गुरुवार, 22 जनवरी 2026

सरस्वती पूजा विधि और शुभ मुहूर्त Saraswati Puja Shubh Muhurat

  

जय माँ सरस्वती

    विक्रम सम्वत् २०८२ में वसन्त पञ्चमी अर्थात् सरस्वती पूजा २३ जनवरी २०२६ को है। ज्ञान व विद्या की देवी माता सरस्वती की आराधना का यह विशेष दिवस होता है। यहाँ जानते हैं इस बार सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में।  

      हालाँकि सरस्वती पूजा के लिए किसी मुहूर्त की जरूरत नहीं है; क्योंकि वसन्त पञ्चमी के दिन सरस्वती पूजा के लिए अबूझ मुहूर्त माना जाता है। वैसे ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, विशेष रूप से शुभ चौघडिया मुहूर्त में पूजा पाठ से ज्ञान की प्राप्ति होती है। विद्यार्थियों के लिए यह मुहूर्त विशेष लाभकारी माना जाता है। जिन बच्चे का शिक्षा संस्कार इस दिन किया जाता है, उन्हें भी मुहूर्त का ख्याल करते हुए ही पूजा करनी चाहिए।

शुभ मुहूर्त :

      चल चौघडिया सुबह में ७ बजकर १३ मिनट से ८ बजकर ३३ मिनट तक। लाभ चौघडिया सुबह में ८ बजकर ३३ मिनट से ९ बजकर ५३ मिनट तक। अमृत चौघडिया सुबह ९ बजकर ५३ मिनट से ११ बजकर १३ मिनट तक।                            

सरस्वती पूजा विधि और मंत्र :-

      सरस्वती पूजा के लिए सब से पहले पूजा स्थल को अच्छे से गंगाजल से साफ कर लें। इस के बाद सरस्वती माता की प्रतिमा एक चौकी पर स्थापित करें और उस लकड़ी की चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछा लें। इस के बाद धूप, दीप और गुगुल जलाएँ और फिर पूजा का आरंभ करें।

      सब से पहले हाथ जोड़कर माता सरस्वती का ध्यान करें।

      “ऊँ अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥” इस मंत्र को बोलकर पीले फूल से जल को अपने आसन पर तीन बार अर्पित करें। ऐसे करने से आप का आसन शुद्ध होगा।

      अब "ऊँ केशवाय नम:, ऊँ माधवाय नम:, ऊँ नारायणाय नम:" मंत्र बोलते हुए अपने हाथ धोएँ। इस के बाद "ऊँ पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्वं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥" मंत्र बोले।

      अब "चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्, आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठतु सर्वदा।" मंत्र कहते हुए चंदन लगाएँ। इस के उपरान्त हाथ में तिल, फूल, अक्षत, मिठाई, फल आदि लेकर "यथोपलब्धपूजनसामग्रीभिः माघ मासे वसन्त पञ्चमी तिथौ भगवत्या: सरस्वत्या: पूजनमहं करिष्ये।" मंत्र बोलकर सभी चीजें एक एक कर माँ सरस्वती को अर्पित कर दें। 

      इस के बाद गणपतिजी की पूजा करें। पहले गणेशजी का ध्यान करते हुए बोले "गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।"

      अब हाथ में थोड़े अक्षत लेकर गणपति की का आह्वान करें और बोलें "ऊँ गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।।" अब अक्षत अर्पित कर दें। अब गणेशजी को तिलक करें और तिलक करते समय बोलें "एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयं ऊँ गं गणपतये नम:।" रक्त चंदन लगाएँ और बोलें "इदं रक्त चंदनम् लेपनम् ऊँ गं गणपतये नम:।"

      अब गणेशजी को सिंदूर अर्पित करें और बोलें "इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ऊँ गं गणपतये नम:।" इस के साथ गणेशजी को दूर्वा अर्पित कर दें। अब वस्त्र अर्पित करें और बोलें "ऊँ गं गणपतये दूर्वावस्त्रं च समर्पयामि।" 

      गणेशजी को प्रसाद अर्पित करें और बोलें "इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊँ गं गणपतये समर्पयामि।" मिष्टान्न अर्पित करने के लिए मंत्र है "इदं शर्करा घृतयुक्त नैवेद्यं ऊँ गं गणपतये समर्पयामि।" अब गणेशजी को पान और सुपारी अर्पित करें और बोलें "इदं ताम्बूल पुंगीफल समायुक्तं ऊँ गं गणपतये समर्पयामि।" अब गणेशजी को फूल अर्पित करें और बोलें "एष: पुष्पाञ्जलि ऊँ गं गणपतये नम:।"

सरस्वती पूजा विधि :

      एक घड़ा या लोटा लें और उस पर मौली बाँध दें। उस के ऊपर आम का पल्लव रखें। कलश में पहले गंगा जल डालें और तब सामान्य शुद्ध जल भरें और उस में सुपारी, दूर्वा, अक्षत, मुद्रा रखें। कलश के गले में मौली लपेटें। नारियल पर लाल वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें। अब कलश को हाथ में लेकर वरुण देव का ध्यान करते हुए बोलें "ऊँ तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेऽमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:।"

अब सरस्वती माता का ध्यान करते हुए बोलें :

"या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।।

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमांद्यां जगद्व्यापनीं।

वीणा-पुस्तकधारिणीं भयदां जाड्यांधकारपहाम्।।

हस्ते स्फटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्।

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।"

      इस के बाद हाथ में थोड़े अक्षत लें और बोलें “ॐ भूर्भुवः स्वः सरस्वती देव्यै इहागच्छ इह तिष्ठ" बोलकर अक्षत छोड़े। इस के बाद जल लेकर "एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।” और जल को अर्पित करें। अब प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएँ। "ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ श्री सरस्वत्यै नमः।।" बोलते हुए माँ सरस्वती को स्नान कराएं।

      इस के बाद वस्त्रं समर्पयामि बोलते हुए वस्त्र अर्पित करें। चंदन का तिलक करें। "ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, सरस्वत्यै नमो नमः।।"

      अब फूल अर्पित करें और बोलें "ॐ सरस्वत्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।" इस के बाद "इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊँ सरस्वतयै समर्पयामि” मंत्र बोलते हुए नैवैद्य अर्पित करें।

      अब माँ सरस्वती को भोग लगाएँ और “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ऊँ सरस्वत्यै समर्पयामि” बालते हुए प्रसाद अर्पित कर दें। प्रसाद के बाद माँ सरस्वती को सुपारी और पान अर्पित करें और बोलें "इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं सरस्वतयै समर्पयामि।"

      अंत में एक फूल लेकर उस में चंदन और अक्षत लगाकर किताब कॉपी पर रखें और रखते हुए बोलें "एष: पुष्पान्जलि ऊँ सरस्वतयै नम:।"

      अंत में सामूहिक रूप से माँ सरस्वती की आरती करें और सभी को प्रसाद वितरित करें।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा का गीत Song For Nitish Kumar's Samriddhi Yatra in Bihar

