सोमवार, 25 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : पंचम् स्कन्दमाता / Navaratra : Nine Forms of Mother Durga : Fifth Skandamata

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के पंचम दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के पंचम स्वरूप ‘स्कन्दमाता’ की आराधना की जाती है। भगवान कार्त्तिकेय का एक अन्य नाम ‘स्कन्द’ भी है। स्कन्द को उत्पन्न करने के कारण माँ दुर्गा के पाँचवें रूप को ‘स्कन्दमाता’ कहा गया। इन्हें पंचम दुर्गा भी कहा जाता है। 
इस स्वरूप में माँ सिंह पर बैठी हैं। उन की गोद में भगवान स्कन्द अपने बालरूप में स्थित हैं। चार भुजाओंवाली देवी स्कन्दमाता खिले कमल के समान सदैव प्रसन्नता का प्रसाद बाँटती हैं। माता अपनी ऊपरवाली दायीं भुजा से गोद में बैठे पुत्र स्कन्द को पकड़ी हुई हैं। दाहिनी तरफ की नीचेवाली भुजा जो ऊपर की ओर मुड़ी हुई है, उस में कमल है। इसी तरह बायीं तरफ की ऊपरी भुजा वरमुद्रा में है। निचली बायीं भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उस में कमल है।
दो हाथों में कमल धारण करनेवाली माता सदैव भक्तों को कमल की तरह आनन्द प्रदान करने को तत्पर हैं। वह कमल के ही आसन पर विराजमान हैं, अतः इन्हें ‘कमलासना’ देवी अथवा ‘पद्मासना’ देवी भी कहते हैं। इन के शरीर का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है।
नवरात्र के पाँचवें दिन योगीजन आदिशक्ति का ध्यान विशुद्धि चक्र में लगाते हैं। गर्दन के निकट यह चक्र स्थित है। सिद्ध योगी खेचरी मुद्रा से यहीं अमृत का पान करते हैं। शुद्धिकरण का प्रतीक है विशुद्धि चक्र जो सोलह पंखुड़ियोंवाला कमल है। इस कमल का रंग जामुनी मिश्रित धुएँ के रंग का है। विशुद्धि चक्र के सोलह पंखुड़ियों पर क्रमशः अं, आं, इं, ईं, उं, ऊं, ऋं, ऋंृ, लृं, लृं, एं, ऐं, ओं, औं, अं, अंः मंत्र अंकित हैं। इस कमल के मध्य श्वेत वृत्त है। विशुद्धि चक्र का बीजमन्त्र हं है और वाहन श्वेत गज (उजला हाथी) है जो आकाश का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव अर्द्धनारीश्वर तथा देवी साकिनी हैं जिन का अधिकार अस्थियों पर है।
विशुद्धि चक्र पर ध्यान केन्द्रित कर स्कन्दमाता की आराधना करनी चाहिये। देवी स्कन्दमाता अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। वह भक्त के दोषों को क्रमशः दूर करती जाती हैं और अन्ततः शुद्ध कर विशुद्धि चक्र की सिद्धि प्रदान करती हैं।
सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण माँ स्कन्दमाता की आराधना से सूर्य के समान अद्भुत तेज व कान्ति की प्राप्ति होती है। इन की पूजा करने से स्वतः ही बालरूप भगवान कार्त्तिकेय अर्थात् स्कन्द की भी पूजा हो जाती है। अतः स्कन्दमाता की पूजार्चना अवश्य करनी चाहिये।
भक्तों के आभामण्डल को सुदृढ़ और अभेद्य बनानेवाली माँ स्कन्दमाता को हाथ जोड़कर चरणों में प्रणाम करें-
सिंहासन नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।

रविवार, 24 सितंबर 2017

नवरात्र : माता दुर्गा के नौ रूप : चतुर्थ कूष्माण्डा / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Fourth Kushmanda

