शनिवार, 3 मई 2014

नारीलता वृक्ष पर खिलते हैं महिला के आकार के फूल / NAREELATA

-शीतांशु कुमार सहाय
प्रकृति इतने आश्चर्यों से भरी है कि इसके सभी रहस्यों को जान पाना साधारण मनुष्य के वश की बात नहीं है। एक ऐसा वृक्ष है जिसपर स्त्री के आकार के फूल लगते हैं। दूर से देखने पर ऐसा लगता है कि कई छोटी स्त्रियाँ पेड़ पर लटक रही हैं। यह पेड़ भारत के हिमालीय क्षेत्रों में भी पाया जाता है। इसके अलावा थाईलैण्ड व श्रीलंका में भी यह वृक्ष मिलता है। इसे आकार के आधार पर ‘नारीलता’ की संज्ञा दी गयी है। नारीलता वृक्ष पर 20 साल के अंतराल में फूल खिलते है। इन फूल से बननेवाले फल को देखकर आप आश्चर्य चकित हो जाएंगे। इन फूलों का आकार देखने में महिला के जैसे होता है। जी हां हम बात कर रहे है नारीलता वृक्ष की, जिस पर 20 वर्ष के अंतराल में फूल खिलते है। यह फूल दिखने में नारी के आकार के दिखाई देते है। यह वृक्ष हिमालय की चोटियों में पाए जाते है। आपने कई बार सुना होगा कि प्रकृति के भी कई रूप होते है। इस प्रकृति को समझने वाला आज तक कोई प्राणी नहीं बना है। हां यह सत्य है प्रकृति जब अपने अलग-अलग रूप दिखाती है तो मानव भी आश्चर्य चकित हो जाता है। यह फूल भी उसी का एक हिस्सा है जिसे देखकर सभी आश्चर्यचकित हो जाते है। नारीलता फूल का वृक्ष भारत में हिमालय क्षेत्र में पाया जाता है। यह 20 साल के अंतराल पर खिलते हैं। यह फूल एक औरत के आकार का होता है, यह एक दुर्लभ फूल है और आश्चर्यजनक!  इस अनोखे फूल को देखिए, इसका आकार देखिए इसकी बनावट को देखिए शायद आपको पेड़ो पर यह लटकी हुई गुडिया सी दिखाई दे रही। किसी इंसान की इंसानी हरकत लगे लेकिन है ऐसा नहीं। यह हिमालय श्रीलंका तथा थाईलैंड में एक पेड में लगने वाला फूल है जिसे ऊपरी हिमालय में नारीलता फूल कहा जाता है। 
नारीलता नामक इस वृक्ष पर अनोखे फूल खिलते हैं, जिनकी बनावट महिला जैसी होती है। फूलों की बनावट के कारण ही इसे नारीलता नाम दिया गया है।कुछ नारीलता वृक्षों पर बच्चों के आकार के फल लगते भी देखे गये हैं।
आप देखिये चित्रों में नारीलता वृक्ष को-

यह फूल हाबेनरिया प्रजाति का है। हाबेनरिया की सभी प्रजातियों के फूल ट्यूबर युक्त स्थलीय ऑर्किड होते हैं। ये फूल श्रीलंका में लियाथाबरा माला नाम से जाना जाता है, जिसकी 10 प्रजातियां है। वहीं थाईलैंड में इस फूल के पौधे को नारीपोल कहा जाता है। 


3 मई : विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस या विश्व प्रेस दिवस / 3 MAY : WORLD PRESS FREEDOM DAY OR WORLD PRESS DAY


-शीतांशु कुमार सहाय
आज 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है। भारत में अक्सर प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चर्चा होती रहती है। पर, अफसोस की बात है कि नरेन्द्र मोदी या किसी अन्य भारतीय नेता ने मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने पर कुछ नहीं कहा। इसपर कहने के लिए नेतागण आदर्श आचार संहिता की दुहाई दे सकते हैं कि इसी कारण ज्यादा नहीं बोला। पर, अन्य कथित विकासवादी आश्वासनों के लिए तो आदर्श आचार संहिता आड़े नहीं आ रहा है। ऐसे में भारतीय पत्रकारों ने अपने हक को मारनेवाले अखबारों के मालिकों को दुखी दिल से ‘दुहाई’ दते हुए विश्व प्रेस स्वतन्त्रता दिवस मनाया।
3 मई को मनाए जाने वाले विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भारत में भी प्रेस की स्वतंत्रता पर बातचीत होना लाजिमी है। भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुच्छेद-19 में भारतीयों को दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार से सुनिश्चित होती है। विश्वस्तर पर प्रेस की आजादी को सम्मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया जिसे विश्व प्रेस दिवस के रूप में भी जाना जाता है। यूनेस्को द्वारा 1997 से हर साल 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर गिलेरमो कानो वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम प्राइज भी दिया जाता है। यह पुरस्कार उस व्यक्ति अथवा संस्थान को दिया जाता है जिसने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए उल्लेखनीय कार्य किया हो। वर्ष 2014 का गिलेरमो कानो वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम पुरस्कार तुर्की के अहमत सिक को दिया जाएगा। 1997 से अब तक भारत के किसी भी पत्रकार को यह पुरस्कार नहीं मिलने की एक बड़ी वजह कई वरिष्ठ पत्रकार पश्चिम और भारत में पत्रकारिता के मानदंडों में अंतर को बताते हैं। भारतीय पत्रकारिता में हमेशा विचार हावी होता है जबकि पश्चिम में तथ्यात्मकता पर जोर दिया जाता है। इससे भारतीय पत्रकारिता के स्तर में कमी आती है। इसके अलावा भारतीय पत्रकारों में पुरस्कारों के प्रति जागरूकता की भी कमी है वे इसके लिए प्रयासरत नहीं रहते।
नरेंद्र मोदी की शुभकामना व अपने भाषण पर ऐतराज....
दूरदर्शन पर अपने साक्षात्कार पर उठे विवाद के बीच भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने आज शनिवार (3 मई) को अहमदाबाद में सार्वजनिक प्रसारक में पत्रकारिता संबंधी स्वतंत्रता में ‘कमी’ आने का जिक्र किया और इसे वर्ष 1975 में आपातकाल की भयावह स्मृतियों से जोड़ा। मोदी ने अपने साक्षात्कार में काट-छांट पर उठे वाकयुद्ध में शामिल होते हुए यह बात कही। पिछले रविवार को दूरदर्शन पर प्रसारित उनके साक्षात्कार के कुछ अंशों को हटा दिया गया था और इसके देर से प्रसारित करने पर भी विवाद खड़ा हो गया। आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर पत्रकारों को शुभकामना देते हुए मोदी ने ट्विटर पर लिखा-- इस दिन मैं यह देखकर दुखी हूं कि हमारा राष्ट्रीय टीवी चैनल (दूरदर्शन) अपनी पेशेवर स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। इस अवसर पर मोदी लोगों को यह याद दिलाना नहीं भूले कि 1975 में दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाया गया था और तब मीडिया पर प्रतिबंध लगाए गए थे। मोदी ने एक अन्य ट्वीट में कहा कि पत्रकार बंधुओं को विश्व प्रेस दिवस पर शुभकामनाएं। स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र का मील का पत्थर है और इसे सही अर्थों में बनाए रखा जाना चाहिए। ऐसी खबरें आने के बाद विवाद उत्पन्न हो गया था जिसके अनुसार, मोदी ने कहा था कि प्रियंका गांधी उनकी बेटी के समान है। इसे न तो प्रियंका और न ही कांग्रेस ने सराहा था। लेकिन बाद में यह बात सामने आई कि मोदी ने ऐसी बात नहीं कही थी। एक अन्य बयान पर विवाद उत्पन्न हुआ जिसमें मोदी ने सोनिया गांधी के करीबी सहयोगी अहमद पटेल से अपनी निकटता होने का जिक्र किया था। पटेल ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया था। साक्षात्कार में मोदी की इन बातों को काट दिया गया, लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से यह बात सार्वजनिक हो गई।
भाजपा का निशाना....
भाजपा ने दूरदर्शन तथा सूचना व प्रसारण मंत्री पर निशाना साधते हुए उन पर बातचीत के तथ्यों को दबाने का आरोप लगाया। इस विवाद पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाजपा नेता वेंकैया नायडू ने कहा कि प्रसार भारत अब ‘प्रचार भारती’ बन गया है। पिछले आठ वर्षों से उन्होंने मोदी को निषेध करके रखा। उन्होंने मांग की कि इस बारे में श्वेतपत्र जारी किया जाए कि चुनाव से 100 दिन पहले कांग्रेस नेताओं और मोदी को कितना कवरेज दिया गया। इससे प्रसार भारती के दुरूपयोग की बात सामने आ जाएगी।
प्रसार भारती के सीईओ जवाहर सरकार ने कहा.....
प्रसार भारती के सीईओ जवाहर सरकार ने कल प्रसार भारती की स्वयत्तता के मुद्दे पर तिवारी पर निशाना साधा था। सरकार ने कहा था कि मंत्रालय ने एक युवा मंत्री को यह समझाने का मौका गंवा दिया, जिससे मंत्रालय और समाचार प्रकोष्ठ के बीच ल3बे पारंपरिक संबंधों को तोड़ा जा सके और जो प्रसार भारती के शुरू होने से पहले से निर्बाध रूप से जारी है।
सूचना व प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा.....
इस विषय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सूचना व प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि मेरा ध्यान इन खबरों पर दिलाया गया, जो प्रसार भारती के संबंध में मीडिया के एक वर्ग में आई है। मैंने पहले भी कहा है और फिर यह कहने की अनुमति चाहता हूं कि संसद के कानून के तहत प्रसार भारती की स्वायत्ता की गारंटी दी गई है। उन्होंने कहा कि प्रसार भारती का संचालन बोर्ड करता है और सूचना व प्रसारण मंत्रालय इससे कुछ फासला बनाकर आगे चलता है। वास्तव में जहां तक स्वायत्ता का सवाल है, जब मैंने अक्टूबर 2012 में मंत्रालय का कार्यभार संभाला तब मेरे और तत्कालीन सचिव उदय कुमार वर्मा की पहल से सैम पित्रोदा समिति का गठन किया गया था। कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि इस मुद्दे पर राई का पहाड़ बनाने की कोशिश की जा रही है, जबकि कुछ विश्लेषकों का आरोप है कि जब भी मौका मिलता है तब कांग्रेस और भाजपा दूरदर्शन का दुरूपयोग करते हैं। कांग्रेस के अल्वी ने कहा कि यह बडा मुद्दा नहीं है। साक्षात्कार का प्रसारण, समय व मुद्दे मीडिया की स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है।

मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने के लिए मध्य प्रदेश सरकार सक्रिय / MP GOVERMENT ACTIVE FOR MAJITHIA WAGES


मध्य प्रदेश के श्रम आयुक्त ने प्रदेश के सभी जिला श्रम अधिकारियों को एक नोटिस जारी किया है. इसमें कहा गया है कि सभी जिला श्रम अधिकारी अपने-अपने जिले में पत्रकारों और गैर-पत्रकारों के लिए गठित मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराएं. श्रम आयुक्त द्वारा जारी नोटिस में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत पत्रकारों और गैर-पत्रकारों को 11 नवंबर 2011 से एरियर और 1 अप्रैल 2014 से नया संशोधित वेतनमान का भुगतान किया जाए. एक वर्ष के अंदर चार किश्तों में एरियर की राशि का भुगतान किया जाए. सर्कुलर में यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत अखबार मैनेजमेंट मीडियाकर्मियों को वेतन भुगतान संबंधी दावे पेश नहीं करता तो उसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन माना जाएगा. यह अपराध है. ऐसा करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही होगी. श्रम आयुक्त ने कहा है कि 30 अप्रैल 2014 तक मध्य प्रदेश के सभी अखबारों को भुगतान का पूरा विवरण देना होगा.(http://bhadas4media.com)
देखिये श्रमायुक्त के आदेश की प्रति----



शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

पहली बार अरविंद केजरीवाल ने माना कि दिल्ली की सरकार से इस्तीफा देना गलत था / Resignation from Delhi Goverment was Wrong : Arvind Kejriwal