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार


 -शीतांशु कुमार सहाय 

सुनो ए भइया, सुन मेरी बहना सुन लो गाँव जवार

पिछड़ा रहेगा न गाँव शहर अब विकसित होगा बिहार 

पश्चिम चम्पारण की पुण्य भूमि से शुरू हुई ये यात्रा 

समृद्ध होते बिहार के लिए है ये समृद्धि यात्रा 

समृद्धि यात्रा पर निकले सीएम नीतीश कुमार 

समृद्धि यात्रा कर रहे हैं बिहार के खेवनहार 

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अन्तरा - 1

सोलह जनवरी से शुरू है सोलहवीं विकास की यात्रा 

समृद्ध होते बिहार का है ये है समृद्धि यात्रा 

चमचमाती सड़कें हर कहीं खाते न हिचकोले

कोई रोक सकेगा न अब-2 विकास की रफ़्तार

समृद्धि यात्रा पर निकले सीएम नीतीश कुमार 

समृद्धि यात्रा कर रहे हैं बिहार के खेवनहार 

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अन्तरा - 2

हर ज़िले के गाँव शहर में घूम रही सरकार 

कोई एक भी छुट न जाय सब का हो उपकार

घूँघट से निकली हैं बहना कर रहीं व्यापार

लक्ष्य तीस का मिलकर रहेगा-2 विकसित होगा बिहार 

समृद्धि यात्रा पर निकले सीएम नीतीश कुमार 

समृद्धि यात्रा कर रहे हैं बिहार के खेवनहार 

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अन्तरा - 3


नयी योजनाओं की सौगातें मिल रहीं हर दिन 

कहीं उद्घाटन, कहीं शिलान्यास हो रहे हर दिन 

आमजन से बात करें तो मिलती है सच्चाई 

जन-जन की भागीदारी से-2 सपने होते साकार

समृद्धि यात्रा पर निकले सीएम नीतीश कुमार 

समृद्धि यात्रा कर रहे हैं बिहार के खेवनहार 

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अन्तरा - 4

कोई खेत अब न रहे सूखा उद्योगों को मिले राहत

पर्यटन में विश्व भागीदारी करनी है सुनिश्चित 

शिक्षा स्वास्थ्य रोज़गार के सध रहे लक्ष्य अपार

समृद्धि यात्रा पर निकले सीएम नीतीश कुमार 

समृद्धि यात्रा कर रहे हैं बिहार के खेवनहार 

सर्वाधिकार सुरक्षित : शीतांशु कुमार सहाय 


शनिवार, 10 जनवरी 2026

विश्व हिन्दी दिवस १० जनवरी : जानिए ये तथ्य और हिन्दी में गिनती World Hindi Day 10 January : Know Important Topics About Hindi Language & Hindi Counting System


-शीतांशु कुमार सहाय 

      विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर जानिए हिन्दी के बारे में महत्त्वपूर्ण तथ्य और सीखिए हिन्दी में गिनती...

      हिन्दी भाषा की बढ़ती व्यापकता को देखते हुए प्रतिवर्ष १० जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस मनाया जाता है। यह दिवस हम हिन्दीभाषियों को याद दिलाता है कि हमें हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास करना चाहिए। वर्तमान में हिन्दी विश्व की तीसरी सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा है। अँग्रेजी और मैंडरिन चाइनीज के बाद दुनिया में हिन्दी तीसरी सब से अधिक बोली जानेवाली भाषा है। पर, अब भी हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा का स्थान नहीं पा सकी है। 

      हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं, राजभाषा है। भारत सरकार ने एक समिति गठित कर कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और नरसिम्हा गोपालस्वामी आयंगर को भाषा सम्बन्धी कानून बनाने की जिम्मेदारी सौंपी थी। डॉ. भीम राव अम्बेदकर को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। १४ सितंबर १९४९ ईस्वी को संविधान के अनुच्छेद ३४३ और ३५१ के तहत बने कानून में हिन्दी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिया गया। इस के बाद १९५३ ईस्वी से प्रतिवर्ष भारत में १४ सितम्बर को राष्ट्रीय हिन्दी दिवस मनाया जाता है।

      आज विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी में गिनती सीखें और अपने बच्चों को भी अवश्य बताएँ जो हिन्दी गणना प्रणाली भूल गये हैं...

  1. एक = १
  2. दो = २
  3. तीन = ३
  4. चार = ४
  5. पाँच = ५
  6. छः = ६
  7. सात = ७
  8. आठ = ८
  9. नौ = ९
  10. दस = १०

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

वेदान्त उद्योग समूह के संस्थापक उद्योगपति अनिल अग्रवाल पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा A Mountain of Sorrows Fell Upon Industrialist Anil Agarwal, Founder of Vedanta Group of Industries

 

पिता अनिल व पुत्र अग्निवेश 

-शीतांशु कुमार सहाय 

छोटे से व्यवसाय से वेदान्त कम्पनी ग्रुप तक का कठिन और लम्बा सफ़र तय कर देश-विदेश में अपना और बिहार का नाम रौशन करने वाले अनिल अग्रवाल को जीवन का सब से दर्दनाक घटना का सामना करना पड़ रहा है। उन के बड़े पुत्र अग्निवेश अग्रवाल का उनचास वर्ष की उम्र में सात जनवरी को निधन हो गया। वेदान्त समूह की एक कम्पनी तलवण्डी साबो पावर लिमिटेड (TSPL) के निदेशक मण्डल में शामिल थे और समूह की प्रगति में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे थे। 

अग्निवेश अग्रवाल अपने मित्रों के साथ अमेरिका में स्कीइंग करने गये अग्निवेश स्कीइंग के दौरान ही घटना का शिकार हो गये। अमेरिका के ही न्यूयॉर्क के माउण्ट सिनाई अस्पताल में चिकित्सा के दौरान उन की मृत्यु हो गयी। 

अनिल अग्रवाल बिहार के रहने वाले हैं और उद्योगपति के रूप में विश्व प्रसिद्ध हैं। उन्होंने पिता के छोटे से व्यवसाय से उद्योग-व्यवसाय की बारीकियों को सीखा और परिश्रम के बल पर आज खरबों रुपयों का टर्नओवर वाले वेदान्त (Vedanta) उद्योग समूह के स्वामी हैं। भारत सहित कई देशों में उन के कारोबार फैले हैं। अनिल जी फेसबुक पर मेरे मित्र भी हैं। मैं जब एक NRI पत्रिका 'युगपत्र' का सम्पादकीय प्रभारी था तो अनिल जी के संघर्षपूर्ण जीवन से सफल मुकाम तक पहुँचने की शोधपरक कहानी का प्रकाशन किया था। नये उद्योगपति उन के संघर्षपूर्ण दास्तान से सीख लेते हैं। उन्होंने फेसबुक के एक पोस्ट में लिखा कि संसार में उन्हें सब से अधिक सुकून पटना में ही मिलता है। शुरुआत से अबतक पटना से लगाव का ही परिणाम था कि बड़े पुत्र अग्निवेश का भी जन्म पटना में ही हुआ था। 

अनिल अग्रवाल की दो सन्तानों में एक पुत्र और एक पुत्री हैं। बड़ी सन्तान के रूप में पुत्र अग्निवेश का जन्म तीन जून 1976 को पटना में हुआ था जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। दूसरी सन्तान पुत्री प्रिया है। प्रिया फिलहाल वेदांत समूह के बोर्ड में शामिल हैं और समूह की कम्पनी हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड की अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रही हैं।

अग्निवेश ने अजमेर के मेयो महाविद्यालय में पढ़ाई की। उन्हें बॉक्सिंग और घुड़सवारी का भी शौक था। उन्होंने समूह के अन्तर्गत Fujeirah Gold कंपनी को खड़ा किया था। वह समूह की कम्पनी हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड के अध्यक्ष भी थे।

इस दुखद घड़ी में हम अनिल अग्रवाल जी के साथ हैं। 

पुत्र अग्निवेश को श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ!

शनिवार, 29 नवंबर 2025

एक लाख श्रद्धालुओं के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गीता पाठ किया Geeta Paath By Prime Minister Narendra Modi

 

-शीतांशु कुमार सहाय 

      प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उडुपी (कर्नाटक) दौरे के दौरान श्री कृष्ण मठ में लक्ष कंठ गीता पारायण (एक लाख व्यक्तियों द्वारा गीता पाठ) कार्यक्रम में शामिल हुए। उन्होंने सुवर्ण तीर्थ मण्डप और कनक कवच का उद्घाटन किया और अपने सम्बोधन में कहा कि गीता श्लोक से मन को आध्यात्मिक शांति मिलती है।

      मठ की एक पवित्र खिड़की से संत कनकदास को भगवान कृष्ण के दिव्य दर्शन हुए थे। उडुपी में श्री कृष्ण मठ की स्थापना आठ सौ साल पहले वेदांत के द्वैत दर्शन के संस्थापक माधवाचार्य ने की थी।

      प्रधानमंत्री मोदी ने श्री कृष्ण मंदिर के सामने बने सुवर्ण तीर्थ मण्डप का उद्घाटन किया और पवित्र कनकना किन्दी के लिए कनक कवच समर्पित किया। यह एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं का एक भक्ति कार्यक्रम था। इस में विद्यार्थियों के साथ ही साधु, विद्वान और अलग-अलग क्षेत्रों के श्रद्धालु शामिल हुए।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

गोवर्द्धन पूजा का इतिहास History Of Govardhan Puja

 -शीतांशु कुमार सहाय 

     गोवर्द्धन पूजा के अवसर पर जानते हैं इस का इतिहास...

     भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्द्धन पर्वत वाली लीला कर एकेश्वरवाद की परम्परा को आगे बढ़ाया। उन्होंने अलग-अलग कार्य के लिए अलग-अलग देवता को पूजने की परम्परा के बदले एकमात्र सर्वशक्तिमान भगवान को पूजने का उपदेश दिया है। भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र के बदले साक्षात् भगवान स्वरूप गोवर्द्धन की पूजा करवायी। पर्वत के रूप में भगवान गोवर्द्धन उस समय गाय और अन्य पशुओं व कई तरह के जीवों के लिए भोजन और शरणस्थली के लिए प्रसिद्ध थे। 

     वृन्दावन के गोपों ने इन्द्र की पूजा बन्द कर गोवर्द्धन भगवान की पूजा करने लगे। अपनी पूजा न हो पाने से देवराज इन्द्र अत्यन्त क्रोध में आकर वृन्दावन को डूबा देने के उद्देश्य से भारी वर्षा आरम्भ कर दी। तब वर्षा से त्रस्त लोग और अन्य जीवों की रक्षा भगवान श्रीकृष्ण ने की। उन्होंने अपनी कनिष्ठा अँगुली पर गोवर्द्धन पर्वत को उठाया और उस के नीचे वर्षा पीड़ितों को सुरक्षित रखा। 

     अन्ततः इन्द्र को अपनी ग़लती का भान हुआ। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा याचना की। 

     इस घटना के बाद से ही प्रतिवर्ष कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि को 'गोवर्द्धन पूजा' का उत्सव मनाया जा रहा है। 

     गोवर्द्धन पूजा के अवसर पर वृन्दावन में गोवर्द्धन पर्वत के आसपास साक्षात् पर्वत की पूजा करने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं। घर पर गाय के गोबर से पर्वत की आकृति बनाकर गोवर्द्धन पूजा की जाती है। इस सुअवसर पर गाय सहित सभी गोवंश की भी पूजा की परम्परा द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने आरम्भ की थी जो सद्यः जारी है।

जय श्रीकृष्ण 

जय गोवर्द्धन 

गोवर्द्धन पूजा की मङ्गलकामना!

शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

धनतेरस क्यों मनाया जाता है और क्या है वामन अवतार का सम्बन्ध


 -शीतांशु कुमार सहाय 

     धनतेरस के सुअवसर पर वामनरूप भगवान श्रीविष्णु, अमृत कलश लेकर समुद्र मन्थन में औषधियों सहित प्रकट होनेवाले भगवान धनवन्तरि और धनाध्यक्ष कुबेर अपनी असीम कृपा का वर्षण करते रहें!
     आध्यात्मिक धन, स्वास्थ्य धन और वस्तुगत धन प्राप्ति हेतु साधन-परिश्रम का विशेष दिवस 'धनतेरस' का आयोजन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को होता है। 
     अब जानते हैं 'धनतेरस' से जुड़ी कथा। राजा बलि के भय से देवताओं को मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था। इस पाँचवें अवतार में वे राजा बलि के यज्ञ स्थल पर जा पहुँचे। इस बीच असुरों के गुरु शुक्राचार्य पहचान गये थे कि वामन के रूप में भगवान विष्णु ही हैं। तब शुक्राचार्य ने राजा बलि से कहा कि वामन जो भी माँगे, वह उन्हें न दिया जाय। साथ ही उन्होंने कहा कि वामन के रूप में भगवान विष्णु हैं, जो देवताओं की सहायता करने के लिए यहाँ आये हैं।
     शुक्राचार्य ऐसा नहीं चाहते थे कि बलि के हाथों भगवान वामन को कुछ भी दान में न मिले। राजा बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य ने वामनरूप भगवान के कमण्डल में लघु रूप धारण कर प्रवेश कर लिया। गुरु शुक्राचार्य की ये चालाकी भगवान विष्णु समझ गये। तब उन्होंने अपने हाथों में मौजूद कुश को कमण्डल में इस तरह रखा कि शुक्राचार्य की एक आँख फूट गयी। इस के बाद सदा के लिए वे एक आँख गँवा बैठे।
     इस घटना के बाद भगवान द्वारा माँगी गयी तीन पग भूमि को बलि ने दान करने का फैसला ले लिया। उस समय भगवान वामन ने अपने एक पैर से पूरी धरती को मापा और दूसरे पैर से अंतरिक्ष के सभी लोकों को माप लिया। अब तीसरा पैर रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा था, तो भगवान के सम्मुख सिर झुकाकर असुरराज बलि ने अपने सिर नरेन्द्र भगवान वामन को पैर रखने का आग्रह किया। भगवान ने अपने श्रीचरणों से वलि को मुक्ति प्रदान किया। इस तरह देवताओं को बलि के भय से मुक्ति मिल गयी। इसी जीत की उल्लासमय अभिव्यक्ति धनतेरस है।
     समुद्र मन्थन में अमृत कलश लेकर औषधियों सहित प्रकट होनेवाले आयुर्वेद अर्थात् चिकित्सा शास्त्र के प्रणेता भगवान धनवन्तरि की भी आराधना की जाती है। इसी दिन धन-वैभव के अध्यक्ष कुबेर देव की भी पूजा की जाती है।

शनिवार, 27 सितंबर 2025

टेक्सटेरिया ड्रेसेज : आशा, विश्वास और क्षमता का प्रतीक टेक्सटेरिया के रेडीमेड कपड़े Textarya Dresses : Textarya Readymade Garments Symbolize Hope, Faith & Potential

Textarya Shirts
 -शीतांशु कुमार सहाय 

      हमारी आशा और हमारे स्वप्न कभी-कभी हमारी पहुँच से बाहर लग सकते हैं; क्योंकि समाज ने हमें सिखाया है कि कुछ चीज़ें बस अप्राप्य हैं। हम ऐसा क्यों मानते हैं? हम स्वयं पर और अपनी अद्भुत क्षमता पर विश्वास क्यों नहीं करते? जो लोग जीवन की बाधाओं और संशयवादियों को पीछे छोड़कर सितारों तक पहुँचना चाहते हैं, उन के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। वास्तविक बदलाव लाने की अपनी क्षमता पर विश्वास करना ही होगा। कभी-कभी सही दिशा में एक धक्का ही हमें अपनी समस्याओं को अलग नज़रिये से देखने के लिए पर्याप्त होता है। 'कुछ भी असंभव नहीं है', जब हम ऐसा ठान लेते हैं तो अन्दर से एक शक्ति मिलती है जो हम को असम्भवताओं के बारे में नये नज़रिये से सोचने पर बाध्य कर देती है। इस के बाद हम जो परिश्रम करते हैं तो सम्भावनाएँ सकारात्मक परिणाम में बदलने लगती हैं और ज़रूरी उपाय खोजने नहीं पड़ते, दीखने लगते हैं। 

रीना कुमारी 

    यह किसी उपदेशक ने नहीं कहा। यह कथन है एक सफल महिला उद्यमी रीना कुमारी का। ये उन के अनुभव से निकले शब्द हैं। कुछ नहीं से शुरू कर आज लाखों का कारोबार करनेवाली रीना का टेक्सटेरिया (Textarya) ब्राण्ड के रेडीमेड गारमेण्ट्स आज कई नगरों में बिक रहे हैं। वह कहती हैं कि वर्तमान सरकार की योजनाएँ महिला उद्यमियों के लिए अनुकूल हैं। सरकार की तरफ से न केवल ऋण और अनुदान के रूप में आर्थिक मदद मिल रही है; बल्कि औद्योगिक, व्यावसायिक और मार्केटिंग के प्रशिक्षण भी दिये जा रहे हैं। पहले महिलाओं के लिए ऐसा माहौल नहीं था।

