मंगलवार, 16 अक्तूबर 2018

नवदुर्गा का नवम् रूप सिद्धिदात्री / Siddhidatri is the Ninth Similitude of Navdurga

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के अन्तिम नवम् दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के नवम् स्वरूप सिद्धिदात्री की आराधना की जाती है। सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने के कारण ही इन्हें सिद्धिरात्री कहा गया। सभी देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और मनुष्य निरन्तर इन की उपासना में संलग्न हैं। चार भुजाओंवाली माँ सिद्धिरात्री का वाहन सिंह है। कभी-कभी माँ कमल पुष्प पर भी आसन ग्रहण करती हैं। 
माँ की ऊपरवाली दायीं भुजा में गदा और नीचेवाली दायीं भुजा में चक्र है। इसी तरह ऊपरवाली बायीं भुजा में कमल और निचली बायीं भुजा में शंख है। इन्हें नवम् दुर्गा भी कहते हैं। माँ सिद्धिरात्री समस्त सिद्धियाँ अपने भक्तों को प्रदान करती हैं। ‘ब्रह्मवैवर्त्तपुराण’ में श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अन्तर्गत अठारह  सिद्धियाँ बतायी गयी हैं- 
1. अणिमा 
2.लघिमा 
3. प्राप्ति 
4. प्राकाम्य
5. महिमा
6. ईशित्व-वशित्व 
7. सर्वकामावसायिता
8. सर्वज्ञत्व
9. दूरश्रवण
10. परकायप्रवेशन 
11. वाक्सिद्धि
12. कल्पवृक्षत्व
13. सृष्टि 
14. संहारकरणसामर्थ्य 
15. अमरत्व
16. सर्वन्यायकत्व 
17. भावना और 
18. सिद्धि। 
एक अन्य ग्रन्थ ‘मार्कण्डेयपुराण’ में सिद्धियों की संख्या आठ बतायी गयी है-
1. अणिमा 
2. महिमा
3. गरिमा 
4. लघिमा 
5. प्राप्ति 
6. प्राकाम्य 
7. ईशित्व और 
8 वशित्व। 
नवम् दुर्गा माता सिद्धिरात्री की कृपा से ही भगवान शिव को समस्त सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी। ऐसा ‘देवीपुराण’ ग्रन्थ में उल्लेख है। ग्रन्थ के अनुसार, सिद्धिरात्री की अनुकम्पा से शिव का आधा शरीर देवी का हो गया था। इस प्रकार वे अर्द्धनारीश्वर कहलाये। सभी तरह की मनोकामनाओं और सिद्धियों को प्रदान कर माता सिद्धिरात्री अपने भक्तों की उच्चस्तरीय परीक्षा लेती हैं। वास्तव में ये दोनों कामना व सिद्धि मुक्ति के मार्ग के प्रलोभन हैं। इन्हें प्राप्त करने पर प्रायः गर्व का अनुभव होता है और अहंकार प्रकट हो जाता है। गर्व और अहंकार दोनों ही पतन के कारक हैं। एक बार पतन होने पर पुनः शिखर पर पहँंुचना अत्यन्त दुष्कर हो जाता है। अतः मुक्ति के मार्ग पर चलते हुए जब सि़िद्धयाँ प्राप्त होने लगे तो उन में उलझने से अच्छा है एकाग्रचित होकर आगे बढ़ते रहना। 
माँ सिद्धिरात्री के चरणों पर ध्यान लगाने से अहंकार का शमन होता है। ब्रह्माण्ड पर पूर्ण विजय का आशीर्वाद देनेवाली माता सिद्धिरात्री के चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।
नवदुर्गा की आराधना सभी भक्तों को करनी चाहिये। शक्ति के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। शक्ति के बिना कोई कार्य नहीं हो सकता। अतः शक्ति की उपासना सब के लिए अनिवार्य है। माँ नवदुर्गा सब का कल्याण करंे!

सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

नवदुर्गा का अष्टम् रूप महागौरी / Mahagauri is the Eighth Similitude of Navdurga

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के अष्टम् दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के अष्टम् रूप महागौरी की आराधना की जाती है। एक बार पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में आदिशक्ति प्रकट हुईं। पार्वती ने शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। हजारों वर्षों की तपस्या के कारण पार्वती का शरीर पूर्णतः काला हो गया था। उन की तपस्या सफल हुई और शिव ने पत्नी के रूप में उन्हें स्वीकार कर लिया। तब भगवान शिव ने पवित्र गंगाजल से पार्वती के शरीर को धोया तो शरीर निर्मल होकर अत्यन्त गौर (गोरा) हो गया। अत्यन्त कान्तियुक्त तथा सर्वाधिक गौरवर्णा माँ का यह स्वरूप महागौरी कहलाया। इन्हें अष्टम् दुर्गा कहा जाता है। 
माँ महागौरी की गौरता गोरापन की उपमा शंख, चन्द्र और कुन्द के पुष्प से की गयी है। इन के समस्त आभूषण भी श्वेत हैं और वस्त्र भी श्वेत ही धारण करती हैं। अतः इन्हें श्वेताम्बरा भी कहा जाता है। 
अष्टम् दुर्गा महागौरी वृषभ (साँढ़) पर सवार रहती है। माता की चार भुजाएँ हैं। ऊपरी वाहिनी भुजा की अभयमुद्रा में रखती हैं और भक्तों को भयमुक्त बनाती हैं। निचली दायीं भुजा में त्रिशूल धारण करती हैं। माँ की बायीं तरफ की ऊपरी भुजा में डमरू और निचली भुजा वरमुद्रा है। 
चतुर्भुजा श्वेताम्बरा माता महागौरी का विग्रह अत्यन्त सौम्य व शान्त है। इस रूप में माँ ने कठिन परिश्रम कर शिव को प्राप्त किया। अतः माँ महागौरी परिश्रम कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। परिश्रम के दौरान कष्ट होते ही हैं, जिन्हें माँ पार्वती की तरह सहन करने से महागौरी की तरह लक्ष्य की प्राप्ति होती है। लक्ष्य प्राप्त हो जाने पर समस्त कष्ट प्रेरणा स्वरूप प्रतीत होने लगते हैं और तब सुख की प्राप्ति होती है। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए महागौरी देवी की उपासना अवश्य करनी चाहिये। देवी महागौरी की उपासना करने से समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। भौतिक और आध्यात्मिक जीवन सुखमय व्यतीत होता है। 
असम्भव को सम्भव करनेवाली दुर्गा का अष्टम् स्वरूप बहुविध कल्याणकारी है। माता पूर्वजन्म के पापों को नष्ट कर भविष्य को मोक्षगामी बना देती हैं। दुःख और दरिद्रता को समाप्त कर अक्षय पुण्य का अधिकार प्रदान करनेवाली माता महागौरी के चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

