गुरुवार, 26 जुलाई 2018

गुरु पूर्णिमा : गुरु पूजा का विशेष दिन / Guru Poornima : Special Day of Guru Pooja

-शीतांशु कुमार सहाय 
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।। 
गुरु अंतःकरण के अंधकार को दूर करते हैं। आत्मज्ञान के युक्तियाँ बताते हैं। गुरु प्रत्येक शिष्य के अंतःकरण में निवास करते हैं। वे जगमगाती ज्योति के समान हैं जो शिष्य की बुझी हुई हृदय-ज्योति को प्रकट करते हैं। 'गु' का अर्थ है- अंधकार या मूल अज्ञान और 'रु' का अर्थ है- उस का निरोधक। गुरु अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देते हैं। अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जानेवाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता है। जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है, वैसी ही गुरु के लिए भी। गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। आज विश्वस्तर पर जितनी भी समस्याएँ दिखायी  दे रही हैं, उन का मूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
(गीताः ४ / ३४)
इस श्लोक में भगवन ने अर्जुन के माध्यम से हम सब को समझाया है कि उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उन को भली-भाँति दण्डवत्-प्रणाम करने से, उन की सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को भली-भाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे। 
भारत में गुरु पूर्णिमा पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। आषाढ़ की पूर्णिमा को ही 'गुरु पूर्णिमा' कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। वैसे तो देशभर में एक से बड़े एक अनेक विद्वान हुए हैं, परंतु उन में महर्षि वेदव्यास, जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, उन का पूजन आज के दिन किया जाता है। 
इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गये हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था, तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति, अपने सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। 

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

बिछड़ गये गोपाल दास 'नीरज'

-शीतांशु कुमार सहाय
 हिंदी साहित्य जगत के मशहूर गीतकार और कवि गोपालदास नीरज को गुरुवार १९ जुलाई २०१८ की शाम दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया. 94 वर्षीय नीरज को फेफडों में संक्रमण की वजह से बीते मंगलवार की रात आगरा के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था. तबीयत में सुधार नहीं होने की वजह से उन्हें गुरुवार को आगरा से दिल्ली के एम्स में शिफ्ट किया गया, जहां शाम करीब 8 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली.

नीरज के निधन ने हिंदी साहित्य और फिल्मी जगत में शोक की लहर दौड़ गई है. बड़े-बड़े साहित्याकार, फिल्मी दुनिया और कई राजनेताओं ने उन के निधन पर शोक व्यक्त किया है.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन के निधन पर दुख प्रकट करते हुए कहा कि कवि गोपाल दास नीरज की प्रसिद्ध रचनाओं और गीतों को अनंत समय तक भुलाया न जा सकेगा.

नीरज को उन के गीतों के लिए भारत सरकार ने 'पद्मश्री' और 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया था. उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए भी अनेक गीत लिखे और उन के लिखे गीत आज भी गुनगुनाए जाते हैं. हिंदी मंचों के प्रसिद्ध कवि नीरज को उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती पुरस्कार से भी सम्मानित किया था.