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के चतुर्थ दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप कूष्माण्डा की आराधना की जाती है। जब आदिशक्ति ने अपनी मन्द मुस्कान से अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया तब उन्हंे ‘कूष्माण्डा’ कहा गया। इसी रूप में माता समस्त जड़-चेतन की पूर्वज हैं, सब का आदि हैं मगर उन का आदि कोई नहीं। भयानक अन्धकार के बीच आदिशक्ति कूष्माण्डा ने प्रसन्न मुद्रा में अपनी मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना की और सृष्टि क्रम को आरम्भ किया। 
माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप के नामकरण का एक अन्य कारण है। संस्कृत शब्द ‘कूष्माण्डा’ का हिन्दी अर्थ कुम्हड़ा या कोहरा है। यह एक प्रकार की सब्जी है जिस की बलि माता को अत्यन्त प्रिय है। अतः इन्हें कूष्माण्डा कहा गया। इन्हंे चतुर्थ दुर्गा भी कहते हैं। 
आठ भुजाओंवाली माँ कूष्माण्डा सिंह पर सवार हैं। इन की सात भुजाओं में क्रमशः कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल, अमृत से भरा कलश, चक्र व गदा हैं। माता ने इस रूप में आठवीं भुजा में समस्त निधियों और सिद्धियों को देनेवाला जपमाला धारण किया है।
योगीजन माता के इस स्वरूप का ध्यान अनाहत चक्र पर करते हैं। यह चक्र बारह पंखुड़ियोंवाला नीला कमल है। इन पंखुड़ियों पर क्रमशः कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ´ं, टं, ठं मन्त्र अंकित हैं। मध्य में षट्कोण आकृति है जो दो त्रिभुजों के मिलने से बनी है। अनाहत चक्र का बीजमन्त्र यं है और वाहन शीघ्रगामी काला हिरन है जो वायु का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव ईशा हैं और देवी काकिनी हैं जो तैलीय तत्त्व पर अधिकार रखती हैं। 
नवरात्र के चौथे दिन आराधक को अनाहत चक्र में ध्यान लगाना चाहिये। योगीजन ध्यान के माध्यम से माँ कूष्माण्डा का दर्शन-पूजन अनाहत चक्र में ही करते हैं। 
माता अपने उपासकों के समस्त रोग व शोक हर लेती हैं और आयुष्य, बल, यश और आरोग्य का वरदान देती हैं। कूष्माण्डा देवी की शरण में पूर्ण निष्ठाभाव से आनेवाले भक्तों का कल्याण सुनिश्चित हो जाता है। ऐसे साधक सुगमतापूर्वक परमधाम को प्राप्त कर लेते हैं। अतः माँ कूष्माण्डा की भक्ति अवश्य करनी चाहिये। 
माता दुर्गा अपने चौथे रूप में सूर्यमण्डल या सूर्यलोक में निवास करती हैं। माता कूष्माण्डा के शरीर कीे कान्ति और प्रभा से ही ब्रह्माण्ड के सभी सूर्य (प्रकाश उत्पन्न करनेवाले तारे) चमक रहे हैं। असंख्य सूर्यों के तेज से भी अधिक उज्ज्वल स्वरूपा माता अपनी स्थायी मुस्कान से भक्तों को प्रसन्न व आनन्दित करती रहती हैं। समस्त प्रकाश पुंजों में देवी कूष्माण्डा का ही तेज समाहित है। इन्हीं का तेज सभी प्राणियों व निर्जीवों में प्रसारित हो रहा है।
कष्टनिवारिणी माता कूष्माण्डा को हाथ जोड़कर चरणों में प्रणाम करें-
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।

शनिवार, 23 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : तृतीय चन्द्रघण्टा / Navaratra : Nine Forms of Mother Durga : Third Chandraghanta