केजरीवाल ने दावा किया कि 'आप' निश्चित तौर पर 2 सीटें- वाराणसी और अमेठी जीतेगी।


आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने माना कि दिल्ली की सरकार से इस्तीफा देने का समय गलत था। एक अखबार से बात करते हुए केजरीवाल ने पहली बार यह स्वीकार किया है कि उन्हें दिल्ली की सरकार से किसी बेहतर समय पर इस्तीफा देना चाहिए था। केजरीवाल ने माना है कि इस्तीफा देने का फैसला ज्यादा जोश में आकर लिया गया इसके लिए किसी बेहतर मौके की तलाश करनी चाहिए थी। केजरीवाल ने पहली बार यह भी माना कि जिस वक्त कांग्रेस और बीजेपी ने जन लोकपाल बिल पर विरोध किया उसी रात उन्होने इस्तीफा देने का मन बनाया था लेकिन यह उनकी गलती थी,हालांकि अब उन्हें इसका कोई दुख या खेद नहीं नहीं है। अरविंद मानते हैं कि इस्तीफा देने का फैसला उसी रात नहीं करना चाहिए था। केजरीवाल अपनी पार्टी का प्रचार करने पंजाब और अमृतसर जा रहे थे इसी दौरान उन्होने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में इस बात का खुलासा किया।
इस्तीफे पर बोले केजरीवाल----
मुख्यमंत्री पद छोड़ने का उन्हें कोई मलाल नहीं है, लेकिन उन्हें लगता है कि जिस दिन कांग्रेस और बीजेपी ने उनके जनलोकपाल विधेयक को रोका, उन्हें उसी दिन इस्तीफ़ा नहीं देना चाहिए था।
कुछ और वक्त लेना चाहिए था----
केजरीवाल ने इंटरव्यू में कहा, मुझे लगता है कि हमें अपने फैसले के पीछे का कारण बताने के लिए जनसभाएं करने के लिए कुछ और दिन लेने चाहिए थे और उसके बाद सरकार छोड़ी जा सकती थी। अब भविष्य की चिंता-केजरीवाल ने कहा कि अब आम आदमी पार्टी को अपने फ़ैसलों के प्रति भविष्य में सजग रहने की ज़रूरत है।
कांग्रेस बीजेपी ने भुनाया मौका----
अरविंद ने कहा, ''हमारे फ़ैसले और जनता के साथ संवादहीनता की वजह से कांग्रेस और भाजपा ये प्रचार करने में कामयाब रहे कि हम दिल्ली छोड़ कर भाग गए हैं।'' यह वजह है कि कांग्रेस और बीजेपी आम आदमी पार्टी पर ज़िम्मेदारी से बचने का आरोप लगाते रहे हैं।
आप के समर्थकों की संख्या घटी----
आप' ने मिडल क्लास के अपने समर्थन को नुकसान पहुंचाया है। इस सवाल पर केजरीवाल का जवाब था कि 'दो तरह के लोग सरकार से इस्तीफा देने से निराश हुए हैं। पहली कैटिगरी हमारे पक्के समर्थकों की है जो सरकार में हमारे काम को मानते हैं और हमारे लिए वोट करना जारी रखेंगे। दूसरी कैटिगरी उन लोगों की है जो अरविंद केजरीवाल को सीएम और मोदी को पीएम देखना चाहते हैं। इस कैटिगरी के लोग इस बात को हजम नहीं कर पा रहे कि मैंने मोदी को सीधी टक्कर दी है और ये लोग मुझसे काफी गुस्सा हैं। हमें ये समर्थक कभी भी वापस नहीं मिलेंगे, लेकिन इनकी संख्या काफी कम है।'
बीजेपी 180 से कम सीटें जीतेगी----
केजरीवाल लोकसभा चुनाव में ''आप' की संभावनाओं को लेकर पॉजिटिव नजर आए। उनका कहना था कि बीजेपी 180 से कम सीटें जीतेगी और 272 के आंकड़े से काफी पीछे रहेगी, जो बीजेपी के नेता नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक करियर के लिए घातक होगा। उन्होंने बताया, 'मेरी गणना कहती है कि बीजेपी 180 से कम सीटें जीतेगी और मोदी इस देश के प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे।''
वाराणसी और अमेठी जीतेंगे----
केजरीवाल ने दावा किया कि 'आप' निश्चित तौर पर 2 सीटें- वाराणसी और अमेठी जीतेगी।

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

मजीठिया वेतन आयोग के विरोधवाला पुनर्विचार याचिका खारिज : पत्रकारिता जगत का काला दिन / Majithia Wage Commission Opposed Petition Dismissed : Black day for the World of Indian Journalism


-शीतांशु कुमार सहाय
आज अर्थात् 9 अप्रैल 2014 का दिन भारतीय पत्रकारिता जगत में ‘काला दिन’ के रूप में दर्ज हो गया। इस दिन पत्रकारों, पत्रकारिता जगत और मीडिया घरानों को प्रभावित करनेवाले अतिमहत्त्वपूर्ण घटना घटी। पर, अत्यन्त अफसोस की बात है कि इस समाचार को देश के सभी समाचार पत्रों ने अपनी सुर्खियों से हटा दिया। यों कहें कि इसे किसी ने तरजीह ही नहीं दी। इस समाचार को प्रकाशित या प्रसारित ही नहीं किया गया। पत्रकारिता के इस अन्धेरगर्दी में ‘जनसत्ता एक्सप्रेस’ व ‘भड़ांस4मीडिया’ जैसे कुछ सितारे भी हैं जिन्होंने इसे अपने वेबपोर्टल पर इसे छापा।
मैं जिस अतिमहत्त्वपूर्ण समाचार की बात कर रहा हूँ, वह समाचार माध्यमों में कार्यरत पत्रकारों व गैर पत्रकारों को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार वेतन, भत्ते व छुट्टियाँ आदि का लाभ देने से सम्बन्धित है। दरअसल, 7 अप्रैल 2014 को सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि देश के सभी छोटे-बड़े मीडिया घरानों को अपने पत्रकारों व गैर पत्रकारों को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार वेतन, भत्ते व छुट्टियाँ आदि का लाभ अप्रैल 2014 से देना पड़ेगा। साथ ही न्यायालय के आदेश के अनुसार यह वेतन आयोग 11 नवंबर 2011 से लागू होगा जब इसे सरकार ने पेश किया था और 11 नवंबर 2011 से मार्च 2014 के बीच बकाया वेतन भी पत्रकारों को एक साल के अंदर चार बराबर किस्तों में दिया जाएगा। इसके साथ ही मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिश के अनुसार अप्रैल 2014 से नया वेतन लागू किया जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय के 7 फरवरी वाले आदेश पर कुछ मीडिया घरानों एबीपी प्रा.लि., इंडियन एक्सप्रेस लिमिटेड, इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी, प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, राजस्थान पत्रिका प्रा. लिमिटेड, उषोदया पब्लिकेशंस और द प्रिंटर्स (मैसूर) प्रा.लि. आदि ने पुनर्विचार याचिका दायर कर दी। इसे आज यानि 9 अप्रैल 2014 को सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के याग्य न करार देते हुए खारिज कर दिया। इस समाचार को किसी भी अखबार ने तरजीह नहीं दी और  9 अप्रैल 2014 को ‘पत्रकारिता जगत का काला दिन’ सिद्ध कर दिया। आखिर ऐसे अखबार किस मुँह से पाठकों के बीच अपने को स्वच्छ व निष्पक्ष साबित करते हैं! उनकी पक्षपात तो जगजाहिर हो गयी। क्या ऐसे समाचार माध्यमों के समाचारों पर पूरी तरह विश्वास करना चाहिये ???
जनसत्ता एक्सप्रेस में समाचार---        
''मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर फैसले पर पुनर्विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे अखबार मालिकों को करारा झटका लगा है। इस मामले को लेकर दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर माननीय मुख्य न्यायमूर्ति पी. सथशिवम की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने आज संक्षिप्त सुनवाई के बाद करीब दो बजे खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय प्रिंट मीडिया और समाचार एजेंसियों से जुड़े कर्मचारियों के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी है। वेतन वृद्धि और एरियर को लेकर टालमटोल कर रहे मालिकान के लिए अब इससे बचने का कोई कानूनी रास्ता नहीं रहा गया है। दो दिन से इस पर मीडया से जुड़े सभी लोगों की नजरें लगी हुई थीं। इस पीठ के दो अन्य न्यायाधीशों में रंजन गोगोई और शिवा कीर्ति सिंह शामिल रहे। याचिका दाखिल करने वालों में आनंद बाजार पत्रिका निकालने वाले समूह एबीपी प्रा.लि., इंडियन एक्सप्रेस लिमिटेड, इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी, प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, राजस्थान पत्रिका प्रा. लिमिटेड, उषोदया पब्लिकेशंस और द प्रिंटर्स (मैसूर) प्रा.लि. के नाम शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा कदम से अखबारों, पत्रिकाओं और समाचार एजेंसियों में कार्यरत पत्रकारों और गैर-पत्रकारों को अपने बढ़े वेतन एवं एरियर के लिए अब और इंतजार नहीं करना पड़ेगा।''
जनसत्ता एक्सप्रेस ने समाचार को छापने के बाद नीचे में लिखा- ''आपको बता दें कि मजीठिया वेजबोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी 2014 को फैसला सुनाया था कि इसे संस्थान लागू करें। पर अखबार मालिकों ने मिलकर इसे न लागू कराने का प्लान बनाया और उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा पर वहां से उन्हें निराशा हाथ लगी है। सो सभी मीडियाकर्मियों को एक बार बधाई...।''
....और मेरी तरफ से समाचार छापने पर बधाई!

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

राँची : रामनवमी पर शोभायात्रा व रामलीला / RAMNAVAMI AT RANCHI


-शीतांशु कुमार सहाय
आज रामनवमी है। आप सबको रामनवमी की हार्दिक बधाई!

रामनवमी के अवसर पर राँची के अलबर्ट एक्का चौक पर रामलीला का आयोजन किया गया।

इस दौरान भगवा ध्वजों के साथ हजारों श्रद्धालुओं ने शोभायात्रा निकाली। शोभायात्रा में कई झाँकियाँ भी शामिल की गयीं।