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

वीर सावरकर को शत-शत नमन Veer Sawrkar

-शीतांशु कुमार सहाय
जिन की किताब १९०९ में लिखी पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस-1857' (१८५७ : प्रथम स्वातंत्र्य समर') को पढ़कर क्रांतिकारी भगत सिंह प्रेरित हुए और उसे पुनर्मुद्रित कराकर उस की प्रतियाँ जनता में बाँटी, जिन की पुस्‍तक 'हिंदुत्‍व' ने भारतीय राजनीति का परिदृश्‍य बदल दिया, जिन को क्रांतिकारी कार्य के लिए अँग्रेजों ने दो-दो आजन्म कारावास की सजा दी, जिन्‍होंने समाज में व्‍याप्‍त कुरीतियों को खत्‍म करने की मुहिम चलायी-- ऐसे महापुरुष वीर सावरकर को शत-शत नमन! उन का जन्म २८ मई १८८३ को महाराष्ट्र (तत्कालीन बम्बई प्रान्त) के नासिक जिलान्तर्गत भगूर गाँव में हुआ था। उन का पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर थावे स्वाधीनता संग्राम के तेजस्वी सेनानी, महान क्रान्तिकारी, वकील, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, नाटककार, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वे एक ऐसे इतिहासकार भी हैं उन्होंने १८५७  के प्रथम स्वातंत्र्य समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला दिया था। सावरकर कट्टर तर्कसंगत व्यक्ति थे जो सभी धर्मों में रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते थे
* सावरकर दुनिया के अकेले स्वातंत्र्य योद्धा थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली, सजा को पूरा किया और फिर से राष्ट्र जीवन में सक्रिय हो गये।
* वे विश्व के ऐसे पहले लेखक थे जिन की कृति 'द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस-1857' को दो-दो देशों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया। अमर शहीद भगत सिंह ने इस पुस्तक का तीसरा संस्करण अपने पैसों से छपवा कर बंटवाया।
* वे पहले स्नातक थे जिन की स्नातक की उपाधि को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण अँगरेज सरकार ने वापस ले लिया।
* सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के केन्द्र लंदन में उस के विरुद्ध क्रांतिकारी आंदोलन संगठित किया था।
* सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् १९०५ ईस्वी के बंग-भंग के बाद सन् १९०६ में 'स्वदेशी' का नारा दे, विदेशी वस्त्रों की होली जलायी 
* वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय विद्यार्थी थे जिन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना कर दिया। फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया।
* वीर सावरकर ने राष्ट्रध्वज तिरंगे के बीच में धर्मचक्र लगाने का सुझाव सर्वप्रथम ‍दिया था, जिसे राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने माना।
* सावरकर पहले भारतीय थे जिस ने एक अछूत को मंदिर का पुजारी बनाया था।
* उन्होंने ही सब से पहले पूर्ण स्वतंत्रता को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया। वे ऐसे प्रथम राजनीतिक बंदी थे जिन्हें विदेशी (फ्रांस) भूमि पर बंदी बनाने के कारण हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामला पहुँचा।
* वे पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का चिंतन किया तथा बंदी जीवन समाप्त होते ही जिन्होंने अस्पृश्यता आदि कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया।
* दुनिया के वे ऐसे पहले कवि थे जिन्होंने अंदमान के एकांत कारावास में जेल की दीवारों पर कील और कोयले से कविताएँ लिखीं और फिर उन्हें याद किया। इस प्रकार याद की हुई दस हजार पंक्तियों को उन्होंने जेल से छूटने के बाद पुन: लिखा।
* वे प्रथम क्रान्तिकारी थे, जिन पर स्वतंत्र भारत की सरकार ने झूठा मुकदमा चलाया और बाद में निर्दोष साबित होने पर माफी माँगी।

* १९६६ ईस्वी में वीर सावरकर के निधन पर भारत सरकार ने उन के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया। इस महान देशभक्त की मृत्यु २६ फ़रवरी १९६६ ईस्वी को मुम्बई में हुई

बुधवार, 11 जुलाई 2018

गुरु पूर्णिमा (२७ जुलाई २०१८) को सब से लम्बा चन्द्रग्रहण The Longest Lunar Eclipse on Guru Purnima 27 July 2018


-शीतांशु कुमार सहाय
हमलोग २१वीं सदी में हैं २१वीं सदी का सब से लम्बी अवधि का चन्द्रग्रहण आषाढ़ पूर्णिमा को होनेवाला है यह खग्रास चन्द्रग्रहण होगा आषाढ़ पूर्णिमा २०७५ अर्थात २७ जुलाई २०१८ शुक्रवार को है आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा भी कहते हें चन्द्रग्रहण वास्तव में एक महत्त्वपूर्ण खगोलीय घटना है २७ जुलाई २०१८ का चन्द्रग्रहण २१वीं सदी का सब से लंबा चन्द्रग्रहण रहनेवाला है इस की कुल अवधि घंटा १४ मिनट रहेगी जिस में पूर्ण चन्द्रग्रहण (खग्रास) की स्थिति १०३ मिनट ( घंटा ४३ मिनट) तक रहेगी  
ऐसा संयोग १०४ साल बाद बना है गुरु पूर्णिमा का चन्द्रग्रहण संसार के बड़े भाग में दिखायी देगा यह चन्द्रग्रहण नजारा भारत समेत दुबई, अफ्रीका, दक्षिण एशिया, मध्य-पूर्व के देशों, म्यांमार, भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान चीन, नेपाल, अंटाकर्टिक, ऑस्ट्रेलिया में दीखेगा

यह चन्द्र ग्रहण २७ जुलाई की रात ११ बजकर ५४ मिनट से शुरू होकर सुबह के बजकर ४९ मिनट तक रहेगा भारत में चन्द्रग्रहण लगभग रात्रि ११ बजकर ५५ मिनट से स्पर्श कर लगभग बजकर ५४ मिनट पर पूर्ण होगा

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

बराबर पहाड़ी : श्रीकृष्ण और शिव के बीच युद्ध का साक्षी / Barabar Hill : Witness of War between Shrikrishna & Shiva