-शीतांशु कुमार सहाय 
नवरात्र के तीसरे दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के तृतीय स्वरूप चन्द्रघण्टा की आराधना की जाती है। इन के मस्तक में घण्टे के आकारवाला अर्द्धचन्द्र है। अतः इन्हें ‘चन्द्रघण्टा’ कहा जाता है। स्वर्ण के समान आभावाला यह स्वरूप परमशान्ति देनेवाला है। ये शीघ्र ही भक्तों का कल्याण करती हैं। इन्हें तृतीय दुर्गा भी कहते हैं।
माँ चन्द्रघण्टा दस भुजाओंवाली हैं जो भक्तों के कल्याण के लिए कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को धारण करती हैं। माँ ने इस रूप में तीर, धनुष, तलवार, गदा, त्रिशूल, कमल, कमण्डलु, जप माला, आशीर्वाद मुद्रा व ज्ञान मुद्रा धारण किया है। इस रूप में माँ सदा असुरों से युद्ध के लिए तैयार हैं। सिंह की सवारी करनेवाली चन्द्रघण्टा देवी के घण्टे की विचित्र ध्वनि से असुर सदा भयभीत रहते हैं। अतः माता दुर्गा के इस तीसरे स्वरूप की पूजा-उपासना करनेवाले भक्तों को दुर्गुण, व्याधि व विविध प्रकार के कष्टों के असुर तंग नहीं करते।
माता चन्द्रघण्टा की असीम कृपा से भक्त प्रसन्न रहते हैं, पाप मिट जाते हैं और बाधाएँ प्रबल नहीं हो पातीं। भक्त सिंह की तरह पराक्रमी व निर्भय हो जाते हैं और उन में सौम्यता व विनम्रता का विकास होता है। माँ दुर्गा के इस तीसरे स्वरूप का उपासक कान्तिवान और ऊर्जावान हो जाता है। उस के स्वर में अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है और मुखमण्डल पर प्रसन्नता छायी रहती है। ऐसे साधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। इस कारण उस के सम्पर्क में आनेवाले लोग को भी अत्यन्त लाभ होता है।
दुर्गा के तीसरे रूप चन्द्रघण्टा को जब भी कोई भक्त पुकारता है, उन्हें स्मरण करता है, उन की स्तुति करता है या उन की शरण में जाता है तो माता का घण्टा प्रकम्पित हो उठता है। यों भक्त शीघ्र ही कष्टमुक्त हो जाता है।
योग के माध्यम से माँ चन्द्रघण्टा को मणिपुर चक्र में स्थित मानकर आराधना करनी चाहिये। मणिपुर चक्र दस पंखुड़ियोंवाला पीला कमल है जिस पर डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं और फं मन्त्र अंकित हैं। इस के मध्य में लाल रंग का उल्टा त्रिभुज है। इस चक्र का बीजमन्त्र रं और वाहन चमकदार भेड़ है जो आघात पहुँचानेवाले चौपाये पशु का प्रतीक है। मणिपुर चक्र के इष्टदेव रुद्र और देवी लाकिनी हैं जिन का अधिकार मांसपेशियों पर है।
नवरात्र के तीसरे दिन भक्त को मणिपुर चक्र पर ही ध्यान लगाना चाहिये। ऐसा करने से भक्त को कई दिव्य व अलौकिक अनुभूतियाँ होती हैं। दिव्य सुगन्ध, दिव्य दर्शन, दिव्य संगीत व दिव्य ज्ञान का लाभ भक्तों को प्राप्त होता है। ध्यान के दौरान प्राप्त होनेवाले इन लाभों पर अहंकार में वृद्धि नहीं हो, इस के लिए भक्त को निरन्तर सावधान रहना चाहिये। भव-बाधा को समाप्त कर कल्याण का मार्ग प्रशस्त करनेवाली ममतामयी माता चन्द्रघण्टा का हाथ जोड़कर नमन करें-
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : द्वितीय ब्रह्मचारिणी / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Second Brahmacharini