तैंतीस करोड़ नहीं, तैंतीस प्रकार के देवता / No 33 Crore, 33 Types of Devata


-शीतांशु कुमार सहाय

चित्र में आदिशक्ति द्वारा त्रिदेवों की उत्पत्ति

सनातन धर्म के बारे में बनी व प्रचलित अधिकतर अवधारणाएँ विवादित हैं। वास्तव में वैसी अवधारणाएँ ही विवादित हैं, जिनका आधार वेद पर आधारित नहीं है। सुनी-सुनायी बातों पर कोई विचार बना लेने से ही विवाद का जन्म होता है। वास्तव में अधिकतर लोग वेदों को पढ़े बिना ही सनातन धर्म पर तर्क प्रस्तुत कर देते हैं। यह गलत है। वेदों को पढ़ें और उसके तथ्यों को गम्भीरता से समझें और तब विचार व्यक्त करें। अधिकतर हिन्दुओं ने वेद नहीं पढ़ी, जो उनकी सबसे बड़ी भूल है।
मेरे एक मुसलमान मित्र तौहीद अनवर ने बताया- आपके धर्म में वेद, रामायण, गीता आदि पढ़ना दकियानूसी विचारधारा का प्रतीक माना जाता है। जीवन गुजर जाती है पर वेद के चन्द पन्ने भी पढ़ नहीं पाते। मित्र ने आगे कहा- आप जिस पण्डित या ब्राह्मण को धर्म व धर्मग्रन्थ का प्रतीक मानते हैं, वह भी जीवन में एक बार भी वेद आदि नहीं पढ़ा। यदि पढ़ा होता तो चन्द रुपयों के लिए पूजा करवाने से आना-कानी नहीं करता या किसी मन्दिर आदि में प्रवेश से पहले पैसे की वसूली के लिए छीछालेदर नहीं करता। मित्र अविराम बोले जा रहा था- इस्लाम में नैतिक नियम बना दिया गया है कि बच्चे पाँच-दस वर्ष की अवस्था में कम-से-कम एक आवृत्ति कुरानशरीफ अवश्य पढ़ें और उसका अर्थ मौलवी या किसी जानकार से समझे। पर, आपके धर्म में बच्चे को वेद, रामायण या गीता आदि पढ़ने का कोई नियम नहीं है। यदि कोई अपने पुत्र या पुत्री को ऐसा करवाता भी है तो आपका समाज उसे पुरानपंथी कहकर चिढ़ाता है। यदि ग्रन्थों को पढ़ने की परम्परा रहती तो हिन्दुओं में इतनी भ्रान्तियाँ नहीं आतीं।
मैं मित्र की बात सुनकर अवाक् रह गया। वास्तव में स्थिति का बिल्कुल सही आकलन किया था तौहीद ने। वास्तव में तौहीद का बड़ा भाई मेरा मित्र है। इस लिहाज से वह मुझे भैया कहता है। तौहीद हिन्दी और उर्दू में पुस्तकों का लेखन भी करता है और पेशे से शिक्षक है।
सनातन धर्म की एक भ्रान्ति यह भी है कि लोग मानते हैं कि इस धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवता हैं। अन्य धर्मवालों को छोड़ दीजिये, सनातनधर्मी अर्थात् हिन्दू भी यही मानते हैं। घोर आश्चर्य है कि इस भ्रान्ति को वेद पढ़े बिना ही प्रचारित कर दिया गया अथवा गलत अर्थ लगाकर भ्रान्ति फैलायी गयी। वास्तव में ‘कोटि’ शब्द का अर्थ ‘करोड़’ ही नहीं ‘प्रकार’ भी होता है। वेद में 33 प्रकार के देवताओं की चर्चा है, 33 करोड़ की नहीं। यहाँ जानिये कि उच्चकोटि का अर्थ ऊँचा करोड़ नहीं, अच्छा प्रकार होता है। वेदों का तात्पर्य तैंतीस कोटि अर्थात तैंतीस प्रकार के देवी-देवताओं से है। इन प्रकारों में हजारों देवी-देवता शामिल हैं। पर, सनातन धर्म एक ही आदिशक्ति की उपासना करने को प्ररित करता है। धार्मिक ग्रंथों में साफ-साफ लिखा है-- ''निरंजनो निराकारो एको देवो महेश्वरः'' अर्थात इस ब्रह्माण्ड में सिर्फ एक ही देव हैं जो निरंजन निराकार महादेव हैं। साथ ही यहाँ एक बात ध्यान में रखने योग्य बात है कि हिन्दू सनातन धर्म मानव की उत्पत्ति के साथ ही बना है और प्राकृतिक है, इसीलिए हमारे धर्म में प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीना बताया गया है।
प्रकृति में भगवान---
प्रकृति को भी भगवान की उपाधि दी गयी है; ताकि लोग प्रकृति के साथ खिलवाड़ न करें। जैसे :- गंगा को देवी माना जाता है; क्योंकि गंगाजल में सैकड़ों प्रकार की हिमालय की औषधियां घुली होती हैं। गाय को माता कहा जाता है; क्योंकि गाय का दूध अमृत है और गोबर एवं गौमूत्र में कई प्रकार की औषधीय गुण पाए जाते हैं। तुलसी के पौधे को भगवान इसीलिए माना जाता है कि तुलसी के पौधे के हर भाग में विभिन्न औषधीय गुण हैं। इसी तरह वट और पीपल के वृक्ष घने होने के कारण ज्यादा ऑक्सीजन देते हैं और थके हुए राहगीर को छाया भी प्रदान करते हैं। यही कारण है कि हमारे धर्मग्रंथों में प्रकृति पूजा को प्राथमिकता दी गयी है। प्रकृति से ही मनुष्य जाति है न कि मनुष्य जाति से प्रकृति है। प्रकृति को धर्म से जोड़ा जाना और उनकी पूजा करना सर्वथा उपर्युक्त है। यही कारण है कि धर्मग्रंथों में सूर्य, चन्द्र, वरुण, वायु, अग्नि को भी देवता माना गया है। इसी प्रकार कुल 33 प्रकार के देवी-देवता हैं।
प्रकृति की प्रार्थना---
वेद प्राकृतिक तत्त्व की प्रार्थना किए जाने के रहस्य को बताते हैं। ये नदी, पहाड़, समुद्र, बादल, अग्नि, जल, वायु, आकाश और हरे-भरे प्यारे वृक्ष हमारी कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं। इनकी पूजा नहीं प्रार्थना की जाती है। यह ईश्वर और हमारे बीच सेतु का कार्य करते हैं।
33 प्रकार के देवी-देवता---
8 वसु ये हैं--  अग्नि, पृथिवि, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, घौ:, चन्द्रमा ओर नक्षत्र। इनका नाम वसु इसलिये है कि सब पदार्थ इन्ही में वास करते हैं। ये ही सबके निवास करने के स्थान हैं। 11 रूद्र ये हैं--  जो शरीर में दश प्राण हैं अर्थात प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कुर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय और 11वां जीवात्मा। जब वे इस शरीर से निकल जाते है तब मरण होने से उसके सब सम्बन्धी लोग रोते हैं। वे निकलते हुए उनको रुलाते हैं, इससे इनका नाम रूद्र है। सृष्टि की उत्पत्ति के दौरान रुद्र की उत्पत्ति ब्रह्मा के क्रोध आने पर उनके भौंहों के बीच से हुआ था। उत्पत्ति के समय रुद्र रो रहे थे। अतः जब भी ये किसी कि शरीर से निकलते हैं तो सबको रुलाते हैं। इसी प्रकार आदित्य 12 महीनो को कहते हैं। वे सब जगत के पदार्थों का आदान अर्थात सबकी आयु को ग्रहण करते चले जाते हैं, इसी से इनका नाम आदित्य है। ऐसे ही 'इंद्र' नाम बिजली का है। वह उत्तम ऐश्वर्य का मुख्य हेतु है और 'यज्ञ' को प्रजापति इसलिए कहते है की उससे वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा प्रजा का पालन होता है तथा पशुओं की यज्ञ संज्ञा होने का यह कारण है कि उनसे भी प्रजा का जीवन पालन होता है। ये सब मिलके अपने दिव्यगुणों से 33 देव कहलाते हैं। इनमें से कोई भी उपासना के योग्य नही है। व्यवहार मात्र की सिद्धि के लिए ये सब देव हैं। वेदानुसार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं- 1.ब्रह्मयज्ञ, 2.देवयज्ञ, 3.पितृयज्ञ, 4.वैश्वदेव यज्ञ और 5.अतिथि यज्ञ। उक्त पांच यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार दिया गया है। वेदज्ञ सार को पकड़ते हैं विस्तार को नहीं।
केवल ब्रह्म ही उपासना योग्य---
मनुष्य के उपासना के योग्य देव तो एक ब्रह्म ही है। सब जगत के बनाने से ब्रह्मा, सर्वत्र व्यापक होने से विष्णु, दुष्टों को दण्ड देकर रुलाने से रूद्र, मंगलमय और सबका कल्याणकर्ता होने से शिव हैं। ईश्वर एक ही है और वही प्रार्थनीय तथा पूजनीय है। वही स्रष्टा है, वही सृष्टि है। शिव, राम, कृष्ण आदि सभी उस ईश्वर के संदेश वाहक हैं। हजारों देवी-देवता उसी एक के प्रति नमन करते हैं। वेद, वेदांत और उपनिषद एक ही परमतत्त्व को मानते हैं। ब्रह्म को ही आदिशक्ति या परमेश्वर कहा जाता है। सनातन हिन्दू धर्म की मान्यता है कि सृष्टि उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अनंत प्रक्रिया पर चलती है। गीता में कहा गया है कि जब ब्रह्मा का दिन उदय होता है, तब सब कुछ अदृश्य से दृश्यमान हो जाता है और जैसे ही रात होने लगती है, सब कुछ वापस आकर अदृश्य में लीन हो जाता है। वह सृष्टि पंच कोष तथा आठ तत्त्व से मिलकर बनी है। परमेश्वर सबसे बढ़कर है।
धर्म के मूल तत्त्व---
किसी भी धर्म के मूल तत्त्व उस धर्म को मानने वालों के विचार, मान्यताएं, आचार तथा संसार एवं लोगों के प्रति उनके दृष्टिकोण को ढालते हैं। हिंदू धर्म की बुनियादी पांच बातें हैं-- 1. वंदना, 2. वेदपाठ, 3. व्रत, 4. तीर्थ, और 5. दान। यम नियम का पालन करना प्रत्येक सनातनी का कर्तव्य है। यम अर्थात 1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय, 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। नियम अर्थात 1.शौच, 2.संतोष, 3.तप, 4.स्वाध्याय और 5.ईश्वर प्रणिधान। संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि पांच या आठ वक्त (समय) की मानी गई है, लेकिन सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्त्वपूर्ण है। इस समय मंदिर या एकांत में गायत्री से ईश्वर की प्रार्थना की जाती है। मोक्ष की धारणा और इसे प्राप्त करने का पूरा विज्ञान विकसित किया गया है। यह सनातन धर्म की महत्त्वपूर्ण देन में से एक है। मोक्ष में रुचि न भी हो तो भी मोक्ष ज्ञान प्राप्त करना अर्थात इस धारणा के बारे में जानना प्रमुख कर्तव्य है। पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। श्राद्ध पक्ष का सनातन हिंदू धर्म में बहुत ही महत्त्व माना गया है। दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है। मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। मृत्यु आए इससे पूर्व सारी गांठे खोलना जरूरी है। दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेद और पुराणों में दान के महत्त्व का वर्णन किया गया है।
वेद ही धर्म ग्रंथ है---
कितने लोग हैं जिन्होंने वेद पढ़े? सभी ने पुराणों की कथाएं जरूर सुनी और उन पर ही विश्वास किया तथा उन्हीं के आधार पर अपना जीवन जिया और कर्मकांड किए। पुराण, रामायण और महाभारत धर्मग्रंथ नहीं इतिहास ग्रंथ हैं। ऋषियों द्वारा पवित्र ग्रंथों, चार वेद एवं अन्य वैदिक साहित्य की दिव्यता एवं अचूकता पर जो श्रद्धा रखता है वही सनातन धर्म की सुदृढ़ नींव को बनाए रखता है। कहा जाता है कि वेदों को अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है, लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है।
कर्म पर विश्वास व सर्वधर्म समभाव---
सनातन हिन्दू धर्म भाग्य से ज्यादा कर्म पर विश्वास रखता है। कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है। कर्म एवं कार्य-कारण के सिद्धांत अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने भविष्य के लिए पूर्ण रूप से स्वयं ही उत्तरदायी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन, वचन एवं कर्म की क्रिया से अपनी नियति स्वयं तय करता है। इसी से प्रारब्ध बनता है। कर्म का विवेचन वेद और गीता में दिया गया है। सनातन हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। जन्म एवं मृत्यु के निरंतर पुनरावर्तन की प्रक्रिया से गुजरती हुई आत्मा अपने पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। आत्मा के मोक्ष प्राप्त करने से ही यह चक्र समाप्त होता है। ''आनो भद्रा कृत्वा यान्तु विश्वतः।'' ऋग्वेद के इस मंत्र का अर्थ है कि किसी भी सदविचार को अपनी तरफ किसी भी दिशा से आने दें। ये विचार सनातन धर्म एवं धर्मनिष्ठ साधक के सच्चे व्यवहार को दर्शाते हैं। चाहे वे विचार किसी भी व्यक्ति, समाज, धर्म या सम्प्रदाय से हो। यही सर्वधर्म समभाव है।
अतः हमें नियमित रूप से ग्रन्थों को पढ़ना चाहिये, उसके तथ्यों को समझना चाहिये और उसपर अमल करना चाहिये। ऐसा करने से ही सफल जीवन का आनन्द लिया जा सकता है।


सोमवार, 7 अप्रैल 2014

शान्ता थीं श्रीराम की बड़ी बहन और लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला / SHANTA WAS THE LORD RAM'S SISTER & URMILA WAS LAXMAN'S WIFE


-शीतांशु कुमार सहाय
कल अर्थात् 8 अप्रैल 2014 को रामनवमी है। आप सबको रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! रामनवमी के अवसर पर यहाँ मैं भगवान श्रीराम से जुड़े दो पात्रों के बारे में चर्चा कर रहा हूँ, श्रीराम की बड़ी और एकमात्र बहन शान्ता और उनके अनुज लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के बारे में। शान्ता के बारे में तीन कथाएँ (प्रकरण) यहाँ प्रस्तुत हैं--
प्रकरण-- 1
हम सभी प्रभु राम के 3 भाईओं के बारे में तो जानते हैं जिनके नाम क्रमशः लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न थे। परन्तु शान्ता का नाम अल्प ही लिया जाता है जो कि वास्तव में इन सभी भ्राताओं में वरिष्ठ थीं। शान्ता रामायण का एक अभिन्न अङ्ग है। वो दशरथ तथा कौशल्या की पुत्री थीं तथा उनको रोम्पद तथा वर्षिणी ने गोद लिया था। वो ऋषिश्रङ्ग की पत्नी थीं। ये माना जाता है कि उनके वंशज सेंगर राजपूत हैं जिन्हे ऋषिवंशी राजपूत भी कहा जाता है। शान्ता राजा दशरथ तथा कौशल्या की पुत्री थीं परन्तु उन्हे अङ्ग देश के राजा रोम्पद तथा उनकी काकी (कौशल्या की बड़ी बहन) वर्षिणी ने गोद लिया था। वर्षिणी के पास कोई बच्चा नहीं था तथा एक बार अयोध्या में उन्होने हंसी में बच्चे की मांग की। दशरथ मान गए। रघुकुल का दिया गया वचन निभाने के लिए शान्ता अङ्गदेश की राजकुमारी बन गईं। ये माना जाता है कि शान्ता वेद, कला तथा शिल्प में पारङ्गत थीं। वो अधिक सुन्दर भी थीं। एक दिन वो अपने पिता के साथ वार्तालाप कर रहीं थीं कि एक ब्राह्मण उनके पास आया। वो मानसून के मौसम में बीजने के लिए सहायता मांगने आया था। परन्तु रोम्पद ने उसे अनदेखा कर दिया। इससे क्रोधित हो कर ब्राह्मण राज्य छोड़ कर चला गया जिससे इन्द्र देव क्रोधित हो गए। वर्षा ऋतु में कम जल बरसने के कारण सूखा पड़ गया। इस स्थिति से पार पाने के लिए राजा ने ऋषिश्रङ्ग को बुलाया। यज्ञ से वर्षा हुई। ऋषिश्रङ्ग को धन्यवाद स्वरूप शान्ता का विवाह उन ऋषि के साथ कर दिया गया। दशरथ के कोई पुत्र नहीं था। वो चाहते थे कि वंश चलाने वाला कोई तो हो। उन्होने ऋषिश्रङ्ग को पुत्रकामेष्ठि यज्ञ पूर्ण करने के लिए बुलाया। इसी यज्ञ से चारों भाई राम, लक्षमण, भरत तथा शत्रुघ्न पैदा हुए।
प्रकरण-- 2
सत्य साईं बाबा ने अपने एक प्रवचन (19 मई, 2002), जो कि बृन्दावन, व्हाईटफ़ील्ड (बेंगलुरु) में दिया गया था, में प्रभु राम की बहन के बारे में कहा था। उन्होने इस कथा को ऐसे कहा:--- कौशल्या के राम को जन्म देने से पहले उसके एक पुत्री थी। क्योंकि वो एक कन्या थी तथा राज्य की उत्तराधिकारी नहीं थी तो उसको एक ऋषि की गोद में दे दिया गया। उस ऋषि ने उसका पालन किया तथा उसका विवाह ऋषिश्रङ्ग से कर दिया। दशरथ ने उनके मंत्री सुमन्त की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलाया। दशरथ ने ऋषिश्रङ्ग को भी बुलाया। ऋषिश्रङ्ग एक पुन्य ऋषि थे तथा जहां वो पांव रखते थे वहां यश होता था. सुमन्त ने ऋषिश्रङ्ग को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए कहा। ऋषिश्रङ्ग ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता। मेरी भार्या शान्ता को भी आना पड़ेगा। सुमन्त इस के लिए मान गए। शान्ता तथा ऋषिश्रङ्ग अयोध्या पहुंचे। तभी शान्ता ने दशरथ के चर्ण स्पर्श किए। दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि वो कौन है चूँकि वो एक ऋषि की भाँति जान पड़ती थीं। वो जहां भी पांव रखती थी सूखा मिट जाता था और समय पर वर्षा होती थी। जब माता पिता विस्मित थे कि वो कौन है तब शान्ता ने बताया कि वो उनकी पुत्री शान्ता है। दशरथ और कौशल्या ये जानकर अधिक प्रसन्न हुए।
प्रकरण-- 3
इसी कथा का एक और रूप है जो कि टीवी कार्यक्रम 'रावण' में था--- इस रूप के अन्तर्गत पुत्री को गोद नहीं दिया। परन्तु सूखा पड़ने के कारण ऋषिश्रङ्ग को बुलाने वाली बात इसमें भी है। ऋषि यज्ञ के लिए मान गए। वर्षा हुई तथी सभी प्रसन्न हो गए। राजा दशरथ अध्यात्मिक वैज्ञानिक को पुरस्कार देने के लिए तत्पर थे जिसने सहस्रों की तृष्णा शान्त की थी। ऋषि ने पुरस्कार के रूप में शान्ता के साथ विवाह का प्रस्ताव रख दिया। सभी आश्चर्यचकित रह गए चूँकि वो एक ब्राह्मण थे तथा शान्ता एक राजकन्या थी। यदि विवाह हुआ तो उसे ऋषि पत्नी की भाँति आश्रम में रहना होगा। परन्तु वो मान गए। वर्षों उपरान्त, दशरथ ने पुनः ऋषिश्रङ्ग को पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करने को कहा। ऋषिश्रङ्ग ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा और भाईयों का जन्म हुआ।

लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला---

वाल्मीकि के ‘रामायण’ या तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के बारे में बहुत कम चर्चा है। अन्य ग्रन्थों में भी उनकी चर्चा नहीं मिलती है। उर्मिला का नाम रामायण में लक्ष्मण की पत्नी के रूप में मिलता है। महाभारत, पुराण तथा काव्य में भी इससे अधिक उर्मिला का कोई परिचय नहीं मिलता। आधुनिक काल में उर्मिला के विषय में विशेष सहानुभूति प्रकट की गयी है। उर्मिला जनकनंदनी सीता की छोटी बहन थीं और सीता के विवाह के समय ही दशरथ और सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण को ब्याही गई थीं। इनके अंगद और चन्द्रकेतु नाम के दो पुत्र तथा सोमदा नाम की एक पुत्री थी। उर्मिला विविध कलाओं में पारंगत और कर्तव्यपरायण नारी थी। राम के साथ लक्ष्मण के भी चौदह वर्ष के लिए वन जाने पर उर्मिला ने अपनी विरह-व्यथा को जीव-जन्तुओं के प्रति सहानुभूति में बदल दिया। भगवान राम के राजतिलक का वनवास में परिवर्तन हो जाने की भनक उर्मिला को नहीं थी। वो अपने भवन में राम के राजतिलक का सुन्दर चित्र बना रही थी। वनवास का समाचार उर्मिला को बताने जब उर्मिला के कक्ष में लक्ष्मण आये तो चित्र पर रंग गिर पड़ा और पूरा चित्र बिगड़ गया। वह सोचीं कि अवश्य ही कोई विषादवाला समाचार है। श्रीराम के वन जाने का समाचार सुनने पर उर्मिला ने पति लक्ष्मण से कहा- आप भी उनके साथ जाइये। वैसे पतिव्रता होने के कारण मुझे भी आपके साथ जाना चाहिये, किन्तु यदि मैं भी वन गयी तो आपकी राम-भक्ति में बाधा पड़ेगी। अतः आप अग्रज के साथ जाएँ और मैं यहीं रहूँगी। यह सुनकर लक्ष्मण हर्षित हो गये। उन्हें अपनी पत्नी पर गर्व हुआ कि उनकी राम-भक्ति में पत्नी बाधा नहीं बनी। यों चौदह वर्षों तक वह पति से अलग रहीं। उनका त्याग अद्भुत है।
भगवान राम आपकी मनोकामना पूरी करें!