      बिहार प्रगति के पथ पर अग्रसर है। महिलाएँ भी इस प्रगति में निरन्तर भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं। उद्योग, व्यवसाय और सेवा के विविध क्षेत्रों में सफल उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इसी सन्दर्भ में बिहार की महिमा उद्यमी के रूप में उभरता नाम रीना कुमारी का है।

      बिहार के पटना जिले में जन्मी रीना के पिता उद्योग विभाग में कार्यरत धे। उन्होंने बेटी को हर सम्भव मदद की और निरन्तर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उन का आशीर्वाद अब भी मिल रहा है। माँ गृहणी होने के बावजूद बेटी के उद्यमी कदम को बढ़ने से कभी नहीं रोकी। माता के प्रगतिशील विचारधारा का सम्बल प्राप्त हुआ। एक भाई और दो बहनों में सब से छोटी हैं रीना जिन के सपने कभी छोटे नहीं रहे। कारोबारी गतिविधियों में पति सतीश कुमार का निरन्तर सहयोग मिल रहा है।

      माता-पिता के आशीर्वाद और पति के साहस व उत्प्रेरणा से रीना ने अपने बचपन के स्वप्न को साकार करना आरम्भ किया। वह सिलेसिलाये वस्त्र का कारोबार करना चाहती थी। इस के लिए मन में एक योजना बनायी और तदनुरूप कार्य करना आरम्भ कर दिया। पच्चीस वर्षों के वैवाहिक जीवन में कई वर्ष औद्योगिक शहरों में रहने के अवसर प्राप्त हुए। इस बीच वह एक पुत्र आकाश और पुत्री भूमि की माँ बनीं लेकिन अपने लक्ष्य से ध्यान को भटकनेे नहीं दिया। अपने सम्पर्क के आधार पर लगातार वस्त्र उद्योग के सभी पक्षों की बारीकियों को आत्मसात करती रहीं। साध ही सरकारी योजनाओं के बारे में भी जानकारी प्राप्त करती रहीं।

      पति के सहयोग से रीना ने पटना में कारोबार करने की ठानी। कई विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। कभी-कभी ऐसा भी लगा कि रेडीमेड कपड़ों के उत्पादन से बेहतर होगा कि दूसरी कम्पनी का माल लेकर बेचा जाय लेकिन जिद्द थी अपना ब्राण्ड बनाने की और वह पूरा हुआ। पहले ट्रीना एण्टरप्राइजेज (Treenaa Enterprises) नामक कम्पनी की स्थापना की। नियमानुसार जीएसटी निबन्धन कराया। रीना कुमारी का कहना है कि उन्हें घर से आरम्भिक पूँजी मिल सकती थी, पर उन्होंने अपने बूते कम्पनी को चलाने का निश्चय किया और प्रधानमंत्री रोज़गार योजना के तहत दस लाख रुपये का ऋण लिया। अच्छी कम्पनी की सिलाई मशीनों का क्रय किया और कुशल कारीगरों की व्यवस्था की। इस प्रकार आरम्भ हो गयी टेक्सटेरिया (Textarya) ड्रेसेज की विकास यात्रा जो अनवरत् जारी है। रीना ने नियमानुसार इस नाम का ट्रेडमार्क भी लिया है।

      फिलहाल टेक्सटेरिया ब्राण्ड के अन्तर्गत शर्ट, कुर्ता, पैजामा और बण्डी का हर साइज में उत्पादन हो रहा है। शुरुआत में पटना के कुछ स्थानीय दुकानों में ही कपड़ों की बिक्री हो पा रही थी लेकिन उत्तम क्वालिटी के कपड़े और उत्कृष्ट तथा मजबूत सिलाई के कारण टेक्सटेरिया के ड्रेसेज लोकप्रिय होने लगे। पटना, बक्सर, वैशाली, सारण, गया, जहानाबाद, भोजपुर, मुजफ्फरपुर, नवादा होते हुए झारखण्ड के राँची, रामगढ़, हजारीबाग, कोडरमा, धनबाद, बोकारो आदि नगरों में टेक्सटेरिया ने अपना बाजार बना लिया है। 

      रेडीमेड कपड़ों का उत्पादन शुरू कर रीना ने न केवल स्वयं को आर्थिक रूप स्वावलम्बी बनाया; बल्कि दर्जनों महिलाओं और पुरुषों की बेरोजगारी भी दूर कर रही हैं। अब उन के कपड़े कई बड़े माॅल की भी शोभा बढ़ा रहे हैं। पटना के चर्चित खादी माॅल, बिहार इम्पोरियम के बिक्री केन्द्रों, बिहार संग्रहालय के बिक्री केन्द्रों से भी टेक्सटेरिया ड्रेसेज की खरीददारी की जा सकती है। 

      क्या आप ने कभी सोचा है कि असम्भव परिस्थितियाँ भी आगे बढ़ने का एक असाधारण अवसर हैं? याद रखिए कि कोई भी महान रचना कुछ संशोधनों के बिना नहीं रची जा सकती। वर्तमान संभावनाओं पर काम करते हुए असम्भवता को ही लक्ष्य बनाएँ, आप वहाँ पहुँच जाएंगी। अगर लोग यह मानना ​​छोड़ दें कि चीजें असंभव हैं तो जीवन कहीं अधिक उज्ज्वल होगा। आप पर्याप्त दृढ़ संकल्प और विश्वास के साथ कुछ भी कर सकती हैं। अपने असंभव स्वप्नों पर विश्वास रखें और रीना कुमारी की तरह लक्ष्य पर ध्यान लगाकर निरन्तर प्रगति के पथ पर बढ़ते रहें।

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बुधवार, 24 सितंबर 2025

भवान्यष्टक और इस की उत्पत्ति का इतिहास Bhawani Ashtak And Its History

 

 -प्रस्तोता : शीतांशु कुमार सहाय 

      माता आदिशक्ति अपने दुर्गा अवतार को नौ रूपों में व्यक्त किया है। इन्हें 'नवदुर्गा' कहते हैं। नवरात्र के दौरान इन की आराधना-उपासना की जाती है। कई मन्त्रों, स्तवनों, श्लोकों और स्तोत्रों से नवदुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। इन में महत्त्वपूर्ण रूप से 'भवान्यष्टक' यानी 'भवानी अष्टक' शामिल है जिसे आचार्य शंकर (शंकराचार्य) ने रचा था।

      भवान्यष्टक की रचना का एक इतिहास है। इस बारे में आप भी जानिए। एक बार आदिगुरु शंकराचार्य शाक्तमत (शक्ति को माननेवाले का मत) का खण्डन करने के लिए कश्मीर पहुँचे थे। कश्मीर में उन का स्वास्थ्य बिगड़ गया। उन का शरीर शक्तिहीन हो गया था। एक पेड़ के नीचे आराम करते हुए विचारमग्न थे कि इतनी शारीरिक शक्तिहीनता कैसे प्रकट हुई और इस का निराकरण क्या है।

वहाँ से एक ग्वालिन सिर पर दही का बर्तन लेकर निकली। आचार्य शंकर का पेट जल रहा था और वे बहुत प्यासे भी थे। उन्होंने ग्वालिन को इशारा किया कि वह उन के पास आकर दही दे। ग्वालिन थोड़ी दूर पर रूकी और  कहा, "दही लेना है तो आप यहाँ आइए।" 

      आचार्य शंकर ने धीरे से कहा, “मुझ में इतनी दूर आने की शक्ति नहीं है। बिना शक्ति के कैसे तुम्हारे पास पहुँच सकता हूँ।"

      हँसती हुई ग्वालिन ने कहा, "शक्ति के बिना कोई एक कदम भी नहीं उठा सकता और आप शक्ति का खण्डन करने निकले हैं?"