बाबा सिद्धेश्वरनाथ शिवलिंग 
 -शीतांशु कुमार सहाय
बिहार के गया जिले में स्थित है बराबर पहाड़। ऐतिहासिक दृष्टि से यह पहाड़ काफी महत्त्वपूर्ण है। भगवान श्रीकृष्ण, शिव, पाण्डव और बाणासुर से सम्बन्धित है यह प्राचीन पर्वत है जो अब पहाड़ी के रूप में विराजमान है। पृथ्वी पर यह एकमात्र पहाड़ी है जो भगवान श्रीकृष्ण और शिव के बीच हुए भयंकर युद्ध का साक्षी है। विश्व के गिने-चुने पहाड़ों में बराबर पहाड़ी शामिल है जो खण्डित है, जड़ से चोटी तक पूरी तरह टुकड़ों में बँटा है। यहाँ भगवान शिव सिद्धेश्वरनाथ शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। सालोंभर भक्तों और पर्यटकों से बराबर पहाड़ी गुलजार रहती है। 
बराबर पहाड़ी के टूटे होने की एक कथा प्राचीन भारतीय ग्रन्थ में उपलब्ध है। उस की संक्षिप्त चर्चा मैं यहाँ कर रहा हूँ। वामनरूपधारी भगवान को पृथ्वी दान देनेवाले राजा बलि के सौ पुत्रों में बाणासुर ज्येष्ठ था। उदार, बुद्धिमान व अटल प्रतिज्ञा के लिए प्रसिद्ध बाणासुर भगवान शिव की भक्ति में मग्न रहता था। वह शोणितपुर (वर्तमान असम का तेजपुर) में राज्य करता था। 
भगवान शिव के आशीर्वाद से बाणासुर ने एक हजार भुजाएँ प्राप्त की। हजार भुजा प्राप्त कर वह समूची पृथ्वी पर तहलका मचाने लगा। उस ने कई पर्वतों को अपने हाथों से तोड़ डाला। इसी दौरान उस ने बराबर पहाड़ पर भी प्रहार किया और इसे चूर कर दिया। पूरा पहाड़ छोटे-बड़े चट्टानों के रूप में है। कई विशाल चट्टानें बहुत छोटी चट्टानों पर अवलम्बित हैं, पर आश्चर्य है कि ये गिरते नहीं।   
हजार हाथों के अलावा शिवजी ने अन्य वरदान माँगने को कहा तो बाणासुर ने कहा- आप मेरे किले के पहरेदार बन जायंे। लाचारी में शिव उस के किले के रक्षक बन गये। 
बाणासुर अत्यन्त बलशाली हो गया। उस से कोई राजा या देवता युद्ध करना नहीं चाहते थे। सभी भयभीत रहने लगे। तब बाणासुर ने शिवजी से युद्ध करनी चाही मगर शिष्य होने के कारण शिवजी ने मना कर दिया। उन्होंने बाणासुर को एक ध्वज दिया और कहा कि जिस दिन यह फट जायेगा, उस दिन तुम से युद्ध करनेवाला (श्रीकृष्ण) अवतार लेगा। यह सुन बाणासुर डर गया। उस ने पुनः तपस्या की और अपनी हजार हाथों से कई सौ मृदंग बजाकर शिवजी को प्रसन्न किया और श्रीकृष्ण से युद्ध के दौरान उन के सहयोग व अपने प्राण की रक्षा का वरदान पा लिया।
बाणासुर की एक पुत्री उषा थी। उषा से विवाह के लिए कई राजा आये किन्तु बाणासुर सब को अपमानित कर भगा देता था। एक दिन उषा ने स्वप्न में एक सुन्दर राजकुमार देखा और मन-ही-मन उस से प्रेम करने लगी। यह बात सखी चित्रलेखा को बतायी। चित्रलेखा मायावी थी जो सुन्दर कलाकृति बनाती थी। उस ने माया से उषा की आँखों में झाँका और स्वप्न-दृश्यों को देखकर उस राजकुमार का चित्र बना दिया। चित्रलेखा ने कहा कि यह चित्र श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का है। उषा के आग्रह पर चित्रलेखा ने माया के बल पर द्वारिका से अनिरुद्ध को अदृश्य कर उषा के सामने प्रकट कर दिया। तब दोनों ने ओखिमठ नामक स्थान (केदारनाथ के पास) में विवाह किया, जहाँ आज भी उषा-अनिरुद्ध नाम से एक मन्दिर है। बाणासुर ने अनिरुद्ध और उषा को कैद कर लिया। 
अन्ततः श्रीकृष्ण और बलराम ने बाणासुर पर हमला कर दिया। भयंकर युद्ध हुआ। बाणासुर की तरफ से भगवान शिव भी श्रीकृष्ण से युद्ध किये। श्रीकृष्ण ने बाणासुर के छियानबे हाथों को काट डाले। तब बाणासुर ने उषा-अनिरुद्ध का विवाह कर दिया और सब सुखी-सुखी रहने लगे।