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के द्वितीय दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के द्वितीय स्वरूप ‘ब्रह्मचारिणी’ की आराधना की जाती है। वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म- वेद, तत्त्व तथा तप ब्रह्म शब्द के अर्थ हैं। चूँकि ब्रह्म का एक अर्थ तप भी है, अतः ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करनेवाली। दाहिने हाथ में जप की माला और बायें हाथ में कमण्डलु धारण करनेवाली द्विभुजा माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यन्त भव्य और पूर्णतः ज्योतिर्मय है। इन्हें ‘तपश्चारिणी’ भी कहते हैं। इन्हें द्वितीय दुर्गा कहा गया है।
अपने एक जन्म में जब आदिशक्ति ने अपने को पार्वती नाम से हिमालय की पुत्री के रूप में प्रकट किया तो भगवान शंकर को पति रूप में पाने के लिए व्यग्र हो उठीं, तब देवर्षि नारद ने उन्हें शंकर को वरण करने के लिए कठिन तपस्या करने का परामर्श दिया। एक हजार वर्षों तक फल-मूल पर तो सौ वर्षों तक केवल साग ग्रहणकर तपस्या मेें लीन रहीं। इस के पश्चात् पूर्णतः उपवास आरम्भ कर दिया। उपवास के साथ वह खुले आकाश तले वर्षा, धूप आदि के कष्ट सहती रहीं। इस के बाद तीन हजार वर्षों तक भूमि पर टूटकर गिरे बेलपत्रों को ग्रहणकर भगवान शंकर की आराधना में माता लीन रहीं। तत्पश्चात् उन्होंने और दुष्कर तप आरम्भ किया। सूखे बेलपत्रों को भी भोजन के रूप में ग्रहण करना छोड़ दिया और कई हजार वर्षों तक बिना जल व बिना आहार के तपस्या करती रहीं। इस तरह के कठोर तप करने के कारण माँ पार्वती का नाम तपश्चारिणी या ब्रह्मचारिणी हो गया। पत्रों या पत्तों को ग्रहण करना छोड़ देने के कारण माता ब्रह्मचारिणी को ‘अपर्णा’ भी कहा गया। इस सन्दर्भ में गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में कहा है- ‘‘उमा नाम तब भयउ अपर्णा।’’ विदित हो कि पत्ते को संस्कृत में पर्ण भी कहते हैं।
हजारों वर्षों तक निरन्तर तपस्यारत रहने के कारण माँ ब्रह्मचारिणी का शरीर क्षीण हो गया। वह अत्यन्त कृषकाय (दुबली) हो गयीं। उन की इस दशा को देखकर उन की माता मेना अत्यन्त दुःखित हुईं। अपनी पुत्री को तपस्या से विरत करने के लिए माता ने कहा- उ...मा,.....अरे नहीं,.....ओ नहीं...। यों माता आदिशक्ति का एक नाम ‘उमा’ भी पड़ गया।
माँ ब्रह्मचारिणी की तपस्या से समस्त लोकों में हलचल मच गया। देव, देवी, ऋषि- सभी उन का गुणगान करने लगे। उन की कठिन तपस्या की प्रशन्सा चहुँओर होने लगी। तीनों लोकों में माँ की स्तुति होने लगी। आकाशवाणी से भगवान ब्रह्मा ने माता ब्रह्मचारिणी से कहा- ‘‘हे देवी! अब तक किसी ने ऐसी कठिन तपस्या नहीं की। ऐसी तपस्या आप से ही सम्भव थी। आप के इस अलौकिक कृत्य की चहुँओर प्रशंसा हो रही है। आप की मनोकामना पूर्ण होगी। भगवान चन्द्रमौलि शिव आप को पति के रूप में प्राप्त होंगे। अब आप तपश्चर्या को त्यागकर निजगृह को लौट जायंे। शीघ्र ही आप के पिता आप को बुलाने आ रहे हैं।’’ इस तरह माता ब्रह्मचारिणी पिता के साथ घर लौट आयीं और बाद में भव्य तरीके से भगवान शिव से उन का विवाह हुआ।
अपने भक्तों को साधना का फल प्रदान करता है माँ दुर्गा का दूसरा स्वरूप। इन की आराधना से तप की प्रगाढ़ता में वृद्धि होती है। सदाचार, त्याग, वैराग्य, संयम, वाक्शुद्धि आदि सद्गुणों में अभिवृद्धि होती है। साथ ही सभी तरह के दुर्गुण कम होते जाते हैं, समाप्त होते जाते हैं।
योग के माध्यम से माता ब्रह्मचारिणी की आराधना करनेवाले भक्त स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान लगाते हैं। इस चक्र में ब्रह्मचारिणी का दर्शन करने से भक्ति अत्यन्त प्रगाढ़ हो जाती है। स्वाधिष्ठान चक्र तेज लाल रंग का कमल है जिस की छः पंखुड़ियों पर क्रमशः बं, भं, मं, यं, रं, लं मन्त्र अंकित हैं। इस चक्र के मध्य में अर्द्धचन्द्र है। स्वाधिष्ठान चक्र का बीजमन्त्र वं और वाहन मगर है जो जल का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव विष्णु तथा देवी राकिनी हैं जिन का अधिकार रक्त पर है।
माता ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों को कठिन संघर्ष की स्थिति में भी कर्त्तव्य-पथ से विचलित नहीं होने देतीं और विजयश्री दिलाती हैं। किसी कार्य को करने में एकाग्रता अनिवार्य है जिस की प्राप्ति माँ ब्रह्मचारिणी की पूजार्चना से होती है। माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी की हाथ जोड़कर आराधना करें-
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : प्रथम शैलपुत्री / Navaratra : Nine Forms of Mother Durga : First Shailputri