      ग्वालिन की बात सुनते ही शंकराचार्य की आँखें खुल गयीं। वह समझ गये कि भगवती स्वयं ही इस ग्वलिन  के रूप में आयी हैं। उन के मन में जो शिव और शक्ति के बीच का अंतर था वो मिट गया और उन्होंने शक्ति के सामने समर्पण कर दिया और शब्द निकले "गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी"

      समर्पण का यह स्तवन 'भवानी अष्टक' या 'भवान्यष्टक' नाम से प्रसिद्ध है, जो अद्भुत है। शिव स्थिर शक्ति हैं और भवानी उन में गतिशील शक्ति हैं। दोनों अलग-अलग हैं... एक दूध है और दूसरा उस की सफेदी है। इस तरह नेत्रों पर अज्ञान का जो आखिरी पर्दा भी माँ ने ही उसे हटाया था। इसलिए शंकर ने कहा, "माँ, मैं कुछ नहीं जानता"।

      यहाँ शंकराचार्य रचित 'भवान्यष्टक' को प्रस्तुत किया गया है। 

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता

          न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।

    न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव

          गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥१॥


भवाब्धावपारे महादुःखभीरु

          प्रपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।

    कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं  

          गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥२॥


न जानामि दानं न च ध्यानयोगं

          न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।

    न जानामि पूजां न च न्यासयोगं

          गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥३॥


न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं

          न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्।

    न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्-

          गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥४॥


कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः

          कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।

    कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं

          गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥५॥


प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं

          दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।

    न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये

          गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥६॥


विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे

          जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।

    अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि

          गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥७॥


अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो

          महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।

    विपत्तौ प्रविष्टः प्रनष्टः सदाहं

          गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥८॥

रविवार, 14 सितंबर 2025

जीवित्पुत्रिका व्रत या जितिया व्रत में मछली खाने की परम्परा का सच The Truth Behind The Tradition of Eating Fish During Jivitputrika Vrat or Jitiya Vrat


-शीतांशु कुमार सहाय 

      ग्रन्थों में वर्णित जीवित्पुत्रिका व्रत को ही जितिया व्रत या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। आदिशक्ति के दुर्गा अवतार का ही एक नाम 'जीवित्पुत्रिका' भी है। अतः इस दिन सन्तान  की दीर्घायुता, विद्वत्ता, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए माता दुर्गा की आराधना अवश्य करनी चाहिए। ऐसा शास्त्र का आदेश है। साथ ही जीमूतवाहन की हरे कुश से प्रतिकृति बनाकर पूजा करने का विधान है। यह चर्चा 'जीवित्पुत्रिका व्रत कथा' में भी है। पूर्ण फल की प्राप्ति हेतु ऐसा ही करना चाहिए। 

      मैं ने देखा है कि लोग मूल ग्रन्थ नहीं पढ़ते और सुनी-सुनायी बातों के आधार पर शास्त्रोक्त पूजन विधियों में फेरबदल कर लेते हैं। फलतः भगवद्कृपा प्राप्त नहीं होती और पूजन का फल नहीं मिलता है। 

      कुछ लोगों ने जितिया के दौरान मछली खाने की परम्परा को आत्मसात् कर लिया है। यह घोर पापकर्म है। यह व्रत पूरी तरह वैष्णव व्रत है। आश्विन कृष्ण पक्ष की सप्तमी रहित अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। मतलब यह कि पितृपक्ष का आठवाँ दिन। पितृपक्ष के दौरान मांसाहार पूरी तरह वर्जित होता है। सातवें दिन यानी आश्विन कृष्ण सप्तमी को नहाय-खाय के दिन स्वाद के गुलाम लोगों ने मछली खाना आरम्भ कर दिया जो स्थानीय स्तर पर परम्परा का रूप ले लिया है जो सर्वथा ग़लत है। इसी तरह कुछ लोग नवरात्र के दौरान भी मछली का सेवन करते हैं। यह भी जीभ की परतन्त्रता स्वीकारनेवालों की 'चालाकी' का प्रतीक है। किसी भी धार्मिक आयोजन में मांसाहार की शास्त्रीय परम्परा नहीं है। धर्म की ग़लत व्याख्या करनेवाले विधर्मियों ने धर्म को बदनाम करने के लिए एक षड्यन्त्र के तहत इसे एक 'परम्परा' का स्वरूप देने का कुत्सित प्रयास किया है। धार्मिक लोग विधर्मियों के इस षड्यन्त्र का जाने-अनजाने में शिकार हो रहे हैं। 

      ऊपर वर्णित 'मछली परम्परा' अधिकतर मिथिला क्षेत्र (नेपाल और बिहार का उत्तरी भाग) में देखने को मिलती है। नवरात्र में मछली खाने की परम्परा बंगाल में अधिक दृष्टिगोचर होती है। मिथिला के निवासियों के मस्तिष्क में यह बात बैठायी गयी है कि मिथिला राज्य (स्वाधीनता से पूर्व) का राजचिह्न मछली थी। कुछ कुतर्की लोग मछली को मांसाहार नहीं मानते; बल्कि 'जल का फल' मानते हैं। पर, धर्म के नियम और शास्त्र के अनुशासन यह बताते हैं कि व्रत, यज्ञ, अनुष्ठान आदि में मूल ग्रन्थ का ही अनुसरण करना चाहिए। 

      अब स्वीकार कीजिए 'जीवित्पुत्रिका व्रत' की मङ्गलकामना, साथ ही सुनिए 'जीवित्पुत्रिका व्रत कथा' और कमेण्ट कर बताइए कि इस में जो कहा गया है, क्या व्रत करनेवाली महिलाएँ उन का पालन करती हैं? यदि नहीं, तो उन्हें पूर्ण फल की प्राप्ति निश्चित रूप से नहीं होगी। अन्त में आप से निवेदन करता हूँ कि आप तैत्तिरीयोपनिषद का कथन 'धर्मं चर' अर्थात् 'धर्म का आचरण करो' की नीति को याद रखिए और ऐसा ही कीजिए।

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

बिहार में सम्पन्नता की संजीवनी : मुख्यमन्त्री महिला रोज़गार योजना Mukhyamantri Mahila Rozgar Yojana In Bihar


-शीतांशु कुमार सहाय 

"नया वक़्त है नया ज़माना,

मिलकर ग़रीबी को दूर भगाना।

बढ़ती जाएंगी महिलाएँ जब,

विकसित होगा भारत अपना तब।"

      बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती अप्सरा का उक्त कथन हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा घोषित 'मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना' पर पूरी तरह से चरितार्थ होता है। महिला सशक्तीकरण की राह में यह योजना वास्तव में ज़मीनी स्तर पर मील का पत्थर साबित होगा। भारत के सभी राज्यों में यह पहली योजना है जो बिहार के सभी परिवार को लाभान्वित करेगी। यह योजना मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 'हर घर महिला उद्यमी' के स्वप्न को साकार करेगी। इस से न केवल प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होगी; बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलेगा। इस तरह बिहार की उद्यमी महिलाएँ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'विकसित भारत' के संकल्प को पूरा करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देने में सक्षम हो पायेंगी। सात सितम्बर २०२५ को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 'मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना' का शुभारम्भ कर रहे हैं। 

●  योजना का उद्देश्य : 

      महिलाओं के उत्थान के लिए निरन्तर प्रयासरत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने निर्थनता का समूल नष्ट करने के उद्देश्य से इस योजना को लागू किया है। इस का लाभ प्रत्येक परिवार तक पहुँचाने को सरकार संकल्पित भाव से कार्य कर रही है। मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना के उद्देश्य के सन्दर्भ में बिहार महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती अप्सरा कहती हैं कि घरेलू जिम्मेदारियों के निर्वहन के बाद महिलाओं के पास दोपहर में घण्टों समय बचता है। इस समय का उपयोग कर महिलाएँ सरकार द्वारा दी जा रही आर्थिक सहायता से परिवार की आमदनी बढ़ा सकती हैं। श्रीमती अप्सरा ने व्यावहारिक रूप से बताया कि अक्सर पारिवारिक या घरेलू विवाद दोपहर के समय में होते हैं। जब महिलाएँ दोपहर के समय का अर्थोपार्जन में सदुपयोग करने लगेंगी तो पारिवारिक कलह में भी कमी आयेगी और महिला आयोग पर बढ़ते घरेलू विवाद के बोझ घटेंगे। प्रत्येक परिवार की एक महिला को उद्यमी या व्यवसायी बनाने का उद्देश्य भी यह योजना पूरी करेगी। श्रीमती अप्सरा कहती हैं कि यह योजना निश्चय ही 'सम्पन्नता की संजीवनी' साबित होगी।