बाणासुर का राज्य विस्तार

बाणासुर को अधिकतर ग्रन्थों में शोणितपुर का शासक बताया गया है। पर, कुछ ग्रन्थों में उस के शासन क्षेत्र का विस्तार भी बताया गया है। उत्तर में बामसू (वर्तमान उत्तराखण्ड का लमगौन्दी), मध्य भारत में बाणपुर (मध्यप्रदेश) में भी बाणासुर का राज था। बाणासुर बामसू में रहता था। बाणासुर को आज भी उत्तराखण्ड के कुछ गाँवों में पूजा जाता है। बाणासुर का राज्य विस्तार वर्तमान उत्तराखण्ड में भी था। अतः बाणासुर के नाम से एक पर्वत ‘वारणावत पर्वत’ उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जिले में भी है। जिस प्रकार बराबर पहाड़ी पर सिद्धेश्वरनाथ शिवलिंग हैं, वैसे ही वारणावत पर्वत पर विमलेश्वर महादेव का मन्दिर है।
शिवभक्त बाणासुर से सम्बन्धित ‘वारणावत’ नाम का स्थान भी है जो ग्रन्थ में प्रसिद्ध है। ‘महाभारत’ के अनुसार, वारणावत में ही पाण्डवों को जलाकर भस्म कर देने के लिए  दुर्योधन ने लाक्षागृह बनवाया था। युधिष्ठिर ने जिन पाँच ग्रामों को युद्ध से पूर्व दुर्योधन से माँगा था, उन में से एक वारणावत भी था। महाभारत के आदिपर्व में वर्णन है कि वारणावत में शिवोपासना से सम्बन्धित भारी मेला लगता था, जिसे ‘समाज’ कहा जाता था। इस प्रकार के ‘समाजों’ का उल्लेख अशोक के शिलालेख संख्या एक में भी है। माना जाता है कि शिवभक्त बाणासुर यहाँ शिवोपासना से सम्बन्धित मेले का आयोजन करवाता था। वर्तमान उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ जिलान्तर्गत ‘बरनावा’ स्थान ही प्राचीन वारणावत है। हिण्डन और कृष्णा नदी के संगम पर मेरठ नगर से 15 मील दूर बरनावा स्थित है।

नामकरण

बराबर पहाड़ी का वर्णन ग्रन्थों में ‘बाणावर्त पर्वत’ के नाम से है। यह नामकरण शोणितपुर के राजा बाणासुर के नाम पर पड़ा। कालान्तर में यह अपभ्रन्शित होकर ‘बराबर पहाड़’ हो गया। ऊँचाई कम होने के कारण इसे अब पहाड़ी कहा जाता है- बराबर पहाड़ी। 

सात गुफाएँ   

बराबर पहाड़ी में सात प्राचीन गुफाएँ हैं। ये विस्तृत प्रकोष्ठों के रूप में निर्मित हैं। तीन गुफाओं में मौर्य वंश के प्रसिद्ध शासक अशोक के अभिलेख अंकित हैं। अभिलेख से विदित होता है कि अशोक ने वन और पर्वत के बीच गुफाओं का निर्माण परिभ्रमण करनेवाले भिक्षुओं के ठहराव के लिए करवाया था। बराबर पहाड़ी की दो गुफाएँ अशोक द्वारा शासन के 12वें वर्ष और 19वें वर्ष में भिक्षुओं को दान में दी गयी थीं। तीन गुफाओं का आकार बड़ा है- कर्णचौपार, विश्वझोपड़ी और सुदामा गुफा। गुफा की दीवारें अब भी काफी चिकनी हैं। एक गुफा में अन्दर बेंच की तरह ऊँचा बैठने का स्थान है। बताया जाता है कि उस पर परिव्राजक साधु टोली के प्रमुख (गुरु) बैठते थे और शिष्यगण नीचे बैठकर उन से निर्देश लेते या ध्यान करते थे। एक ‘लोमस ऋषि गुफा’ है जो लोमस ऋषि से सम्बन्घित है।
विशाल गुफा 
बड़ी गुफा के अन्दर सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता। ऐसे में यह शोध का विषय है कि आखिर राजा अशोक के समय धुआँरहित वह कौन-सी प्रकाश व्यवस्था थी, जिस के प्रकाश में गुफा के अन्दर की निर्माण प्रक्रिया पूरी की गयी।
यहाँ मैं ने एक अधूरे निर्माणवाला गुफा भी देखा। प्रवेश द्वार से दो-तीन फीट तक गुफा की आन्तरिक दीवारें चिकना कर दी गयी हैं और शेष भाग पर पत्थर काटे जाने के निशान बरकरार हैं। इन के बारे में कहा जाता है कि निर्माण के दौरान अशोक के शासन काल की समाप्ति हो गयी और गुफा अधूरी रह गयी। 