-शीतांशु कुमार सहाय
माँ दुर्गा के नौ रूप हैं- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री। ‘मार्कण्डेयपुराण’ में माँ नवदुर्गा का भक्तिपूर्ण परिचय 700 श्लोकों में व्यक्त किया गया है जिन्हंे ‘दुर्गासप्तशती’ कहा जाता है। ‘दुर्गासप्तशती’ ग्रन्थ के वर्णन के अनुसार, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने जिन श्लोकों से माँ आदिशक्ति की आराधना की, उन श्लोकों को सम्मिलित रूप से ‘रात्रि सूक्त’ कहते हैं। इस में नवदुर्गा का मन्त्र इस प्रकार है-
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। 
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना।।

प्रथम शैलपुत्री 

नवरात्र के प्रथम दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की आराधना की जाती है। पर्वत को संस्कृत में ‘शैल’ भी कहते हैं। अतः पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण देवी का नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। 
वृषभ (साँढ़) की सवारी करनेवाली माता शैलपुत्री द्विभुजा हैं। दायें हाथ में त्रिशूल व बायें हाथ में कमल का फूल धारण करती हैं। इन्हें प्रथम दुर्गा भी कहा जाता है। माता शैलपुत्री का विवाह भगवान शंकर से हुआ। प्रत्येक जन्म की भाँति इस जन्म में भी शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए शैलपुत्री को तपस्या करनी पड़ी। 
पर्वत की पुत्री होने के कारण इन्हें ‘पार्वती’ भी कहा जाता है। पिता हिमालय के नाम के आधार पर इन्हें ‘हैमवती’ या ‘हेमवती’ की संज्ञा भी दी जाती है। माता ने हैमवती स्वरूप में देवताओं के गर्व व अहंकार को समाप्त किया था। अतः माँ को ‘देवगर्वभंजिका’ भी कहा गया।
नवरात्र के प्रथम दिन कलश स्थापित करने के पश्चात् वृषारूढ़ा शैलपुत्री की विधिवत् पूजा की जाती है। भक्तों को कर्मफल प्रदान करनेवाली माता सद्कर्म की प्रेरणा देती हैं। 
योग के माध्यम से भी शैलपुत्री की आराधना की जाती है। इस विधि से माता की आराधना करने के लिए किसी वाह्य सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। माँ शैलपुत्री का दर्शन योगीजन मूलाधार चक्र में करते हैं। नवरात्र के प्रथम दिन मूलाधार चक्र में ही ध्यान लगाना चाहिये। 
मूलाधार चक्र गहरे लाल रंग का कमल है जिस की चार पंखुड़ियाँ हैं। पंखुड़ियों पर क्रमशः वं, शं, षं और सं मन्त्र अंकित हैं। इस चक्र की आकृति चौकोर है। मूलाधार चक्र पर बीजमन्त्र लं है। वाहन हाथी है जो पृथ्वी की दृढ़ता का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव ब्रह्मा और देवी डाकिनी हैं जिन का अधिकार स्पर्शानुभूति पर है। मूलाधार चक्र के केन्द्र में लाल त्रिभुज है जिस का सिरा नीचे की ओर है। 
पूर्वजन्म में दक्ष की पुत्री सती के रूप में माँ शैलपुत्री प्रकट हुई थीं। सती का विवाह शंकर से हुआ था। एक बार दक्ष ने एक विशेष यज्ञ का आयोजन किया जिस में भगवान शिव अर्थात् अपने दामाद को निमन्त्रित नहीं किया। पर, पिता के यज्ञ मेें शामिल होने की आज्ञा सती ने येन-केन प्रकारेण अपने पति शिव से ले ही ली। अन्ततः सती अपने शरीर को यज्ञ स्थल पर योगाग्नि से भस्म कर देती हैं। तत्पश्चात् हिमालय की पुत्री के रूप में अवतरित हुईं और शैलपुत्री कहलायीं। हाथ जोड़कर माँ शैलपुत्री की आराधना करें-
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्द्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