रविवार, 6 अप्रैल 2014

बन्दरों के बीच त्रिकूट का आनन्द / A TOUR ON TRIKUT WITH MONKEYS AT DEOGHAR IN JHARKHAND



-शीतांशु कुमार सहाय
झारखण्ड के देवघर जिले से 16 किलोमीटर दूर देवघर-दुमका मार्ग पर खूबसूरत त्रिकूट पहाड़ स्थित है। देवघर का यह सबसे रोमांचक पर्यटन स्थल है। इस पहाड़ पर कई गुफाएँ और झरनें हैं। वैद्यनाथधाम से वासुकिनाथ मंदिर की ओर जाने वाले श्रद्धालु मंदिरों से सजे इस पहाड़ पर रूकना पसन्द करते हैं। यहाँ लोग पूजा-अर्चना करते हैं। यहाँ पहाड़ के निचले हिस्से पर बन्दर की कई प्रजातियाँ मिलती हैं। बन्दरों को दर्शनार्थी चना खिलाते हैं। गाड़ी से उतरते ही पर्यटकों पर पैनी निगाह रखनेवाले बन्दर हाथों में कोई भी वस्तु देखने पर उसे छीन लेते हैं। अतः यहाँ आने पर जरूरी वस्तुओं को लोग वाहनों में ही रखकर बन्द कर देते हैं। बन्दरों के अलावा त्रिकूट के जंगल में हाथी, खरहा, शाहिल, हिरन आदि वन्य जीव पाये जाते हैं। इस पहाड़ पर व निकटवर्ती जंगल में कई प्रजातियों की वनस्पतियाँ पायी जाती हैं। यह पहाड़ काफी मनोरम है।
ब्रह्मा़-विष्णु-महेश व ट्रैकिंग
त्रिकूट पहाड़ की तीन मुख्य ऊँची चोटियाँ हैं। इनके नाम हैं- ब्रह्मा़, विष्णु़ और महेश। इसलिए इसे ‘त्रिकूट’ कहा गया। सबसे ऊँची चोटी समुद्र तल से 2470 फीट की ऊँचाई पर है। यह ट्रैकिंग के लिए एक आदर्श स्थान है। अधिकतर चोटियाँ खड़ी ढाल वाली हैं। अतः ट्रैकिंग के लिए कुछ चोटियाँ ही सुरक्षित हैं।
रज्जु मार्ग
त्रिकूट पहाड़ और इसके जंगल में पैदल घूमने के अलावा मुख्य शिखर (विष्णु चोटी) पर रज्जु मार्ग (रोप-वे) के माध्यम से भी जाया जा सकता है। शिखर तक पहुँचने के लिए एक एकल रस्सी कार को 10 मिनट लगते हैं।
तपस्थली व मन्दिर
यह मनोरम पहाड़ कई ऋषियों-मुनियों की तपस्थली रही है। कहा जाता है कि कुछ समय तक रावण ने भी यहाँ तपस्या की थी। अभी भी यहाँ सन्त आश्रम है और कई मन्दिर हैं। यहाँ प्रसिद्ध त्रिकूटाचल महादेव मंदिर है। गणेश, पार्वती, भैरव, अन्नपूर्णा आदि की भी मन्दिरें हैं। मन्दिरों के बीच एक प्राकृतिक जलस्रोत है जिसका जल अत्यन्त निर्मल है। पर्यटकों के अलावा मन्दिर में रहनेवालों के लिए यह जीवनदायिनी जलस्रोत है। मैंने भी बोतल में भरकर इस जल का रसास्वादन किया।

कई गुफाएँ
देवघर के त्रिकूट पहाड़ पर कई गुफाएँ हैं। कुछ में मन्दिर तो कुछ में सन्तों या स्थानीय पुजारियों के आवास हैं। कुछ गुफाओं में पूजन स्थल बनाये गये हैं। सभी गुफाएँ अत्यन्त गर्मी में भी शीतलता प्रदान करती हैं। सबसे अधिक शीतल गुफा में माता अन्नपूर्णा देवी का मन्दिर है। इसमें हमें काफी राहत महसूस हुई। 
प्लास्टिक से हानि
देवघर के त्रिकूट पहाड़ पर इन दिनों प्लास्टिक का जमकर उपयोग हो रहा है। उपयोग में लाए गए प्लास्टिक को नष्ट करने का कोई प्रयास नहीं होने से इस मनोरम पर्यटक स्थल की स्थिति नारकीय होती जा रही है। विभागीय अधिकारी एक-दूसरे की जिम्मेदारी बताकर अपना पाला झाड़ लेतेे हैं। इससे जहाँ पर्यावरण को खतरा है वहीं यहाँ निवास कर रहे बंदर, शाहिल, खरहे, हिरन, हाथी आदि जंगली जानवरों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है।

इसके अलावा एक अन्य प्रसिद्ध त्रिकूट पर्वत हिमालय क्षेत्र में है जिसपर माता वैष्णो देवी का मन्दिर है।  

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

मजीठिया वेतन आयोग : लोकसभा निर्वाचन-2014 के भारी शोर में पत्रकारों के कल्याण की बात छिप गयी / MAJITHIA WAGE COMMISSION



-शीतांशु कुमार सहाय
लोकसभा निर्वाचन-2014 के भारी शोर में पत्रकारों के कल्याण की बात छिप गयी है। यह बात इतनी परतों में खो गयी है कि किसी पत्रकार को भी अपने हक में बोलने-लड़ने की फुसर्त नहीं है; बल्कि यों कहें कि चुनावी समाचारों के कवरेज की व्यस्तता में पत्रकारों को फुर्सत के क्षण मिल ही नहीं रहे हैं कि वे अपने हक में सोच भी सकें। मैं बात कर रहा हूँ पत्रकारों व गैर पत्रकारों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से अप्रैल 2014 से नये वेतनमान के तहत भुगतान करनेवाले प्रकरण की। दरअसल, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 7 फरवरी 2014 को देशभर के सभी समाचार पत्रों, समाचार एजेंसियों, टीवी न्यूज चैनलों, वेब मीडिया आदि में कार्यरत पत्रकारों व गैर पत्रकारों के लिए मजीठिया वेतन आयोग की सभी सिफारिशों को लागू करने का आदेश दिया जो एक अप्रैल 2014 से प्रभावी भी हो गया। पर, सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश को समाचार संगठनों के प्रबन्धन लागू नहीं कर रहे हैं।
ठेका पत्रकार होते ही नहीं---                               
मजीठिया वेतन आयोग लागू होने के बाद पत्रकारों के बीच एक चर्चा है कि प्रेस मालिक ठेका पत्रकार रख लेंगे, किसी को इसका लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं है। कानून की परिभाषा में ठेका पत्रकार होते ही नहीं और जो कर्मचारियों से कुछ भी लिखा कर उन्हें अपना गुलाम बनाने की बात करते हैं, वे प्रेस मालिक कर्मचारियों को उल्लू बनाने की कोशिश करते है। चूंकि प्रेस एक उद्योग है इस कारण इंण्डस्ट्रियल एम्प्लायमेंट (स्टैडिंग आर्डर्स) एक्ट 1946 के उपबंध यहां भी लागू होते हैं। इस एक्ट की धारा 38 के तहत कर्मचारियों से नियोक्ता की कोई अनलीगल शर्त स्वतः समाप्त हो जाती है। कानून में इस बात का भी प्रावधान है कि भले ही आपसे बंदूक अड़ाकर या भय दिखाकर कोई कुछ भी करा ले, लिखा ले, उसकी कोई कानूनी मान्यता नहीं है। श्रमजीवी पत्रकार तथा अन्य समाचार पत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और विविध उपबंध अधिनियम 1955 में या कानून में कहीं भी 'ठेका पत्रकार' शब्द का उल्लेख नहीं है, हां मजीठिया वेतन बोर्ड में अंशकालीक संवाददाता का जरूर उल्लेख है लेकिन उन्हें भी 30 से 40 प्रतिशत मजीठिया वेतनमान देना पड़ेगा।  
क्या होता है ठेका---
ठेका श्रमिक की परिभाषा अलग है। प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से कर्मचारी सप्लाई करने या ठेका श्रमिक रखने के लिए संविदा श्रमिक (विनियमन तथा उन्मूलन) अधिनियम 1970 की धारा 13 के तहत पहले एक ठेकेदार को पंजीयन कराना पड़ता है जो लेबर आफिस में होता है और इसकी लीगल फीस होती है यहां कम से कम 20 श्रमिकों के सप्लाई के नाम पर ठेका मिलता है। तभी ठेके श्रमिक से काम कराए जा सकते है यदि इस नियम का पालन कर पत्रकार की भर्ती की जाती है तो भी उसे ठेकेदार के माध्यम से मजीठिया वेतनमान देना पड़ेगा। हालांकि पत्रकार का कार्य एक मौसमी कार्य नहीं होता इसलिए ठेका पत्रकार नहीं रखे जा सकते। संविदा श्रमिक (विनियमन तथा उन्मूलन) अधिनियम 1970 की धारा 10 के तहत ऐसे कार्यों के लिए ठेका श्रमिक रखने को प्रतिबंधित किया गया है जो नियमित कार्य की श्रेणी में आते है। मतलब पत्रकारिता का पेशा ठेका श्रमिक रखकर नहीं कराए जा सकते। कंपनी या नियोक्ता कर्मचारी से कुछ भी लिखा ले और वह ठेका श्रमिक हो गया। यह गुमराह करने का तरीका है और लेबर कोर्ट में इस तरह की कोई दलील नहीं सुनी जाती।
मजीठिया वेतन देना कानूनन मजबूरी---
प्रेस मालिकों को मजीठिया वेतनमान देना कानूनन मजबूरी है। वश पत्रकारों व पत्रकार संगठन को जागरूक होने की जरूरत है उनकी जिम्मेदारी बनती है कि यदि कही इस बोर्ड के आदेश का पालन नहीं हो रहा है तो वे लेबर कोर्ट में चुनौती दे या पत्रकार अपने संस्था के खिलाफ शिकायत करें चाहे वह गुमनाम ही शिकायत क्यों ना हो। पत्रकार अधिनियम 1955 के तहत इस कानून का पालन कराना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि प्रेस मालिक वेतन नहीं देते तो मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936 के तहत भारी भरकम जुर्माना होता है जो कुल वेतन का 10 प्रतिशत हो सकता है। पत्रकारों के वेतन भुगतान में भी मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936 की धारा 6 के तहत क्लेम किया जाता है। अधिनियम के अनुसार कर्मचारियों को वेतन माह की 7 तारीख तक मिल जाना चाहिए। इसी की धारा 7 के तहत यदि पीएफ की कटौती नहीं की जाती तो कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीण उपबंध 1955 के तहत भू-राजस्व के बकाया की भांति वसूली की जाती है तथा धारा 14 के अनुसार हर्जाना वसूल में कंपनी अपना अंशदान नहीं देती तो भारतीय दंड संहित की धारा 409 के तहत दंडनीय अपराध दर्ज होता है। रही बोनस की बात तो बोनस भुगतान अधिनियम 1965 की धारा 10 के अनुसार कुल वेतन का 8.33 प्रतिशत भुगतान करना चाहिए। जो एक माह के वेतन के बराबर होता है। धारा 31 के तहत 20 प्रतिशत का बोनस दिया जाता है। प्रेस के लिए कंपनी के मुनाफे के अनुसार कर्मचारियों को बोनस मिलना चाहिए नहीं तो उक्त अधिनियम लागू होते है।
पत्रकारों की छंटनी---
यदि संस्थान को घाटा हो रहा है या किसी कारण से छंटनी करना चाहती है तो पहले इसकी विधिवत सूचना देकर छंटनी की प्रक्रिया शुरू की जाती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी को भी निकाल दे जो पहले आया है वह पहले जाएगा जो लास्ट में आया है वह अंतिम में जाएगा। और हर साल के 15 दिन के हिसाब से छंटनी मुआवजा देना पड़ता है जैसे यदि पत्रकार दो साल का किया तो 30 दिन का अतिरिक्त वेतन छंटनी मुआवजा के रूप में देना होता है। इसमें ग्रेच्यूटी की बात शामिल नहीं है वह अलग से देना पड़ता है। लेकिन यदि किसी पत्रकार को निकालना है तो पहले उसके खिलाफ आरोप और विभागीय जांच होती है यदि उसमें वह दोषी पाया जाता है तो 3 माह का वक्त देकर नमस्ते किया जाता है। लेकिन यदि कर्मचारी कार्यवाही से संतुष्ट नहीं तो लेबर कोर्ट से स्टे ले सकता है या चुनौती दे सकता है। यदि किसी कर्मचारी की सेवा एक वर्ष में 240 दिन से अधिक हो गई तो वह नियमित कर्मचारी मान लिया जाता है और उसका काम संतोषजनक माना जाता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 25 (एफ) में इसका उल्लेख है लेकिन इसका पालन ना कर कर्मचारी को निकालने पर निकालने की अवधि का वेतन और पुनः नौकरी पाने का कानून अधिकारी होता है।

