा सकता है। यह सुविधा इस समय भारत सरकार के 37 मंत्रालय/विभागों के लिए ही उपलब्‍ध है। यह जानकारी कार्मिक, सार्वजनिक शिकायत और पेंशन मंत्रालय में राज्‍य मंत्री तथा प्रधानमंत्री के कार्यालय में राज्‍यमंत्री श्री वी. नारायणसामी ने 8 अगस्त 2013 को राज्‍यसभा में डॉक्‍टर जर्नादन वागमरे और श्री एनके. सिंह के एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में दी।

अशोक खेमका का जवाब सार्वजनिक : रॉबर्ट वाड्रा पर 20,000 करोड़ से 3.5 लाख करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े का आरोप

प्रस्तुति- शीतांशु कुमार सहाय
हरियाणा के गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में रॉबर्ट वाड्रा का भूमि सौदा एक बार फिर कांग्रेस पार्टी और उसकी अध्यक्ष के लिए परेशानी का सबब बनता दिख रहा है। भंडाफोड़ करने वाले आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने आरोप लगाया है कि रॉबर्ट वाड्रा ने गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में 3.53 जमीन के दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया और वाणिज्यिक कालोनी के लाइसेंस पर बड़ा मुनाफा हासिल किया।
आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने कहा--

1)  हरियाणा सरकार ने पिछले 2012 के अक्टूबर में वाड्रा-डीएलएफ डील की जांच के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित किया था। हरियाणा सरकार और इस जांच समिति पहले ही वाड्रा को क्लीन चिट दे दी और डील कैंसल करने के लिए अशोक खेमका को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। हरियाणा सरकार ने इस पर खेमका से जवाब मांगा था।
2)  अशोक खेमका ने 100 पन्नों की रिपोर्ट 21मई 2013 को हरियाणा सरकार को सौंप दी थी। खेमका को जवाब दाखिल किए हुए तीन महीना से अधिक समय हो चुका है लेकिन हरियाणा के चीफ सेक्रेटरी पीके चौधरी का कहना है कि इस विस्तृत जवाब का फिलहाल अध्ययन किया जा रहा है, खेमका ने जो सवाल उठाए हैं, उन पर गौर किया जा रहा है।
3)  नवंबर 2012 में प्रधान मंत्री कार्यालय (पीएमओ) भी इलाहाबाद हाई कोर्ट में वाड्रा के खिलाफ अनियमितताओं के आरोपों को झूठा और अफवाह पर आधारित बता चुका है।
4) आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने 21 मई 2013 को हरियाणा सरकार को भेजी अपनी रिपोर्ट में कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ड वाड्रा ने गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में 3.53 एकड़ जमीन खरीदने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए और जमीन के लिए कोई कीमत नहीं चुकाई थी।

5) 12 फरवरी 2008 को वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से जमीन हासिल की थी और मार्च 2008 में उनकी कंपनी को वाणिज्यिक कालोनी की सहमति मिल गई। दोनों सेल डीड्स फर्जीवाड़ा हैं। हरियाणा राज्य सरकार ने ऐसा वाड्रा को फायदा पहुंचाने के लिए किया।
6) जैसा कि रजिस्ट्री डीड में कहा गया है कि कोई पेमेंट नहीं किया गया तो फिर इस संदिग्ध बिक्री से जमीन का मालिकाना हक स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी के पास चले जाना कैसे संभव है? कानून के मुताबिक बिक्री के तहत रकम के भुगतान या रकम देने के वादे पर मालिकाना हक का ट्रांसफर होता है। रजिस्टर्ड डीड में भविष्य में भी कोई भुगतान करने का वादा नहीं किया गया है। ऐसे में इसे सेल कहा ही नहीं जा सकता है और कानूनी या नैतिक रूप से वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी जमीन की मालिक नहीं हो सकती है।
7)  रजिस्ट्रेशन ऐक्ट 1908 के सेक्शन 82 के तहत गलत जानकारी और फर्जी दस्तावेज देने पर 7 सालों तक की सजा का प्रावधान है।
8) सिर्फ जमीन की सेल डीडी ही नहीं स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी की ओर से दाखिल बैलेंस शीट भी गलतहै। कंपनी ऐक्ट और आईपीसी के सेक्शन 417, 468 और 471 के तहत यह अपराध है।
9) 5 अगस्त, 2008 को डीएलएफ यूनिवर्सल और स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी के बीच 2.7 एकड़ जमीन के लिए हुआ अनरजिस्टर्ड समझौता कानूनी रूप से मान्य नहीं है। इससे सरकार खजाने को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ।
10)  डिपार्टमेंट ऑफ टाउन ऐंड कंट्री प्लैनिंग (डीटीसीपी) ने अप्रैल 2012 में स्काईलाइट को लाइसेंस डीएलएफ को ट्रांसफर करने की इजाजत दे दी और इसके बाद आखिरकार 18 सितंबर 2012 को यह लाइसेंस डीएलएफ को बेच दिया गया।
11)  हरियाणा सरकार की जांच समिति ने इस वर्ष के प्रारंभ में कहा था कि वाड्रा से जुड़े भूमि सौदों की जांच के लिए खेमका की ओर से जारी आदेश नियमों या प्रावधानों के दायरे में नहीं आते हैं और उपयुक्त नहीं हैं।
12) अगर इस संबंध में वाणिज्यिक कालोनी लाइसेंस के लिए बाजार मुनाफा न्यूनतम एक करोड़ रूपया मान लिया जाए तब पिछले 8 वर्षों में जमीन लाइसेंस घोटाला करीब 20,000 करोड़ रुपये का होगा। उन्होंने दावा किया कि प्रति एकड़ 15.78 करोड़ रुपये के प्रीमियम पर यह राशि 3.5 लाख करोड़ रुपये जा सकती है।
13)  डीटीसीपी ने अप्रैल 2012 में स्काईलाइट को डीएलएफ को लाइसेंस हस्तांतरित करने की अनुमति दी और लाइसेंसशुदा जमीन अंतत: 18 सितंबर 2012 को डीएलएफ को बेच दी गई।
14)  वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी और डीएलएफ के बीच 2011 से 2012 तक हुए फर्जी लेन-देन। सेल डीड में 7.5 करोड़ रुपये के चेक का जिक्र है लेकिन यह वाड्रा की कंपनी का नहीं है। इतना ही नहीं, स्टांप ड्यूटी भी वाड्रा की कंपनी ने नहीं दी। उसे ओंकारेश्वर प्रॉपर्टी ने भरा।
15) खेमका ने 21 मई को अपना जवाब पेश किया था। इसमें कहा गया है कि 12 फरवरी 2008 के बिक्री के दोनों अनुबंध में वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से जमीन खरीदी और मार्च 2008 में डीटीसीपी की ओर से उनकी कंपनी को वाणिज्यिक लाइसेंस प्रदान करने के लिए जारी आशय पत्र फर्जी लेनदेन है, ताकि वाड्रा को बाजार से मुनाफा हासिल हो सके।
16)  डिपार्टमेंट ऑफ टाउन ऐंड कंट्री प्लैनिंग (डीटीसीपी) ने इस हेराफेरी में वाड्रा का साथ दिया। डीटीसीपी ने नियमों को ताक पर रखकर बिचौलिये की तरह काम कर रहे वाड्रा को फायदा पहुंचाने के लिए जमीन के वाणिज्यिक इस्तेमाल का लाइसेंस दे दिया।
17)  वाणिज्यिक इस्तेमाल का लाइसेंस के बाद वाड्रा ने 58 करोड़ में यह जमीन डीएलएफ के बेच दी थी। खेमका यह सवाल भी उठा रहे हैं कि एक दिन नें ही 7.5 करोड़ की जमीन 58 करोड़ की कैसे हो गई?
18) इंडियन नेशनल लोकदल ने अशोक खेमका के जवाब पर उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश से इसका जांच कराने की मांग की है।