नवरात्र में शरीर व मन की शुद्धि / Purification of Body and Mind in Navaratra

-शीतांशु कुमार सहाय
शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शु़िद्ध प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई के लिए वर्ष में चार नवरात्र आते हैं। ये चारों अवसर ऋतुओं के परिवर्तन के हैं। इस दौरान अनेक व्याधियों की उत्पत्ति होती है। इन से बचने के लिए नवरात्र में शरीर व मन की शुद्धि की जाती है। ये चार अवसर हैं- चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ। 
चैत्र में वसन्त ऋतु की समाप्ति व ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत होती है। आषाढ़ में ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति व वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। आश्विन में वर्षा ऋतु की समाप्ति व शरद ऋतु की शुरुआत होती है। यों माघ में शिषिर ऋतु की समाप्ति व वसन्त ऋतु की शुरुआत होती है। इन चारों महत्त्वपूर्ण ऋतुओं के सन्धिकाल में शरीर और मन को शुद्धकर माता आदिशक्ति दुर्गा की आराधना करनी चाहिये। 
सात्त्विक आहार से शरीर की शुद्धि होती है। साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, शुद्ध बुद्धि से उत्तम विचार, उत्तम विचारों से उत्तम कर्म, उत्तम कर्मों से सच्चरित्रता और सच्चरित्रता से क्रमशः मन शुद्ध होता है। स्वच्छ मन के मन्दिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।

नवरात्र या नवरात्रि / Navaratri or Navaratra

-शीतांशु कुमार सहाय
संस्कृत व्याकरण के अनुसार, ‘नवरात्रि’ कहना त्रुटिपूर्ण है। नौ रात्रियों का समाहार (समूह होने के कारण से द्वऩ्द्व समास) होने के कारण यह शब्द पुल्लिंग रूप ‘नवरात्र’ में ही शुद्ध है। 
पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक वर्ष की चार सन्धियाँ हैं। चैत्र में वसन्त ऋतु व ग्रीष्म ऋतु की और आषाढ़ में ग्रीष्म ऋतु व वर्षा ऋतु की सन्धि होती है। इसी तरह आश्विन में वर्षा ऋतु व शरद ऋतु की तथा माघ में शिशिर ऋतु व वसन्त ऋतु की सन्धि होती है। 
ऋतुओं के उपर्युक्त चार सन्धियों के समय रोगाणुओं के आक्रमण की सर्वाधिक सम्भावना रहती है। ऋतु सन्धियों में अक्सर शारीरिक व मानसिक बीमारियाँ बढ़ती हैं। अतः उस काल में स्वास्थ्य के उद्देश्य से शरीर-शुद्धि और तन-मन की निर्मलता के लिए की जानेवाली प्रक्रिया का नाम नवरात्र है। अमावस्या की रात से अष्टमी तक या प्रथमा (प्रतिपदा) से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रातें होती हैं अर्थात् ‘नवरात्र’ नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, नौ रातों का समूह ही नवरात्र कहा जाता है। 
हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारोंवाला कहा गया है और दसवाँ द्वार सहस्रार चक्र है जहाँ आदिशक्ति माँ दुर्गा स्थित हैं। सहस्रार चक्र में निवास करनेवाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा है। इन मुख्य इन्द्रियों के बीच अनुशासन, स्वच्छता व तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में शरीर-तन्त्र को पूरे वर्ष के लिए सुचारू रूप से कार्यशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नवरात्र मनाया जाता है।