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

आम आदमी पार्टी का घोषणा-पत्र जारी / AAP MANIFESTO



-शीतांशु कुमार सहाय
वृहस्पतिवार 3 अप्रैल 2014 को लोकसभा निर्वाचन-2014 के मद्देनजर आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया। इस अवसर पर मुख्य रूप से मनीष सिसोदिया, योगेन्द्र यादव, गोपाल राय आदि उपस्थित थे। घोषणा-पत्र में आम आदमी पार्टी (आप) ने जनलोकपाल विधेयक लाने, अदालत कक्षों में सीसीटीवी कैमरे लगाने और चुनाव लडने की न्यूनतम आयु 25 से 21 साल करने सहित कई और वादे किए हैं। अगले पांच साल में देश भर में न्यायाधीशों की संख्या दोगुनी करने का भी वादा किया। केजरीवाल ने कहा, ‘हम अपने पड़ोस के देशों के साथ राजनीतिक शत्रुता को कम करने की दिशा में काम करेंगे पर सीमा पार आतंकवाद के लिए तनिक भी बर्दाश्त न करने की नीति अपनायी जाएगी।’ उन्होंने कहा, ‘सीमाई इलाकों को उच्च आर्थिक संपर्क क्षेत्र के तौर पर विकसित किया जाना चाहिए ताकि दोनों पक्षों में शांति के पक्षधर लोगों की संख्या बढ़ायी जाए। चीन द्वारा की जाने वाली घुसपैठ को रोकने के लिए हम रक्षा क्षमता बढ़ाएंगे पर उसके साथ संतुलित व्यापार बढ़ाने की भी कोशिश करेंगे।’ केजरीवाल ने कहा कि उनकी पार्टी न केवल उपकरणों को लेकर दूसरों देशों पर निर्भरता को कम करेगी बल्कि रक्षा उपकरणों की खरीद में पारदर्शिता भी लाएगी।
घोषणा पत्र की मुख्य बातें--
1. स्वराज लाने व भ्रष्टाचार समाप्त करने का किया गया है वायदा।
2. जनलोकपाल बिल पारित किया जाएगा।
3. स्वराज बिल के तहत ग्राम सभा और मोहल्ला सभाओं की ताकत बढ़ाई जाएगी ताकि स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार खत्म किया जा सके।
4. सरकारी प्रक्रिया को आसान बनाया जाएगा।
5. सूचना तकनीक का उपयोग पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए किया जाएगा।
6. आम आदमी को न्याय दिलाएंगे।
7. ग्राम न्यायालयों का गठन किया जाएगा।
8. हाईकोर्ट और निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति पारदर्शी बनाने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर न्यायिक नियुक्ति कमीशन का गठन किया जाएगा।
9. फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया जाएगा।
10. अगले पांच सालों में अदालतों की संख्या दोगुनी की जाएगी। अदालतो में ढांचागत सुविधाओं और संसाधनों को बढ़ाया जाएगा।
11. मानवीय और जवाबदेही नीतियां सुनिश्चित करेंगे।
12. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक पुलिस सुधार लागू किए जाएंगे। राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने के लिए पुलिस को अधिक स्वायत्तता दी जाएगी।
13. स्थानीय ग्राम सभा(मोहल्ला सभा) के प्रति पुलिस की जवाबदेही तय की जाएगी
14. पुलिस हिरासत के अधिकार को खत्म किया जाएगा। सभी हिरासत न्यायिक होंगी और इसी के तहत पुलिस पूछताछ करेगी
15. एफआईआर दर्ज करने से इनकार करना अपराध श्रेणी में आएगा।
16. वीआईपी सुरक्षा में लगे भारी सुरक्षा बलों को हटाया जाएगा।
17. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, प्रतिनिधित्व में सुधार लाया जाएगा।
18. चुनाव आयुक्त की नियुक्ति सरकार नहीं बल्कि कई सदस्यों वाली संसदीय कमेटी करेगी। चुनाव आयुक्त के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाया जाएगा।
19. राजनीति में काले धन के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाएगी। स्टेट फंडिंग इलेक्शन की संभावनाओं को तलाशा जाएगा।
20. राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रिकॉल प्रक्रिया को लाया जाएगा।
21. देश के सभी नागरिकों को उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ देने के लिए राइट टू हेल्थ केयर विधेयक लाया जाएगा।
22. जन स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही तय की जाएगी।
23. सभी बच्चों के लिए उच्च स्तरीय शिक्षा मुहैया कराना प्राथमिकता होगी। जनशिक्षा प्रणाली का भी विस्तार किया जाएगा।
24. लड़कियों, गरीब बच्चों, सामाजिक रूप से पिछड़े समुदाय के बच्चों के लिए उच्च स्तरीय शिक्षा सुविधाओं दिलाने का विशेष प्रावधान किया जाएगा।
25. स्कूल प्रबंधनों में लोकल कम्युनिटीज की भागीदारी के साथ ही स्कूलों/टीचरों की ग्राम सभाओं या मोहल्ला सभाओं के प्रति जवाबदेही तय की जाएगी।
26. योग्य टीचरों की पारदर्शी चयन प्रक्रिया के तहत नियमित आधार पर नियुक्ति की जाएगी।
27. बड़ी संख्या में आईटीआई स्थापित की जाएगी।
28. सार्वजनिक क्षेत्र के तहत विश्व स्तर के शिक्षण संस्थानों की स्थापना की जाएगी।
29. दिल्ली यूनिवर्सिटी में लागू किए गए चार वर्षीय अंडर ग्रेजुएट प्रोग्राम को वापस लिया जाएगा।
30. देश के हर नागरिक मूलभूत सुविधाएं मसलन खाना, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य,बिजली, पानी, शौचालय और अन्य सुविधाएं मुहैया कराईं जाएंगीं।
31. किसानों का जीवन खुशहाल और सुरक्षित बनाया जाएगा।
32. युवाओं को रोजगार के अवसर दिए जाएंगे।
33. निष्पक्ष उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाएगा।
34. कर प्रणाली को आसान और निष्पक्ष बनाया जाएगा।
35. रोटी कपड़ा और मकान के साथ-साथ सुरक्षा, सम्मान और व्यक्तिगत क्षमता को हर नागरिक को उपलब्ध कराया जाएगा।
36. एकीकृत आर्थिक और पार्यावरण प्रणाली लाई जाएगी।
37. गांव और शहरों में विश्वस्तरीय ढांचागत व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाएगा।
38. देशभर के युवाओं को कृषि,उत्पादन, और अन्य सेवा सेक्टरों में रोजगार के अवसर मुहैया कराए जाएंगे।
39. नौकरियों के अवसर पैदा किए जाएंगे।
40. काले धन की अर्थव्यस्था को खत्म किया जाएगा।
41. गरीब और पिछड़ों को और अधिकार दिए जाएंगे।
42. किसानों की जीवनदशा में सुधार लाया जाएगा।
43. स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों को लागू किया जाएगा।
44. किसानों को आत्महत्या से रोकने के लिए क्रेडिट और इंश्योरेंस लागू किए जाएंगे।
45. खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में ग्राम सभा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी।
46. प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का लाभ स्थानीय लोगों को मिले। इन संसाधनों का वाणिज्यिक शोषण पर लगाम लगाई जाएगी।
47. नई भूमि अधिग्रहण नीति लाई जाएगी।
49. नौकरियों में ठेकेदारी प्रथा बंद करेंगे।
50. बढ़ती महंगाई पर अंकुश लगाएंगे।
51. लैंगिक हिंसा और भेदभाव को खत्म करने के लिए एक जनशिक्षण अभियान चलाएंगे।
52. महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का समर्थन करेंगे।
53. जातिगत असमानता को खत्म करेंगे।
54. वाल्मीकि समुदाय सम्मान के साथ जीने के अधिकार देंगे।
55. सांप्रादायिक और सामुदायिक सदभावना को बढ़ावा देंगे।
56. मुस्लिम के साथ भेदभाव का खात्मा किया जाएगा और सुरक्षा प्रदान की जाएगी।
57. आदिवासियों को उनके विकास का अधिकार देना।
58. पशु कल्याण के लिए कार्य किए जाएंगे।
59. खेल प्राधिकरणों पर भ्रष्ट और आपराधिक लोगों का वर्चस्व कम किया जाएगा।
60. खिलाड़ियों को राष्ट्रीय खेल प्राधिकरण में निर्णय और निर्णय निर्धारण समीति में प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।
62. मीडिया में पारदर्शिता लाने के लिए कानून लाया जाएगा।
63. आतंरिक और सीमा सुरक्षा को मजबूत किया जाएगा।
64. विदेश और रक्षा नीति की मजबूती के लिए कदम उठाए जाएंगे।

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

झारखण्ड : धूमधाम से मना प्रकृति पर्व सरहुल, निकाली गयी शोभायात्रा / SARHUL IN JHARKHAND


-शीतांशु कुमार सहाय
आदिवासियों का प्रकृति पर्व सरहुल के अवसर पर बुधवार 2 अप्रैल 2014 को झारखण्ड की राजधानी राँची में विशाल शोभायात्रा निकाली गयी। राज्यभर में सरहुल का पर्व धूमधाम से मनाया गया। पूजा करने वाले को नायके हड़ाम कहते हैं। नायके हड़ाम ने आदिवासियों के इष्टदेव मारांग बुरु व इष्टदेवी जोहार आयो की विधिवत् पूजा की। उन्हें सखुआ का फूल अवश्य चढ़ाया जाता है। श्रद्धालुओं को कान पर सखुए का फूल लगाकर पुजारी द्वारा बधाई दी जाती है। सरहुल का मुख्य उद्देश्य समाज के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए वृक्षों की रक्षा करना है; ताकि पर्यावरण स्वच्छ रहे और मनुष्य सहित अन्य जीवों का जीवन संकट में न पड़े। अखाड़ा व सरना स्थलों पर सुबह में सरहुल की पूजा-अर्चना विधि-विधान से की गयी। मुख्य पूजा 'हातमा' सरना स्थल में हुई। पाहन जगलाल हेमरोम ने पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ मुर्गा की बलि देकर पूजा संपन्न करायी।
राँची के मोरहाबादी के निकट हातमा बस्ती से आरंभ हुई शोभायात्रा विभिन्न मार्गों से होती हुई क्लब रोड के पास सिरमटोली बस्ती पहँुची। सिरमटोली बस्ती में पाहन (आदिवासी पुरोहित) द्वारा पूजा सम्पन्न होने के बाद शोभायात्रा का विसर्जन हुआ। रास्ते में विभिन्न अखाड़ों और मोहल्लों से निकाली गयी झाँकियाँ शोभायात्रा में शामिल हुईं। सिरमटोली पहँुचते-पहँुचते शोभायात्रा ने विशाल स्वरूप ले लिया। ढोल और नगाड़ों की गूँज पर युवक-युवतियों की टोलियाँ सरहुल गीत गाती हुई थिरक रही थीं। बीच-बीच में एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर सरहुल की शुभकामनाएँ भी दे रहे थे। सरहुल गीत, युवक-युवतियों के नृत्य और पारंपरिक वेश-भूषा के कारण सड़क पर झारखंड की समृद्ध संस्कृति की झलक दिख रही थी। इसके साथ-साथ आधुनिक नागपुरी गीतों पर भी लोग थिरक रहे थे। ट्रकों में शामिल वाहनों पर सवार महिलाएँ इस शोभायात्रा का आनंद उठा रही थीं। 
पूजा-अर्चना के बाद दोपहर में राजधानी के विभिन्न मुहल्लों व आसपास के गाँवों से शोभा यात्रा निकाली गयी।, उसमें विभिन्न इलाकों की सरना समितियाँ झंडे और कई आकर्षक झाँकियांे के साथ शामिल हुईं। चडरी सरना समिति द्वारा अल्बर्ट एक्का चौक पर बनाये गये विशाल पंडाल में शोभायात्रा में शामिल लोगों का स्वागत किया गया। कई क्षेत्र की सरना समितियों को सम्मानित भी किया गया। जुलूस में शामिल लोगों के स्वागत के लिए कई अन्य संगठनों द्वारा जगह-जगह शिविर लगाये गये थे। इन शिविरों में जुलूस में शामिल लोगों के लिए चना-गुड़, पेयजल, शर्बत आदि की व्यवस्था भी की गयी थी।
सरहुल के मौके पर उमड़ी भीड़ को लेकर प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये गये थे। राज्य में कहीं से भी कोई अप्रिय घटना की सूचना नहीं है। शोभायात्रा में महिलाओं की बड़ी संख्या को देखते हुए महिला सुरक्षा बल को भी तैनात किया गया था। सभी प्रमुख चौक-चौराहो और संवेदनशील इलाके में दंडाधिकारियों के नेतृत्व में सुरक्षा बल मुस्तैद थे। यातायात सुगम बनाने के लिए शोभा यात्रा के दौरान मार्ग परिवर्तन किया गया था। जिस ओर से सरहुल की शोभायात्रा निकाली गयी, उधर से वाहनों को दूसरी ओर डायवर्ट कर दिया गया था। इस दौरान कुछ लोगों ने लोकसभा चुनाव के मौसम में नेताओं से विविध तरीके से अपनी माँगें भी रखीं।
-होगी अच्छी वर्षा
पूजा संपन्न होने के बाद पाहन ने वहाँ रखे गये घड़े के पानी को देखकर इस वर्ष अच्छी वर्षा होने की भविष्यवाणी की और इसे कृषि के लिए शुभ बताया। मंगलवार को उपवास रखने के बाद पाहन घड़ों में पानी भरकर सरना-स्थल पर रखते हैं। उसमें केकड़े भी डाले जाते हैं। दूसरे दिन सुबह इसी पानी को देखकर भविष्यवाणी की जाती है। पाहन ने कहा कि रात में रखा गया घड़ा सुबह भंडार कोण की ओर झुका पाया गया। यह कृषि और वर्षा के लिए अच्छा संकेत है।
