कितनी आर्थिक सहायता :

      इस योजना के अन्तर्गत प्रत्येक परिवार की एक महिला को शुरुआत में दस हजार रुपये की राशि बैंक खाते में प्रदान की जायेगी। इस राशि से उद्योग या व्यवसाय आरम्भ करना है। कुछ महीनों बाद उद्योग या व्यवसाय की स्थिति का आकलन करने के बाद आवश्यकता के अनुसार दो लाख रुपये तक अतिरिक्त सहायता राशि प्रदान की जायेगी।

कार्यकारी एजेन्सी : 

      मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना को राज्य का ग्रामीण विकास कार्यान्वित कर रहा है। इस विभाग के अधीन कार्यरत 'बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति (जीविका) ही इस योजना को संचालित करने के लिए अधिकृत एजेन्सी है। गाँवों में जीविका के अन्तर्गत संचालित महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएँ इस योजना का लाभ ले सकती हैं। जो महिलाएँ समूह से नहीं जुड़ी हैं, उन्हें समूह से जुड़ने के बाद ही आवेदन करना होगा। 

      शहरों की महिलाओं को भी इस योजना का लाभ मिलेगा। शहरी महिलाएँ भी जीविका समूह से जुड़कर इस योजना का लाभ लेने के लिए आवेदन कर सकती हैं। शहरों में योजना के सफल कार्यान्वयन के लिए नगर विकास एवं आवास विभाग की सहायता ली जा रही है। 

योजना में परिवार की परिभाषा :

      मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना का फायदा हर परिवार तक पहुँचाने को सरकार संकल्पित भाव से कार्य कर रही है। इस योजना में पति, पत्नी और उन के अविवाहित बच्चों को परिवार माना जायेगा। यदि 18 वर्ष से अधिक आयु की अविवाहित लड़की की माँ और पिता दोनों का देहान्त हो गया है तो उसे एकल परिवार माना जायेगा। ऐसी लड़की इस योजना का लाभ लेने के लिए आवेदन कर सकती है। 

पात्रता की शर्तें :

      इस योजना के तहत लाभ लेने के लिए कुछ शर्तें निर्धारित की गयी हैं।  आवेदिका की आयु कम-से-कम 18 और अधिकतम 60 वर्ष होनी चाहिए। आवेदिका या उस का पति आयकर न देता हो तभी इस योजना का लाभ मिलेगा। साथ ही आवेदिका या उस का पति नियमित या संविदा पर सरकारी नौकरी न करता हो। आवेदिका का एक बैंक खाता हो जो आधार से जुड़ा हो।

आवश्यक दस्तावेज :

      इस योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए एक नियमित संचालित बैंक खाता हो जो आधार से जुड़ा होना चाहिए। साथ ही आधार कार्ड, आवास प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र की भी आवश्यकता के अनुसार ज़रूरत पड़ेगी।

      परिवार की आय बढ़ाने, बिहार को प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाने और विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना से महिलाओं को अवश्य जुड़ना चाहिए। 

● पंजीकरण और वेबसाइट :

ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाली महिलाएँ जीविका के प्रखण्ड या जिला कार्यालय में पंजीकरण करा सकती हैं। इस के अलावा प्रखण्ड कार्यालय, उप विकास आयुक्त कार्यालय अथवा जिलाधिकारी (डीएम) के कार्यालय में भी पंजीकरण कराया जा सकता है। 

शहरी क्षेत्रों में रहनेवाली महिलाएँ 'मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना' का लाभ लेने के लिए अपने नगर पंचायत, नगर परिषद या नगर निगम कार्यालय में जाकर पंजीकरण करा सकती हैं। 

मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना के लिए ऑनलाइन आवेदन का वेबसाइट है :- www.brlps.in

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सोमवार, 18 अगस्त 2025

बच्चों के हृदय की निःशुल्क चिकित्सा और शल्य Free Treatment Of Heart For Children & Operation

 

-शीतांशु कुमार सहाय 

कुछ बच्चों को जन्म से ही हृदय की बीमारी होती है। ऐसे बच्चों की चिकित्सा अत्यन्त मुश्किल हो जाती है। कई बार तो उन की जान तक चली जाती है। ऐसे बच्चों के लिए हरियाणा का एक अस्पताल वरदान साबित हो रहा है। इस अस्पताल में बीमार बच्चों की दवा, इलाज, जाँच सहित सर्जरी मुफ्त में की जाती है। चिकित्सा के दौरान बच्चे के साथ ही उस के परिजन के ठहरने की भी व्यवस्था की जाती है।

      इस अस्पताल में किसी भी काम के लिए पैसे नहीं देने पड़ते हैं। हम बार कर रहे हैं, हरियाणा के पलवल स्थित बघोला में बने श्री सत्य साईं संजीवनी अस्पताल की। बघोला में बने श्री सत्य साईं संजीवनी इण्टरनेशनल सेण्टर फॉर चाइल्ड हार्ट केयर सेण्टर गरीबों की निःशुल्क चिकित्सा कर रहा है।

शनिवार, 16 अगस्त 2025

श्रीकृष्ण के जन्म से पूर्व कंस के हाथों मारे गये छः शिशु कौन थे Who were the six children killed by Kansa before the birth of Shri Krishna


-प्रस्तोता : शीतांशु कुमार सहाय

      भगवान् श्री कृष्ण वह महानायक है, जिसने पूरी दुनिया को अधर्म और अन्याय के खिलाफ खड़े होना सिखाया ! जीवन-दर्शन का संदेश और ज्ञान गीता के द्वारा समझाया, भ्रमितों को राह दिखाई, दुखियों को न्याय दिलवाया ! इसके लिए भारी कीमत भी चुकाई ! जन्म लेते ही माँ-बाप से अलग होना पड़ा, जहां पला-बढ़ा, उस स्थान को भी छोड़ना पड़ा ! बचपन से लेकर जीवन पर्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बावजूद उसे बदनाम होना पड़ा, लांछन झेलने पड़े यहां तक कि श्रापग्रस्त भी होना पड़ा ! अपने जीवन काल में ही अपने वंश की दुर्दशा का सामना करना पड़ा पर इस सबके बावजूद चेहरे की मधुर मुस्कान को तिरोहित नहीं होने दिया ! कभी अपने दुखों की काली छाया अपने भक्तों की आशाओं पर छाने नहीं दी, क्योंकि सभी का कष्ट हरने के लिए ही तो अवतार लिया था ! 

      द्वापर का समय था ! बड़ी भीषण परिस्थितियां थीं ! राज्याध्यक्ष उच्श्रृंखल हो चुके थे ! प्रजा परेशान थी ! न्याय माँगने वालों को काल कोठरी नसीब होती थी ! अराजकता का बोल-बाला था ! भोग-विलास का आलम छाया हुआ था ! उस समय मथुरा का राज्य कंस के हाथों में था ! कंश निरंकुश व पाषाण ह्रदय नरेश था ! वैसे तो वह अपनी बहन देवकी से बहुत प्यार करता था पर जबसे उसे मालूम हुआ था कि देवकी का आठवां पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा तभी से उसने उसे काल कोठरी में डाल रखा था ! किसी भी तरह का खतरा मोल न लेने की इच्छा के कारण कंस ने देवकी के पहले छह पुत्रों की भी ह्त्या कर दी !

कौन थे वे अभागे शिशु ? 

ब्रह्मलोक में स्मर, उद्रीथ, परिश्वंग, पतंग, क्षुद्र्मृत व घ्रिणी नाम के छह देवता हुआ करते थे ! ये ब्रह्माजी के कृपा पात्र थे ! इन पर ब्रह्मा जी की कृपा और स्नेह दृष्टि सदा बनी रहती थी ! वे इन छहों की छोटी-मोटी बातों और गलतियों पर ध्यान न दे उन्हें नज़रंदाज़ कर देते थे ! इसी कारण उन छहों में धीरे-धीरे अपनी सफलता के कारण घमंड पनपने लग गया ! ये अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझने लग गए ! ऐसे में ही एक दिन इन्होंने बात-बात में ब्रह्माजी का भी अनादर कर दिया ! इससे ब्रह्माजी ने क्रोधित हो इन्हें श्राप दे दिया कि तुम लोग पृथ्वी पर दैत्य वंश में जन्म लो ! इससे उन छहों की अक्ल ठिकाने आ गयी और वे बार-बार ब्रह्माजी से क्षमा याचना करने लगे ! ब्रह्मा जी को भी इन पर दया आ गयी और उन्होंने कहा कि जन्म तो तुम्हें दैत्य वंश में लेना ही पडेगा पर तुम्हारा पूर्व ज्ञान बना रहेगा !