मनोरम वातावरण

यहाँ मनोरम व प्रदूषणरहित वातावरण है। प्राकृतिक छटाओं से परिपूर्ण बराबर पहाड़ी पर्यटकों को आकर्षित करती है। यहाँ वर्षभर पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। बराबर पहाड़ी की प्राकृतिक वादियाँ, पाताल गंगा, नौका विहार, ऐतिहासिक व पुरातात्त्विक महत्त्ववाली गुफाएँ और झरना पर्यटकों को खूब आकर्षित करती हैं। झरने का जल अत्यन्त शुद्ध है, जिसे यहाँ के लोग पीते हैं। 

बाबा सिद्धेश्वरनाथ

बराबर पहाड़ी की चोटी पर भगवान शिव सिद्धेश्वर शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। बाबा सिद्धेश्वरनाथ का मन्दिर काफी लोकप्रिय है। यहाँ सालों भर जलाभिषेक करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। ‘शिवपुराण’ में कहा गया है कि भगवान शिव के नौ रूपों में ‘सिद्धनाथ’ का सर्वाेच्च स्थान है। यह साधना का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सिद्धेश्वरनाथ या सिद्धनाथ मन्दिर के गर्भ गृह का प्रवेश द्वार छोटा है जिस में झुककर अन्दर जाना पड़ता है। शिवलिंग के अलावा यहाँ आदिशक्ति का दुर्गा रूप और हनुमान की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। पहाड़ी के नीचे भी एक मन्दिर स्थानीय श्रद्धालुओं ने दशकों पूर्व स्थापित की है।

पहाड़ी के अन्दर मन्दिर

कहा जाता है कि बाणासुर ने बराबर पहाड़ी के अन्दर शिवलिंग स्थापित किया था। वह उस शिवलिंग की पूजा प्रतिदिन करने आता था। पहाड़ी के एक छोर से अन्दर की तरफ विशाल गुफा है जो जंगलों से अटा पड़ा है। यही अन्दर जाने का रास्ता है जहाँ बाणासुर द्वारा स्थापित शिवलिंग है। अन्दर अब तक किसी के जाने का प्रमाण नहीं मिला है।

आये थे श्रीकृष्ण संग पाण्डव

कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव (पाण्डव) के साथ भगवान श्रीकृष्ण बराबर पहाड़ी के क्षेत्र में आये थे। परिभ्रमण के दौरान श्रीकृष्ण को प्यास लगी। तब अर्जुन ने धरती में तीर मारकर भूगर्भ जल को प्रकट किया। जहाँ अर्जुन ने तीर चलाया था, पहाड़ी पर वह स्थान आज भी गड्ढे के रूप में बरकरार है। पाताल गंगा के झरने का जल अब भी अत्यन्त शुद्ध है, जिसे पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
 टुकड़ों में बँटी पहाड़ी 

सुविधाएँ विकसित

सरकार द्वारा इस स्थल को अन्तरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए कई तरह की आधुनिक सुविधाएँ बहाल करायी गयी हैं। अब पाताल गंगा के निकट अत्याधुनिक संग्रहालय बनाया गया है। साथ ही कैफिटेरिया, सुदामा मार्केट कॉम्प्लेक्स, जल नौकाओं की सुविधा, अतिथिशाला और बाबा सिद्धनाथ मन्दिर तक जाने-आने के लिए सीढ़ियों का निर्माण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। 

पहुँच पथ

बिहार की राजधानी पटना से बराबर पहाड़ी की दूरी सड़क मार्ग से करीब 65 किलोमीटर है। भाड़े की गाड़ी या अपनी गाड़ी से यहाँ पहुँचा जा सकता है। रेलमार्ग से आने के लिए पटना जंक्शन से वैसी ट्रेन को पकड़ें जो पटना-गया रेलमार्ग से जाती हो और बेलागंज स्टेशन या बराबर हॉल्ट पर रूकती हो। यहाँ उतरकर भाड़े की गाड़ी से बराबर पहाड़ी तक पहुँच सकते हैं। यहाँ ठहरने के लिए सरकारी अतिथिशाला बना है। यहाँ खाने-पीने के सामान उचित मूल्य पर उपलब्ध हैं।