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

अगस्त क्रान्ति और भारत दर्शन


 
 शीतांशु कुमार सहाय
 ‘‘यह एक छोटा-सा मंत्र मैं आपको देता हूँ। आप इसे हृदय-पटल पर अंकित कर लीजिये और हर श्वांस के साथ उसका जाप कीजिये। वह मंत्र है- करो या मरो। या तो हम भारत को आजाद करेंगे या आजादी की कोशिश में प्राण दे देंगे। हम अपनी आँखों से अपने देश को सदा गुलाम और परतन्त्र बना रहना नहीं देखेंगे। प्रत्येक सच्चा काँग्रेसी, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, इस दृढ़ निश्चय से संघर्ष में शामिल होगा कि वह देश को बन्धन और दासता में बने रहने को देखने के लिए जिन्दा नहीं रहेगा। ऐसी आपकी प्रतिज्ञा होनी चाहिये।’’ अखिल भारतीय काँग्रेस समिति की बैठक में दिये गये गाँधीजी के भाषण का यह अंश आज भी लागू है। अक्षरशः नहीं, कुछ बदलकर। वस्तुतः आज ही के दिन सन् 1942 में ‘करो या मरो’ के नारे साथ स्वतन्त्रता के अन्तिम चरण का आन्दोलन (अगस्त क्रान्ति) आरम्भ किया था महात्मा गाँधी ने। आज 71 वर्ष हो गये गाँधीजी को देशवासियों को दासता से मुक्ति का संकल्प दिलवाये हुए। पर, अफसोस कि आज भी आम देशवासी कई दासताओं को देखने के लिए ही नहीं; झेलने के लिए भी जिन्दा हैं। ये दासताएँ अंग्रेजों जैसे आतताई शासक ने नहीं, अपने लोगों की अपने द्वारा चुनी हुई सरकारों ने दी हैं। घटती कमाई और बढ़ती महंगाई की दासता, खाली होती थाली की दासता, गिरती विधि-व्यवस्था के बीच प्राण व प्रतिष्ठा के असुरक्षा की दासता, साम्प्रदायिक उन्माद की दासता, अमूल्य मतदान करके भी 5 वर्ष तक जनविरोधी सरकार को झेलने की दासता, जायज सरकारी सहायता के अभाव में आत्महत्या की दासता- ये दासता, वो दासता, पग-पग पर दासता। इन सबके साथ जिल्लत की जिन्दगी जीने को विवश हैं देशवासी।

    अगस्त क्रान्ति के साथ ही ‘करो या मरो’ खत्म नहीं हुआ, यह जारी है अब भी। सरकार द्वारा उपहार में मिली वर्तमान दुर्व्यवस्थाओं के बीच जिन्दगीभर संघर्ष करो या घिसट-घिसटकर मरो। स्वतन्त्र भारत का लोकतन्त्र और यहाँ की लोकतान्त्रिक सरकारें इसी ‘करो या मरो’ को समझा रही हैं, समझाती आ रही हैं- मेरे अनुसार करो या मरो- अब जनता न समझ पाये तो इसमें सरकार का क्या दोष! सरकार कभी 24 रुपये तो कभी 32 रुपये कमाने वाले को अमीर कहती है। इतनी राशि कमाने वाला परिवार के साथ जिन्दा रहेगा या मरेगा? 85 करोड़ गरीबों के देश में काँग्रेस के एक युवा शख्स ने तो यहाँ तक कह डाला कि रुपये-पैसे या साधनों का अभाव गरीबी नहीं है। जो गरीब मुश्किल से एक जून का भोजन जुटा पाता है, उसकी झोपड़ी में जाकर वह भोजन भी खाकर गरीबों का हमदम बनने का ढोंग रचने वाले उस शख्स ने गरीबी को दिमागी फितूर बताया। अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री को भी माँ के साथ इशारों पर नचाने वाला यह अनर्थशास्त्री युवा स्वयं प्रधान मंत्री बनने का स्वप्न भी देख रहा है। राजनीतिबाज ऐसा बोलने का दुस्साहस इसलिये कर रहे हैं; क्योंकि भारत का लोकतान्त्रिक, समाजवादी व धर्मनिरपेक्ष संविधान पँूजीवाद-सामन्तवाद के गठजोड़ की छाया से बच नहीं पाया। अंग्रेजों के वैभव व दबाव ने भारतीयों के दिलों में भय बैठाया था। इसे स्वतन्त्र भारत के शासकों ने भी अपनाये रखा है। ये इसे और मजबूत करते जा रहे हैं। आम जनता की गरीबी, महंगाई, कुपोषण, बीमारी, बेकारी, शोषण, विस्थापन व आत्महत्याओं के मलबे तले दबे भारत में शासक वर्ग का वैभव निश्चय ही नागवार गुजरता है। करोड़ों गटकने व लाखों का सरकारी सुख भोगने वाले गरीब और 32 रुपये में आम लोग अमीर! यह है शासक वर्ग का अर्थशास्त्र!

अगस्त क्रान्ति के दिन यह भी याद कर लें कि सेवाग्राम व साबरमती आश्रम के छोटे-कच्चे कमरों में बैठकर गाँधीजी को विश्व के सबसे बड़े साम्राज्य से राजनीतिक-कूटनीतिक संवाद करने में असुविधा नहीं हुई, चिन्तन-लेखन-आन्दोलन करने में भी नहीं। पर, आज के भारतीय शासक वर्ग को चाहिये वातानुकूलित कमरा। यह वर्ग गाँधीजी से कोई प्रेरणा नहीं लेना चाहता। सच तो यह है कि गाँधीजी आम भारतीय के लिए ‘राष्ट्रपिता’ हैं, शासकों के लिए नहीं। भारत सरकार ने उन्हें औपचारिक रूप से ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा दिया ही नहीं है।

    9 अगस्त को हम अगस्त क्रान्ति का 71वाँ वर्षगाँठ मना रहे हैं। ऐसे में शासक वर्ग व जनता सोचे कि क्या वे देश की आजादी को अक्षुण्ण बनाये रखने लिए कृत्संकल्पित हैं? 71 वर्षों पूर्व राष्ट्रपिता द्वारा कराए गये संकल्प को निबाह रहे हैं? दासता की बेड़ियों को तोड़ रहे हैं या उसे और मजबूत कर रहे हैं? क्या जनता का पक्ष मजबूत हो रहा है? कहीं अगस्त क्रान्ति के प्रेरणा-प्रतीकों, प्रसंगों व विभूतियों का उत्सव मनाकर उसके सारतत्त्व को खत्म तो नहीं कर रहे हैं? दरअसल, अगस्त क्रान्ति का 50वाँ वर्षगाँठ वाला वर्ष 1992 विशेष यादगार है। उसी वर्ष नयी आर्थिक नीतियों के तहत देश के दरवाजे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की लूट के लिए खोले गये और एक 500 वर्ष पुरानी मस्जिद को राम मन्दिर आन्दोलन के तहत ढाह दिया गया। तब से नवउदारवाद व सम्प्रदायवाद की युगलबन्दी के बीच भारत का शासक वर्ग जनविरोधी बन गया। 90 के दशक के बाद उपनिवेश काल से भी अधिक भयानक तरीके से जनता का दमन किया जा रहा है। ...तो ईद की खुशियों के बीच मना लीजिये अगस्त क्रान्ति दिवस को, बिना उसके सन्देशों को अपनाए, बिना उसपर अमल किये!

बुधवार, 7 अगस्त 2013

पाकिस्तान को जवाब तो देना ही होगा


   
शीतांशु कुमार सहाय
हम अपने घरों में सुरक्षित हैं, अपने परिवार के साथ सुख-चैन की जिन्दगी व्यतीत कर रहे हैं और शान से चला रहे हैं अपना कारोबार, निश्चिन्त होकर कर रहे हैं नौकरी। यह इसलिये सम्भव है कि देश की सीमा पर हमारे जांबाज प्रहरी कड़ाके की ठण्ड या कड़कड़ाती धूप में दिन-रात मुस्तैद हैं, देश और देशवासियों की सुरक्षा के लिए अपनी सुरक्षा हथेली पर लेकर तैनात हैं। ऐसे में देशवासियों का नैतिक समर्थन तो उन्हें मिल ही रहा है, तभी तो 6 अगस्त को पुंछ के चक्कां दा बाग इलाके में घुसकर पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा 4 जवानों और एक जेसीओ की हत्या के विरोध में देशवासी गुस्से में हैं। देश के कोने-कोने से पाकिस्तान को माकूल जवाब देने की माँग उठ रही है। आवश्यकता है कि उन्हें सरकारी स्तर पर भी उचित सम्मान मिले और उनके त्याग-बलिदान की सराहना हो। पर, अफसोस है कि ऐसा हो नहीं रहा है। उक्त हमले पर रक्षा मंत्री एके एण्टनी ने संसद में कहा कि हमलावर पाकिस्तानी सैनिक नहीं; बल्कि पाकिस्तानी सैनिकों के वेश में आतंकवादी थे। यह बयान पाकिस्तानी सैनिकों को एक तरह से ‘क्लीन चिट’ देने जैसा है। देशवासियों के अलावा विपक्षी नेताओं ने भी एण्टनी के बयान को निन्दनीय कहा है और उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी माँगने को कह रहे हैं।

वास्तव में लोकसभा में एण्टनी ने एक तरह से सीमा प्रहरियों के बलिदान को नजर-अन्दाज किया है। सीमा प्रहरी अपनी जान गँवाकर देश की हिफाजत   करें और देश का रक्षा मंत्री उन्हें चन्द बोलों से भी नैतिक सम्बल न दे! यह तो निश्चय ही निन्दनीय है। अब उनके दल काँग्रेस के बयान बहादुरों ने तो यहाँ तक कह दिया कि एण्टनी माफी नहीं माँगेंगे। जान हथेली पर लेकर देश की सुरक्षा करने वाले सैनिकों को सरकारी स्तर पर मिलने वाले नैतिक सम्बल का यही है नमूना!