समयानुसार उन छहों ने राक्षसराज हिरण्यकश्यप के घर जन्म लिया ! उस जन्म में उन्होंने पूर्व जन्म का ज्ञान होने के कारण कोई गलत काम नहीं किया ! सारा समय उन्होंने ब्रह्माजी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न करने में ही बिताया ! जिससे प्रसन्न हो ब्रह्माजी ने उनसे वरदान माँगने को कहा ! दैत्य योनि के प्रभाव से उन्होंने वैसा ही वर माँगा कि हमारी मौत न देवताओं के हाथों हो, न गन्धर्वों के, न ही हम हारी-बीमारी से मरें ! ब्रह्माजी तथास्तु कह कर अंतर्ध्यान हो गये।

इधर हिरण्यकश्यप अपने पुत्रों से देवताओं की उपासना करने के कारण नाराज था। उस ने इस बात के मालूम होते ही उन छः को शाप दे डाला कि वे किसी देवता या गंधर्व के हाथों नहीं, एक दैत्य के हाथों मरेंगे। इसी शाप के वशीभूत उन्होंने देवकी के गर्भ से जन्म लिया और कंस के हाथों मारे गये और सुतल लोक में जगह पायी।

कंस वध के पश्चात जब श्रीकृष्ण माँ देवकी के पास गए तो माँ ने उन छहों पुत्रों को देखने की इच्छा प्रभू से की जिनको जन्मते ही मार डाला गया था। प्रभू ने सुतल लोक से उन छहों को लाकर माँ की इच्छा पूरी की। प्रभू के सानिध्य और कृपा से वे फिर देवलोक में स्थान पा गये।

मंगलवार, 12 अगस्त 2025

शबरी को भगवान श्रीराम के दर्शन का रहस्य


शबरी को आश्रम सौंपकर महर्षि मतंग जब देवलोक जाने लगे, तब शबरी भी साथ जाने की जिद करने लगी।

      शबरी की उम्र  दस वर्ष  थी। वो महर्षि मतंग का हाथ पकड़ रोने लगी।

      महर्षि शबरी को रोते देख व्याकुल हो उठे। शबरी को समझाया   पुत्री इस आश्रम में भगवान आएंगे, तुम यहीं प्रतीक्षा करो।

        अबोध शबरी इतना अवश्य जानती थी कि गुरु का वाक्य सत्य होकर रहेगा, उसने फिर पूछा-  कब आएंगे..

       महर्षि मतंग त्रिकालदर्शी थे। वे भूत भविष्य सब जानते थे, वे ब्रह्मर्षि थे।  महर्षि शबरी के आगे घुटनों के बल बैठ गए और शबरी को नमन किया।

      आसपास उपस्थित सभी ऋषिगण असमंजस में डूब गए। ये उलट कैसे हुआ।  गुरु यहां शिष्य को नमन करे, ये कैसे हुआ   महर्षि के तेज के आगे कोई बोल न सका।

                 महर्षि मतंग बोले- 

      पुत्री अभी उनका जन्म नहीं हुआ। अभी दशरथ जी का लग्न भी नहीं हुआ।

      उनका कौशल्या से विवाह होगा। फिर भगवान की लम्बी प्रतीक्षा होगी। 

      फिर दशरथ जी का विवाह सुमित्रा से होगा।  फिर प्रतीक्षा..

               फिर उनका विवाह कैकई से होगा। फिर प्रतीक्षा.. 

     फिर वो  जन्म लेंगे, फिर उनका  विवाह माता जानकी से होगा।  फिर उन्हें 14 वर्ष वनवास होगा और फिर वनवास के आखिरी वर्ष माता जानकी का हरण होगा।  तब उनकी खोज में वे यहां आएंगे।  तुम उन्हें कहना  आप सुग्रीव से मित्रता कीजिये। उसे आतताई बाली के संताप से मुक्त कीजिये, आपका अभीष्ट सिद्ध होगा। और आप रावण पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे।

         शबरी एक क्षण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई।  अबोध शबरी इतनी लंबी प्रतीक्षा के समय को माप भी नहीं पाई।

         वह फिर अधीर होकर  पूछने लगी-  इतनी लम्बी प्रतीक्षा कैसे पूरी होगी गुरुदेव

         महर्षि मतंग बोले-  वे ईश्वर है, अवश्य ही आएंगे। यह भावी निश्चित है।  लेकिन यदि उनकी इच्छा हुई तो काल दर्शन के इस विज्ञान को परे रखकर वे कभी भी आ सकते है। लेकिन आएंगे  अवश्य 

        जन्म मरण से परे उन्हें जब जरूरत हुई तो प्रह्लाद के लिए खम्बे से भी निकल आये थे।  इसलिए प्रतीक्षा करना। वे कभी भी आ सकते है।  तीनों काल तुम्हारे गुरु के रूप में मुझे याद रखेंगे। शायद यही मेरे तप का फल है।

        शबरी गुरु के आदेश को मान वहीं आश्रम में रुक गई।  उसे हर दिन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा रहती थी। वह जानती थी समय का चक्र उनकी उंगली पर नाचता है, वे कभी भी आ सकतें है। 

        हर रोज रास्ते में फूल बिछाती है और हर क्षण प्रतीक्षा करती।

                  कभी भी आ सकतें हैं।

हर तरफ फूल बिछाकर हर क्षण प्रतीक्षा।  शबरी बूढ़ी हो गई। लेकिन प्रतीक्षा  उसी अबोध चित्त से करती रही।

     और एक दिन उसके बिछाए फूलों पर प्रभु श्रीराम के चरण पड़े।  शबरी का कंठ अवरुद्ध हो गया। आंखों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ी।

         गुरु का कथन सत्य हुआ।* भगवान उसके घर आ गए।  शबरी की प्रतीक्षा का फल ये रहा कि जिन राम को कभी तीनों माताओं ने जूठा नहीं खिलाया, उन्हीं राम ने शबरी का जूठा खाया।

         ऐसे पतित पावन मर्यादा, पुरुषोत्तम, दीन हितकारी श्री राम जी की जय हो। जय हो। जय हो।

         एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद वृद्धा भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे-

         कहो राम ! शबरी की कुटिया को ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ..

        राम मुस्कुराए-  यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य..

        जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्मे भी नहीं थे, यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो  कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास ? बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा, जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा।

       राम ने कहा-  तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को शबरी के आश्रम में जाना है।

       एक बात बताऊँ प्रभु ! भक्ति में दो प्रकार की शरणागति होती है। पहली ‘वानरी भाव’ और दूसरी ‘मार्जारी भाव’।

       बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न..उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है...! (वानरी भाव)

       पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया।  मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी,   और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना...। (मार्जारी भाव)

                 राम मुस्कुराकर रह गए!!

    भीलनी ने पुनः कहा-  सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न...  कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं! तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी।  यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते..

                राम गम्भीर हुए और कहा-

   भ्रम में न पड़ो मां!  राम क्या रावण का वध करने आया है..

      रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण चलाकर भी कर सकता है।

     राम हजारों कोस चलकर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि  सहस्त्रों वर्षों के बाद भी, जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिलकर गढ़ा था।

     जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़कर कहे कि नहीं! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ, एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।

     राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि  जब युगों का इतिहास लिखा जाए, तो उसमें अंकित हो कि  शासन/प्रशासन और सत्ता जब पैदल चलकर वन में रहने वाले समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, तभी वह रामराज्य है।

     राम वन में इसलिए आया है,  ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है माँ!

     माता शबरी एकटक राम को निहारती रहीं।

                    राम ने फिर कहा-

     राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता!  राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए।

     राम राजमहल से निकला है, ताकि  विश्व को संदेश दे सके कि एक माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है।

     राम निकला है, ताकि  भारत विश्व को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है।

    राम आया है, ताकि  भारत विश्व को बता सके कि अन्याय और आतंक का अंत करना ही धर्म है।

    राम आया है, ताकि भारत विश्व को सदैव के लिए सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाए और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाए।

    राम आया है, ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते है।

       शबरी की आँखों में जल भर आया था।

उसने बात बदलकर कहा- बेर खाओगे राम..

   राम मुस्कुराए, बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां!

      शबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर लेकर आई और राम के समक्ष रख दिये।

      राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- 

                बेर मीठे हैं न प्रभु?

    यहाँ आकर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है।

    सबरी मुस्कुराईं, बोली- सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम!

     मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को 

       बारंबार सादर चरण वंदन।।

शनिवार, 31 मई 2025

लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर Lokmata Devi Ahilyabai Holkar



केवल तीन मिनट में जानिये महान शासिका  लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की जीवनी। उन की ३००वीं जयन्ती मनायी जा रही है। नीचे के लिंक पर क्लिक करें और देखें.....

https://youtu.be/KaKpBnatPC8

आज का राशिफल ३१ मई २०२५ Aaj Ka Rashifal 31 May 2025

 


अपनी राशि के अनुसार जानिये आज का राशिफल। 

अपना राशिफल इस लिंक पर क्लिक करें और देखें.....


https://youtu.be/qrSPxLVaTwI

शुक्रवार, 30 मई 2025

आतंक के फन को कुचल देंगे, बिहार से मोदी की हुंकार

 


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार में ४८ हज़ार ५०० करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण के बाद जनसभा को सम्बोधित किया और पाकिस्तान को आतंकवाद से परहेज करने की नसीहत दी।

उन्होंने कहा कि भारत की बेटियों के सिन्दूर की शक्ति को आज विश्व देख रहा है। मोदी ने रोहतास जिले के सासाराम में आज आयोजित विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए 'प्राण जाय पर वचन न जाई' का जयघोष किया। पाकिस्तान को सावधान करते हुए कहा कि अगर आतंक का फन निकला तो बिल से खींचकर कुचल देंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने और क्या कहा, सुनने और देखने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें.....

https://youtu.be/_X_Sc-fmvLk?si=Imdlq6rweP69BV_2

बिहार में ४८ हज़ार ५०० करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण किये PM Narendra Modi Inaugrated Mega Projects Of More Than 48 Thousand 500 Crore



बिहार में शुक्रवार, ३० मई २०२५ को प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने४८ हजार ५०० करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं के शिलान्यास व लोकार्पण किये। 

नीचे के लिंक पर क्लिक करें और देखें कि बिहार के किन जिला को किस प्रकार की परियोजना का सीधा लाभ मिला.....

https://m.youtube.com/watch?v=23HtLyPVGOo

आज ३० मई २०२५ का राशिफल Aaj Ka Rashifal 30 May 2025

 


अपनी राशि के अनुसार जानिये आज ३० मई २०२५ (शुक्रवार) का राशिफल। आज का दिन और आज की रात कैसी गुजरेगी?

अपना राशिफल इस लिंक पर जानिये...

https://m.youtube.com/watch?v=vPl5cmIf6N0

बुधवार, 28 मई 2025

प्रख्यात शिक्षक खान सर के विवाह का सच जानिये | Know Fact Of The Marriage Of Famous Teacher Khan Sir | Faizal Khan

 


     बिहार की राजधानी पटना में प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले शिक्षक फैजल खान बिहारी हिन्दी में पढ़ाने के कारण चर्चित हैं। वह 'खान सर' के नाम से विद्यार्थियों के बीच प्रसिद्ध हैं। यूट्यूबर के रूप में भी उन की प्रसिद्धि है।

      खान सर ने अपने विद्यार्थियों के बीच अपनी शादी की बात कही है। इस के बारे में सच जानने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें और देखें.....

https://youtu.be/N9wu_ivSe6A?si=swBgtE9kAWYJUxaZ

      Know Fact Of The Marriage Of Famous Teacher Khan Sir on above link.


खान सर के विवाह का सच जानिये | Know Fact Of The Marriage Of Famous Teacher Khan Sir | Faizal Khan


सोमवार, 19 मई 2025

१७ नेता संसद के रत्न चयनित, २ समितियों को भी सम्मान 17 Leaders Are The Sansad Ratna, 2 Committees Also Honored

भारत का संसद भवन


शीतांशु कुमार सहाय

      भारत में १५ वर्षों से बेहतरीन सांसदों को सम्मानित-पुरस्कृत करने की परम्परा चली आ रही है। इस वर्ष भी सम्मानित होनेवाले सांसदों का चयन कर लिया गया है। संसद में उल्लेखनीय योगदान देनेवाले १७ सांसदों और दो संसदीय स्थायी समितियों को 'संसद रत्न पुरस्कार २०२५' के लिए चुना गया है। ये पुरस्कार संसद में सक्रियता, बहस में भागीदारी, प्रश्न पूछने और विधायी कामकाज में योगदान के आधार पर दिए जाते हैं। यह पुरस्कार प्राइम प्वाइंट फाउण्डेशन की तरफ से शुरू किया गया है। 

      संसद रत्न पुरस्कार की शुरुआत २०१० में हुई थी और यह पुरस्कार उन सांसदों को दिये जाते हैं जो पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने के लिए संसद में सक्रिय रहते हैं।

      इस वर्ष के विजेताओं का चयन जूरी कमेटी ने किया जिस की अध्यक्षता पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष हंसराज अहीर (राष्ट्रीय) ने की। 

४ सांसदों को विशेष सम्मान 

      चार सांसदों को संसदीय लोकतंत्र में उत्कृष्ट और सतत योगदान के लिए विशेष रूप से सम्मानित किया जायेगा। प्राइम प्वाइंट फाउंडेशन के अनुसार, ये चारों सांसद १६वीं और १७वीं लोकसभा में भी संसद में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करनेवालों में शामिल रहे हैं और अपनी मौजूदा कार्यकाल में भी लगातार सक्रिय हैं। 

      ये चारों सांसद हैं-- भर्तृहरि महताब (भाजपा), सुप्रिया सुले (एनसीपी-एसपी), एन. के. प्रेमचंद्रन (आरएसपी) और श्रीरंग अप्पा बारणे (शिवसेना)

१३ सांसदों को  विशिष्ट सम्मान 

      अन्य १३ सांसदों को उन के विशिष्ट संसदीय कार्यों के लिए चुना गया है। इन में कई राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं। इन सांसदों ने संसद में प्रश्न पूछने, चर्चा में भाग लेने और विधेयकों पर सुझाव देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

      इन के नाम इस प्रकार हैं-- स्मिता वाघ (भाजपा),  अरविंद सावंत (शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट), नरेश गणपत म्हास्के (शिवसेना), वर्षा गायकवाड़ (काँग्रेस), मेधा कुलकर्णी (भाजपा), प्रवीण पटेल (भाजपा), रवि किशन (भाजपा), निशिकांत दुबे (भाजपा), बिद्युत बरन महतो (भाजपा), पी. पी. चौधरी (भाजपा), मदन राठौर (भाजपा), सी. एन. अन्नादुरै (डीएमके) और दिलीप सैकिया (भाजपा)।

दो स्थायी समितियाँ भी पुरस्कृत 

     इस वर्ष दो संसदीय स्थायी समितियों को भी संसद रत्न पुरस्कार से नवाजा जाएगा। ये हैं दोनों समितियाँ--

      वित्त पर स्थायी समिति। इस समिति के अध्यक्ष भर्तृहरि महताब (भाजपा) हैं। इस समिति ने वित्तीय नीतियों पर कई प्रभावशाली और व्यावहारिक रपटें संसद में प्रस्तुत की हैं।

      कृषि पर स्थायी समिति। इस समिति के अध्यक्ष चरणजीत सिंह चन्नी (काँग्रेस) हैं। इस समिति ने किसानों की समस्याओं और कृषि सुधारों पर ठोस सुझाव संसद में रखे हैं।