नवदुर्गा का सप्तम् रूप कालरात्रि / Kalratri is the Seventh Similitude of Navdurga

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के सप्तम् दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के सप्तम स्वरूप कालरात्रि की आराधना की जाती है। घनी काली रात्रि की तरह काला वर्णवाली माता ही कालरात्रि कहलाती हैं। काल भी इन्हीं के वश में है। इन्हें सप्तम् दुर्गा भी कहते हैं। माँ कालरात्रि की केश-राशि बिखरी हुई है। गले में विद्युत की तरह चमकीला माला है। इस रूप में माता के तीन नेत्र हैं। अतः इन्हें त्रिनेत्रा भी कहते हैं। माता के तीनों नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं। इन नेत्रों से विद्युत के समान चमकवाली किरणें अनवरत् निकलती रहती हैं। 
गर्दभ (गदहा) पर सवार माँ कालरात्रि का स्वरूप अत्यन्त भयानक है। बिखरे बाल, गोल-गोल अत्यन्त चमकीले नेत्र और व्याघ्रचर्म पहनी हुई माँ का विकराल रूप देखकर असुर काँप उठते हैं। असुरों और दुर्गुणों का नाश करने के लिए माता ने बायीं तरफ के ऊपरवाले हाथ में लोहे का काँटा और नीचेवाले हाथ में खड्ग अर्थात् कटार धारण किया है। असुरों के लिए भयानक होने पर भी माँ कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल ही प्रदान करती हैं। अतः इन्हें शुभङ्करी भी कहा जाता है। 
भक्तों को वरदान देने के लिए माता शुभङ्करी ने ऊपर के दायें हाथ को वरमुद्रा में रखा है। निचले दायें हाथ से माँ कालरात्रि अभय प्रदान कर रही हैं। इस तरह माँ सदैव स्नेह बरसाती रहती हैं। उन के भयंकर रूप से न घबराते हुए उन से कृपा की याचना करनी चाहिये। 
सप्तम् दुर्गा की पूजार्चना के दौरान योगीजन सहस्रार चक्र में ध्यान लगाते हैं। सहस्रार चक्र एक हजार (सहस्र) पंखुड़ियोंवाला कमल है। इन पंखुड़ियों पर कई मन्त्र अंकित हैं। इस चक्र के मध्य में अत्यन्त उज्ज्वल शिवलिंग है जो पवित्र और उच्चतम चेतना का प्रतीक है। सहस्रार चक्र के उदय के इष्टदेव शिव और देवी शक्ति हैं जिन का समस्त शक्तियों तथा तत्त्वों पर अधिकार है। इस चक्र में समस्त शक्त्यिाँ निहित हैं, जिन का सम्बन्ध पचास बीजमन्त्रों की शक्ति के बीस गुणक ५० गुणा २० बराबर १००० से है। यहीं शिव-शक्ति का मिलन होता है, आत्मा का परमात्मा में विलय होता है। इस चक्र में ध्यान लगवाकर माँ कालरात्रि सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त कर देती हैं और अपने चरमें में स्थान दे देती हैं। 
दुष्टों का विनाश करनेवाली माँ कालरात्रि की उपासना करनेवाला बाधाओं में नहीं फँसता, वह निर्भय हो जाता है। कालरात्रि देवी के आराधक को आग, जल, जन्तु, शत्रु और अन्धकार का भय नहीं सताता। ऐसे साधक को ग्रह-बाधा से भी मुक्ति मिल जाती है। मन, कर्म, वचन और शारीरिक शुद्धता व पवित्रता से इन की आराधना करनी चाहिये। 
भय की मुक्ति का आशीर्वाद देनेवाली माँ कालरात्रि के चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्द्धनमूर्द्धध्वजा कृृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी।।

नवदुर्गा का षष्टम् रूप कात्यायनी / Katyayani is the Sixth Similitude of Navdurga

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के षष्टम दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के षष्टम् स्वरूप कात्यायनी की आराधना की जाती है। महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में प्रकट होने के कारण इन्हें कात्यायानी कहा गया। भक्तों को वरदान के साथ अभय देनेवाली माँ कात्यायनी सिंह पर सवार रहती हैं। इन्हें षष्टम् दुर्गा भी कहते हैं। 
प्राचीन काल में कत ऋषि हुए थे। उन के पुत्र भी ऋषि हुए जिन का नाम कात्य था। कात्य के गोत्र में ही महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए जो आदिशक्ति के उपासक थे। कात्यायन ने इस उद्देश्य से तपस्या की कि आदिशक्ति उन की पुत्री के रूप में जन्म लें। माता आदिशक्ति ने उन की यह प्रार्थना स्वीकार की। यों महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में अवतरित होने के कारण इन्हें कात्यायनी कहा गया। 
कात्यायन ऋषि की पुत्री के रूप में माँ कात्यायनी का अवतरण आश्विन कृष्णपक्ष चतुदर्शी को हुआ। इन्होंने आश्विन शुक्ल पक्ष सप्तमी, अष्टमी और नवमी को कात्यायन ऋषि की त्रिदिवसीय पूजा स्वीकार की और दशमी को भयंकर महिषासुर का वध किया। माता कात्यायनी के प्रथम पुजारी कात्यायन ही थे। 
नवरात्र के छठे दिन माँ कात्यायनी की आराधना के लिए योगीजन आज्ञा चक्र में ध्यान लगाते हैं, जो मेरुदण्ड के शीर्ष पर भू्रमध्य (भौंहों के बीच के सीध में) स्थित है। आज्ञा चक्र हल्के भूरे या श्वेत रंग का दो पंखुड़ियोंवाला कमल है, जिनपर हं और क्षं मन्त्र अंकित हैं। इस चक्र के मध्य में मन्त्र ऊँ है। आज्ञा चक्र के इष्टदेव परमशिव हैं और देवी हाकिनी हैं जिन का मन पर अधिकार है। 
आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाकर माँ कात्यायनी के चरणों में सर्वस्व अर्पित कर देना चाहिये। ऐसा करने से ही माँ षष्टम् दुर्गा दर्शन देती हैं और भक्त को परमपद की प्राप्ति होती है। चारों पुरूषार्थों- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्रदान करनेवाली माँ कात्यायनी की आराधना कर ब्रजवासी गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पतिरूप में प्राप्त किया था। कालिन्दी (यमुना) नदी के तट पर गोपियों ने उन की उपासना की थी। इसलिए माता कात्यायनी को ब्रजमण्डल की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। ब्रजवासी प्राचीन काल से उन की उपासना करते आ रहे हैं। 
सिंह पर सवार माँ कात्यायनी की चार भुजाएँ हैं। दाहिनी तरफ की ऊपरी भुजा अभयमुद्रा में व निचली भुजा वरमुद्रा में है। ऊपरवाली बायीं भुजा में तलवार और नीचेवाली भुजा में कमल सुशोभित हैं। स्वर्ण के समान चमकीले और भास्वर (ज्योतिर्मय) वर्णवाली माता भक्तों की वर देती हैं और भयमुक्त भी बनाती हैं। 
जन्म-जन्मान्तर के समस्त कष्टों को समाप्त करनेवाली माँ कात्यायनी के चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।

रविवार, 14 अक्तूबर 2018

नवदुर्गा का पंचम् रूप स्कन्दमाता / Skandmata is the Fifth Similitude of Navdurga

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के पंचम् दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के पंचम् स्वरूप स्कन्दमाता की आराधना की जाती है। भगवान कार्त्तिकेय का एक अन्य नाम स्कन्द भी है। स्कन्द को उत्पन्न करने के कारण माँ दुर्गा के पाँचवें रूप को स्कन्दमाता कहा गया। इन्हंे पंचम् दुर्गा भी कहा जाता है। 
इस स्वरूप में माँ सिंह पर बैठी हैं। उन की गोद में भगवान स्कन्द अपने बालरूप में स्थित हैं। चार भुजाओंवाली देवी स्कन्दमाता खिले कमल के समान सदैव प्रसन्नता का प्रसाद बाँटती हैं। माता अपनी ऊपरवाली दायीं भुजा से गोद में बैठ पुत्र स्कन्द को पकड़ी हुई हैं। दाहिनी तरफ की नीचेवाली भुजा जो ऊपर की ओर मुड़ी हुई है, उस में कमल है। इसी तरह बायीं तरफ की ऊपरी भुजा वरमुद्रा में है। निचली बायीं भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उस में कमल है। 
दो हाथों में कमल धारण करनेवाली स्कन्दमाता सदैव भक्तों को कमल की तरह आनन्द प्रदान करने को तत्पर हैं। वह कमल के ही आसन पर विराजमान हैं, अतः इन्हें कमलासना देवी अथवा पद्मासना देवी भी कहते हैं। इन का शारीरिक वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। 
नवरात्र के पाँचवें दिन योगीजन आदिशक्ति का ध्यान विशुद्धि चक्र में लगाते हैं। मेरुदण्ड पर गर्दन के निकट यह चक्र स्थित है। सिद्ध योगी खेचरी मुद्रा से यहीं अमृत का पान करते हैं। शुद्धिकरण का प्रतीक है विशुद्धि चक्र जो सोलह पंखुड़ियोंवाला कमल है। इस कमल का रंग जामुनी मिश्रित धुएँ के रंग का है। विशुद्धि चक्र के सोलह पंखुड़ियों पर क्रमशः अं, आं, ईं, उं, ऊं, ऋं, ऋृ, लृं, लृं हं, एं, ऐं, ओं, औं, अं, अंः मंत्र अंकित है। इस कमल के मध्य श्वेत वृत्त है। विशुद्धि चक्र का बीजमन्त्र हं है और वाहन श्वेतगण है जो आकाश का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव अर्द्धनारीश्वर हैं तथा देवी साकिनी हैं जिन का अधिकार अस्थियों पर है। विशुद्धि चक्र पर ही ध्यान केन्द्रित कर स्कन्दमाता की आराधना करनी चाहिये। 
देवी स्कन्दमाता अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। उन के दोषों को क्रमशः दूर करती जाती हैं और शुद्ध कर अन्ततः विशुद्धि चक्र की सिद्धि पद्रान करती हैं। सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण माँ स्कन्दमाता की आराधना से सूर्य के समान अद्भुत तेज व कान्ति की प्राप्ति होती है। इन की पूजा करने से स्वतः ही बालरूप भगवान कार्त्तिकेय अर्थात् स्कन्द की भी पूजा हो जाती है। अतः स्कन्दमाता की पूजार्चना अवश्य करनी चाहिये। 
भक्तों के आभामण्डल को सुदृढ़ व अभेद्य बनानेवाली माँ स्कन्दमाता को हाथ जोड़कर चरणों में प्रणाम करें-
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।

शनिवार, 13 अक्तूबर 2018

नवदुर्गा का चतुर्थ रूप कूष्माण्डा / Kooshmanda is the Fourth Similitude of Navdurga


-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के चतुर्थ दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप कूष्माण्डा की आराधना की जाती है। जब आदिशक्ति ने अपनी मन्द मुस्कान से अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया, तब उन्हें कूष्माण्डा कहा गया। इसी रूप में माता समस्त जड़-चेतन की पूर्वज हैं, सब का आदि हैं मगर उन का आदि कोई नहीं। भयानक अन्धकार के बीच आदिशक्ति कूष्माण्डा ने प्रसन्न मुद्रा में अपनी मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना की और सृष्टि क्रम को आरम्भ किया। 
माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप के नामकरण का एक अन्य कारण है- संस्कृृत शब्द कूष्माण्डा का हिन्दी अर्थ कुम्हड़ा या कोहरा है। यह एक प्रकार की सब्जी है, जिस की बलि माता को अत्यन्त प्रिय है। अतः इन्हें कूष्माण्डा कहा गया। इन्हें चतुर्थ दुर्गा भी कहते हैं। 
आठ भुजाओंवाली माँ कूष्माण्डा सिंह पर सवार हैं। इन की सात भुजाओं में क्रमशः कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल, अमृत से भरा कलश, चक्र व गदा है। माता ने आठवीं भुजा में समस्त विधियों-सिद्धियों को देनेवाली जपमाला धारण किया है। 
योग के माध्यम से माता के इस रूप की आराधना करनेवाले को अनाहत चक्र पर ध्यान लगाना चाहिये। यह चक्र बारह पंखुड़ियोंवाला नीला कमल है। जिन पर क्रमशः कं, खं, गं, घं, डं., चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं मंत्र अंकित हैं। मध्य में षट्कोण आकृृति है जो दो त्रिभुजों के मिलने से बनी है। अनाहत चक्र का बीजमंत्र यं है। वाहन शीघ्रगामी काला हिरन है जो वायु का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव ईशा हैं, देवी काकिनी है- जो तैलीय तत्त्व पर अधिकार रखती हैं। नवरात्र के चौथे दिन आराधक को अनाहत चक्र में ध्यान लगाना चाहिये। योगीगन ध्यान के माध्यम से माँ कूष्माण्डा का दर्शन पूजन अनाहत चक्र में ही करते हैं। 
माता अपने उपासकों के समस्त रोग व शोक हर लेती हैं और आयुष्य, बल, यश और आरोग्य का वरदान देती हैं। कूष्माण्डा देवी की शरण में पूर्ण निष्ठाभाव से आनेवाले भक्तों का कल्याण सुनिश्चित हो जाता है। ऐसे साधक सुगमतापूर्वक परमतत्त्व को प्राप्त कर लेते हैं। अतः माँ कूष्माण्डा की भक्ति अवश्य करनी चाहिये। 
माता दुर्गा अपने चौथे रूप में सूर्यमण्डल या सूर्यलोक में निवास करती हैं। माता कूष्माण्डा के शरीर की कान्ति और प्रभा से ही ब्रह्माण्ड के सभी सूर्य (प्रकाश उत्पन्न करनेवाले तारे) चमक रहे हैं। असंख्य सूर्यों के तेज से भी अधिक उज्ज्वलस्वरूपा माता अपनी स्थायी मुस्कान से भक्तों को प्रसन्न व आनन्दित करती रहती हैं। समस्त प्रकाश पुंजों में देवी कूष्माण्डा का ही तेज समाहित है। इन्हीं का तेज सभी प्राणियों और निर्जीवों में प्रसारित हो रहा है।
कष्टनिवारिणी माता कूष्माण्डा को हाथ जोड़कर चरणों में प्रणाम करें-
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।

नवदुर्गा का तृतीय रूप चन्द्रघण्टा / Chandraghanta is the Third Similitude of Navdurga

-शीतांशु कुमार सहाय 
नवरात्र के तीसरे दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के तृृतीय स्वरूप चन्द्रघण्टा की आराधना की जाती है। इन के मस्तक में घण्टे के आकार वाला अर्द्धचन्द्र है, अतः इन्हें चन्द्रघण्टा कहा जाता है। स्वर्ण के समान आभा वाली यह स्वरूप परमशान्ति देनेवाला है। यह शीघ्र ही भक्तों का कल्याण करती हैं। इन्हें तृतीय दुर्गा भी कहते हैं। 
दस भुजाओं वाली माँ चन्द्रघण्टा भक्तों के कल्याण के लिए विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों को धारण करती हैं। माँ ने इस रूप में तीर, धनुष, तलवार, गदा, त्रिशूल, कमल, कमण्डलु, जप माला, आशीर्वाद मुद्रा व ज्ञान मुद्रा धारण किया है। इस रूप में माँ सदा असुरों से युद्ध के लिए तैयार हैं। सिंह की सवारी करनेवाली चन्द्रघण्टा देवी के घण्टे की विचित्र ध्वनि से असुर सदा भयभीत रहते हैं। अतः माँ दुर्गा के इस तीसरे स्वरूप की उपासना करनेवाले भक्तों को दुर्गुण, व्याधि व विविध प्रकार के कष्टों के अुसर तंग नहीं करते।
माता चन्द्रघण्टा की असीम कृपा से भक्त प्रसन्न रहते हैं, पाप मिट जाते हैं और बाधाएँ प्रबल नहीं हो पातीं। चन्द्रघण्टा के आराधक सिंह की तरह पराक्रमी व निर्भय हो जाते हैं और उन में सौम्यता व विनम्रता का विकास होता है। माँ दुर्गा के इस तीसरे स्वरूप का उपासक कान्तिवान और ऊर्जावान हो जाता है, उस के स्वर में अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है और मुखमण्डल पर प्रसन्नता छायी रहती है। ऐसे साधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। इस कारण उस के सम्पर्क में आनेवाले लोग को भी अत्यन्त लाभ होता है। 
दुर्गा के तीसरे रूप चन्द्रघण्टा को जब भी कोई भक्त पुकारता है, उन्हें स्मरण करता है, उन की स्तुति करता है या उन की शरण में जाता है तो माता का घण्टा प्रकम्पित हो उठता है। यों भक्त शीघ्र ही कष्टमुक्त हो जाते हैं। 
योग के माध्यम से माँ चन्द्रघण्टा को मणिपुर चक्र में स्थित मानकर आराधना करनी चाहिये। मणिपुर चक्र दस पंखुड़ियोंवाला पीला कमल है जिस पर डं, दं, णं, तं, थं, दं, घं, नं, पं, फं मन्त्र अंकित हैं। इस के मध्य में लाल रंग का उल्टा त्रिभुज है। इस चक्र का बीजमन्त्र रं और वाहन चमकदार भेड़ है, जो आघात पहुँचानेवाले चौपाये पशु का प्रतीक है। मणिपुर चक्र के इष्टदेव रुद्र और देवी लाकिनी है जिन का अधिकार मांसपेशियों पर है। 
नवरात्र के तीसरे दिन भक्त को मणिपुर चक्र पर ही ध्यान लगाना चाहिये। ऐसा करने से भक्त को कई दिव्य व अलौकिक अनुभूतियाँ होती हैं। दिव्य सुगन्ध, दिव्य दर्शन, दिव्य संगीत व दिव्य ज्ञान का लाभ भक्तों को प्राप्त होता है। ध्यान के दौरान प्राप्त होनेवाले इन लाभों पर अहंकार में वृद्धि नहीं हो, इस के लिए भक्त को निरन्तर सावधान रहना चाहिए। भव बाधा को समाप्त कर कल्याण का मार्ग प्रशस्त करनेवाली ममतामयी माता चन्द्रघण्टा को हाथ जोड़कर नमन करें-
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

नवदुर्गा का द्वितीय रूप ब्रह्मचारिणी / Bramcharini is the Second Similitude of Navdurga

-शीतांशु कुमार सहाय
आज शारदीय नवरात्र का दूसरा दिन है।नवरात्र के द्वितीय दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के द्वितीय स्वरूप ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म- वेद, तत्त्व तथा तप ब्रह्म शब्द के अर्थ हैं। चूँकि ब्रह्म का एक अर्थ तप भी है, अतः ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करनेवाली। दाहिने हाथ में जप की माला और बायें हाथ में कमण्डलु धारण करनेवाली द्विभुजा माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यन्त भव्य और पूर्णतः ज्योतिर्मय है। इन्हें तपश्चारिणी भी कहते हैं। इन्हें द्वितीय दुर्गा भी कहते हैं।
अपने एक जन्म में जब आदिशक्ति ने अपने को पार्वती नाम से हिमालय की पुत्री के रूप में प्रकट किया तो भगवान शंकर को पति रूप पाने के लिए व्यग्र हो उठीं। तब देवर्षि नारद ने उन्हें शंकर को वरण करने के लिए कठिन तपस्या करने का परामर्श दिया। एक हजार वर्षों तक फल-मूल पर तो सौ वर्षों तक केवल साग ग्रहण कर तपस्या मे लीन रहीं। इस के पश्चात् पूर्णतः उपवास आरम्भ कर दिया। उपवास के साथ वह खुले आकाश तले वर्षा, धूप आदि के कष्ट सहती रहीं। इसी कारण माता पार्वती का नाम तपश्चारिणी या ब्रह्मचारिणी हो गया। इस के बाद तीन हजार वर्षों तक भूमि पर टूटकर गिरे बेलपत्रों को ग्रहण कर माता भगवान शंकर की आराधना में लीन रहीं। तत्पश्चात् उन्होंने और दुष्कर तप आरम्भ किया। सूखे बेलपत्रों को भी भोजन के रूप में ग्रहण करना छोड़ दिया और कई हजार वर्षों तक बिना जल व बिना आहार के तपस्या करती रहीं। पत्रों या पत्तों को ग्रहण करना छोड़ देने के कारण माता ब्रह्मचारिणी को अपर्णा भी कहा गया। पत्ते को संस्कृत में पर्ण भी कहते हैं।
हजारों वर्षों तक निरन्तर तस्यारत रहने के कारण माँ ब्रह्मचारिणी का शरीर क्षीण हो गया। वह अत्यन्त कृशकाय (दुबली) हो गयीं। उन की इस दशा को देखकर उनकी माता मेना अत्यन्त दुःखित हुई। अपनी पुत्री को तपस्या से विरत करने के लिए माता ने कहा उ.....मा, अरे! न्हीं, ओ! नहीं! यों माता आदिशक्ति का एक नाम उमा भी पड़ गया। माँ ब्रह्मचारिणी की तपस्या से समस्त लोकों में हलचल मच गया। देव, देवी, ऋषि-सभी उन का गुणगान करने लगे, उन की कठिन तपस्या की प्रशंसा करने लगे। तीनों लोकों में माता की स्तुति होने लगी।
आकाशवाणी से भगवान ब्रह्मा ने माता ब्रह्मचारिणी से कहा- हे देवी अब तक किसी ने ऐसी कठिन तपस्या नहीं की। ऐसी तपस्या आप से ही सम्भव थी। आप के इस अलौकिक कृत्य की चहुँओर प्रशंसा हो रही है। आप की मनोकामना पूर्ण होगी, भगवान चन्द्रमौलि शिव आप को पति के रूप में प्राप्त होंगे। अब आप तपश्चर्या को त्यागकर निजगृह को लौट जायं। शीघ्र ही आप के पिता आप को बुलाने आ रहे हैं। इस तरह माता ब्रह्मचारिणी पिता के साथ घर लौट आयीं और बाद में भव्य तरीके भगवान शिव से उन का विवाह हुआ।
अपने भक्तों को साधना का फल प्रदान करता है माँ दुर्गा का दूसरा स्वरूप। इन की आराधना से तप की प्रगाढ़ता में वृद्धि होती है। त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम, वाक्शुद्धि आदि सद्गुणों में अभिवृद्धि होती है। साथ ही सभी तरह के दुर्गुण कम होते जाते हैं, समाप्त होते जाते हैं।
योग के माध्यम से माता ब्रह्मचारिणी की आराधना करनेवाले भक्त स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान लगाते हैं। इस चक्र में ब्रहमचारिणी का दर्शन करने से भक्ति अत्यन्त प्रगाढ़ हो जाती है। स्वाधिष्ठान चक्र तेज लाल रंग का कमल है जिस की पंखुड़ियों पर क्रमशः वं, मं, मं, यं, रं, लं मन्त्र अंकित हैं। इस चक्र के मध्य में अर्द्धचन्द्र है। स्वाधिष्ठान का बीजमंत्र वं और वाहन मगर है जो जल का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव विष्णु तथा देवी राकिनी है जिन का अधिकार रक्त पर है।
माता ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों को कठिन संघर्ष की स्थित में भी कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होने देतीं और विजयश्री दिलाती हैं। किसी कार्य को करने में एकाग्रता अनिवार्य है। जिस की प्राप्ति माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चना से होती है। माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी की हाथ जोड़कर आराधना करें-
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रहमचारिण्यनुत्तमा।

नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री / Shailputri is the First Similitude of Navdurga

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के प्रथम दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की आराधना की जाती है। पर्वत को संस्कृत में शैल भी कहते हैं। अतः पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण देवी का नाम शैलपुत्री पड़ा। वृषभ (साँढ़) की सवारी करनेवाली माता शैलपुत्री द्विभुजा हैं। दायें हाथ में त्रिशूल व बायें हाथ कमल का फूल धारण करती हैं। इन्हें प्रथम दुर्गा भी कहा जाता है। माता शैलपुत्री का विवाह भगवान शंकर से हुआ। प्रत्येक जन्म की भाँति इस जन्म में भी शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए शैलपुत्री को तपस्या करनी पड़ी। पर्वत की पुत्री होने के कारण इन्हें पार्वती भी कहा जाता है। पिता हिमालय के नाम के आधार पर इन्हें हैमवती की संज्ञा भी दी जाती है। माता ने हैमवती स्वरूप में देवताओं के गर्व अहंकार को समाप्त किया था। अतः मांँ को देवगर्वभंजिका भी कहा गया। नवरात्र के प्रथम दिन कलश स्थापित करने के पश्चात वृषारूढ़ा शैलपुत्री की विधिवत् पूजा की जाती है। भक्तों-उपासकों को कर्मफल प्रदान करनेवाली माता सद्कर्म की प्रेरणा देती हैं।
योग के माध्यम से भी शैलपुत्री की आराधना की जाती है। इस विधि से माता की आराधना करने के लिए किसी वाह्य-सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। माँ शैलपुत्री का दर्शन योगीजन मूलाधार चक्र में करते हैं। नवरात्र के प्रथम दिन मूलाधार चक्र में ही ध्यान लगाना चाहिये। मूलाधार चक्र गहरे लाल रंग का कमल है जिस की चार पंखुड़िया हैं। पंखुड़ियों पर क्रमशः वं, शं, षं, मन्त्र अंकित हैं। इस चक्र की आकृति चौकोर है। मूलाधार चक्र पर बीजमन्त्र लं है। वाहन हाथी है जो पृथ्वी की दृढ़ता का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव ब्रह्मा और देवी डाकिनी हैं जिन का अधिकार स्पर्शानुभूति पर है। मूलाधार चक्र के केन्द्र में लाल त्रिभुज है जिस का सिरा नीचे की ओर है।
पूर्वजन्म में दक्ष की पुत्री सती के रूप में माँ शैलपुत्री प्रकट हुई थीं। सती का विवाह शंकर से हुआ था। एक बार दक्ष ने एक विशेष यज्ञ का आयोजन किया जिस में भगवान शिव अर्थात् अपने दामाद को निमंत्रित नहीं किया। पर, पिता के यज्ञ मेें शामिल होने की आज्ञा सती ने येन-केन प्रकारेण अपने पति शिव से ले ही ली। अन्ततः सती अपने शरीर को यज्ञ स्थल पर योगाग्नि में भस्म कर देती है। तत्पश्चात्  हिमालय की पुत्री के रूप में अवतरित हुईं और शैलपुत्री कहलायीं।
हाथ जोड़कर माँ शैलपुत्री की आराधना करें-
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्द्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।

बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

नवदुर्गा का प्रार्थना : मातृ वन्दना / Prayer to Navdurga : Matri Vandana

-शीतांशु कुमार सहाय


हे माता अम्बिका भवानी, करती हो जग-कल्याण।
जग में तू ही मार्गदायिनी, चले उस पर इन्सान।

हर काल और लोक में, होती है पूजा तेरी।
भक्त तुम्हारे बने हैं हम भी, सुन ले अरज हमारी।।
चित्ताकर्षक तेरा विग्रह, हृदय में प्रेम तुम्हारा।
गंगावटवासिनी सब है तेरा, यहाँ न कुछ है मेरा।।
केवल एक है भक्ति अपनी, करुँ चरणों में अर्पण।
रूप दिखा दे माता अपनी, करुँ न्योछावर प्राण।।
जग में तू ही मार्गदायिनी, चले उस पर इन्सान।

हे माता अम्बिका भवानी, करती हो जग-कल्याण।
जग में तू ही मार्गदायिनी, चले उस पर इन्सान।

घोर-काल और वज्र-दण्ड का, वध किया है तुम ने।
दुर्मुख और चण्ड-मुण्ड को खत्म किया है तुम ने।।
हे महाशक्ति माता भवानी, त्रिदेवों की उपवासी तू।
हे महामाया माता नन्दिनी, आमी की है वासी तू।।
सत्य में तपकर सुरथ-समाधि ने किया तेरा सन्धान।
तेरी भक्ति करके मानव, बन जाये भगवान।।
जग में तू ही मार्गदायिनी, चले उस पर इन्सान।

हे माता अम्बिका भवानी, करती हो जग-कल्याण।
जग में तू ही मार्गदायिनी, चले उस पर इन्सान।

सरस्वती और लक्ष्मी-काली, तू माता अतुलित बलशाली।
तेरी ही शक्ति सब देवों में, करती सब की रखवाली।।
हे आदिशक्ति-अम्बिका भवानी! तुम ने सब का उद्धार किया।
ब्रह्मा-विष्णु-शिव-राम-कृष्ण बन सब का ही उपकार किया।।
तेरी आराधन से मुख मोड़कर भटक रहा इन्सान।
मोक्ष-मुक्ति को देनेवाली, अम्बे तू है महान।।
जग में तू ही मार्गदायिनी, चले उस पर इन्सान।

हे माता अम्बिका भवानी, करती हो जग-कल्याण।
जग में तू ही मार्गदायिनी, चले उस पर इन्सान।

रविवार, 26 अगस्त 2018

भगवान शिव ही समस्त सृष्टि के आदि कारण / Lord Shiva is the Cause of All the Creatures


ब्रहमांड के बीच में आदि व अनन्त ऊर्जा स्वरूप महाशिवलिंग 
-शीतांशु कुमार सहाय
सृष्टि की उत्पत्ति के बारे में ग्रन्थों में वर्णन है। सब में शक्ति विद्यमान है और शक्ति के अभाव में मृत। जीव में जब तक शक्ति का अंश मौजूद है, तब तक ही वह जीवित है और जीव की श्रेणी में आता है। जब उस में से शक्ति का अंश निकल जाता है तो व निर्जीव हो जाता है, मर जाता है और पार्थिव कहलाता है। पार्थिव- अर्थात् जो पृथ्वी पर गिर गया, जो अब उठ नहीं सकता, जो पृथ्वी के समानान्तर हो गया, जो अब पृथ्वी में मिल जायेगा। यही कारण है कि मृत व्यक्ति के शरीर को पार्थिव शरीर कहते हैं। इस तरह ज्ञात होता है कि सभी में शक्ति विराजमान है, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव। भारतीय ऋषि हज़ारों वर्षों पूर्व ही कह गये हैं कि जड़ व चेतन- दोनों में शक्ति का अंश विद्वमान है। आज का भौतिक विज्ञान भी यही कहता है कि जड़ अर्थात् निर्जीव में स्थितिज ऊर्जा और सजीव में गतिज ऊर्जा व्याप्त है। प्राचीन वैज्ञानिकों को भारतीय ग्रन्थों में ऋषि की संज्ञा दी गयी है। ऋषियों ने सब में, अखिल विश्व में व्याप्त शक्ति को कई नाम दिये हैं, जिन में एक नाम आत्मा भी है।
          शक्ति ही आदि है। अतः इसे आदिशक्ति भी कहते हैं। यह अनन्त है। कहाँ से कहाँ तक शक्ति का प्रसार है, इसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। यह सब में और सर्वत्र है। शक्ति सब में और सभी शक्ति में हैं; क्योंकि यह ब्रह्माण्ड शक्ति या आदिशक्ति का ही व्यापक प्रसारित रूप है। ब्रह्माण्ड में ऊर्जा या शक्ति परमाणु के रूप में बिखरी है। ब्रह्माण्ड में दो ही तरह की परमाणु शक्ति है- चैतन्य और जड़। चैतन्य शक्ति से भरे परमाणु संयोजित होकर जीव की उत्पत्ति करते हैं और जड़ शक्तिवाले परमाणु मिलकर जड़ पदार्थ जैसे ग्रह, तारे, नक्षत्र, उपग्रह, धूमकेतु, पर्वत, वायु, धातु आदि का निर्माण करते हैं। यों प्रतीत हुआ कि समस्त सृष्टि या निर्माण में केवल और केवल शक्ति का ही हाथ है।   
         
आदिशक्ति को ऋषियों ने देवी’ के रूप में पूजा है। उस परम्परा का निर्वहन करते हुए धरतीवासी शक्ति की आराधना करते हैं। धरती के सभी धर्मों में केवल शक्ति और उस के रूप की ही चर्चा है। उन का कोई रूप नहीं, कोई आकार नहीं; पर यह साकार रूप धारण करती रहती हैं। ऊपर में मैं ने जिस परमाणु-शक्ति की चर्चा की है, उस के माध्यम से समझिये कि परमाणुओं (शुक्राणु व अण्डाणु) के मिलन से कोशिकांग, कोशिकांगों के संयोजन से कोशिका और कोशिकाओं से अंग बनते हैं। अंगों से अंगतन्त्र और अंगतन्त्रों का समूह एक सम्पूर्ण जीव का निर्माण करता है।  
          आदिकाल में जब महादेवी आदिशक्ति में कम्पन हुआ तो ॐ की प्रथम ध्वनि के साथ विशाल शिवलिंग का निर्माण हुआ जिस का न आदि है और न अन्त। यह शिवलिंग ठीक ब्रहमांड के बीच में है। ॐ के साथ उत्पन्न होने के कारण शिव को 'कार' भी कहा जाता है 
वास्तव में शिवलिंग का अभिप्राय स्त्री या पुरुष सूचक लिंग से कदापि नहीं है। किसी भी ग्रन्थ में ऐसा उल्लेख मुझे नहीं मिला। वैज्ञानिक तथ्य यह है कि जब भी कोई ऊर्जा समूह एक साथ मुक्त होता है तो वह बड़े गोलाकार रूप धारण करता है जो शिवलिंगस्वरूप होता है। हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों (ऋषियों) ने ऊर्जा अर्थात् शक्ति के इस रूप को शिवलिंग का पवित्र नाम दिया। आदिशक्ति के इस रूप को पुरुषवाचक माना गया। इस तरह आदिशक्ति ने अपने को दो रूपों में विभक्त किया- स्त्री रूप में माता शक्ति और पुरुष रूप में भगवान शिव। साकार रूप में इन्हें शंकर कहा गया।
          भगवान शिव की पूजा या आराधना का मतलब है ब्रह्माण्ड में बिखरी परमाणु-शक्ति को प्राप्त कर उस का जीवन पालन में उपयोग करते हुए मुक्ति की ओर अग्रसर होना। जो शक्तिशाली है, वही कल्याण को प्राप्त होता है। अतः शिव को कल्याण का कारक माना गया है। 
      भगवान शिव ही समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त सृष्टि का उद्भव होता है। संक्षेप में यह कथा इस प्रकार है- प्रलयकाल के पश्चात सृष्टि के आरम्भ में भगवान नारायण की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ और उस कमल से ब्रह्मा प्रकट हुए। ब्रह्माजी अपने कारण का पता लगाने के लिए कमलनाल के सहारे नीचे उतरे। वहाँ उन्होंने शेषशायी भगवान नारायण को योगनिद्रा में लीन देखा। उन्होंने भगवान नारायण को जगाकर पूछा- ''आप कौन हैं?''
नारायण ने कहा- "मैं लोकों का उत्पत्तिस्थल और लयस्थल पुरुषोत्तम हूँ।"
ब्रह्मा ने पूछा- "किन्तु सृष्टि की रचना करनेवाला तो मैं हूँ।"
      ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर भगवान विष्णु ने उन्हें अपने शरीर में व्याप्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दर्शन कराया।
      इस पर ब्रह्माजी ने कहा- "इस का तात्पर्य है कि इस संसार के स्रष्टा मैं और आप दोनों हैं।"
        भगवान विष्णु ने समझाया- "ब्रह्माजी! आप भ्रम में हैं। सब के परम कारण परमेश्वर ईशान भगवान शिव को आप नहीं देख रहे हैं। आप अपनी योगदृष्टि से उन्हें देखने का प्रयत्न कीजिये। हम सब के आदि कारण भगवान सदाशिव आप को दिखायी देंगे।"
      जब ब्रह्माजी ने योगदृष्टि से देखा तो उन्हें त्रिशूल धारण किये परम तेजस्वी नीलवर्ण की एक मूर्ति दिखायी दी। उन्होंने नारायण से पूछा- "ये कौन हैं?"
      भगवान विष्णु ने बताया- "ये ही देवाधिदेव भगवान महादेव हैं। ये ही सब को उत्पन्न करने के उपरान्त सब का भरण-पोषण करते हैं और अन्त में सब इन्हीं में लीन हो जाते हैं। इन का कोई आदि है अन्त। यही सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हैं।" इस प्रकार ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु की कृपा से सदाशिव का दर्शन किया।