   
एक वह भी समय था जब धोती पहनने वाले प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री फेंटा बाँधकर पहुँच गये थे सीमा पर अपने सैनिकों की हिम्मत बढ़ाने और एक आज के रक्षा मंत्री हैं। शास्त्री भी काँग्रेसी थे और एण्टनी भी काँग्रेस के ही हैं। पर, दोनों में अन्तर देख रहे हैं देशवासी और शिद्दत से महसूस भी कर रहे हैंे। जहाँ तक सीमा पर हमले की बात है तो 3 जुलाई से अब तक पाकिस्तान ने 7 बार युद्धविराम का उल्लंघन किया। 3 जुलाई को पुंछ के सब्जियाँ में एक शव की तलाशी में गये पुलिसवालों पर पाकिस्तानी सैनिकों ने गोली चलायी। 8 जुलाई को पाकिस्तानी आतंकियों के बम विस्फोट में पुंछ में 2 कुली मारे गये। भारतीय सेना ने जब जख्मी हुए अन्य कुलियों को राहत पहुँचाने की कोशिश की तो पाकिस्तानी सेना ने फायरिंग की। 12 जुलाई को जम्मू जिले के पिण्डी इलाके में पाकिस्तानी रेंजरों ने भारतीय चौकी पर फायरिंग की। 22 जुलाई को पुंछ में भारतीय चौकी पर पाकिस्तान ने छोटे हथियारों से फायरिंग की। 27 जुलाई को पुंछ में भारतीय चौकियों को पाकिस्तान ने गोलीबारी का निशाना बनाया तो 28 जुलाई को पुंछ के ही डोडा बटालियन फॉरवर्ड इलाके में पाकिस्तान ने मशीन गन और ग्रेनेड दागे। यों 6 अगस्त को पाक सेना ने पुंछ के चक्कां दा बाग इलाके में घुसकर 4 जवानों और एक जेसीओ की हत्या कर दी। नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी हरकतों को देखकर स्पष्ट है कि नवाज शरीफ भारत के साथ ‘शराफत’ नहीं दिखा रहे हैं।

    अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे पाकिस्तान को सबक सिखाना जरूरी है। इसके लिए चौतरफा दबाव बनाना होगा। इसमें कूटनीति, कारोबार, सैन्य दबाव और खेल-संस्कृति से जुड़े मोर्चे पर सख्ती शामिल हैं। ऐसा करने से पाकिस्तान पर जबर्दस्त दबाव बन सकता है और उसे अपनी गलती का पुरजोर एहसास हो सकता है। कूटनीतिक दबाव के तहत भारत व पाकिस्तान के राजनयिकों के बीच प्रस्तावित मुलाकात को कुछ समय के लिए रोका जाना चाहिये। साथ ही भारत अगले महीने न्यूयार्क में प्रस्तावित मनमोहन सिंह व नवाज शरीफ की मुलाकात को भी रद्द कर सकता है। इससे पाकिस्तान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनेगा। कारोबारी दबाव के अन्तर्गत भारत द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही रियायतों पर लगाम लगाया जाना चाहिये। बिजली के क्षेत्र में प्रस्तावित मदद के प्रोजेक्ट को भी तुरन्त रोका जाना चाहिये। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को दी जा रही कारोबारी मदद के खिलाफ भी भारत गोलबन्दी कर सकता है। सैन्य विकल्प के रूप में सेना को यह निर्देश दिया जा सकता है कि सीमा पर पाकिस्तानी हमले का स्थानीय स्तर पर ही मुँहतोड़ जवाब दे। साथ ही सांस्कृतिक रिश्तों पर कुछ समय के लिए विराम लगाया जाये। क्रिकेट समेत कई खेलों को लेकर भी भारत रिश्ता तोड़ सकता है। खस्ताहाल पाकिस्तानी क्रिकेट और उसके प्रशंसकों पर इससे जबर्दस्त  दबाव बनेगा। यों बिगड़ैल पाकिस्तान का होश ठिकाने लग जाएगा।

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय में अब प्यार की पढ़ाई


 
  शीतांशु कुमार सहाय
19वीं सदी में अपने द्वारा आविष्कृत क्रेस्कोग्राफ के माध्यम से पेड़-पौधों में प्रेम की उत्तेजना को विश्व में पहली बार प्रदर्शित करने वाले वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस को यह नहीं मालूम था कि 21वीं सदी में उसी प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय में प्रेम की पढ़ाई भी आरम्भ हो जाएगी। पर, यह ऐतिहासिक पहल मूर्त्त रूप ले रहा है और 2014 के जनवरी से राजा राम मोहन राय द्वारा स्थापित प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय में प्यार का पाठ पढ़ेंगे विद्यार्थी। वास्तव में क्रेस्कोग्राफ 1/100000 इंच प्रति सेकेण्ड तक की वनस्पति के स्पन्दन को दर्ज कर सकता है। पर, प्यार का स्पन्दन इससे भी सूक्ष्म है जिसका अध्ययन अब प्रेसीडेन्सी में आरम्भ होने वाला है। यह ऐसा समय है जब विश्वस्तर पर सर्वाधिक कमी प्यार की ही महसूस की जा रही है। घर-परिवार व समाज से प्यार गुम हो गया-सा लग रहा है। सबको वर्तमान यांत्रिक विकास ने इस कदर स्वार्थी बना दिया है कि सम्पत्ति-संचय और रुपयों के ढेर के बीच प्रेम की लकीर ढँक गई, विलीन हो गई। उसी की खोज फिर से प्रारम्भ करेंगे कोलकाता के करीब 2 सदी पुराने प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थी। तलाशे जाएंगे प्रेम के नए सूत्र, प्रादुर्भूत होंगे प्यार के नूतन सिद्धान्त और मोहब्बत के नवीन आयाम गढ़े जाएंगे। पुस्तकों की उबाऊ गन्ध के बीच प्यार के अफसाने की गुदगुदाहट महसूस करेंगी छात्र-छात्राओं की टोली। उन्हें प्यार की पढ़ाई इस तरह प्रभावित करेगी कि व्यावहारिक जीवन में वे प्रत्येक कार्य को बड़े प्यार-दुलार से निभाएंगे, परिणति तक पहुँचाएंगे। प्रसीडेन्सी में मटुकनाथ जैसे प्रेम विशेषज्ञ होंगे या जूली जैसी प्रेम दीवानी होगी, यह कहना भले ही अतिरेक सिद्ध हो मगर प्रसिद्ध प्रेमियों की जीवनी से प्रेम का विशेष रूप तो अख्तियार करेंगे ही विद्यार्थी। यह अनुकरणीय भी हो सकता है और निन्दनीय भी। पर, प्यार के पाठ्यक्रम को तैयार करने वाली टीम तो यही कहती है कि इसमें निहित तथ्य पढ़नेवालों में सकारात्मकता लाएगी, नकारात्मकता नहीं।

  
विदित हो कि सन् 1817 ईश्वी में कुछ सहयोगियों के साथ तत्कालीन समाजसेवी राजा राम मोहन राय ने कोलकाता में हिन्दू महाविद्यालय की स्थापना की। पश्चिम जगत की उच्च शिक्षा को एशिया में प्रदान करना ही इसका उद्देश्य था। 1855 ईश्वी में ब्रिटिश सरकार ने इसे अधिग्रहित कर ‘प्रसीडेन्सी कॉलेज ऑफ बंगाल’ नाम दिया जिसका संक्षिप्त प्रेसीडेन्सी कॉलेज कहलाया। जब 1857 ईश्वी में कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो प्रेसीडेन्सी महाविद्यालय को उसके अधीन कर दिया गया। 1944 ईश्वी से यहाँ लड़कियों को भी पढ़ने की इजाजत मिली। ऐतिहासिकता व प्रसिद्धि के मद्देनजर 7 जुलाई 2010 को इसे विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया। जगदीश चन्द्र बोस के अलावा प्रफुल्ल चन्द्र राय, मेघनाथ साहा, अमल कुमार रायचौधरी जैसे वैज्ञानिक, सुखमय चक्रवर्ती और अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों के अलावा भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, बांग्ला देश के राष्ट्रपति अबु सईद चौधरी व पाकिस्तान के प्रधान मंत्री मुहम्मद अली जैसे प्रख्यात राजनीतिज्ञ प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रहे हैं। अब यहाँ से प्रख्यात प्रेम विशेषज्ञ भी निकलेंगे और देश-दुनिया में नाम करेंगे। विद्यार्थी प्यार जैसे गूढ़ विषय को पढ़ने के लिए चुन सकेंगे। प्यार का पाठ्यक्रम वस्तुतः नए बहुविषयक अध्ययन कार्यक्रम का ही एक भाग होगा। प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय की कुलपति मालविका सरकार के अनुसार, प्यार का नया पाठ्यक्रम आगामी सत्र में जनवरी से आरम्भ हो जाएगा। फिलहाल यह समाज शास्त्र विभाग के अन्तर्गत संचालित होगा। इसमें मुख्यतः प्यार के सैद्धान्तिक पहलुओं को पढ़ाया जाएगा। 