सोमवार, 31 मार्च 2014

अरविन्द केजरीवाल पर स्नात्कोत्तर परीक्षा में 46 अंकों के प्रश्न, मोदी पर 20 अंकों के प्रश्न / 46 MARKS QUESTIONS ON ARVIND KEJRIWAL & 20 ON MODI IN M.A. EXAM OF KURUKESHTRA UNIVERSITY


-शीतांशु कुमार सहाय
जिस तेज रफ्तार से अरविन्द केजरीवाल और उनके द्वारा स्थापित आम आदमी पार्टी को सुर्खियों में जगह मिली है, उसका प्रभाव अब विश्वविद्यालयों की परीक्षा में भी देखने को मिल रहा है। सोमवार 31 मार्च 2014 को उत्तर प्रदेश के झाँसी स्थित बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की राजनीति शास्त्र की परीक्षा में केजरीवाल ही छाए रहे। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की एमए सेकंड इयर की 'इंडियन पॉलिटिक्स' (भारतीय राजनीति) की परीक्षा में 2 प्रश्नपत्रों में केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर 46 नंबर के 4 सवाल पूछे गए। इन दोनों प्रश्न-पत्रों में 20 नंबर का एक सवाल नरेंद्र मोदी पर और 4 नंबर का एक सवाल शिव सेना और अकाली दल की भूमिका पर रहा। राहुल गाँधी और दूसरे नेताओं पर कोई सवाल नहीं पूछा गया।
आप और केजरीवाल पर सवाल----
1. आम आदमी पार्टी के भविष्य पर संक्षिप्त टिप्पणी (2 अंक)
2. आम आदमी पार्टी के घोषणा-पत्र एवं कार्यक्रम का वर्णन कीजिए। (4 अंक)
3. दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत ने भारतीय राजनीति के विमर्श को बदल दिया है। वर्णन करिए। (20 अंक)
4. अन्ना हजारे आंदोलन एवं दिल्ली विधानसभा चुनावों में केजरीवाल की जीत के भारतीय राजनीति पर प्रभाव की विवेचना कीजिए। (20 अंक)
नरेंद्र मोदी पर सवाल----
1. लोकसभा चुनाव 2014 पर नरेंद्र मोदी के प्रभाव की विवेचना कीजिए। (20 अंक)
शिव सेना और अकाली दल 1. अकाली दल और शिव सेना की भूमिका (4 अंक)
ऑप्शनल पेपर है इंडियन पॉलिटिक्स----
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में इंडियन पॉलिटक्स ऑप्शनल पेपर है। कई विश्वविद्यालयों में यह अनिवार्य प्रश्न-पत्र भी होता है। इस ऑप्शनल प्रश्नपत्र में भी 2 विकल्प 'पॉलिटिकल पार्टीज इन इंडिया' और 'डिमॉक्रेसी इन इंडिया' हैं। दोनों ही प्रश्नपत्र 100-100 नंबर के हैं। 'इंडियन पॉलिटिकल पार्टीज' नाम से पाठ्यक्रम तय है लेकिन पाठ्य सामग्री तय नहीं होती। पॉलिटिकल पार्टीज पर कोई भी सवाल पूछा जा सकता है लेकिन सामान्य तौर पर परिपाटी रही है कि एक पार्टी पर एक-दो सवाल ही पूछे जाते हैं। प्रश्न-पत्र के सवाल पेपर सेट करने वाले शिक्षक के विवेक पर निर्भर करते हैं। राजनीति शास्त्र के जानकारों का मानना है कि एक पार्टी से जुड़े इतने सवाल पूछना उचित नहीं लगता। इसकी वजह यह है कि पॉलिटकल पार्टीज पूरे पाठ्यक्रम का एक हिस्सा भर हैं।






रविवार, 30 मार्च 2014

भारतीय नववर्ष विक्रम सम्वत् 2071 की शुभकामनाएँ! / HAPPY INDIAN NEW YEAR VIKRAM SAMVAT 2014


-शीतांशु कुमार सहाय
विक्रम सम्वत् 2071 कल मतलब चैत्र शुक्ल पक्ष प्रथमा (31 मार्च 2014) को आरम्भ हो रहा है। विश्वभर में सनातनधर्मी इसी सम्वत् के आधार पर अपना पर्व-त्योहार मनाते हैं। यह सम्वत् चाँद की दिशा व दशा के आधार पर दिन-तिथि निर्धारित करता है। ग्रन्थों की बात मानें तो चैत्र शुक्ल पक्ष प्रथमा के दिन ही आदिशक्ति के आदेश से सृष्टि की रचना आरम्भ की थी। भारतीय दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति आदिशक्ति से मानी जाती है। उन्होंने अपने रूप को जल, स्थल और वायु के साथ-साथ समस्त देवी-देवताओं, मानव व अन्य जीव-जन्तुओं की करोड़ों श्रेणियों में विभक्त किया। आदिशक्ति ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की और ब्रह्माण्ड के कण-कण में वह स्वयं ही विभिन्न रूपों में विद्यमान हैं।
सर्वप्रथम आदिशक्ति ने नीरव शान्ति और भयंकर अन्धेरे के बीच अपने शब्द-स्वरूप ‘ऊँ’ को प्रकट किया जिससे नीली रश्मि उत्पन्न हुई और सर्वत्र ऊँ व्याप्त हो गया। ऊँ के नाद (स्वर) से ब्रह्माण्ड में उथल-पुथल हुई तो गति उत्पन्न हुई और विभिन्न वायु प्रकट हुए। यों सर्वत्र जल-ही-जल दिखायी देने लगा। तब आदिशक्ति ने नारायण (विष्णु) का पुरुषस्वरूप धारण किया। विष्णु के नाभि से एक कमल प्रकट हुआ जिससे ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई।
आदिदेव ब्रह्मा को आदिशक्ति ने सृष्टि का आदेश दिया। ब्रह्मा ने चारों ओर मुख घुमाकर ब्रह्माण्ड की व्यापकता का दर्शन किया तो उनके चार मुख हो गये। उन्होंने अपने अस्तित्व पर विचार करना और अपनी उत्पत्ति वाले स्थान के अन्वेषण में बहुत समय व्यतीत किया पर पता न चला तो तपस्या में लीन हो गये। सौ दिव्य वर्षों तक तपश्चर्या के दौरान उन्हें अन्तःकरण में दिव्य प्रकाश दिखायी दिया। साथ ही नारायण का दर्शन भी प्राप्त हुआ। नारायण ने उन्हें सृष्टि की रचना के लिए उत्प्रेरित किया। सभी मित्रों को भारतीय नववर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएँ!
भारतीय नववर्ष का ऐतिहासिक महत्व---
1. यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है। इस दिन से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 109 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने जगत की रचना प्रारंभ की।
2. विक्रम सम्वत् का पहला दिन : उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होता था जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो, और न ही कोई भिखारी हो। साथ ही राजा चक्रवर्ती सम्राट भी हो। सम्राट विक्रमादित्य ने 2071 वर्ष पहले इसी दिन राज्य स्थापित किया था।
3. प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक दिवस : प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिये चुना।
4. नवरात्र स्थापना : शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन।
5. गुरू अंगददेव प्रगटोत्सव : सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्म दिवस।
6. समाज को श्रेष्ठ मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
7. संत झूलेलाल जन्म दिवस : सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।
8. शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस : विक्रमादित्य की भांति शालिनवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।
9. युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5112 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।
भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व---
1. वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
2. फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
3. नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।
अत: हमारा नववर्ष कई कारणों को समेटे हुए है, अत: हर्षोउल्लास के साथ नववर्ष  मनायें और दूसरो को भी मनाने के लिए प्रेरित करें।


झारखण्ड : मुख्य निर्वाचन आयुक्त वीएस संपत ने चुनाव तैयारियों पर जताया संतोष / Chief Election Commissioner of India VS Sampat in Jharkhand at Ranchi for Preparedness of Loksabha General Election 2014


-शीतांशु कुमार सहाय
30 अप्रैल 2014 को भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त वीएस संपत झारखण्ड में लोकसभा की तैयारियों को जायजा लेने राँची पहुँचे। एकदिवसीय दौरे के क्रम में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, जिला निर्वाची पदाधिकारियों, मुख्य सचिव, गृह सचिव व डीजीपी समेत अन्य अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने चुनाव तैयारियों और सुरक्षा के इंतजाम पर संतोष व्यक्त करते हुए यह उम्मीद जतायी कि झारखंड में आम चुनाव पूरी तरह से स्वतंत्र्ा, निष्पक्ष और भयमुक्त वातावरण में होगा। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने बताया कि मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक में कई सूचनाएं, शिकायतें और इनपुट प्राप्त हुए तथा कई अच्छे सुझाव मिलेे। उन्होंने बताया कि बाद में जिला निर्वाची पदाधिकारियों, आरक्षी अधीक्षकों, आरक्षी महानिरीक्षकों, आरक्षी उपमहानिरीक्षकों के साथ बैठक हुई। फिर मुख्य सचिव, गृह सचिव व पुलिस महानिदेशक के साथ बैठक हुई। इसके अलावा आयकर विभाग के वरीय अधिकारियों के साथ भी बैठक हुई।
उन्होंने बताया कि लोकसभा चुनाव में राज्य की 14 सीटों के लिए कुल 2.03 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इसमें 1.06 करोड़ पुरुष और 99 लाख महिला मतदाता शामिल हैं। उन्होंने बताया कि लोकसभा चुनाव के लिए 5 मार्च 2014 को अधिसूचना जारी होने के बाद मतदाता सूची में मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाये गये जिसमें राज्य में 2.32 लाख नये मतदाताओं को जोड़ा गया है। संपत ने बताया कि आम चुनाव पर नजर रखने के लिए 14 सामान्य पर्यवेक्षक, 13 व्यय पर्यवेक्षक, 5 पोलिंग पर्यवेक्षक तथा 4 अवरनेस पर्यवेक्षकों को ड्यूटी पर लगाया गया है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने बताया कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की ओर से यह बात सामने आयी कि उन्हें प्रचार वाहनों की संख्या समिति करने से उन्हें कठिनाई हो रही है। इस संबंध में जिला निर्वाची पदाधिकारियों को यह निर्देश दिया गया कि अनावश्यक रूप से वाहनों की संख्या को सीमित नहीं किया जाये और जिन वाहनों को प्रचार कार्य में लगाया जाता है, उसका व्यय प्रतिदिन प्रत्याशियों के खर्च मंे जोड़ा जाये। उन्होंने बताया कि घरों मंे झंडा-बैनर लगाने के लिए पूर्वानुमति जरूरी नहीं है और हेलीकॉप्टर उतारने की अनुमति जिला निर्वाची पदाधिकारी देंगे। इसके लिए संबंधित दल के प्रतिनिधियों को जिला प्रशासन के साथ समन्वय करना होगा। उन्होंने बताया कि उम्मीदवारों द्वारा चुनाव प्रचार में किये जा रहे व्यय पर निगरानी के लिए विशेष तौर पर निगरानी रखी जा रही है और व्यय मॉनिटरिंग के इंतजाम किये जा रहे हैं। इसके अलावा राज्य में 256 स्थानों पर चेक पोस्ट बनाकर वाहनों की छानबीन की जा रही है। 295 फ्लाइंग स्क्वायड की टीम गठित की गयी है। जिन क्षेत्र्ाों में चुनाव में अधिक खर्च किये जाने की संभावना है, उन क्षेत्र्ाों में विशेष नजर रखी जा रही है। उन्होंने बताया कि 70 माइक्रो ऑबजर्वर, 865 वीडियो कैमरे व 75 वेब कैमरों से चुनाव पर रखी जायेगी। अब तक 51 लाख रुपये नकद जब्त किये गये हैं। इसके अलावा 66 हजार लीटर अवैध शराब जब्त किये गये हैं और सैकड़ों छापामारी अभियान चलाकर बड़ी संख्या में गिरफ्तारी वारंट का तामिला कराया गया है।
-भाजपा
भाजपा की ओर से वरीय अधिवक्ता अनिल सिन्हा और राकेश प्रसाद के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल ने आज वीएस संपत से मुलाकात की और उनके समक्ष 9 सूत्र्ाी बिन्दुओं पर अपनी बातों को रखा। बाद में पत्र्ाकारों से बातचीत में अनिल सिन्हा ने बताया कि मुख्य रुप से दो प्रमुख मुद्दों चुनाव के दौरान पार्टी सिंबल का उपयोग और घरों में झंडा-बैनर लगाने के मसले पर आयोग का ध्यान दिलाया गया। इसके अलावा अन्य 7 बिन्दुओं पर पार्टी की ओर से ध्यान आकृष्ट कराया गया।
-काँग्रेस
काँग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने आयोग से कुछ दलों के नेताओं की शिकायत सहित यह आग्रह किया कि महिलाओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मतदान केंद्रों को अधिक दूर नहीं रखा जाये।
-आजसू
पार्टी उपाध्यक्ष प्रवीण प्रभाकर ने याद दिलायी कि 4 मार्च 2014 को नयी दिल्ली में सभी राजनीतिक दलों के साथ चुनाव आयोग की बैठक हुई थी। उसमें यह स्पष्ट किया गया था कि पार्टी के कार्यकर्त्ता अपनी इच्छानुसार अपने घरों पर पार्टी का झण्डा लगा सकते हैं लेकिन व्यावहारिक रूप में इसका उलटा हो रहा है। निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देश के नाम पर स्थानीय पुलिस-प्रशासन द्वारा कार्यकर्त्ताओं को अपने घरों पर स्वेच्छा से भी झण्डा नहीं लगाने दिया जा रहा है। इस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने आश्वस्त किया कि पार्टी कार्यकर्ता स्वेच्छा से अपने घरो पर झंडा लगा सकते हैै इसके लिए अनुमति की जरुरत नहीं है। सोशल मीडिया पर सामग्रियों के पूर्व प्रमाणीकरण के निर्देश पर सिर्फ विज्ञापन की सामग्रियों का पूर्व प्रमाणीकरण पर जोर दिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि संबंधित साइट के सदस्य या फॉलोअर को किसी भी सूचना या सामग्री को बिना अनुमति पोस्ट करने की छूट है।  
-राजद
राजद के प्रदेश राजद के प्रवक्ता डॉ. मनोज कुमार, वरिष्ठ नेता विजया पाहन और रामकुमार यादव ने संपत से मुलाकात की। राजद नेताओं की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त को यह जानकारी दी गयी कि चुनाव जैसे महत्वपूर्ण मौके पर आयोग की ओर से विभिन्न राजनीतिक दलों को कई पत्र्ा भेजे जाते है, जो अंग्रेजी में होते हैैं। इस कारण विभिन्न दलों के कई नेता-कार्यकर्त्ता इसे ठीक से समझ नहीं पाते हैं, इसलिए ऐसे महत्वपूर्ण पत्र्ाों को हिन्दी में भी अनुवाद कर उपलब्ध कराया जाये। इसके अलावा पार्टी नेताओं ने क्षेत्र्ाीय भाषाओं में भी पत्र्ा उपलब्ध कराने का आग्रह किया। 