पुराणों में नवरात्र / Navaratra in the Puranas

-शीतांशु कुमार सहाय
मान्यता है कि नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोयी हुई शक्ति पायी थी। अतः इस समय आदिशक्ति की आराधना पर विशेष बल दिया गया है। ‘मार्कण्डेयपुराण’ के अन्तर्गत ‘दुर्गा सप्तशती’ में स्वयं भगवती ने इस समय (नवरात्र) शक्ति पूजा को ‘महापूजा’ बताया है। कलश स्थापना, दुर्गा की स्तुति, सुमधुर घण्टियों की आवाज, धूप व बत्तियों की सुगन्ध- यह नौ दिनों तक चलनेवाले साधना पर्व नवरात्र का चित्रण है। 
भारतीय संस्कृति में नवरात्र की साधना का विशेष महत्त्व है। नवरात्र में ईश-साधना और अध्यात्म का अद्भुत संगम होता है। इस अवधि में रामलीला, रामायण पाठ, रामचरितमानस पाठ, श्रीमद्भागवत पाठ, अखण्ड कीर्तन जैसे सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। यही वजह है कि नवरात्र के दौरान प्रत्येक व्यक्ति नये उत्साह और उमंग से भरा दिखायी पड़ता है। 
वैसे तो ईश्वर का आशीर्वाद हम पर सदा ही बना रहता है। पर, कुछ विशेष अवसरों पर उन के प्रेम व कृपा का लाभ हमंे अधिक मिलता है। पावन पर्व नवरात्र में सृष्टि की सभी रचनाओं पर माता दुर्गा की कृपा समान रूप से बरसती है। इस के परिणामस्वरूप ही मनुष्य को लोक-मंगल के कार्यकलापों में आत्मिक आनन्द की अनुभूति होती है।

अम्बिका स्थान : नवरात्र के नियम और मान्यताएँ / Ambika Sthan : Navaratra Rules and Beliefs


-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र में माँ दुर्गा के व्रत रखे जाते हैं। भारत के उत्तरी क्षेत्र में स्थान-स्थान पर माँ दुर्गा की मूर्तियाँ बनाकर उनकी विशेष पूजा की जाती है। अनेक लोग घर में भी कलश स्थापित कर ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ करते हैं। कुछ लोग इस दौरान ‘रामायण’, ‘रामचरितमानस’ या ‘सुन्दरकाण्ड’ (रामचरितमानस का एक खण्ड) आदि का भी पाठ करते हैं। 
नवरात्र के दौरान अम्बिका स्थान पर दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। नवरात्र के दिनों में यहाँ मेला लगता है। भगवती के नौ प्रमुख रूप (अवतार) हैं तथा प्रत्येक की इन नौ दिनों में विशिष्ट पूजा की जाती है। मुख्य रूप से वर्ष में दो बार भगवती अम्बिका भवानी की विशेष पूजा की जाती है। इन में एक नवरात्र तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (प्रथमा) से नवमी तक और दूसरा श्राद्धपक्ष (पितृपक्ष) के दूसरे दिन आश्विन शुक्ल प्रथमा से आश्विन शुक्ल नवमी तक। अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा को पूर्णाहुति दी जाती है। चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराया जाता है। 
नवरात्र में अम्बिका स्थान पर पशुओं की हत्या-बलि नहीं दी जाती। यहाँ के पुजारी सन्त भीखमदास बताते हैं कि सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के किसी भी मूल ग्रन्थ में पशु-पक्षियों की हत्या-बलि का विधान नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस धर्म में किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाने तक की मनाही है, उस धर्म में हत्या को कैसे जायज माना जा सकता है। यह धर्म में घुसे मांसाहारियों के मन की खुराफात है। बलि का अर्थ वास्तव में प्रिय वस्तु का त्याग है, दुर्गुणों का त्याग है, कुरीतियों का त्याग है- किसी को जान से मारकर जश्न मनाना किसी भी धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता। 
भीखमदास के अनुसार, अम्बिका स्थान में मुक्त-बलि की प्रथा प्रचलित है। इस के तहत पशु के कान में छेद कर उसे छोड़ दिया जाता है जिसे जरूरतमन्द लोग पकड़ लेते हैं और उसे पालते हैं। 
नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में नौ शक्तियों की पूजा करनी चाहिये। पूजन की पूर्णाहुति पर दरिद्रनारायण व ब्राह्मण को अवश्य दान दें। दान देते समय यह कल्पना कदापि न करें कि मैं दे रहा हूँ और वह ले रहा है। उस समय यही स्मरण रहना चाहिये कि भगवान के एक रूप से भगवान का ही अन्य रूप ग्रहण कर रहा है।