 
  आने वाले दिनों में यहाँ प्रेम के नए-नए आयाम गढ़े जाएंगे, प्यार के नए तरीके और सिद्धान्त बताए जाएंगे, इस पर नया अनुसन्धान भी होगा। दरअसल, स्नातक में एक विषय के रूप में प्यार की पढ़ाई होगी। सभी विषयों के विद्यार्थियों को प्रेम का पाठ पढ़ना अनिवार्य होगा। यह फिलहाल 50 अंक का वैकल्पिक विषय है जिसे बाद में विस्तृत रूप दिया जा सकता है। बड़ा ही मनोरंजक और जीवन में पग-पग पर काम आने वाले इस कोर्स में हिन्दी फिल्मों के प्रेम के कई रूपों को एक अलग अन्दाज में पढ़ाया जाएगा। इसमें प्रेम के सभी पहलुओं और उसके सामाजिक प्रभावों वाले तथ्यों को समाहित किया गया है। विद्यार्थी जहाँ श्रीकृष्ण, राधा, मीरा को पढ़ सकेंगे वहीं राजकपूर, गुरुदत्त, यश चोपड़ा के प्रेमपूर्ण फिल्मों के विषय को भी जान सकेंगे। यों विद्यार्थी मो. रफी, मुकेश, किशोर कुमार व लता के पुराने रोमांटिक गीतों के साथ ही नए गायकों के गीतों सहित शेरों व अफसानों को पढ़कर प्रेम को जानेंगे, पहचानेंगे। प्रेम को लेकर विश्व में विश्वविद्यालय स्तर पर यह पहला प्रयास है। अब देखना है कि विद्वानों ने पाठ्यक्रम को कितना जीवनोपयोगी बनाया है। वैसे यह प्रशंसनीय पहल तो है ही।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

झारखण्ड की बदहाल स्वास्थ्य सेवाएँ


शीतांशु कुमार सहाय
    इन दिनों स्तनपान सप्ताह चल रहा है। इस दौरान झारखण्ड की स्वास्थ्य सेवाओं, विशेषकर बच्चों व माँ के स्वास्थ्य प्रकरण की पड़ताल आवश्यक जान पड़ती है। झारखण्ड को बिहार से अलग करने का एकमात्र कारण विकास को ही माना गया। पर, अब तक विकास के किसी भी खाँचे में यह फिट नहीं बैठ रहा है। विकास के सभी क्षेत्र बदहाल हैं। सड़क, बिजली व पेयजल की हालत तो बदतर है ही, स्वास्थ्य का क्षेत्र तो और भी बदहाल है। राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं व जागरूकता के अभाव में प्रत्येक वर्ष हजारों बच्चे और माँ की मृत्यु हो जाती है। इसे कम किया जा सकता है, रोका जा सकता है मगर सरकारी स्तर पर वैसा प्रयास नहीं हो रहा है। यह निश्चय ही खेदजनक है। जब सरकारी स्तर पर सार्थक प्रयास नहीं हुए तब यूनिसेफ ने राज्य के एक दैनिक समाचार पत्र के साथ स्वास्थ्य जागरूकता का प्रशंसनीय कार्य आरम्भ कर दिया है। इस अभियान में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे बड़े चौंकाने वाले हैं। बच्चों व माँ के स्वास्थ्य के प्रति स्थिति अत्यन्त खतरनाक है। जहाँ तक गर्भवती स्त्री और प्रसव के तरीकों की बात है तो अब भी अधिकतर प्रसव घर में ही बड़े अस्वास्थ्यकर तरीके से हो रहे हैं। संस्थागत प्रसव बहुत कम हो रहा है।

    इस सन्दर्भ की पड़ताल से पता चलता है कि स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से प्रति वर्ष 46 हजार बच्चे असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं। इनमें 19 हजार बच्चों की मौत जन्म के मात्र 28 दिनों के अन्दर ही हो जाती है। इस सन्दर्भ में सरकारी आँकड़े का अवलोकन करें तो विदित होता है कि जन्म लेने वाले प्रति एक हजार बच्चों में 55 बच्चे जीवन का 5वाँ दिन भी नहीं देख पाते हैं। 24 बच्चे जन्म के 28 दिनों के अन्दर मर जाते हैं तो 38 बच्चे अपना पहला वर्षगाँठ भी नहीं मना पाते। मतलब यह कि प्रति हजार नवजात बच्चों में 79 की मौत एक माह के अन्दर निश्चित है। एक वर्ष पूरा होते-होते कम-से-कम 117 बच्चे काल-कवलित हो जाते हैं। अगर थोड़ी सावधानी बरती जाए, जागरूकता फैलाई जाए, सरकारी स्वास्थ्य संस्थाएँ ठीक से कार्य करें, बच्चों को माँ नियमित स्तनपान कराए, समय पर टीके लगाए जाएँ, कुपोषण व संक्रमण से बचने के उपाय किये जाएँ और संस्थागत प्रसव हो तो निश्चय ही 46 हजार जानें बचाई जा सकती हैं। प्रतिदिन कम-से-कम 126 नवजातों की प्राण रक्षा हो सकती है। जाहिर है कि इस रक्षा की कुंुजी सरकार के पास है और वह प्रयत्नशील नहीं है या उसका तन्त्र उचित तरीके से कार्य नहीं कर रहा है। वास्तव में सरकार के पास नियम-कानूनों की कमी नहीं है पर उसे सही तरीके से लागू करने वाले तन्त्र की लगाम का प्रबन्धन ही नहीं हो पा रहा है। यही कारण है कि झारखण्ड में 62 प्रतिशत प्रसव अकुशल दाई कराती हैं या फिर घरों में असुरक्षित तरीके से कराए जाते हैं। यह स्वास्थ्य व स्वच्छता की दृष्टि से उचित नहीं है। इससे माँ-बच्चों में जानलेवा संक्रमण का खतरा बना रहता है। केवल 37.6 प्रतिशत प्रसव ही सरकारी या निजी अस्पतालों में होते हैं। कुशल और प्रशिक्षित हाथों से प्रसव होने पर माँ व बच्चों की मृत्यु-दर को काफी कम किया जा सकता है। माँ व बच्चों के स्वास्थ्य के क्षेत्र में राज्य के जिलों की स्थिति को देखें तो पूर्वी सिंहभूम सबसे आगे दीखता है। सबसे बुरा हाल सिमडेगा का है। पूर्वी सिंहभूम के आगे होने का एक कारण यह भी है कि जिले के जमशेदपुर क्षेत्र में टाटा के अस्पताल व निजी अस्पतालों की व्यवस्था अच्छी है। वित्त वर्ष 2012-13 में जहाँ तक प्रसव के लिए सिजेरियन ऑपरेशन यानी सी-सेक्शन की बात है तो इसमें सबसे आगे है हजारीबाग जहाँ 401 सिजेरियन हुए। राँची में 256, पलामू में 186, साहेबगंज में 157, गोड्डा में 138, गिरिडीह में 135 और दुमका में 109 महिलाओं के सिजेरियन हुए। सबसे शर्मनाक स्थिति पाकुड़ की है जहाँ एक भी सिजेरियन नहीं हुआ।

    झारखण्ड में मातृ-शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ काम हुए भी हैं। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और ऑपरेशन की आवश्यकता वाली गर्भवती महिलाओं के सुरक्षित प्रसव के लिए पिछली राज्य सरकार ने फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) की व्यवस्था की जहाँ सर्जन होते हैं और ऑपरेशन की व्यवस्था होती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों (पीएचसी) को एफआरयू की तरह विकसित किया गया है। राज्य के 188 पीएचसी में से 17 को पहले एफआरयू बनाया गया था। वर्ष 2012-13 में इनकी संख्या 46 की गयी है। इस कारण सिजेरियन की संख्या बढ़ी है। राज्यभर के एफआरयू में वर्ष 2011-12 में 889 सिजेरियन हुए जो वर्ष 2012-13 में बढ़कर 1926 हो गए। वर्तमान वित्त वर्ष 2013-14 में 5 हजार सिजेरियन का लक्ष्य सरकार ने रखा है। अब देखना है कि नवनियुक्त स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र प्रसाद सिंह के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग यह लक्ष्य प्राप्त करता है या नहीं। वैसे यूनिसेफ के नेतृत्व में झारखण्ड में चल रहे स्वास्थ्य जागरूकता अभियान को तमाम गाँव-शहर तक फैलाने के लिए राज्य सरकार को भी सहयोग करना चाहिये। इससे हजारों झारखण्डियों के प्राण बचाए जा सकते हैं। 