राँची में जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त वीएस संपत प्रेस को सम्बोधित कर रहे थे तो उनके बायें बैठे अधिकारी नींद ले रहे थे। देखिये चित्रों में--






शुक्रवार, 28 मार्च 2014

विदेशी फंड का घपला : काँग्रेस व भाजपा पर दिल्ली उच्च न्यायालय सख्त / FOREIGN FUNDING : DELHI HIGH SOURT RIGOROUS ON CONGRESS & BJP


शीतांशु कुमार सहाय / SHEETANSHU KUMAR SAHAY
लोकसभा आम चुनाव होने वाले हैं। पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) व काँग्रेस के बीच ही मुख्य टक्कर है। पर, इस बीच सबसे आश्चर्य की बात है कि मात्र एक वर्ष की आम आदमी पार्टी (आप) पूरे देश में तीसरे स्थान पर मीडिया के चुनाव कवरेज में बना हुआ है। अब इससे भी आश्चर्य की बात जानिये कि भाजपा और काँग्रेस ने विदेश से करोड़ों रुपयों का राजस्व अवैध तरीके से प्राप्त किया। इसपर शुक्रवार 28 मार्च 2014 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने सख्त रूख अपनाया है। इन दोनों के विरुद्ध 6 माह में जाँच का आदेश दिया है। वैसे यह मालूम हो कि ये दोनों दल आप के विदेशी फण्डिंग पर सवाल खड़ा करते रहे हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से कहा है कि काँग्रेस और भाजपा पर विदेशी फडिंग को लेकर लग रहे आरोपों पर उचित कार्रवाई करे। जस्टिस प्रदीप नंदराजोग और जस्टिस जयंत नाथ की बेंच ने गृह मंत्रालय के रुख को खारिज करते हुए कहा कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियों ने फॉरन कॉन्ट्रिब्यूशन रेग्युलेशन ऐक्ट का उल्लंघन किया है। कोर्ट ने गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि राजनीतिक दलों की रसीदों की दोबारा जांच करके विदेशी फंडिंग की पहचान की जाए और छ: महीने के भीतर कार्रवाई की जाए। कोर्ट का यह आदेश असोसिएशन फॉर डेमॉक्रैटिक रीफॉर्म्स के वकील प्रशांत भूषण की उस जनहित याचिका पर दिया गया है जिसमें दावा किया गया था कि ब्रिटेन की कंपनी वेदांता और भारत में इसकी सहयोगी कंपनियां स्टरलाइट इंडस्ट्रीज, सेसा गोवा और मालको भारत के राजनीतिक दलों काँग्रेस और भाजपा को कई करोड़ रुपये की फंडिंग कर रही हैं। हाई कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि कंपनीज़ ऐक्ट 1956 के हिसाब से वेदांता एक विदेशी कंपनी है। इस हिसाब से इसके और इसकी सहयोगी कंपनियों स्टरलाइट और सेसा को विदेशी सोर्स माना जाए। हाई कोर्ट ने कहा, 'पहली नजर में लगता है कि काँग्रेस और भाजपा साफ-साफ विदेशी फंडिंग पर लगाई गई रोक का उल्लंघन कर रही हैं क्योंकि स्टरलाइट और सेसा से जो धन मिला है वह कानूनन विदेशी धन है।' जनहित याचिका में वेदांता की 2012 की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि 2011-12 में उसने 20.1 लाख डॉलर की राजनीतिक फंडिंग दी। कानूनन कोई भारतीय पार्टी किसी विदेशी कंपनी से फंड नहीं ले सकती। उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि वेदांता कंपनी अधिनियम 1956 के तहत एक विदेशी कंपनी है और विदेशी योगदान (नियमन) अधिनियम, 1976 के तहत वेदांता और इसकी सहायक कंपनियां विदेशी स्रोत हैं। पीठ ने कहा, "प्रथम दृष्टया काँग्रेस और भाजपा ने कानून के दायरे में विदेशी स्रोत माने जाने वाले स्टरलाइट और सेसा से चंदा स्वीकार कर विदेशी योगदान (नियमन) अधिनियम का प्रत्यक्ष उल्लंघन किया है।" एनजीओ और केंद्र सरकार के पूर्व सचिव ईएएस शर्मा द्वारा दायर याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि दोनों पार्टियों ने वेदांता सर्विसेज से चंदा लिया है। याचिका में कहा गया है कि दोनों ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और विदेशी योगदान (नियमन) अधिनियम (एफसीआरए) का उल्लंघन किया है। याचिका के मुताबिक, वेदांता के 2012 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार उसने 2011-12 में 20.1 लाख डॉलर का चंदा दिया है। याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि वित्त मंत्री पी.चिदंबरम मई 2004 तक वेदांता के निदेशक थे, इसलिए सरकार ने खुद इस समूह पर कोई कार्रवाई नहीं की।

सोमवार, 24 मार्च 2014

आधार कार्ड की अनिवार्यता खत्म की सर्वोच्च न्यायालय ने, दिया कड़ा निर्देश / AADHAR CARD IS NOT NECESSARY : SUPREME COURT



-शीतांशु कुमार सहाय।
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह आधार कार्ड को सभी के लिए अनिवार्य बनाने के आदेश को तुरंत वापस ले। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस आदेश के बाद भी कि आधार कार्ड नही होने के कारण किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए, नागरिकों के जबरन आधार कार्ड बनवाने के लिए मजबूर किए जाने पर सरकार को तुरंत इसकी अनिवार्यता खत्म कराने का निर्देश दिया है। केन्द्र की यूपीए सरकार को कड़ा झटका देते हुए न्यायमूर्ति बीएस चौहान की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आधार कार्ड को सबके लिये अनिवार्य बनाने के आदेश को तुरंत वापस लेने का सोमवार 24 मार्च 2014 को निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि मुझे अनेक पत्र मिले हैं जिसमे कहा गया है कि अदालत के आदेश के बावजूद आधार कार्ड बनाना अनिवार्य है। एक पत्र में तो यह लिखा है कि उसकी शादी का पंजीकरण इसलिये नहीं हो सका, क्‍योंकि उसके पास आधार कार्ड नहीं था। ऐसे ही एक और पत्र में लिखा है कि आधार कार्ड नहीं होने के कारण मकान की रजिस्ट्री नहीं हो सकी। पीठ ने कहा कि हम पहले ही आदेश दे चुके हैं कि आधार कार्ड नहीं होने के कारण किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिये और अगर कोई ऐसा निर्देश है कि आधार कार्ड होना अनिवार्य है तो उसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिये। पिछले साल सितंबर में ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आधार कार्ड जनसुविधाओं के लिए जरूरी नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही आधार कार्ड की जानकारी बिना संबंधित शख्स की मंजूरी के साझा नहीं करने का भी निर्देश दिया है।

आपको ज्ञात ही है कि देशभर के गैस एजेंसी वालों ने आधार कार्ड को आधार बनाकर कितनी मनमानी की और ग्राहकों को काफी परेशान किया। केन्द्र व राज्य सरकारें चुप रहीं तब सितम्बर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने आधार कार्ड की अनिवार्यता खत्म कर दी थी मगर तब भी सरकार व उसकी विभिन्न योजनाओं में इसकी अनिवार्यता को समाप्त नहीं किया गया था। इसलिये आज 24 मार्च 2014 को पुनः सर्वोच्च न्यायालय को कड़ा निर्देश देना पड़ा कि जहाँ भी इसकी अनिवार्यता केन्द्र या राज्य सरकारों ने जारी रखा है, उसे तुरन्त समाप्त किया जाये।

23 मार्च (शहादत दिवस) : कुछ देशभक्तों को याद आये शहीद भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु / SAHADAT DIVAS


23 मार्च 2014 को झारखण्ड की राजधानी राँची में चन्द लोगों ने मिलकर शहीदे आजम भगत सिंह व उनके मित्रों राजगुरु व सुखदेव का शहादत दिवस मनाया। स्थानीय मौलाना आजाद कॉलेज की ओर से शहादत पर चर्चा की गयी।

23 मार्च 2014 को कुछ संगठनों ने राँची के अलबर्ट एक्का चौक पर शहादत समारोह मनाया।

23 मार्च 2014 को राँची में शहादत दिवस पर सर्वधर्म प्रार्थना का आयोजन।

23 मार्च 2014 को सामाजिक कार्यकर्ता अन्‍ना हजारे सभी राजनीतिक दलों से तौबा कर पंजाब के अमृतसर के स्‍वर्ण मंदिर में मत्‍था टेकने के लिए पहुँचे। पर, उन्होंने शहादत दिवस पर कुछ नहीं कहा।



रविवार, 23 मार्च 2014

23 मार्च (शहादत दिवस) : भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को श्रद्धांजलि देने की फुर्सत नहीं है किसी को

 लाहौर से प्रकाशित 'द ट्रिब्युन' के बुधवार 25 मार्च 1931 ईश्वी के अंक का प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित सुखदेव, राजगुरु तथा भगत सिंह के फाँसी का समाचार।



-शीतांशु कुमार सहाय।
आज 23 मार्च है। आज ही के दिन सन् 1931 ईश्वी को शहीदे आजम भगत सिंह व उनके दो मित्रों सुखदेव व राजगुरु को अंग्रेजों ने फाँसी दे दी थी। देश की आजादी के लिए जीवन कुर्बान करने वालों के लिए देश के नेताओं के पास श्रद्धांजलि के लिए आज न समय मिला और न शब्द। आश्चर्य है कि लोकसभा निर्वाचन की गहमागहमी के दौरान विभिन्न दलों के छोटे-बड़े नेताओं ने देशभर में हजारों सभाएँ कीं मगर किसी को भी उन शहीदों की याद न आयी। दूसरी तरफ जिस गद्दार शोभा सिंह की गवाही पर इन देशभक्तों को मौत की सजा दी गयी, उसके बेटे खुशवन्त सिंह की तीन दिनों पूर्व 20 मार्च 2014 को मौत हुई तो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर तमाम बड़े-छोटे नेताओं ने शोक में उसके प्रति कसीदे पढ़े। सबने खुशवन्त को महान बताया, उनके बाप को आधी दिल्ली का निर्माता बताया। पर, किसी ने इतिहास का वह सच नहीं बताया कि खुशवन्त का पिता ही वह सख्श था जिसके मुँह खोलने से भारत माँ के तीन सपूतों की जीवनलीला समाप्त हो गयी!
इस सन्दर्भ में मैं 20 मार्च 2014 को खुशवन्त पर जो लिखा था, उसे अपने मित्रों के लिए एक बार फिर से पेश कर रहा हूँ---