शनिवार, 3 अगस्त 2013

छिपाएंगे राज और पर्दे में रहेंगे राजनीतिक दल


   
शीतांशु कुमार सहाय
अब राजनीतिक दलों के आन्तरिक सच को जानने का अवसर जनता को नहीं मिल पाएगा, कभी नहीं। जनतन्त्र की दुहाई देने वाले दल जनता से ही छिपाएंगे अपना राज। वे कभी नहीं बताएंगे कि उनके पास वैध या अवैध तरीके से कितना धन आया। पद पर रहकर महज कुछ हजार वेतन पाने वाले नेता लाखों की यात्रा व मौज-मस्ती में करोड़ों उड़ाने का राज ढँककर रखेंगे। पद से हटने पर भी उनके रुतबे में कमी क्यों नहीं हुई? यह प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा। गला फाड़कर पारदर्शिता की बात कहने वाले नेता अपनी पार्टी को कभी पारदर्शी नहीं बनाएंगे। वे ऐसा करें भी क्यों? अब कोई प्रखर समाजसेवी कहेगा भी तोे वे कानून की लाचारी समझा देंगे और कहेंगे, क्या करें, हम तो चाहते हैं कि हमारी पार्टी अपनी आय-व्यय और अन्य बातें सार्वजनिक करे लेकिन कानून ऐसा करने नहीं देता.....अब हम तो कानून मानने वाले हैं, गैर-कानूनी काम तो हम कर नहीं सकते! ऐसा तर्क देने का मौका किसी और ने नहीं दिया; बल्कि दल वाले स्वयं अपनी ‘हिफाजत’ के लिए ऐसा कानून बना रहे हैं। वृहस्पतिवार को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) से बाहर कर दिया। अब सम्बन्धित विधेयक संसद के मॉनसून सत्र में लाया जाएगा। यकीन मानिये कि बिना हिल-हुज्जत के यह पारित भी हो जाएगा। जिस विधेयक से सीधा जनता को लाभ हो, वह भले ही विरोध या शोरगुल की भेंट चढ़ जाए मगर जिससे नेताओं को फायदा हो, वह तुरन्त पारित हो जाता है। यह भारतीय जनतन्त्र का व्यावहारिक सच है।

    दरअसल, देश के सभी राजनीतिक दल अब आरटीआई से बाहर रहेंगे। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने वृहस्पतिवार को एक महत्त्वपूर्ण फैसला लेते हुए आरटीआई में संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी है। अब सरकार को संसद के मॉनसून सत्र में इस विधेयक को पेश करना होगा। प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमण्डल की बैटक हुई। उस दौरान आरटीआई संशोधन विधेयक को हरी झण्डी दिखायी गयी। असल में सरकार इस विधेयक के जरिये सार्वजनिक इकाइयों की परिभाषा बदलना चाहती है; ताकि सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा जा सके। यों तो सरकार ने आरटीआई को जनता के हाथ में ताकत देने का सबसे बड़ा हथियार बताया था लेकिन खुद इसके दायरे से बाहर रहने में जुटी है। सरकार इस मुद्दे पर पहले ही सभी दलों की राय ले चुकी है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस प्रस्ताव पर संसद में सरकार को समर्थन देने का वचन दिया है। वास्तव में जब स्वार्थ साधना हो तब दुश्मन को भी दोस्त बना लेना चाहिये। भाजपा ने ऐसा ही किया। विदित हो कि आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चन्द्र अग्रवाल और अनिल बैरवाल ने केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के समक्ष अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराकर राजनीतिक दलों को आरटीआई के तहत लाने की माँग की थी। इस मामले पर सुनवाई के दौरान 3 जून को सीआईसी ने कहा था कि 6 राष्ट्रीय दलों को केन्द्र सरकार की ओर से परोक्ष रूप से आर्थिक मदद मिलती है। ये 6 दल हैं- काँग्रेस, भाजपा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी। मुख्य सूचना आयुक्त ने यह भी कहा था कि पार्टियों को जन सूचना अधिकारियों की नियुक्ति करनी चाहिये; क्योंकि आरटीआई के तहत उनका स्वरूप सार्वजनिक इकाई का है। सीआईसी ने पार्टियों को जन सूचना अधिकारी और अपीलीय अधिकारी की नियुक्ति के लिए 6 सप्ताह का समय दिया था। हालाँकि इस दौरान केवल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ही एकमात्र ऐसी पार्टी रही जिसने आरटीआई के जरिये माँगी गयी सूचना आवेदक को मुहैया करायी।

    इस संदर्भ में सरकारी राग भी सुन लेते हैं। केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक दल निर्वाचन आयोग के प्रति जवाबदेह हैं और आय का ब्योरा आयोग को दिया जाता है। 20 हजार रुपये से अधिक के चन्दे का आँकड़ा आयकर विभाग को दिया जाता है। अब प्रश्न उठता है कि जो बातें निर्वाचन आयोग व आयकर विभाग को बतायी जाती है, वही बातें जनता को बताने से पार्टियाँ क्यों घबरा रही हैं? जिसे जनता चुनकर भेजती है वह अपने बारे में जनता को नहीं बताएगा। यह कैसा जनप्रतिनिधित्व? जनता कराहती रहेगी और उसके प्रतिनिधि पर्दे के पीछे मलाई काटते रहेंगे। बकौल सिब्बल वे (दलीय नेता) नियुक्त नहीं होते, उन्हें जनता चुनती है, इसलिये उन पर आरटीआई लागू नहीं होगा। यानी नेताओं ने अपने को कानून से ऊपर की चीज बना लिया है। इसका असर 2014 के लोकसभा आम चुनाव में हो या न हो मगर दूरगामी प्रभाव तो अवश्य पड़ेगा, बस इन्तजार कीजिये। इस दौरान अन्ना हजारे की सहयोगी अरुणा राय ने शनिवार को जयपुर में इस सरकारी निर्णय को निन्दनीय बताया। वह कहती हैं कि राजनीतिक दल भले ही अपनी विचारधारा छिपाएँ मगर आय-व्यय को जनता के सामने रखना ही चाहिये। इस बीच 5 अगस्त को विरोध प्रदर्शन का निर्णय समाजसेवी निखिल डे ने लिया है। बाद में दिल्ली में खुले मंच पर इसका विरोध किया जाएगा। सच है कि जनता अब जाग गयी है। यही सच नेताओं के गले नहीं उतर रहा है।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

दुर्गा शक्ति से घबरायी अखिलेश की सरकार


शीतांशु कुमार सहाय
याद है मुझे अब भी कि विद्यालय में शिक्षक ने पढ़ाया था- ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है यानी ऑनेस्टी इज द बेस्ट पॉलिसी। पढ़ाते समय शिक्षक महोदय ने यह भी कहा था कि इस उक्ति पर अमल करने से ही जीवन सफल होगा। पर, अब व्यावहारिक जीवन में वह उक्ति सफल होती नहीं दीख रही है। ‘डिजऑनेस्टी इज द बेस्ट पॉलिसी’ ही हर जगह सफल दीख रहा है, खासकर भारतीय लोकतन्त्र में। ईमानदारों को तन्त्र और समाज दोनों से दग्ध व पीड़ित होना पड़ रहा है। कुछ ऐसा ही हुआ है उत्तर प्रदेश कैडर की भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी (भाप्रसेअ) दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ। वर्ष 2010 बैच की भाप्रसेअ दुर्गा को उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री अखिलेश यादव ने 27 जुलाई को निलम्बित कर लखनऊ स्थित राजस्व बोर्ड में भेज दिया है। उनपर आरोप लगाया गया है कि सरकारी भूमि पर बन रही मस्जिद की दीवार को तोड़ने का उन्होंने आदेश दिया था। यह तो हुआ सरकारी पक्ष पर वास्तविकता इससे अलग है। वास्तव में खनन माफियाओं पर दुर्गा ने कार्रवाई की थी। उन माफियाओं की राजनीतिक पहुँच की ही यह परिणति है।

दुर्गा शक्ति की घटना ने अशोक खेमका की याद दिला दी। 1991 बैच के हरियाणा कैडर के भाप्रसेअ खेमका को 22 साल की नौकरी में 44 तबादलों का दंश झेलना पड़ा। उनके 19 तबादलों का आदेश हरियाणा के मुख्य मंत्री भूपिन्दर सिंह हुड्डा ने दिया। इन दोनों ने विश्व कीर्तिमान बनाया है। खेमका के नाम सर्वाधिक तबादले का कीर्तिमान है तो हुड्डा के नाम एक ही अधिकारी को सर्वाधिक तबादले का आदेश देने का। खेमका ने इसी वर्ष अप्रील में जब काँग्रेस प्रमुख सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा व रियल एस्टेट कम्पनी डीएलएफ के बीच के करोड़ों रुपयों के घोटाले को उजागर किया व जमीन के निबन्धन को रद्द कर दिया तो हुड्डा की काँग्रेसी सरकार ने अगले ही दिन उनका तबादला कर दिया गया। ईमानदार खेमका जहाँ भी गये, अनियमितता को उजागर किया और पुरस्कारस्वरूप तबादले का आदेश मिलता रहा। कुछ विभागों से तो 4-5 दिनों में ही उन्हें हटा दिया गया। इसी नक्श-ए-कदम पर दुर्गा भी चलीं और निलम्बन का पुरस्कार पायीं। इस निलम्बन को अखिलेश ने जायज ठहराया। पर, दुर्गा पर लगाया उनका आरोप तब निराधार लगा जब गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी की रपट आयी कि जिले के ग्रेटर नोएडा के रबुपुरा क्षेत्र के कांदलपुर गाँव की निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार ग्रामीणों ने स्वयं तोड़कर सरकारी भूमि खाली कर दी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भवन का निर्माण आरम्भ ही नहीं हुआ, ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह धार्मिक स्थल है या नहीं। जिला पुलिस भी दंगा भड़कने की किसी सम्भावना से इनकार करती है। स्थानीय लोग भी कहते हैं कि निर्माण में गाँव के सभी धर्मों के लोग शामिल थे इसलिये साम्प्रदायिकता भड़कने का सवाल ही नहीं उठता। फिर सरकार किस साम्प्रदायिकता की बात कर रही है? सच्चाई कुछ और ही है। हाल के दिनों में नोएडा में यमुना और हिण्डन नदियों के तटवर्ती क्षे़त्रों में चल रहे अवैध बालू खनन के विरुद्ध नोएडा की उपजिलाधिकारी के रूप में दुर्गा ने विशेष अभियान छेड़ा था। 2 दर्जन प्राथमिकियाँ दर्ज करवाई थीं तो खनन माफिया बौखला गये। विरोधी दलों की बात मानें तो इन माफियाओं के तार सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी से जुड़े हैं। लिहाजा बहाना बनाकर दुर्गा को वहाँ से हटा दिया गया। माफियाओं के पक्ष में अखिलेश सरकार के मंत्री आजम खान ने कहा- राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। जाहिर है कि जब लूट को तन्त्र का ही सहयोग मिल रहा है तो इस लूट से कंगाल हो रही जनता को कौन बचाएगा?

इस बीच भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी संघ को केन्द्रीय कार्मिक राज्य मंत्री वी नारायणसामी ने न्याय का वचन दिया है। 4737 सदस्यों वाले इस संघ ने दुर्गा के निलम्बन वापसी की माँग की है। वैसे मामला अब जनहित याचिका के माध्यम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पहुँच गया है। देखना दिलचस्प होगा कि न्यायालय का क्या फैसला आता है? वैसे एक बात तो सच ही है कि राजनेताओं को सच्चे अधिकारियों से डर लगता है। लिहाजा अशोक खेमका, मनोज नाथ, राहुल शर्मा, अमिताभ ठाकुर और दुर्गा शक्ति नागपाल जैसे भाप्रसे अधिकारियों को बार-बार तबादला या निलम्बित होना पड़ता है। इस संदर्भ में सरकार की तरफ से ‘गलत’ कार्य करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की बात की जाती है पर जब नियम के विरुद्ध राजनेता की ओर से तबादला या निलम्बन किया जाता है तो उनपर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? दुर्गा प्रकरण में भी नियम के खिलाफ ही कार्रवाई की गयी है।  

सोमवार, 29 जुलाई 2013

100 करोड़ का सांसद


    शीतांशु कुमार सहाय
याद होगा सुधी पाठकों को कि कुछ दिनों पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त ने कहा था कि राजनीतिक दल भी सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आते हैं। लिहाजा उन्हें अपनी आय व व्यय के अलावा अन्य जानकारी माँगने पर उपलब्ध करवानी चाहिये। इतना सुनते ही काँग्रेस बौखला गयी। उसने अपने को सूचना का अधिकार कानून के बाहर रहने की घोषणा कर दी। काँग्रेस के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने भी काँग्रेस का साथ दिया और कहा था कि ऐसा करने से कई व्यावहारिक अड़चनें उत्पन्न होंगी। इस संदर्भ में पक्ष व विपक्ष के सभी दलों के सुर एक हो गये, कट्टर विरोधी भारतीय जनता पार्टी भी इस मामले में काँग्रेसी पाले में नजर आयी। दलों की ऐसी ‘एकता’ का राज केवल यही है कि उनकी अवैध कमाई को जनता जान जाएगी, चन्दे की मोटी आय सार्वजनिक हो जाएगी। लोग यह भी जान जाएंगे कि चुनाव के दौरान किस कम्पनी ने भविष्य में ‘लाभ’ लेने के लिए और किस नेता ने चुनावी टिकट के एवज में कितनी मोटी राशि दल के कोष में जमा करायी है। वैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक वर्ग यह कहता आ रहा है कि विभिन्न दलों द्वारा विधायक व सांसद का चुनावी टिकट मनमाने दाम पर बेचा जाता है। इसी बात को और पुष्ट किया है राज्य सभा के काँग्रेसी सांसद चौधरी वीरेन्द्र सिंह ने। बकौल चौधरी राज्य सभा की सीटें 100 करोड़ रुपये में बिकती हैं। यह है भारतीय लोकतन्त्र का एक और सच, कड़वा सच जिसकी घँूट से जनता का हाजमा बिगड़ता है मगर नेताओं के गालों की लाली बढ़ती है।
    चहुंओर से भ्रष्टाचार में घिरी काँग्रेस व उसके नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार चौधरी वीरेन्द्र सिंह के बयान से और पसोपेश में पड़ गयी है। अभी केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल व योजना आयोग के बीच गरीबी वाला विवाद शान्त भी नहीं पड़ा कि उसे अपने बयान बहादुरों को चौधरी के बयान पर सफाई देने के लिए लगाना पड़ा है। बयान बहादुरों के बीच सफाई देने स्वयं चौधरी भी सामने आए और कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया। पर, बयानों से पलटने वाले वरिष्ठ नेताओं को हमेशा अपने जमाने के प्रिण्ट मीडिया वाला ही जमाना याद रहता है जिस वक्त ‘तोड़-मरोड़कर छापा गया’ कहकर बयान से पलटना आसान था। पर, अब त्वरित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जमाना है जिसमें कैमरा सच को ही दिखाता है। शायद कैमरे की इस सच्चाई को भूल जाते हैं बयानबाज नेता। पर, लोकतान्त्रिक शर्म को ताक पर रखकर निर्लज्जतापूर्वक कैमरे की सच्चाई को भी नकारने से बाज नहीं आते कथित वरिष्ठ नेता। ऐसा ही किया है हरियाणा के चर्चित काँग्रेसी नेता चौधरी वीरेन्द्र ने। वास्तव में उनके बयान को मीडिया ने बिना छेड़छाड़ किये ही छापा और दिखाया। उन्होंने समझाकर कहा कि राज्य सभा के एक सांसद ने उन्हें बताया कि उनके राज्य सभा में सांसद बनने का बजट 100 करोड़ रुपयों का था पर काम 80 करोड़ रुपये में ही हो गया और 20 करोड़ रुपये की ‘बचत’ हो गयी। चौधरी के शब्दों में और तल्खी आयी और उन्होंने अपने गृह राज्य हरियाणा के यमुना नगर में पत्रकारों को समझाया कि जो 100 करोड़ में सांसद की सीट खरीदेगा, क्या वह गरीबों का भला सोचेगा! अपनी पार्टी पर भी भड़ास निकालते हुए उनकी जुबान ने कहा कि प्रदेश काँग्रेस में वे पहले पायदान पर हैं पर पार्टी में पायदान से नहीं, ‘अन्य दानों’ से कुर्सी मिलती है। क्या इतने शब्दों को मीडिया ने गढ़ा? क्या कैमरे में रिकॉर्ड उनके शब्द गलत हैं? आखिर किस तकनीक से यह सम्भव हो सका कि उन्होंने कहा कुछ और कैमरे ने रिकॉर्ड किया कुछ और? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर न चौधरी दे सकते हैं, न उनकी पार्टी काँग्रेस और न ही पार्टी के बयान बहादुर। वैसे वे बंसल के बाद रेल मंत्री बनने वाले थे और राष्ट्रपति की चिट्ठी भी आ गयी थी, वे ‘गोल’ करने वाले ही थे कि ‘रेफरी’ ने सीटी बजा दी और पत्ता साफ हो गया। ऐसे में जज्बात की पटरी पर उनकी जुबान की रेल ऐसी चली कि पंजे वाली पार्टी का हलक सूख गया। पर, इस बार भी जरूर उसी रेफरी ने सीटी बजायी होगी तभी तो अपनी प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाकर बयान से पलटना पड़ा। नहीं पलटते तो 100 करोड़ रुपये की सांसदी जाती। इस महंगाई में भी एक अरब रुपये का मोल तो है ही!  
    इस बीच भाजपा ने चुटकी लेते हुए इसे काँग्रेस की संस्कृति बतायी। सूचना का अधिकार के तहत न आने पर अड़ी और इस बाबत काँग्रेस के साथ दीखने वाली भाजपा चौधरी के बयान पर मिशन 2014 को ध्यान में रखकर ही काँग्रेस का विरोध कर रही है। इस संदर्भ में एक अन्य गंभीर प्रश्न उभरता है कि मनमोहन सरकार में मात्र सांसद बनने की लागत एक अरब रुपये है तो मंत्री बनने की कीमत क्या होगी?

रविवार, 28 जुलाई 2013

तेलंगाना के गठन से घटेंगी नहीं, बढ़ेंगी समस्याएँ


शीतांशु कुमार सहाय
 छोटे राज्यों के गठन से समस्याएँ बढ़ती हैं या घटती हैं? तेलंगाना प्रकरण के बहाने यह टटोलने का अवसर एक बार फिर से आया है। आखिर राज्यों को भौगोलिक रूप से नन्हा बनाने का कारण क्या हो सकता है? इस पर समर्थक राजनीतिज्ञों का एकमात्र कथन यही है कि इससे विकास अधिक होगा। जनसमस्याओं के निराकरण तेजी से होंगे। छोटा राज्य होने से विधि-व्यवस्था की कठिनाइयाँ उत्पन्न नहीं होंगी। जनता के प्रति जनप्रतिनिधि अपेक्षाकृत अधिक उत्तरदायी हो पाएंगे। इन तर्कांे के अलावा भी ढेर सारे तर्क समर्थन में दिये जाते हैं। किसी बड़े राज्य के विखण्डन के समय भोली-भाली जनता को अपने पक्ष में करने के लिए संभावित नये राज्य का नाम लेकर यह प्रचारित किया जाता है कि अब उसका कायापलट हो जाएगा, विकास की रफ्तार बुलेट ट्रेन को मात दे देगी। पर, सच्चाई की कसौटी पर जब ये तर्क सही नहीं ठहरते तब माहौल के मद्देनजर दूसरा तर्क खोज लेते हैं राजनीति के खिलाड़ी और लगातार चलता रहता है उनका पंचवर्षीय लोकतान्त्रिक-तानाशाह।

दरअसल, जब देश स्वतन्त्र हुआ तब प्रशासनिक सुदृढ़ता के लिए राज्यों का पुनर्गठन करना आवश्यक था। इसके लिए 22 दिसम्बर 1953 को न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ जिसने 30 सितम्बर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। वैसे राज्य पुनर्गठन आयोगों का इतिहास 110 वर्ष पुराना है। सबसे पहले सन् 1903 ईश्वी में तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार के गृह सचिव हर्बर्ट रिसले की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन समिति गठित की गयी थी। इस समिति ने भाषाई आधार पर बंगाल के विभाजन की सिफारिश की थी जिसके चलते 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ था। इसके बाद 1911 में लार्ड हार्डिंग की अध्यक्षता में एक आयोग बना जिसने बंगाल विभाजन को खत्म करने का सुझाव दिया। 1918 में मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड समिति की रपट आयी जिसने विधिवत् आयोग की तरह कार्य नहीं किया लेकिन प्रशासनिक सुधारों के बहाने छोटे राज्यों के गठन का सुझाव दिया था। उसने भाषाई व जातीय आधार पर राज्य गठन को नामंजूर कर दिया था। फिर करीब 10 वर्षों बाद मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी जिसे काँग्रेस का समर्थन था। उस समिति ने भाषा, जनेच्छा, जनसंख्या, भौगोलिक और वित्तीय स्थिति को राज्य के गठन का आधार माना। 1947 में स्वतन्त्रता मिलते ही भारत के सामने 562 देसी रियासतों के एकीकरण व पुनर्गठन की समस्या थी। इसे ध्यान में रखते हुए उसी वर्ष पहले एसके दर आयोग का गठन किया गया फिर जेवीपी (जवाहर लाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, पट्टाभिसीतारमैया) आयोग का गठन किया गया। दर आयोग ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का विरोध किया था। उसका मुख्य जोर प्रशासनिक सुविधाओं को आधार बनाने पर था। हालाँकि तत्कालीन जनाकांक्षाओं को देखते हुए तत्काल जेवीपी आयोग बना जिसने प्रभावित जनता की आपसी सहमति, आर्थिक और प्रशासनिक व्यवहार्यता पर जोर देते हुए भाषाई राज्यों के गठन का सुझाव दिया। पर, सरकार में आने पर जवाहर लाल के सुर बदल गये और वे भाषाई आधार पर राज्य गठन का विरोध करने लगे। सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामालू की मद्रास से आंध्र प्रदेश को अलग किये जाने की माँग को लेकर 58 दिन के आमरण अनशन के बाद मौत हो गयी पर अपने हठ पर जवाहर लाल डटे रहे। तब संयुक्त मद्रास में साम्यवादी दलों के बढ़ते वर्चस्व ने उन्हें अलग तेलुगू भाषी राज्य बनाने पर मजबूर कर दिया था। अब आंध्र प्रदेश से ही पृथक तेलंगाना बनाने की प्रक्रिया बतौर काँग्रेस अन्तिम चरण में है।

तेलंगाना के गठन के बाबत भी वही पुरानी बात दुहराई जा रही है कि अब विकास तीव्र होगा। पर, हश्र सामने है कि असम को विभाजित कर छोटे-छोटे राज्य बने मगर विकास कम और हªास अधिक हुआ। पूर्वोत्तर के तमाम राज्य अब भी विकास में पिछड़े हैं और विधि-व्यवस्था इतनी लचर है कि वहाँ आतंकवाद और बांग्ला देशी घुसपैठ की समस्या चरम पर है। पहले अवतरण में वर्णित तर्कों के आधार पर ही सन् 2000 के नवम्बर में भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार ने उत्तर प्रदेश से उत्तरांचल, मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ और बिहार से पृथक झारखण्ड राज्य बनाया। केन्द्र में काँग्रेस की सरकार बनने के बाद उसने उत्तरांचल का नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया जिस पर करोड़ों रुपये बेकार ही खर्च हुए। इस विखण्डन का नतीजा सामने है कि कुछ पूर्व मुख्य मंत्रियों और मंत्रियों की सुविधाभोगी संख्या अवश्य बढ़ी मगर विकास की रफ्तार जापान की बुलेट ट्रेन को नहीं ही पछाड़ पायी, अलबत्ता भारतीय रेल की सवारी गाड़ी की गति को भी छू नहीं सकी। .... तो फिर बनने दीजिए तेलंगाना को भी और रहिए तैयार उसका परिणाम देखने के लिए!

शनिवार, 27 जुलाई 2013

लालू ने पगला बाबा के जोड़े हाथ, मिली गाली


मिर्जापुर| बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव शुक्रवार 26 जुलाई 2013 को विंध्यधाम क्षेत्र में पहुंचने के बाद मंदिर बाद में पहले बाबाओं के आश्रम में गए। घमहापुर स्थित विभूति नारायण उर्फ पगला बाबा और महुवारी कला स्थित देवराहा हंस बाबा के आश्रम में उन्होंने पांच घंटे से भी अधिक समय गुजारा। आश्रम में आशीर्वाद लेने के बाद उन्होंने रात में मां विंध्यवासिनी देवी का दर्शन-पूजन किया। शुक्रवार शाम करीब चार बजे लालू अपने लाव-लश्कर के साथ सबसे पहले विभूति नारायण बाबा के आश्रम में पहुंचे। यहां पर बाबा ने अपने चिरपरिचित अंदाज में उन्हें खूब गाली दी, जिसे बाबा का आशीर्वाद समझ लालू मुस्कराते रहे। फिर बाबा ने आश्रम में स्थित शिवलिंग की पूजा लालू से कराई। विभूति नारायण बाबा के आश्रम से होते हुए लालू महुवारी कला स्थित देवराहा हंस बाबा के आश्रम में पहुंचे। यहां पर भी उन्होंने बाबा का आशीर्वाद लिया।(Amar Ujala)

रविवार, 21 जुलाई 2013

गुरु पूर्णिमा : अन्तःकरण के अंधकार को दूर करते हैं गुरु Guru Poornima



गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवोमहेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः ।।
      गुरु अन्तःकरण के अंधकार को दूर करते हैं। आत्मज्ञान की युक्तियाँ बताते हैं। गुरु प्रत्येक शिष्य के अंतःकरण में निवास करते हैं। वे जगमगाती ज्योति के समान हैं जो शिष्य की बुझी हुई हृदय-ज्योति को प्रकट करते हैं। 
      'गु' का अर्थ है- अंधकार या मूल अज्ञान और 'रु' का अर्थ है- उस का निरोधक। गुरु अज्ञान-तिमिर का ज्ञानाञ्जन-शलाका से निवारण कर देते हैं। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जानेवाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता है। जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है, वैसी ही गुरु के लिए भी। गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। आज विश्वस्तर पर जितनी भी समस्याएँ दिखायी दे रही हैं, उन का मूल कारण है गुरु-शिष्य परम्परा का टूटना।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
(शीमद्भगवद्गीता ४ / ३४)
      गुरु की महत्ता को समझाते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया-- ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ। उन को भली-भाँति दण्डवत्-प्रणाम करने से, उन की सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को भली-भाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे। 
      गुरु पूर्णिमा का यह दिन 'महाभारत' के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। उन के पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती हैं। कृष्ण द्वैपायन व्यास संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे और उन्होंने भगवान द्वारा प्रदत्त ज्ञान को पहली बार संकलित कर पुस्तक का स्वरूप प्रदान किया। इस ज्ञान को 'वेद' की पवित्र संज्ञा दी गयी। चारों वेदों की भी रचना करने के कारण उन का एक नाम 'वेद व्यास' भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उन के सम्मान में गुरु पूर्णिमा को 'व्यास पूर्णिमा' नाम से भी जाना जाता है। ‘व्यास’ का शाब्दिक अर्थ है सम्पादक। वेदों का व्यास यानी विभाजन भी सम्पादन की श्रेणी में आता है। कथावाचक शब्द भी व्यास का पर्याय है। कथावाचन भी देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप पौराणिक कथाओं का विश्लेषण भी सम्पादन है। भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, १०८ उपनिषदों, १८ पुराणों और उपपुराणों आदि ग्रन्थों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को जनसामान्य के योग्य  बनाकर व्यवस्थित किया। उन्होंने ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्णिमा के दिन पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ 'ब्रह्मसूत्र' का लेखन इसी दिन आरंभ किया। देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन आषाढ़ पूर्णिमा को किया और तभी से 'व्यास पूर्णिमा' अर्थात् 'गुरु पूर्णिमा' मनायी जा रही है।
      द्वापर युग के अंतिम भाग में वेदव्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा। व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं। इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं। धार्मिक ग्रंथों में महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित 'शिव-पुराण' को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की भक्ति महिमा का उल्लेख है। इसमें शिव के अवतार आदि विस्तार से लिखे गए हैं। 'वेद' और 'उपनिषद' सहित 'विज्ञान भैरव तंत्र', 'शिव पुराण' और 'शिव संहिता' में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की। इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।
      भारत में गुरु पूर्णिमा पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। आषाढ़ की पूर्णिमा को ही 'गुरु पूर्णिमा' कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। वैसे तो देश भर में एक से बड़े एक अनेक विद्वान हुए हैं, परंतु उनमें महर्षि वेद व्यास, जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, उनका पूजन आज के दिन किया जाता है।
      इस दिन से लगभग चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
      प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था, तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति, अपने सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था।      
      हमें वेदों का ज्ञान देनेवाले व्यासजी ही हैं, अतः वे हमारे आदिगुरु हुए। इसीलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनकी स्मृति हमारे मन मंदिर में हमेशा ताजा बनाए रखने के लिए हमें इस दिन अपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पाद-पूजा करनी चाहिए तथा अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए गुरु का आशीर्वाद जरूर ग्रहण करना चाहिए। साथ ही केवल अपने गुरु-शिक्षक का ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।
      गुरु पूर्णिमा के दिन खासकर करें : -
* प्रातः घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके तैयार हो जाएं।
* घर के किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर १२-१२ रेखाएँ बनाकर व्यास-पीठ बनाना चाहिए।
* फिर हमें 'गुरुपरम्परासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये' मंत्र से पूजा का संकल्प लेना चाहिए।
* तत्पश्चात् दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ना चाहिए।
* फिर व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम, मंत्र से पूजा का आवाहन करना चाहिए।
* अब अपने गुरु अथवा उन के चित्र की पूजा करके उन्हें यथायोग्य दक्षिणा देना चाहिए।
* गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।
* यह पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वास के आधार पर नहीं।
* इस दिन वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर गुरु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
* गुरु का आशीर्वाद सभी-छोटे-बड़े तथा हर विद्यार्थी के लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्द्धक होता है।
* इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।
      अन्त में कबीर की वाणी का उल्लेख करता हूँ......
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥
      गुरु के श्रीचरणों में नमन!

गुरु की कृपा का दिन गुरु पूर्णिमा

 गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
गुरु अंतःकरण के अंधकार को दूर करते हैं। आत्मज्ञान के युक्तियाँ बताते हैं। गुरु प्रत्येक शिष्य के अंतःकरण में निवास करते हैं। वे जगमगाती ज्योति के समान हैं जो शिष्य की बुझी हुई हृदय-ज्योति को प्रकट
करते हैं। 'गु' का अर्थ है- अंधकार या मूल अज्ञान और 'रु' का अर्थ है- उसका निरोधक। गुरु अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता है। जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है, वैसी ही गुरु के लिए भी। गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। आज विश्वस्तर पर जितनी भी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, उनका मूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
(गीताः ४ / ३४)('उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत्-प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्व को भलीभाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे।') यह दिन
'महाभारत' के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है। कृष्ण द्वैपायन व्यास संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। ‘व्यास’ का शाब्दिक संपादक है। वेदों का व्यास यानी विभाजन भी संपादन की श्रेणी में आता है। कथावाचक शब्द भी व्यास का पर्याय है। कथावाचन भी देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप पौराणिक कथाओं का विश्लेषण भी संपादन है। भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, 18 पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्णिमा के दिन पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ 'ब्रह्मसूत्र' का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया और तभी से 'व्यास पूर्णिमा' अर्थात 'गुरु पूर्णिमा' मनायी जा रही है।
द्वापर युग के अंतिम भाग में वेदव्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा। व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं। इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं। धार्मिक ग्रंथों में महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित
'शिव-पुराण' को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की भक्ति महिमा का उल्लेख है। इसमें शिव के अवतार आदि विस्तार से लिखे गए हैं। 'वेद' और 'उपनिषद' सहित 'विज्ञान भैरव तंत्र', 'शिव पुराण' और 'शिव संहिता' में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की। इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।
भारत में गुरु पूर्णिमा पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। आषाढ़ की पूर्णिमा को ही 'गुरु पूर्णिमा' कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। वैसे तो देश भर में एक से बड़े एक अनेक विद्वान हुए हैं, परंतु उनमें महर्षि वेद व्यास, जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, उनका पूजन आज के दिन किया जाता है।
इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था, तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति, अपने सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था।

हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यासजी ही हैं, अतः वे हमारे आदिगुरु हुए। इसीलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनकी स्मृति हमारे मन मंदिर में हमेशा ताजा बनाए रखने के लिए हमें इस दिन अपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पाद-पूजा करनी चाहिए तथा अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए गुरु का आशीर्वाद जरूर ग्रहण करना चाहिए। साथ ही केवल अपने गुरु-शिक्षक का ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

गुरु पूर्णिमा के दिन खासकर करें : -
* प्रातः घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके तैयार हो जाएं।
* घर के किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाना चाहिए।
* फिर हमें 'गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये' मंत्र से पूजा का संकल्प लेना चाहिए।
* तत्पश्चात दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ना चाहिए।
* फिर व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम, मंत्र से पूजा का आवाहन करना चाहिए।
* अब अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा करके उन्हें यथा योग्य दक्षिणा देना चाहिए।
* गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।
* यह पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वास के आधार पर नहीं।
* इस दिन वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर गुरु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
* गुरु का आशीर्वाद सभी-छोटे-बड़े तथा हर विद्यार्थी के लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्द्धक होता है।
* इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

यह तन विष की बेलरी
, गुरु अमृत की खान।शीश दियो जो गुरु मिले
, तो भी सस्ता जान॥-कबीरदास