देशद्रोही के पुत्र खुशवन्त सिंह की मौत
20 मार्च 2014 ईश्वी तदनुसार चैत्र कृष्ण पक्ष पंचमी विक्रम सम्वत् 2070 को खुशवन्त सिंह का 99 वर्षों की अवस्था में निधन हो गया। पूरे इण्टरनेट पर एक गद्दार के बेटे के मरने पर शोक से भरे समाचार भरे पड़े हैं। पर, जिन्होंने शोक के शब्द कहे या शोक के शब्द लाचारी में बोले या लिखित शोक-संदेश पढ़े, वे शायद इतिहास को नहीं जानते या इतिहास को जान-बूझकर नजरअंदाज कर रहे हैं। ऐसे तमाम लोगों को खुशवन्त की असलियत भी जाननी चाहिये। अंग्रेजी सरकार के पिट्ठू बन गए थे खुशवन्त के पिता। भारत की आजादी के इतिहास को जिन अमर शहीदों के रक्त से लिखा गया है, जिन शूरवीरों के बलिदान ने भारतीय जन-मानस को सर्वाधिक उद्वेलित किया है, जिन्होंने अपनी रणनीति से साम्राज्यवादियों को लोहे के चने चबवाए हैं, जिन्होंने परतन्त्रता की बेड़ियों को छिन्न-भिन्न कर स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया है तथा जिन पर जन्मभूमि को गर्व है, उनमें से एक थे भगत सिंह। शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के बलिदान को शायद ही कोई भुला सकता है। आज भी देश का बच्चा-बच्चा उनका नाम इज्जत के साथ लेता है। जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी आत्मकथा में यह वर्णन किया है– ''भगत सिंह एक प्रतीक बन गया। सैण्डर्स के कत्ल का कार्य तो भुला दिया गया लेकिन चिह्न शेष बना रहा और कुछ ही माह में पंजाब का प्रत्येक गाँव और नगर तथा बहुत कुछ उत्तरी भारत उसके नाम से गूँज उठा। उसके बारे में बहुत से गीतों की रचना हुई और इस प्रकार उसे जो लोकप्रियता प्राप्त हुई वह आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।''
भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ खुशवन्त के पिता ने दी थी गवाही---
जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में असेंबली में बम फेंकने का मुकद्दमा चला तो भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ गवाही देने को कोई तैयार नहीं हो रहा था। बड़ी मुश्किल से अंग्रेजों ने कुछ लोगों को गवाह बनने पर राजी कर लिया। इनमें से एक था खुशवन्त का पिता शोभा सिंह। मुकद्दमे में भगत सिंह को पहले देश निकाला मिला फिर लाहौर में चले मुकद्दमें में उन्हें उनके दो साथियों समेत फाँसी की सजा मिली जिसमें अहम गवाह था शादी लाल।
खुशवन्त के पिता की गद्दारी के ऐतिहासिक दस्तावेज---
प्रेमचंद सहजवाला ने भगत सिंह के कई अनछुए पहलुओं पर एक अनोखी किताब लिख रखी है। किताब का नाम है, ‘भगत सिंह, इतिहास के कुछ और पन्ने‘। जिस दिन भगत सिंह ने असेंबली में बम फेंका था उस दिन के बारे में विस्तार से बताया गया है। किताब के मुताबिक शोभा सिंह ने न सिर्फ गवाही दी थी, बल्कि भगत सिंह को पकड़वाया भी था। किताब मे प्रमुख इतिहासकार ए जी नूरानी के हवाले से लिखा गया है--- ''शोभा सिंह, जो कि नई दिल्ली के निर्माण में प्रमुख ठेकेदार थे, अभी-अभी गैलरी में प्रविष्ट हुए थे। वे अपने चंद मित्रों के चेहरे खोज रहे थे जिनके साथ उन्हें बाद में भोजन करना था….. ठीक इसी क्षण धमाक-धमाक की आवाज से दोनों बम गिरे थे। सभी भागने लगे, लेकिन शोभा सिंह दोनों पर नजर रखने के लिए डटे रहे…. जैसे ही पुलिस वाले आए शोभा सिंह ने दो पुलिसकर्मियों को उनकी ओर भेजा और स्वयं भी उनके पीछे लपके… पुलिस जब नौजवानों के निकट पहुंची तब किसी भी अपराध बोध से मुक्त अपने किए पर गर्वान्वित दोनों वीरों ने खुद ही अपनी गिरफ़्तारी दी…।''
शोभा सिंह व शादी लाल को गद्दारी का इनाम---
दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले। शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले जबकि शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है। लेकिन शादी लाल को गाँव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा तक नहीं दिया। शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था। इस नाते शोभा सिंह खुशनसीब रहा। उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर पंजाब में कोट सुजान सिंह गांव और दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है) को राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में हजारों एकड़ जमीन मिली और खूब पैसा भी। शोभा सिंह को अंग्रेजों ने ‘सर’ की उपाधि दी थी। खुशवंत सिंह ने खुद भी लिखा है कि ब्रिटिश सरकार ने उनके पिता को न सिर्फ महत्वपूर्ण ठेके दिए बल्कि उनका नाम नॉर्थ ब्लॉक में लगे पत्थर पर भी खुदवाया था। इतना ही नहीं, खुशवंत सिंह के ससुर यानि शोभा सिंह के समधी पहले ऐसे भारतीय थे जिन्हें सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (सीपीडब्ल्यूडी) का प्रमुख बनने का ‘अवसर’ प्राप्त हुआ था। कहते हैं ‘सर’ शोभा सिंह और उसके परिवार को दो रुपए प्रति वर्ग गज पर वह जमीन मिली थी जो कनॉट प्लेस के पास है और आज दस लाख रुपए वर्ग गज पर भी उपलब्ध नहीं है।
अपने को प्रतिष्ठित करते रहे खुशवन्त---
शोभा सिंह के बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर पत्रकारिता शुरु कर दी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया। सर सोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता है। आज दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंबा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था। खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देश भक्त और दूरद्रष्टा निर्माता साबित करने का भरसक कोशिश की। खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की भी कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की। खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेका था। बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही तो दी, लेकिन इसके कारण भगत सिंह को फांसी नहीं हुई। शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था। हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की। खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं, बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जुटे गद्दार को महिमामण्डित करने---
अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और खुशवंत सिंह की नज़दीकियों का ही असर कहा जाए कि प्रधानमंत्री ने बाकायदा पत्र लिख कर दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से अनुरोध किया कि कनॉट प्लेस के पास जनपथ पर बने विंडसर प्लेस नाम के चौराहे (जहां ली मेरीडियन, जनपथ और कनिष्क से शांग्रीला बने तीन पांच सितारा होटल हैं) का नाम सर शोभा सिंह के नाम पर कर दिया जाए। हालाँकि अबतक ऐसा नहीं हो पाया है; क्योंकि इसका भारी विरोध भी हुआ। क्या मनमोहन सिंह को इतिहास की जानकारी नहीं कि वे देशभक्त के विरोध में अंग्रेजों के पक्ष में गवाही देने वाले को प्रतिष्ठित करने का लिखित आदेश दे दिया। आश्चर्य होता है ऐसी काँग्रेसी सरकार पर और उसके मुखिया पर! गृह मंत्रालय को हारकर प्रधानमंत्री की अपील और दिल्ली सरकार के प्रस्ताव को मानने से मना करना पड़ गया।
पिता के पक्ष से सफाई दी थी खुशवन्त ने---
जब खुशवन्त के पिता के नाम से दिल्ली में चौक का नाम नहीं पड़ा तो हिन्दुस्तान टाइम्स के अपने साप्ताहिक स्तम्भ 'विद मैलिस टूवार्ड्स वन एंड ऑल'  में खुशवंत सिंह ने अपने पिता को ‘सच्चा इन्सान’ बताया। लेख का शीर्षक है- 'जब सच बोलना अपराध बन गया'। लेख कुछ इस प्रकार है--- ''कुछ वक्त पहले मैंने नई दिल्ली बनाने वालों पर लिखा था। उनमें पांच लोग खास थे। मेरी शिकायत थी कि उनमें से किसी के नाम पर दिल्ली में सड़क नहीं है। तब तक मुझे नहीं पता था कि मनमोहन सिंह ने शीला दीक्षित को इस सिलसिले में एक चिट्ठी लिखी है। उनकी गुजारिश थी कि विंडसर प्लेस को मेरे पिता शोभा सिंह के नाम पर कर दिया जाए। उसके बाद एक किस्म का तूफान ही आ गया। कई लोगों ने विरोध जताया कि मेरे पिता तो ब्रिटिश सरकार के पिट्ठू थे। मैंने उस पर कुछ भी नहीं कहा। जब कुछ अखबारों ने उनका नाम भगत सिंह की सजा से जोडा, तो मुझे तकलीफ हुई। सचमुच, उस खबर में कोई सच नहीं था। दरअसल, शहीद भगत सिंह और उनके साथियों ने इंस्पेक्टर सांडर्स और हेड कांस्टेबल चन्नन सिंह की हत्या की थी। वे इन दोनों से लाला लाजपत राय का बदला लेना चाहते थे। लाहौर में लालाजी की हत्या में उनका हाथ था। उसके बाद भगत सिंह और उनके साथी हिन्दुस्तान की आजादी के आंदोलन को दुनिया की नजरों में लाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने तय किया कि संसद में हंगामा करेंगे। और फिर अपनी गिरफ्तारी दे देंगे। ठीक यही उन्होंने किया भी। ये लोग दर्शक दीर्घा में जा बैठे। वहीं मेरे पिता भी बैठे थे। संसद में बहस चल रही थी। और वह खासा उबाऊ थी। सो मेरे पिता ने अखबार निकाला और उसे पढ़ने लगे। अचानक पिस्टल चलने और बम के धमाके की आवाज सुनी। वहां बैठे बाकी लोग भाग लिए। रह गए मेरे पिता और दो क्रांतिकारी। जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने आई, तो उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। मेरे पिता का जुर्म यह था कि उन्होंने कोर्ट में दोनों की पहचान की थी। दरअसल, मेरे पिता ने सिर्फ सच कहा था। सच के सिवा कुछ नहीं। क्या सच कहना कोई जुर्म है? फिर भी मीडिया ने शहीदों की फांसी से उन्हें जोड़ दिया। सचमुच उनका क्रांतिकारियों की फांसी से कोई लेना-देना नहीं था। यह एक ऐसे आदमी पर कीचड़ उछालना है, जो अपना बचाव करने के लिए दुनिया में नहीं है।''  हालांकि खुशवंत सिंह ने यह तो कुबूल किया था कि उनके मरहूम पिता ने भगत सिंह की शिनाख्त की थी, लेकिन शायद यह छिपा गए थे कि उनके पिता इस हद तक अंग्रेजी सरकार के पिट्ठू बन गए थे कि सिपाहियों के मददगार बनकर क्रांतिवीरों की गिरफ्तारी का इनाम लेने में जुट गए थे।
खुशवन्त के चाचा सरदार उज्जल सिंह---
शोभा सिंह के छोटे भाई उज्जल सिंह, जो पहले से ही राजनीति में सक्रिय थे, को 1930-31 में लंदन में हुए प्रथम राउंड टेबल कांफ्रेंस और 1931 में ही हुए द्वितीय राउंड टेबल कांफ्रेंस में बतौर सिख प्रतिनिधि लंदन भी बुलाया गया। उज्जल सिंह को वाइसरॉय की कंज्युलेटिव कमेटि ऑफ रिफॉर्म में रख लिया गया था। हालांकि जब सिखों ने कम्युनल अवार्ड का विरोध किया तो उन्होंने इस कमेटि से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन फिर 1937 में उन्हें संसदीय सचिव बना दिया गया। 1945 में उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कनाडा में यूएन के फूड एंड एग्रीकल्चर कांफ्रेंस में प्रतिनिधि बना कर भेजा और जब 1946 में संविधान बनाने के लिए कॉन्सटीच्युएंट असेंबली बनी तो उसमें भी शोभा सिंह के इस भाई को शामिल कर लिया गया। अंग्रेजों ने तो जो किया वह ‘ वफादारी ’ की कीमत थी, लेकिन आजादी के बाद भी कांग्रेस ने शोभा सिंह के परिवार पर भरपूर मेहरबानी बरपाई। उज्जल सिंह को न सिर्फ कांग्रेसी विधायक, मंत्री और सांसद बनाया गया बल्कि उन्हें वित्त आयोग का सदस्य और बाद में पंजाब तथा तमिलनाडु का राज्यपाल भी बनाया गया। अभी हाल ही में दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग पर मौजूद उनकी 18,000 वर्गफुट की एक कोठी की डील तय हुई तो उसकी कीमत 160 करोड़ आंकी गई थी।
अमीरी में बीता खुशवंत का जीवन---
खुशवंत सिंह का जीवन भी कम अमीरी में नहीं बीता। उन्होंने अपने पिता के बनाए मॉडर्न स्कूल और सेंट स्टीफेंस के बाद लंदन के किंग्स कॉलेज व इनर टेंपल जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई की थी, जिसके बाद उन्होंने लाहौर में वकालत भी की, लेकिन आजादी के बाद दिल्ली आ गए और लेखन तथा पत्रकारिता शुरु कर दी। उन्होंने सरकारी पत्रिका ‘योजना’ का संपादन किया और फिर साप्ताहिक पत्रिका इलसट्रेटेड वीकली तथा नैश्नल हेराल्ड और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अखबारों के ‘सफल’ कहलाने वाले संपादक रहे। कहा जाता है कि खुशवंत सिंह ने अधिकतर उन्हीं अखबारों का संपादन किया जो कांग्रेस के करीबी माने जाते थे।
एक नजर डालिये शोक-संदेशों पर---
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित कई गणमान्य लोगों ने जाने माने लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह के निधन पर शोक जताया और उन्हें श्रद्धांजलि दी। खुशवंत सिंह का 99 वर्ष की आयु में गुरुवार को निधन हो गया। प्रधानमंत्री ने खुशवंत को प्रतिभाशाली लेखक, स्पष्टवादी टिप्पणीकार और एक प्रिय मित्र बताया जिन्होंने सही रूप में सजनात्मक जीवन जीया। वयोवृद्ध लेखक पिछले कुछ समय से बीमार थे और सार्वजनिक जीवन से दूर रह रहे थे। उनके पुत्र और पत्रकार राहुल सिंह ने बताया कि उन्होंने सुजान सिंह पार्क स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी और दिवंगत आत्मा की शांति की कामना की। पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने सिंह के साथ टेनिस खेलने की बात याद की। उन्होंने कुछ शॉटों पर उनकी हंसी को याद करते हुए कहा कि वे आनंद के लिए खेलते थे, न कि प्रतिस्पर्धा के लिए। खुशवंत सिंह से जुड़े रहे लोगों ने उन्हें सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी और उनके साथ बिताए क्षणों को याद किया। वरिष्ठ पत्रकार मार्क टली ने उन्हें महान लेखक बताते हुए कहा कि खुशवंत सिंह का हास्यबोध काफी अच्छा था। टली ने कहा कि वह काफी स्पष्टवादी और साहसी व्यक्ति थे। उन्होंने कहा कि उन्हें याद है कि एक बार वह खुशवंत सिंह के साथ रात का खाना खा रहा था, जब सिंह ने उर्दू शायरी के अपना व्यापक ज्ञान से उनका परिचय कराया। टली के अनुसार खुशवंत एक प्यारा इंसान थे।


 शहीदों को श्रद्धांजलि दें और उनके अन्तिम क्षणों को पुनः याद करें---
आइये, गद्दारों से देश की रक्षा का संकल्प लेते हुए शहीदों को श्रद्धांजलि दें और उनके अन्तिम क्षणों को पुनः याद करें। सोमवार 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फाँसी पर जाने से पहले वे राम प्रसाद 'बिस्मिल' की जीवनी पढ़ रहे थे जो सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान का एक सूबा) के एक प्रकाशक भजन लाल बुकसेलर ने आर्ट प्रेस, सिन्ध से छापी थी। जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले- "ठीक है अब चलो।"
फाँसी पर जाते समय भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु तीनों मस्ती से गा रहे थे--
''मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला...''
फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गाँधी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे। इस कारण जब गाँधी काँग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गाँधी का स्वागत किया। एकाध जग़ह पर गाँधी पर हमला भी हुआ किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया।