बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

गोधरा कांड पर फैसला उचित / Decision on Godhra proceedings


-शीतांशु कुमार सहाय
गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा गोधरा कांड पर दिये गये फैसले का अर्थ इतना ही है कि विशेष एसआईटी न्यायालय द्वारा जिन ३१ लोग को दोषी माना गया वे वाकई दोषी थे। हाँ, ११ फाँसी की सजा पाये अभियुक्तों को उम्र कैद में बदलने का मतलब हुआ कि अदालत इन के गुनाह को विरलतम नहीं मानती। मृत्युदंड के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने विरलों में विरलतम का आधार तय किया हुआ है। हालाँकि २७ फरवरी, २००२ को गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस की एक बोगी एस ६ में आग लगाकर जिस तरह ५९ लोग को मरने के लिए विवश किया गया, उस से जघन्यतम अपराध कोई और नहीं हो सकता। गुजरात दंगों पर गठित नानावती आयोग ने भी माना था कि उस बोगी में स्वयं आग नहीं लगी थी, उसे साजिशन जलाया गया था जिस में केवल एक समुदाय के लोग मरे थे। देश उस कांड को कभी नहीं भूल सकता जिस की प्रतिक्रिया में गुजरात में भीषण दंगे हुए और उस में करीब १२०० लोग मारे गये। हालाँकि एक वर्ग गुजरात दंगों पर तो छाती पीटता रहा है लेकिन गोधरा पर चुप रहता है। 
पहले एसआईटी की जाँच, फिर एसआईटी न्यायालय का फैसला और अब उच्च न्यायालय के फैसले के बाद उन्हें यह तो स्वीकारना होगा कि अपराधियों के एक वर्ग ने जान-बूझकर अयोध्या से लौटते कारसेवकों को जलाकर मार डाला तथा ऐसी स्थिति नहीं छोड़ी कि वे अपनी जान बचा सकें। इन के खिलाफ आपराधिक साजिश, ज्वलनशील पदार्थ जुटाने और समुदाय विशेष के लोग पर हमला करके मार डालने का आरोप साबित हुआ है। वैसे, दोनों न्यायालयों ने ६३ आरोपितों को बरी भी किया है। इन में मौलाना उमरजी शामिल हैं, जिन्हें एसआईटी ने मुख्य साजिशकर्ता माना था। इस को इसलिए बरी किया गया; क्योंकि पुख्ता सुबूत रखने में एसआईटी विफल रही। मृत्युदंड की जगह ११ लोग को उच्च न्यायालय ने उम्रकैद दी तो इस का कारण भी यही है कि इन का साजिश में शामिल होना तो साबित हुआ लेकिन इस के मुख्य साजिशकर्ताओं की सटीक पहचान नहीं हो सकी। फैसले का एक महत्त्वपूर्ण पहलू गोधरा कांड में मारे गए लोग के परिजनों को सरकार द्वारा १०-१० लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश है। न्यायालय की टिप्पणी बिल्कुल उचित है कि राज्य सरकार एवं रेलवे प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाये रखने में विफल रहे।

उच्चतम न्यायालय का निर्णय : नाबालिग पत्नी से सेक्स बलात्कार / Supreme Court Verdict : sex with Underage Wife is Rape

-शीतांशु कुमार सहाय
उच्चतम न्यायालय ने बड़ा निर्णय देते हुए कहा कि अठारह वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना रेप हो सकता है, यदि नाबालिग पत्नी इस की शिकायत एक वर्ष में करती है उच्चतम न्यायालय ने कहा कि शारीरिक संबंधों के लिए उम्र अठारह वर्ष से कम करना असंवैधानिक हैन्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३७५ के अपवाद को अंसवैधानिक करार दिया अगर पति १५ से १८ वर्ष की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाता है तो बलात्कार माना जायेगा ऐसे मामले में एक वर्ष के भीतर यदि महिला शिकायत करती है तो पति पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज हो सकता है
इस पूरे मामले में उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार की तमाम दलीलों को ठुकरायान्यायालय ने कहा कि महज इसलिए कि बाल विवाह की कुरीती सदियों से चली आ रही है, इसे कानूनी जामा नहीं पहनाया जा सकता, ये गैरकानूनी है और अपराध हैउच्चतम न्यायालय ने कहा कि संसद ने ही कानून बनाया कि १८ से कम उम्र की बच्ची न तो कानूनन विवाह कर सकती है न ही सेक्स के लिए सहमति दे सकती हैसंसद ने ही कानून के जरिये बाल विवाह को अपराध बनाया

उच्चतम न्यायालय ने कहा, नाबालिग बच्ची का बाल विवाह हो जाय और पति जबरन सेक्स करे तो वह अपराध नहीं, यह कहना बिल्कुल बेतुका और असंवैधानिक है१८ साल से कम की उम्र में विवाह बच्ची के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। ऐसा होना संविधान के अनुछेद १४ के तहत बराबरी के हक और अनुछेद २१ के तहत जीने के अधिकार का भी हनन करता हैकोर्ट ने कहा, ये पॉस्को कानून के भी खिलाफ हैउच्चतम न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि भारतीय दण्ड संहिता (आईपीसी) की धारा ३७५ का वह प्रावधान असंवैधानिक है जिस के तहत पति को छूट है कि अगर वह १५-१८ वर्ष की पत्नी से शारीरिक संबंध बनायेगा तो वह बलात्कार नहीं कहलायेगा

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : नवम् सिद्धिदात्री / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Navam Siddhidatri

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के अन्तिम नवम् दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के नवम् स्वरूप ‘सिद्धिदात्री’ की आराधना की जाती है। सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने के कारण ही इन्हें ‘सिद्धिदात्री’ कहा गया। सभी देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और मनुष्य निरन्तर इन की उपासना में संलग्न हैं। 
चार भुजाओंवाली माँ सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। कहीं-कहीं माँ कमल पुष्प पर भी आसीन दीखती हैं। माँ की ऊपरवाली दायीं भुजा में गदा और नीचे की दायीं भुजा में चक्र है। इसी तरह ऊपरवाली बायीं भुजा में कमल और निचली बायीं भुजा में शङ्ख है। इन्हें नवम् दुर्गा भी कहते हैं। 
माँ सिद्धिदात्री समस्त सिद्धियाँ अपने भक्तों को प्रदान करती हैं। ‘ब्रह्मवैवर्त्तपुराण’ में श्रीकृष्ण के जन्मखण्ड में अठारह सिद्धियाँ बतायी गयी हैं- 
१ .अणिमा,
२ .लघिमा, 
३ .प्राप्ति,      
४ .प्राकाम्य, 
५ .महिमा,
६ .ईशित्व-वशित्व, 
७ .सर्वकामावसायिता,     
८ .सर्वज्ञत्व, 
९ दूरश्रवण,    
१० .परकायप्रवेशन, 
११ .वाक्सिद्धि,            
१२ .कल्पवृक्षत्व, 
१३ .सृष्टि,                    
१४ .संहारकरणसामर्थ्य, 
१५ .अमरत्व,    
१६ .सर्वन्यायकत्व, 
१७ .भावना और          
१८ .सिद्धि। 
एक अन्य ग्रन्थ ‘मार्कण्डेयपुराण’ में सिद्धियों की संख्या मात्र आठ बतायी गयी है- 
१ . अणिमा,
२ . महिमा, 
३ . गरिमा,
४ . लघिमा, 
५ . प्राप्ति,                
६ . प्राकाम्य, 
७ . ईशित्व और 
८  वशित्व। 
नवम् दुर्गा माता सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव को समस्त सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी। ऐसा ‘देवीपुराण’ ग्रन्थ में उल्लेख है। ग्रन्थ के अनुसार, सिद्धिदात्री की अनुकम्पा से शिव का आधा शरीर देवी का हो गया था। इस प्रकार महादेव को ‘अर्द्धनारीश्वर’ भी कहा जाने लगा। 
सभी तरह की मनोकामनाओं और सिद्धियों को प्रदान कर माँ सिद्धिदात्री अपने भक्तों की उच्चस्तरीय परीक्षा लेती हैं। वास्तव में ये दोनों कामना व सिद्धि मुक्ति के मार्ग के प्रलोभन हैं। इन्हें प्राप्त करने पर प्रायः गर्व का अनुभव होता है और अहंकार प्रकट हो जाता है। गर्व और अहंकार दोनों ही पतन के कारक हैं। एक बार पतन होने पर पुनः शिखर पर पहुँचना अत्यन्त दुष्कर हो जाता है। अतः मुक्ति के मार्ग पर चलते हुए जब सि़िद्धयाँ प्राप्त होने लगे तो उन में उलझने से अच्छा है, एकाग्रचित होकर आगे बढ़ते रहना। 
माँ सिद्धिदात्री के चरणों पर ध्यान लगाने से अहंकार का शमन होता है। 
ब्रह्माण्ड पर पूर्ण विजय का आशीर्वाद देनेवाली माता सिद्धिदात्री के चरणों में सिर झुकाते हुए हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : अष्टम् महागौरी / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Ashtam Mahagauri

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के अष्टम् दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के अष्टम् स्वरूप ‘महागौरी’ की आराधना की जाती है। एक बार पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में आदिशक्ति प्रकट हुईं। पार्वती ने शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। हजारों वर्षों की तपस्या के कारण पार्वती का शरीर पूर्णतः काला हो गया था। उन की तपस्या सफल हुई और शिव ने पत्नी के रूप में उन्हें स्वीकार कर लिया। भगवान शिव ने पवित्र गङ्गाजल से पार्वती के शरीर को धोया तो वह निर्मल होकर अत्यन्त गौर (गोरा) हो गया। अत्यन्त कान्तियुक्त तथा सर्वाधिक गौरवर्णा माँ का यह स्वरूप ‘महागौरी’ कहलाया। इन्हें अष्टम् दुर्गा भी कहा जाता है।
माँ महागौरी की गौरता (गोरापन) की उपमा शङ्ख, चन्द्र और कुन्द के पुष्प से की गयी है। इन के समस्त आभूषण भी श्वेत हैं और वस्त्र भी श्वेत ही धारण करती हैं। अतः इन्हंे ‘श्वेताम्बरा’ भी कहा जाता है। 
अष्टम् दुर्गा महागौरी वृषभ (साँढ़) पर सवार रहती हैं। माता की चार भुजाएँ हैं। ऊपरी दाहिनी भुजा को अभयमुद्रा में रखती हैं और भक्तों को भयमुक्त बनाती हैं। निचली दायीं भुजा में त्रिशूल धारण करती हैं। माँ की बायीं तरफ की ऊपरी भुजा में डमरू और निचली भुजा वरमुद्रा में है। चतुर्भुजा श्वेताम्बरा माता महागौरी का विग्रह अत्यन्त सौम्य और शान्त है। 
महागौरी के रूप में माँ ने कठिन परिश्रम कर शिव को प्राप्त किया। अतः माँ महागौरी परिश्रम कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। परिश्रम के दौरान कष्ट होते ही हैं। इन कष्टों को माँ पार्वती की तरह सहन करने से महागौरी की तरह लक्ष्य की प्राप्ति होती है। लक्ष्य प्राप्त हो जाने पर समस्त कष्ट प्रेरणास्वरूप प्रतीत होने लगते हैं और तब सुख की प्राप्ति होती है। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए महागौरी देवी की उपासना अवश्य करनी चाहिये। 
देवी महागौरी की उपासना करने से समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। भौतिक और आध्यात्मिक जीवन सुखमय व्यतीत होता है। असम्भव को भी सम्भव करनेवाला माता दुर्गा का अष्टम् स्वरूप बहुविध कल्याणकारी है। माता पूर्वजन्म के पापों को नष्ट कर भविष्य को मोक्षगामी बना देती हैं। 
दुःख और दरिद्रता को समाप्त कर अक्षय पुण्य का अधिकार प्रदान करनेवाली माता महागौरी के चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

बुधवार, 27 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : सप्तम् कालरात्रि / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Saptam Kalratri

-शीतांशु कुमार सहाय 
नवरात्र के सप्तम दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के सप्तम् स्वरूप ‘कालरात्रि’ की आराधना की जाती है। घनी काली रात्रि की तरह काला वर्णवाली माता ही ‘कालरात्रि’ कहलाती हैं। काल भी इन्हीं के वश में है। इन्हें सप्तम् दुर्गा भी कहते हैं। 
माँ कालरात्रि की केश-राशि बिखरी हुई है। गले में विद्युत की तरह चमकीली माला है। इस रूप में माता के तीन नेत्र हैं। अतः इन्हें ‘त्रिनेत्रा’ भी कहते हैं। माता के तीनों नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं। इन नेत्रों से विद्युत के समान चमकवाली किरणें अनवरत् निकलती रहती हैं। 
गर्दभ (गदहा) पर सवार माँ कालरात्रि का स्वरूप अत्यन्त भयानक है। बिखरे बाल, गोल-गोल अत्यन्त चमकीले नेत्र और व्याघ्रचर्म पहनी हुई माँ का यह विकराल रूप देखकर असुर काँप उठते हैं। असुरों और दुर्गुणों का नाश करने के लिए माता ने बायीं तरफ के ऊपरवाले हाथ में लोहे का काँटा व नीच के हाथ में खड्ग अर्थात् कटार धारण किया है। 
असुरों के लिए भयानक होने पर भी माँ कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल ही प्रदान करती हैं। अतः इन्हें ‘शुभङ्करी’ भी कहा जाता है। भक्तों को वरदान देने के लिए माता शुभङ्करी ने ऊपर के दायें हाथ को वरमुद्रा मंे रखा है। निचले दायें हाथ से माँ कालरात्रि भक्तों को अभय प्रदान कर रही हैं; क्योंकि यह हाथ अभयमुद्रा में है। इस तरह माँ सदैव स्नेह बरसाती रहती हैं। उन के भयङ्कर रूप से न घबराते हुए उन से कृपा की याचना करनी चाहिये। 
सप्तम् दुर्गा की पूजार्चना के दौरान योगीजन सहस्रार चक्र में ध्यान लगाते हैं। सहस्रार चक्र एक हजार (सहस्र) पंखुड़ियोंवाला कमल है। इन पंखुड़ियों पर कई मन्त्र अंकित हैं। इस चक्र के मध्य में अत्यन्त उज्ज्वल शिवलिंग है जो पवित्र और उच्चतम चेतना का प्रतीक है। सहस्रार चक्र के इष्टदेव शिव और देवी शक्ति हैं जिन का समस्त शक्तियों तथा तत्त्वों पर अधिकार है। इस चक्र में समस्त शक्तियाँ निहित हैं जिन का सम्बन्ध पचास बीजमन्त्रों की शक्ति के बीस गुणक (50 गुणा 20 बराबर 1000) से है। यहीं शिव-शक्ति का मिलन होता है, आत्मा का परमात्मा में विलय होता है। इस चक्र में ध्यान लगवाकर माँ कालरात्रि सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त कर देती हैं और अपने चरणांे में स्थान दे देती हैं। 
दुष्टों का विनाश करनेवाली माँ कालरात्रि की उपासना करनेवाला बाधाओं में नहीं फँसता, वह निर्भय हो जाता है। कालरात्रि देवी के आराधक को आग, जल, जन्तु, शत्रु और अन्धकार का भय नहीं सताता। ऐसे साधक को ग्रह-बाधा से भी मुक्ति मिल जाती है। मन, कर्म, वचन और शारीरिक शुद्धता-पवित्रता से इन की आराधना करनी चाहिये। 
भय से मुक्ति का आशीर्वाद देनेवाली माँ कालरात्रि के चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी।।

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : षष्टम् कात्यायनी / Navaratr : Nine Forms of Maa Durga : Shashtam Katyayani

-शीतांशु कुमार सहाय 
नवरात्र के षष्टम् दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के षष्टम् स्वरूप ‘कात्यायनी’ की आराधना की जाती है। महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में प्रकट होने के कारण इन्हें ‘कात्यायनी’ कहा गया। भक्तों को वरदान के साथ अभय देनेवाली माँ कात्यायनी सिंह पर सवार रहती हैं। इन्हें षष्टम् दुर्गा भी कहते हैं। 
प्राचीन काल में कत ऋषि हुए थे। उन के पुत्र भी ऋषि हुए जिन का नाम कात्य था। कात्य के गोत्र में ही महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए। आदिशक्ति के उपासक थे कात्यायन। कात्यायन ने इस उद्देश्य से तपस्या की कि आदिशक्ति उन की पुत्री के रूप में जन्म लें। माता आदिशक्ति ने उन की यह प्रार्थना स्वीकार की। यों महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में अवतरित होने के कारण इन्हें ‘कात्यायनी’ कहा गया। 
कात्यायन ऋषि की पुत्री के रूप में माँ कात्यायनी का अवतरण आश्विन कृष्णपक्ष चतुर्दशी को हुआ। इन्होंने आश्विन शुक्ल पक्ष सप्तमी, अष्टमी व नवमी तिथि को कात्यायन ऋषि की त्रिदिवसीय पूजा स्वीकार की और दशमी को भयंकर महिषासुर का वध किया। छठी दुर्गा माता कात्यायनी के प्रथम पुजारी ऋषि कात्यायन ही थे। 
नवरात्र के छठे दिन माँ कात्यायनी की आराधना के लिए योगी आज्ञा चक्र में ध्यान लगाते हैं। यह चक्र मेरुदण्ड के शीर्ष पर भू्रमध्य (भौंहों) के बीच के सीध में स्थित है। आज्ञा चक्र हल्के भूरे या श्वेत रंग का दो पंखुड़ियोंवाला कमल है। इन पंखुड़ियों पर हं और क्षं मन्त्र अंकित हैं। इस के मध्य में बीज मन्त्र ऊँ है। आज्ञा चक्र के इष्टदेव परमशिव हैं और हाकिनी देवी हैं जिन का मन पर अधिकार है। 
आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाकर माँ कात्यायनी के चरणों में सर्वस्व अर्पित कर देना चाहिये। ऐसा करने से ही माँ षष्टम् दुर्गा दर्शन देती हैं और भक्त को परमपद की प्राप्ति होती है। 
चारों पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्रदान करनेवाली माँ कात्यायनी की आराधना करके ही ब्रजवासी गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पतिरूप में प्राप्त किया था। कालिन्दी (यमुना) नदी के तट पर गोपियों ने उन की उपासना की थी, इसलिए माता कात्यायनी को ब्रजमण्डल की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। ब्रजवासी प्राचीन काल से उन की उपासना करते आ रहे हैं। 
सिंह पर सवार माँ कात्यायनी की चार भुजाएँ हैं। दाहिनी तरफ की ऊपरी भुजा अभयमुद्रा में व निचली भुजा वरमुद्रा में हैं। ऊपरवाली बायीं भुजा में तलवार और नीचेवाली भुजा में कमल सुशोभित हैं। स्वर्ण के समान चमकीले और भास्वर वर्णवाली माता भक्तों को वर भी देती हैं और भयमुक्त भी बनाती हैं।
जन्म-जन्मान्तर के समस्त कष्टों को समाप्त करनेवाली माँ कात्यायनी के चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानवघातिनी।।

सोमवार, 25 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : पंचम् स्कन्दमाता / Navaratra : Nine Forms of Mother Durga : Fifth Skandamata

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के पंचम दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के पंचम स्वरूप ‘स्कन्दमाता’ की आराधना की जाती है। भगवान कार्त्तिकेय का एक अन्य नाम ‘स्कन्द’ भी है। स्कन्द को उत्पन्न करने के कारण माँ दुर्गा के पाँचवें रूप को ‘स्कन्दमाता’ कहा गया। इन्हें पंचम दुर्गा भी कहा जाता है। 
इस स्वरूप में माँ सिंह पर बैठी हैं। उन की गोद में भगवान स्कन्द अपने बालरूप में स्थित हैं। चार भुजाओंवाली देवी स्कन्दमाता खिले कमल के समान सदैव प्रसन्नता का प्रसाद बाँटती हैं। माता अपनी ऊपरवाली दायीं भुजा से गोद में बैठे पुत्र स्कन्द को पकड़ी हुई हैं। दाहिनी तरफ की नीचेवाली भुजा जो ऊपर की ओर मुड़ी हुई है, उस में कमल है। इसी तरह बायीं तरफ की ऊपरी भुजा वरमुद्रा में है। निचली बायीं भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उस में कमल है।
दो हाथों में कमल धारण करनेवाली माता सदैव भक्तों को कमल की तरह आनन्द प्रदान करने को तत्पर हैं। वह कमल के ही आसन पर विराजमान हैं, अतः इन्हें ‘कमलासना’ देवी अथवा ‘पद्मासना’ देवी भी कहते हैं। इन के शरीर का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है।
नवरात्र के पाँचवें दिन योगीजन आदिशक्ति का ध्यान विशुद्धि चक्र में लगाते हैं। गर्दन के निकट यह चक्र स्थित है। सिद्ध योगी खेचरी मुद्रा से यहीं अमृत का पान करते हैं। शुद्धिकरण का प्रतीक है विशुद्धि चक्र जो सोलह पंखुड़ियोंवाला कमल है। इस कमल का रंग जामुनी मिश्रित धुएँ के रंग का है। विशुद्धि चक्र के सोलह पंखुड़ियों पर क्रमशः अं, आं, इं, ईं, उं, ऊं, ऋं, ऋंृ, लृं, लृं, एं, ऐं, ओं, औं, अं, अंः मंत्र अंकित हैं। इस कमल के मध्य श्वेत वृत्त है। विशुद्धि चक्र का बीजमन्त्र हं है और वाहन श्वेत गज (उजला हाथी) है जो आकाश का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव अर्द्धनारीश्वर तथा देवी साकिनी हैं जिन का अधिकार अस्थियों पर है।
विशुद्धि चक्र पर ध्यान केन्द्रित कर स्कन्दमाता की आराधना करनी चाहिये। देवी स्कन्दमाता अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। वह भक्त के दोषों को क्रमशः दूर करती जाती हैं और अन्ततः शुद्ध कर विशुद्धि चक्र की सिद्धि प्रदान करती हैं।
सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण माँ स्कन्दमाता की आराधना से सूर्य के समान अद्भुत तेज व कान्ति की प्राप्ति होती है। इन की पूजा करने से स्वतः ही बालरूप भगवान कार्त्तिकेय अर्थात् स्कन्द की भी पूजा हो जाती है। अतः स्कन्दमाता की पूजार्चना अवश्य करनी चाहिये।
भक्तों के आभामण्डल को सुदृढ़ और अभेद्य बनानेवाली माँ स्कन्दमाता को हाथ जोड़कर चरणों में प्रणाम करें-
सिंहासन नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।

रविवार, 24 सितंबर 2017

नवरात्र : माता दुर्गा के नौ रूप : चतुर्थ कूष्माण्डा / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Fourth Kushmanda

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के चतुर्थ दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप कूष्माण्डा की आराधना की जाती है। जब आदिशक्ति ने अपनी मन्द मुस्कान से अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया तब उन्हंे ‘कूष्माण्डा’ कहा गया। इसी रूप में माता समस्त जड़-चेतन की पूर्वज हैं, सब का आदि हैं मगर उन का आदि कोई नहीं। भयानक अन्धकार के बीच आदिशक्ति कूष्माण्डा ने प्रसन्न मुद्रा में अपनी मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना की और सृष्टि क्रम को आरम्भ किया। 
माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप के नामकरण का एक अन्य कारण है। संस्कृत शब्द ‘कूष्माण्डा’ का हिन्दी अर्थ कुम्हड़ा या कोहरा है। यह एक प्रकार की सब्जी है जिस की बलि माता को अत्यन्त प्रिय है। अतः इन्हें कूष्माण्डा कहा गया। इन्हंे चतुर्थ दुर्गा भी कहते हैं। 
आठ भुजाओंवाली माँ कूष्माण्डा सिंह पर सवार हैं। इन की सात भुजाओं में क्रमशः कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल, अमृत से भरा कलश, चक्र व गदा हैं। माता ने इस रूप में आठवीं भुजा में समस्त निधियों और सिद्धियों को देनेवाला जपमाला धारण किया है।
योगीजन माता के इस स्वरूप का ध्यान अनाहत चक्र पर करते हैं। यह चक्र बारह पंखुड़ियोंवाला नीला कमल है। इन पंखुड़ियों पर क्रमशः कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ´ं, टं, ठं मन्त्र अंकित हैं। मध्य में षट्कोण आकृति है जो दो त्रिभुजों के मिलने से बनी है। अनाहत चक्र का बीजमन्त्र यं है और वाहन शीघ्रगामी काला हिरन है जो वायु का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव ईशा हैं और देवी काकिनी हैं जो तैलीय तत्त्व पर अधिकार रखती हैं। 
नवरात्र के चौथे दिन आराधक को अनाहत चक्र में ध्यान लगाना चाहिये। योगीजन ध्यान के माध्यम से माँ कूष्माण्डा का दर्शन-पूजन अनाहत चक्र में ही करते हैं। 
माता अपने उपासकों के समस्त रोग व शोक हर लेती हैं और आयुष्य, बल, यश और आरोग्य का वरदान देती हैं। कूष्माण्डा देवी की शरण में पूर्ण निष्ठाभाव से आनेवाले भक्तों का कल्याण सुनिश्चित हो जाता है। ऐसे साधक सुगमतापूर्वक परमधाम को प्राप्त कर लेते हैं। अतः माँ कूष्माण्डा की भक्ति अवश्य करनी चाहिये। 
माता दुर्गा अपने चौथे रूप में सूर्यमण्डल या सूर्यलोक में निवास करती हैं। माता कूष्माण्डा के शरीर कीे कान्ति और प्रभा से ही ब्रह्माण्ड के सभी सूर्य (प्रकाश उत्पन्न करनेवाले तारे) चमक रहे हैं। असंख्य सूर्यों के तेज से भी अधिक उज्ज्वल स्वरूपा माता अपनी स्थायी मुस्कान से भक्तों को प्रसन्न व आनन्दित करती रहती हैं। समस्त प्रकाश पुंजों में देवी कूष्माण्डा का ही तेज समाहित है। इन्हीं का तेज सभी प्राणियों व निर्जीवों में प्रसारित हो रहा है।
कष्टनिवारिणी माता कूष्माण्डा को हाथ जोड़कर चरणों में प्रणाम करें-
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।

शनिवार, 23 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : तृतीय चन्द्रघण्टा / Navaratra : Nine Forms of Mother Durga : Third Chandraghanta

-शीतांशु कुमार सहाय 
नवरात्र के तीसरे दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के तृतीय स्वरूप चन्द्रघण्टा की आराधना की जाती है। इन के मस्तक में घण्टे के आकारवाला अर्द्धचन्द्र है। अतः इन्हें ‘चन्द्रघण्टा’ कहा जाता है। स्वर्ण के समान आभावाला यह स्वरूप परमशान्ति देनेवाला है। ये शीघ्र ही भक्तों का कल्याण करती हैं। इन्हें तृतीय दुर्गा भी कहते हैं।
माँ चन्द्रघण्टा दस भुजाओंवाली हैं जो भक्तों के कल्याण के लिए कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को धारण करती हैं। माँ ने इस रूप में तीर, धनुष, तलवार, गदा, त्रिशूल, कमल, कमण्डलु, जप माला, आशीर्वाद मुद्रा व ज्ञान मुद्रा धारण किया है। इस रूप में माँ सदा असुरों से युद्ध के लिए तैयार हैं। सिंह की सवारी करनेवाली चन्द्रघण्टा देवी के घण्टे की विचित्र ध्वनि से असुर सदा भयभीत रहते हैं। अतः माता दुर्गा के इस तीसरे स्वरूप की पूजा-उपासना करनेवाले भक्तों को दुर्गुण, व्याधि व विविध प्रकार के कष्टों के असुर तंग नहीं करते।
माता चन्द्रघण्टा की असीम कृपा से भक्त प्रसन्न रहते हैं, पाप मिट जाते हैं और बाधाएँ प्रबल नहीं हो पातीं। भक्त सिंह की तरह पराक्रमी व निर्भय हो जाते हैं और उन में सौम्यता व विनम्रता का विकास होता है। माँ दुर्गा के इस तीसरे स्वरूप का उपासक कान्तिवान और ऊर्जावान हो जाता है। उस के स्वर में अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है और मुखमण्डल पर प्रसन्नता छायी रहती है। ऐसे साधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। इस कारण उस के सम्पर्क में आनेवाले लोग को भी अत्यन्त लाभ होता है।
दुर्गा के तीसरे रूप चन्द्रघण्टा को जब भी कोई भक्त पुकारता है, उन्हें स्मरण करता है, उन की स्तुति करता है या उन की शरण में जाता है तो माता का घण्टा प्रकम्पित हो उठता है। यों भक्त शीघ्र ही कष्टमुक्त हो जाता है।
योग के माध्यम से माँ चन्द्रघण्टा को मणिपुर चक्र में स्थित मानकर आराधना करनी चाहिये। मणिपुर चक्र दस पंखुड़ियोंवाला पीला कमल है जिस पर डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं और फं मन्त्र अंकित हैं। इस के मध्य में लाल रंग का उल्टा त्रिभुज है। इस चक्र का बीजमन्त्र रं और वाहन चमकदार भेड़ है जो आघात पहुँचानेवाले चौपाये पशु का प्रतीक है। मणिपुर चक्र के इष्टदेव रुद्र और देवी लाकिनी हैं जिन का अधिकार मांसपेशियों पर है।
नवरात्र के तीसरे दिन भक्त को मणिपुर चक्र पर ही ध्यान लगाना चाहिये। ऐसा करने से भक्त को कई दिव्य व अलौकिक अनुभूतियाँ होती हैं। दिव्य सुगन्ध, दिव्य दर्शन, दिव्य संगीत व दिव्य ज्ञान का लाभ भक्तों को प्राप्त होता है। ध्यान के दौरान प्राप्त होनेवाले इन लाभों पर अहंकार में वृद्धि नहीं हो, इस के लिए भक्त को निरन्तर सावधान रहना चाहिये। भव-बाधा को समाप्त कर कल्याण का मार्ग प्रशस्त करनेवाली ममतामयी माता चन्द्रघण्टा का हाथ जोड़कर नमन करें-
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : द्वितीय ब्रह्मचारिणी / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Second Brahmacharini

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के द्वितीय दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के द्वितीय स्वरूप ‘ब्रह्मचारिणी’ की आराधना की जाती है। वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म- वेद, तत्त्व तथा तप ब्रह्म शब्द के अर्थ हैं। चूँकि ब्रह्म का एक अर्थ तप भी है, अतः ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करनेवाली। दाहिने हाथ में जप की माला और बायें हाथ में कमण्डलु धारण करनेवाली द्विभुजा माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यन्त भव्य और पूर्णतः ज्योतिर्मय है। इन्हें ‘तपश्चारिणी’ भी कहते हैं। इन्हें द्वितीय दुर्गा कहा गया है।
अपने एक जन्म में जब आदिशक्ति ने अपने को पार्वती नाम से हिमालय की पुत्री के रूप में प्रकट किया तो भगवान शंकर को पति रूप में पाने के लिए व्यग्र हो उठीं, तब देवर्षि नारद ने उन्हें शंकर को वरण करने के लिए कठिन तपस्या करने का परामर्श दिया। एक हजार वर्षों तक फल-मूल पर तो सौ वर्षों तक केवल साग ग्रहणकर तपस्या मेें लीन रहीं। इस के पश्चात् पूर्णतः उपवास आरम्भ कर दिया। उपवास के साथ वह खुले आकाश तले वर्षा, धूप आदि के कष्ट सहती रहीं। इस के बाद तीन हजार वर्षों तक भूमि पर टूटकर गिरे बेलपत्रों को ग्रहणकर भगवान शंकर की आराधना में माता लीन रहीं। तत्पश्चात् उन्होंने और दुष्कर तप आरम्भ किया। सूखे बेलपत्रों को भी भोजन के रूप में ग्रहण करना छोड़ दिया और कई हजार वर्षों तक बिना जल व बिना आहार के तपस्या करती रहीं। इस तरह के कठोर तप करने के कारण माँ पार्वती का नाम तपश्चारिणी या ब्रह्मचारिणी हो गया। पत्रों या पत्तों को ग्रहण करना छोड़ देने के कारण माता ब्रह्मचारिणी को ‘अपर्णा’ भी कहा गया। इस सन्दर्भ में गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में कहा है- ‘‘उमा नाम तब भयउ अपर्णा।’’ विदित हो कि पत्ते को संस्कृत में पर्ण भी कहते हैं।
हजारों वर्षों तक निरन्तर तपस्यारत रहने के कारण माँ ब्रह्मचारिणी का शरीर क्षीण हो गया। वह अत्यन्त कृषकाय (दुबली) हो गयीं। उन की इस दशा को देखकर उन की माता मेना अत्यन्त दुःखित हुईं। अपनी पुत्री को तपस्या से विरत करने के लिए माता ने कहा- उ...मा,.....अरे नहीं,.....ओ नहीं...। यों माता आदिशक्ति का एक नाम ‘उमा’ भी पड़ गया।
माँ ब्रह्मचारिणी की तपस्या से समस्त लोकों में हलचल मच गया। देव, देवी, ऋषि- सभी उन का गुणगान करने लगे। उन की कठिन तपस्या की प्रशन्सा चहुँओर होने लगी। तीनों लोकों में माँ की स्तुति होने लगी। आकाशवाणी से भगवान ब्रह्मा ने माता ब्रह्मचारिणी से कहा- ‘‘हे देवी! अब तक किसी ने ऐसी कठिन तपस्या नहीं की। ऐसी तपस्या आप से ही सम्भव थी। आप के इस अलौकिक कृत्य की चहुँओर प्रशंसा हो रही है। आप की मनोकामना पूर्ण होगी। भगवान चन्द्रमौलि शिव आप को पति के रूप में प्राप्त होंगे। अब आप तपश्चर्या को त्यागकर निजगृह को लौट जायंे। शीघ्र ही आप के पिता आप को बुलाने आ रहे हैं।’’ इस तरह माता ब्रह्मचारिणी पिता के साथ घर लौट आयीं और बाद में भव्य तरीके से भगवान शिव से उन का विवाह हुआ।
अपने भक्तों को साधना का फल प्रदान करता है माँ दुर्गा का दूसरा स्वरूप। इन की आराधना से तप की प्रगाढ़ता में वृद्धि होती है। सदाचार, त्याग, वैराग्य, संयम, वाक्शुद्धि आदि सद्गुणों में अभिवृद्धि होती है। साथ ही सभी तरह के दुर्गुण कम होते जाते हैं, समाप्त होते जाते हैं।
योग के माध्यम से माता ब्रह्मचारिणी की आराधना करनेवाले भक्त स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान लगाते हैं। इस चक्र में ब्रह्मचारिणी का दर्शन करने से भक्ति अत्यन्त प्रगाढ़ हो जाती है। स्वाधिष्ठान चक्र तेज लाल रंग का कमल है जिस की छः पंखुड़ियों पर क्रमशः बं, भं, मं, यं, रं, लं मन्त्र अंकित हैं। इस चक्र के मध्य में अर्द्धचन्द्र है। स्वाधिष्ठान चक्र का बीजमन्त्र वं और वाहन मगर है जो जल का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव विष्णु तथा देवी राकिनी हैं जिन का अधिकार रक्त पर है।
माता ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों को कठिन संघर्ष की स्थिति में भी कर्त्तव्य-पथ से विचलित नहीं होने देतीं और विजयश्री दिलाती हैं। किसी कार्य को करने में एकाग्रता अनिवार्य है जिस की प्राप्ति माँ ब्रह्मचारिणी की पूजार्चना से होती है। माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी की हाथ जोड़कर आराधना करें-
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : प्रथम शैलपुत्री / Navaratra : Nine Forms of Mother Durga : First Shailputri

-शीतांशु कुमार सहाय
माँ दुर्गा के नौ रूप हैं- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री। ‘मार्कण्डेयपुराण’ में माँ नवदुर्गा का भक्तिपूर्ण परिचय 700 श्लोकों में व्यक्त किया गया है जिन्हंे ‘दुर्गासप्तशती’ कहा जाता है। ‘दुर्गासप्तशती’ ग्रन्थ के वर्णन के अनुसार, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने जिन श्लोकों से माँ आदिशक्ति की आराधना की, उन श्लोकों को सम्मिलित रूप से ‘रात्रि सूक्त’ कहते हैं। इस में नवदुर्गा का मन्त्र इस प्रकार है-
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। 
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना।।

प्रथम शैलपुत्री 

नवरात्र के प्रथम दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की आराधना की जाती है। पर्वत को संस्कृत में ‘शैल’ भी कहते हैं। अतः पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण देवी का नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। 
वृषभ (साँढ़) की सवारी करनेवाली माता शैलपुत्री द्विभुजा हैं। दायें हाथ में त्रिशूल व बायें हाथ में कमल का फूल धारण करती हैं। इन्हें प्रथम दुर्गा भी कहा जाता है। माता शैलपुत्री का विवाह भगवान शंकर से हुआ। प्रत्येक जन्म की भाँति इस जन्म में भी शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए शैलपुत्री को तपस्या करनी पड़ी। 
पर्वत की पुत्री होने के कारण इन्हें ‘पार्वती’ भी कहा जाता है। पिता हिमालय के नाम के आधार पर इन्हें ‘हैमवती’ या ‘हेमवती’ की संज्ञा भी दी जाती है। माता ने हैमवती स्वरूप में देवताओं के गर्व व अहंकार को समाप्त किया था। अतः माँ को ‘देवगर्वभंजिका’ भी कहा गया।
नवरात्र के प्रथम दिन कलश स्थापित करने के पश्चात् वृषारूढ़ा शैलपुत्री की विधिवत् पूजा की जाती है। भक्तों को कर्मफल प्रदान करनेवाली माता सद्कर्म की प्रेरणा देती हैं। 
योग के माध्यम से भी शैलपुत्री की आराधना की जाती है। इस विधि से माता की आराधना करने के लिए किसी वाह्य सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। माँ शैलपुत्री का दर्शन योगीजन मूलाधार चक्र में करते हैं। नवरात्र के प्रथम दिन मूलाधार चक्र में ही ध्यान लगाना चाहिये। 
मूलाधार चक्र गहरे लाल रंग का कमल है जिस की चार पंखुड़ियाँ हैं। पंखुड़ियों पर क्रमशः वं, शं, षं और सं मन्त्र अंकित हैं। इस चक्र की आकृति चौकोर है। मूलाधार चक्र पर बीजमन्त्र लं है। वाहन हाथी है जो पृथ्वी की दृढ़ता का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव ब्रह्मा और देवी डाकिनी हैं जिन का अधिकार स्पर्शानुभूति पर है। मूलाधार चक्र के केन्द्र में लाल त्रिभुज है जिस का सिरा नीचे की ओर है। 
पूर्वजन्म में दक्ष की पुत्री सती के रूप में माँ शैलपुत्री प्रकट हुई थीं। सती का विवाह शंकर से हुआ था। एक बार दक्ष ने एक विशेष यज्ञ का आयोजन किया जिस में भगवान शिव अर्थात् अपने दामाद को निमन्त्रित नहीं किया। पर, पिता के यज्ञ मेें शामिल होने की आज्ञा सती ने येन-केन प्रकारेण अपने पति शिव से ले ही ली। अन्ततः सती अपने शरीर को यज्ञ स्थल पर योगाग्नि से भस्म कर देती हैं। तत्पश्चात् हिमालय की पुत्री के रूप में अवतरित हुईं और शैलपुत्री कहलायीं। हाथ जोड़कर माँ शैलपुत्री की आराधना करें-
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्द्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

नवरात्र में शरीर व मन की शुद्धि / Purification of Body and Mind in Navaratra

-शीतांशु कुमार सहाय
शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शु़िद्ध प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई के लिए वर्ष में चार नवरात्र आते हैं। ये चारों अवसर ऋतुओं के परिवर्तन के हैं। इस दौरान अनेक व्याधियों की उत्पत्ति होती है। इन से बचने के लिए नवरात्र में शरीर व मन की शुद्धि की जाती है। ये चार अवसर हैं- चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ। 
चैत्र में वसन्त ऋतु की समाप्ति व ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत होती है। आषाढ़ में ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति व वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। आश्विन में वर्षा ऋतु की समाप्ति व शरद ऋतु की शुरुआत होती है। यों माघ में शिषिर ऋतु की समाप्ति व वसन्त ऋतु की शुरुआत होती है। इन चारों महत्त्वपूर्ण ऋतुओं के सन्धिकाल में शरीर और मन को शुद्धकर माता आदिशक्ति दुर्गा की आराधना करनी चाहिये। 
सात्त्विक आहार से शरीर की शुद्धि होती है। साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, शुद्ध बुद्धि से उत्तम विचार, उत्तम विचारों से उत्तम कर्म, उत्तम कर्मों से सच्चरित्रता और सच्चरित्रता से क्रमशः मन शुद्ध होता है। स्वच्छ मन के मन्दिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।

नवरात्र या नवरात्रि / Navaratri or Navaratra

-शीतांशु कुमार सहाय
संस्कृत व्याकरण के अनुसार, ‘नवरात्रि’ कहना त्रुटिपूर्ण है। नौ रात्रियों का समाहार (समूह होने के कारण से द्वऩ्द्व समास) होने के कारण यह शब्द पुल्लिंग रूप ‘नवरात्र’ में ही शुद्ध है। 
पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक वर्ष की चार सन्धियाँ हैं। चैत्र में वसन्त ऋतु व ग्रीष्म ऋतु की और आषाढ़ में ग्रीष्म ऋतु व वर्षा ऋतु की सन्धि होती है। इसी तरह आश्विन में वर्षा ऋतु व शरद ऋतु की तथा माघ में शिशिर ऋतु व वसन्त ऋतु की सन्धि होती है। 
ऋतुओं के उपर्युक्त चार सन्धियों के समय रोगाणुओं के आक्रमण की सर्वाधिक सम्भावना रहती है। ऋतु सन्धियों में अक्सर शारीरिक व मानसिक बीमारियाँ बढ़ती हैं। अतः उस काल में स्वास्थ्य के उद्देश्य से शरीर-शुद्धि और तन-मन की निर्मलता के लिए की जानेवाली प्रक्रिया का नाम नवरात्र है। अमावस्या की रात से अष्टमी तक या प्रथमा (प्रतिपदा) से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रातें होती हैं अर्थात् ‘नवरात्र’ नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, नौ रातों का समूह ही नवरात्र कहा जाता है। 
हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारोंवाला कहा गया है और दसवाँ द्वार सहस्रार चक्र है जहाँ आदिशक्ति माँ दुर्गा स्थित हैं। सहस्रार चक्र में निवास करनेवाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा है। इन मुख्य इन्द्रियों के बीच अनुशासन, स्वच्छता व तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में शरीर-तन्त्र को पूरे वर्ष के लिए सुचारू रूप से कार्यशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नवरात्र मनाया जाता है।

पुराणों में नवरात्र / Navaratra in the Puranas

-शीतांशु कुमार सहाय
मान्यता है कि नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोयी हुई शक्ति पायी थी। अतः इस समय आदिशक्ति की आराधना पर विशेष बल दिया गया है। ‘मार्कण्डेयपुराण’ के अन्तर्गत ‘दुर्गा सप्तशती’ में स्वयं भगवती ने इस समय (नवरात्र) शक्ति पूजा को ‘महापूजा’ बताया है। कलश स्थापना, दुर्गा की स्तुति, सुमधुर घण्टियों की आवाज, धूप व बत्तियों की सुगन्ध- यह नौ दिनों तक चलनेवाले साधना पर्व नवरात्र का चित्रण है। 
भारतीय संस्कृति में नवरात्र की साधना का विशेष महत्त्व है। नवरात्र में ईश-साधना और अध्यात्म का अद्भुत संगम होता है। इस अवधि में रामलीला, रामायण पाठ, रामचरितमानस पाठ, श्रीमद्भागवत पाठ, अखण्ड कीर्तन जैसे सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। यही वजह है कि नवरात्र के दौरान प्रत्येक व्यक्ति नये उत्साह और उमंग से भरा दिखायी पड़ता है। 
वैसे तो ईश्वर का आशीर्वाद हम पर सदा ही बना रहता है। पर, कुछ विशेष अवसरों पर उन के प्रेम व कृपा का लाभ हमंे अधिक मिलता है। पावन पर्व नवरात्र में सृष्टि की सभी रचनाओं पर माता दुर्गा की कृपा समान रूप से बरसती है। इस के परिणामस्वरूप ही मनुष्य को लोक-मंगल के कार्यकलापों में आत्मिक आनन्द की अनुभूति होती है।

अम्बिका स्थान : नवरात्र के नियम और मान्यताएँ / Ambika Sthan : Navaratra Rules and Beliefs


-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र में माँ दुर्गा के व्रत रखे जाते हैं। भारत के उत्तरी क्षेत्र में स्थान-स्थान पर माँ दुर्गा की मूर्तियाँ बनाकर उनकी विशेष पूजा की जाती है। अनेक लोग घर में भी कलश स्थापित कर ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ करते हैं। कुछ लोग इस दौरान ‘रामायण’, ‘रामचरितमानस’ या ‘सुन्दरकाण्ड’ (रामचरितमानस का एक खण्ड) आदि का भी पाठ करते हैं। 
नवरात्र के दौरान अम्बिका स्थान पर दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। नवरात्र के दिनों में यहाँ मेला लगता है। भगवती के नौ प्रमुख रूप (अवतार) हैं तथा प्रत्येक की इन नौ दिनों में विशिष्ट पूजा की जाती है। मुख्य रूप से वर्ष में दो बार भगवती अम्बिका भवानी की विशेष पूजा की जाती है। इन में एक नवरात्र तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (प्रथमा) से नवमी तक और दूसरा श्राद्धपक्ष (पितृपक्ष) के दूसरे दिन आश्विन शुक्ल प्रथमा से आश्विन शुक्ल नवमी तक। अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा को पूर्णाहुति दी जाती है। चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराया जाता है। 
नवरात्र में अम्बिका स्थान पर पशुओं की हत्या-बलि नहीं दी जाती। यहाँ के पुजारी सन्त भीखमदास बताते हैं कि सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के किसी भी मूल ग्रन्थ में पशु-पक्षियों की हत्या-बलि का विधान नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस धर्म में किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाने तक की मनाही है, उस धर्म में हत्या को कैसे जायज माना जा सकता है। यह धर्म में घुसे मांसाहारियों के मन की खुराफात है। बलि का अर्थ वास्तव में प्रिय वस्तु का त्याग है, दुर्गुणों का त्याग है, कुरीतियों का त्याग है- किसी को जान से मारकर जश्न मनाना किसी भी धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता। 
भीखमदास के अनुसार, अम्बिका स्थान में मुक्त-बलि की प्रथा प्रचलित है। इस के तहत पशु के कान में छेद कर उसे छोड़ दिया जाता है जिसे जरूरतमन्द लोग पकड़ लेते हैं और उसे पालते हैं। 
नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में नौ शक्तियों की पूजा करनी चाहिये। पूजन की पूर्णाहुति पर दरिद्रनारायण व ब्राह्मण को अवश्य दान दें। दान देते समय यह कल्पना कदापि न करें कि मैं दे रहा हूँ और वह ले रहा है। उस समय यही स्मरण रहना चाहिये कि भगवान के एक रूप से भगवान का ही अन्य रूप ग्रहण कर रहा है।

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

तीन तलाक़ असंवैधानिक : सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला / Three Divorces Unconstitutional : Historic Decision of The Supreme Court

-शीतांशु कुमार सहाय
मुसलमानों में महिलाओं को दोयम दर्जे का अधिकार है। अब उच्चतम न्यायालय के फैसले से कुछ परिवर्तन की आशा जगी है। तीन तलाक के मसले पर उच्चतम न्यायालय आज २२ अगस्त २०१७ को ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए तीन (ट्रिपल) तलाक़ को असंवैधानिक क़रार दिया। तीन न्यायाधीशों के मुताबिक तुरंत ट्रिपल तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत यानी एक बार में तीन तलाक गैर कानूनी और इस्लाम के खिलाफ है। यह इस्लाम का हिस्सा नहीं है और इसलिए मुस्लिम इस तरीके से तलाक नहीं ले सकते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने केंद्र से इस मामले में ६ महीने के अंदर क़ानून बनाने को कहा है। फ़िलहाल ट्रिपल तलाक पर ६ महीने की रोक लगा दी है। ५ में से ३ न्यायाधीशों  ने ट्रिपल तलाक के ख़िलाफ़ बात कही। उच्चतम न्यायालय ने इस साल मई में इस मामले पर सुनवाई की थी और सभी पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट में ११ से १६ मई २०१७ तक सुनवाई हुई थी। मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता में पाँच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनीं हैं। इस से पहले संविधान पीठ ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से पूछा था कि क्या औरतें तीन तलाक को न कह सकती हैं? पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील सिब्बल से मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने पूछा था कि क्या महिलाओं को निकाहनामा के समय तीन तलाक को न कहने का विकल्प दिया जा सकता है। क्या सभी काजियों से निकाह के समय इस शर्त को शामिल करने का प्रस्ताव पारित किया जा सकता है?
यह है संविधान पीठ
पाँच न्यायाधीशों  वाली संविधान पीठ ने तीन तलाक मामले की सुनवाई की है जिस की अध्यक्षता मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने की। इस पीठ में न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ, न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर शामिल रहे।
पक्ष व विपक्ष के दलील   
केन्द्रीय सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न हिस्सा कभी था ही नहीं। इसे सिर्फ इसलिए नहीं जारी रखा जा सकता है कि ये प्रथा पिछले 1400 साल से चल रही थी। अटॉर्नी जनरल ने तर्क देते हुए कहा कि क्या कोई ये कह सकता है कि परंपरा के नाम पर नरबलि को इजाजत दे दी जाय।
कपिल सिब्बल ने दलील दी थी कि मुस्लिम समुदाय के एक छोटी सी चिड़िया है, जिस पर गिद्ध अपनी नज़रें गड़ाये बैठा हुआ है। समुदाय के घोंसले को सुप्रीम कोर्ट का संरक्षण मिलना चाहिए। मुस्लिम समुदाय एक विश्वास के साथ कोर्ट आया है और अपने पर्सनल लॉ, परंपरा और रुढ़ियों के लिए सुरक्षा माँग रहा है। मुस्लिम समुदाय का सुप्रीम कोर्ट पर पिछले 67 वर्षों से विश्वास है। उन्होंने कहा था कि यदि कोई अदालत इस विश्वास के साथ आता है कि उसे न्यायालय मिलेगा तो अदालत को भी उसकी भावना को समझना चाहिए। अगर यदि अदालत में कोई तीन तलाक़ को रद्द् कराने के लिए आता तो वो ठीक था लेकिन अदालत का ख़ुद संज्ञान लेना ठीक नहीं है क्योंकि संविधान भी इस विषय पर मौन ही रहा है।
ये हैं याचिका दायर करनेवाली 
(1) शायरा बानो : १५ साल शादी के बाद अक्टूबर २०१६ में तीन तलाक की शिकार। शायरा बानो को १५ साल की शादी के बाद उन के पति ने तलाक दे दिया। शायरा बानो इसे कोर्ट में सेकर चली गयी। उन्होंने तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला की परंपरा को चुनौती दी।
(2) मुस्लिम महिलाओं का प्रतिनिधि समूह : इस ग्रुप ने तीन तलाक पर प्रतिबंध को लेकर याचिका दायर की। यह बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं के मत का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
(3) कुरान सुन्नत सोसाइटी : कुरान के सही ढंग से पालन के लिए बनाया गया समूह, इन की माँग है कि कुरान का ईमानदार और सही ढंग से पालन हो।
(4) अतिया शाबरी : अमरोहा की रहने वाली उसके पति ने स्पीड पोस्ट से मिला तलाक। इस संबंध में इशरत ने पीएम और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से शिकायत की थी।
(5) आफरीन रहमान : मई २०१६ में पत्र के जरिये मिला तलाक।
(6) गुलशन परवीन : पिछले साल दस रुपये के स्टाम्प पेपर पर मिला तलाक। रामपुर की रहनेवाली 30 वर्षीया गुलशन परवीन अंग्रेजी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएट को उन के पति ने तलाक दे दिया। २०१३ में उन की शादी हुई थी।
(7) इशरत जहां : १५ साल की शादीशुदा, दुबई से फोन पर मिला तलाक। फिलहाल वह पश्चिम बंगाल में रह रहीं हैं।
इन देशों में भी लगा है प्रतिबंध
तीन तलाक पर दुनिया के कई देशों ने प्रतिबंध लगाया हुआ है। इन में अल्जिरिया, बांग्लादेश, ब्रुनेई, साइप्रस, संयुक्त अरब गणराज्य (मिस्र), इंडोनेशिया, इरान, इराक, जोर्डन, मलेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका, सीरिया, ट्यूनिशिया, तुर्की और यूएई शामिल है। अब दुनिया के इन देशों की सूची में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तीन तलाक को असंवैधिक करार देने के बाद भारत भी शामिल हो गया है।
बचे हैं तलाक के दो रास्ते
भारतीय मुसलमान दो अन्य तरीकों से तलाक ले सकते हैं : तलाक-ए-एहसन और तलाक-ए-हसना।
तलाक-ए-एहसन : एक बार में एक तलाक बोला, इसके बाद तीन महीने तक इंतजार किया। इस दौरान अगर पति-पत्नी के बीच सुलह हो जाए तो तलाक नहीं होगा। अगर सुलह नहीं हुई तो तीन महीने के बाद तलाक हो जाएगा।
तलाक-ए-हसना : पत्नी के मेंस्ट्रुअल साइकल के बाद तलाक बोला. इसके बाद अगले मेंस्ट्रुअल साइकल के बाद तलाक बोला और फिर तीसरे महीने के मेंस्ट्रुअल साइकल के बाद तलाक बोला। इस तरह तीन महीने तक लगातार तलाक बोलने के बाद तलाक हो जाएगा।

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

हमारा देश


-शीतांशु कुमार सहाय
 
भारत हमारा देश है,
हम सब इसके हैं फूल-से।
अगर देश हमारा हो चमन,
हो केवल इसमें अमन।।

बँटने न देंगे हम इसे,
टूटने न देंगे हम इसे।
सींचेंगे इसको खून से,
त्याग से, बलिदान से।।

भारत हमारा देश है,
हम सब इसके हैं फूल-से।
अगर देश हमारा हो चमन,
हो केवल इसमें अमन।।

गुजरात से असम तक,
कश्मीर से इन्दिरा बिन्दु तक।
यह धरा हमारी अपनी है,
इसके हर लोग अपने हैं।।

भारत हमारा देश है,
हम सब इसके हैं फूल-से।
अगर देश हमारा हो चमन,
हो केवल इसमें अमन।।

भूलो न हिन्दी भाषा को,
देश की अपनी आशा को।
संविधान हमारा एक है,
हम सब मिलजुलकर एक हैं।।

भारत हमारा देश है,
हम सब इसके हैं फूल-से।
अगर देश हमारा हो चमन,
हो केवल इसमें अमन।।

शान है तिरंगा


-शीतांशु कुमार सहाय

तिरंगा हमारी शान है,
ये आबरू मेरी जान है।
इस की छाया में हम बढ़ें,
बढ़ते रहें आगे चलें।

धन्य जीवन कोटि है, जिन्होंने पाया जन्म यहाँ;
मिट्टी जिस की है स्वर्ण-सी, वह है हमारी भारती।
खेतों में हरियाली है, है गर्भ रत्नों से भरा;
सारे जहां में नाम है, वह है हमारी भारती।।

तिरंगा हमारी शान है,
ये आबरू मेरी जान है।
इस की छाया में हम बढ़ें,
बढ़ते रहें आगे चलें।

भाल पर नगराज है, है पाँव धोता उदधि;
विन्ध्य मेरूदण्ड बना, है यह हमारी भारती।
न धर्म में न जाति में, हम कभी भी न बँटें;
आगोश में जिस के रहे हैं, है यह हमारी भारती।।

तिरंगा हमारी शान है,
ये आबरू मेरी जान है।
इस की छाया में हम बढ़ें,
बढ़ते रहें आगे चलें।


बुधवार, 21 जून 2017

योग : जानें स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर को YOGA : KNOW ABOUT PHYSICAL, ASTRAL AND CAUSAL BODIES



-शीतांशु कुमार सहाय / Sheetanshu Kumar Sahay

यहाँ आज मैं एक अच्छे विचार से आलेख आरम्भ कर रहा हूँ। मेरे मित्र सञ्जय कुमार विनीत ने मुझे भेजा है- "ताश का जोकर और अपनों की ठोकर, अक्सर बाजी घुमा देती है। अपनी सहनशीलता को बढ़ाइये, छोटी-मोटी घटना से हताश मत होइये। जो चन्दन घिस जाता है, वह भगवान के मस्तक पर लगाया जाता है और जो नहीं घिसता वह तो सिर्फ जलाने के काम आता है।" वास्तव में बड़ा अच्छा विचार है। हमें इसे जीवनभर अपनाये रहना चाहिये।

तीसरे 'अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस' (२१ जून २०१७) पर मैं योग के विशेष अध्याय 'शरीर' पर चर्चा कर रहा हूँ। वास्तव में तीन प्रकार के शरीर योग में बताये गये हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण। योग साधना के उच्च स्तर पर पहुँचकर तीनों शरीर के बारे में पूरी तरह जाना जा सकता है। 

स्थूल शरीर / Physical Body

जो शरीर दीख रहा है, यही स्थूल शरीर है। इसी शरीर का नाम होता है जो हाड़-मांस का बना है। इसे भौतिक शरीर भी कहते हैं। यह पञ्चतत्त्व या पञ्चमहाभूत (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) से बना है। पाँचों का हिस्सा है इस शरीर में। जब आत्मा स्थूल या भौतिक शरीर से निकलती है तो पाँचों अपना- अपना अंश वापस ले लेते हैं।
योग व आयुर्वेद के अनुसार, स्थूल या भौतिक शरीर सात मूल भौतिक तत्वों से निर्मित हुआ है। ये तत्त्व हैंरस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा व शुक्र (महिला के लिए रज)। वात, पित्त, और कफये तीनों द्रव्य यह सुनिश्चित करते हैं कि शरीर ग्रहण किये गये भोजन का क्या करता है। यहाँ 'भोजन' शब्द में साँस से ली गयी हवा के अलावा सभी तरह खाद्य (व्यंजन) शामिल हैं।
स्थूल शरीर में पाँच ऊर्जा या वायु (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान) पाचन व उपापचय या चयापचय जैसी प्रक्रियाओं को प्रभावित करती हैं। एक बार जब स्थूल शरीर भोजन को पचाकर अवशोषित कर लेता है तब सूक्ष्म शरीर (चेतना) यह निर्धारित करता है कि कितना भोजन भौतिक शरीर को प्रभावित करे। यही कारण है कि कुछ लोग कम भोजन करके भी अधिक मोटे हो जाते हैं व कुछ अन्य लोग अधिक भोजन तो करके भी दुबले ही रह जाते हैं। 

सूक्ष्म शरीर / Astral Body

सूक्ष्म शरीर को 'चेतना' भी कहते हैं। वास्तव में अठारह तत्त्वों का संयोग है सूक्ष्म शरीर। ये अठारह तत्त्व हैं- पाँच प्राण, दस इन्द्रियाँ (पाँच कर्मेन्द्रियाँ व पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ) और मन, बुद्धि व अहंकार। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान पञ्चप्राण हैं। इन्हें पञ्चवायु भी कहते हैं। स्थूल शरीर में भी पञ्चवायु के स्थान निर्धारित हैं। पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं-- वाक्, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ। यों पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं-- कान, त्वचा, नेत्र, जीभ और नाक।
सूक्ष्म शरीर हमें दिखायी नहीं देता। हम उसे नींद में महसूस कर सकते हैं। इसे ही वेद में 'मनोमय शरीर' कहा गया है।
सूक्ष्म शरीर की चेष्टा जीव की प्रवृत्ति के अनुसार होती है। इसलिए यह शरीर वस्तुतः जीव के स्वभाव को कार्यान्वित करता है। इस कारण स्थूल शरीर की रचना एक समान होने पर भी जीव के स्वभाव भिन्न-भिन्न होते हैं।
स्थूल शरीर को सूक्ष्म शरीर ने घेर रखा है। वास्तव में स्थूल यानी भौतिक शरीर के चारों तरफ ऊर्जा का एक क्षेत्र है जो सूक्ष्म शरीर है। भौतिक शरीर कि तरह ही सूक्ष्म शरीर भी देख सकता है, सूँघ सकता है, भोजन ग्रहण कर सकता है, चल सकता है और बोल भी सकता है आदि। सूक्ष्म शरीर अपारदर्शी दीवार के पार भी देख सकता है, मन की बात जान सकता है, पलभर में कहीं भी जा सकता है। सूक्ष्म शरीर में यह क्षमता है कि वह किसी घटना का पूर्वाभास कर सकता है। यह अतीत की प्रत्येक बात जान सकता है।
ध्यान से एक से अधिक शरीरों का अनुभव हो सकता है। लगातार ध्यान करते रहने पर कई बार एक से अधिक शरीरों का अनुभव होता है। ध्यान के दौरान स्थूल शरीर से बाहर निकलते हुए अन्य दो शरीरों का भान होता है। जब ऐसा हो तो अपने गुरु से परामर्श करना चाहिये। नये लोग ध्यान के दौरान ऐसा होने पर घबरा जाते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं उनकी मृत्यु न हो जाय। सूक्ष्म या कारण शरीर के दर्शन के इस आरम्भिक अनुभव से घबराकर कई लोग ध्यान करना छोड़ देते हैं। जब एक बार ध्यान का अभ्यास छुट जाय तो पुनः उसी अवस्था में लौटने में अत्यन्त परिश्रम करना पड़ता है।
भौतिक, सूक्ष्म और कारण शरीर के अलावा और भी शरीर होते हैं। हमारे शरीर में मुख्यत: सात चक्र हैं। ये सात चक्र हैं-- मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र। प्रत्येक चक्र से एक शरीर जुड़ा हुआ है। इस तरह पता चलता है कि शरीर की रचना बहुत अद्भुत व आश्चर्यजनक है। सामान्य आँखों से दिखायी देनेवाला भौतिक या स्थूल शरीर केवल रक्त, अस्थि और मांस-मज्जा का जोड़ तो दीखता है मगर इसे संचालित रखनेवाले शरीर पृथक हैं। योग के उच्च शिखर पर जब कुण्डलिनी जागृत होती है तो इसका अनुभव होता है।
वास्तव में चेतन अवस्था यानी चैतन्यता का ही दूसरा नाम सूक्ष्म शरीर है। किसी भी एक समय में चेतना पाँच में से किसी एक अवस्था में हो सकती है। चेतना की पाँच अवस्थाएँ हैं-- चैतन्य, उपचैतन्य, अनाचैतन्य, अचैतन्य और पराचैतन्य। साथ ही शरीर स्वप्न, जागृत, सुषुप्त अथवा तुरीयकिसी भी अवस्था में हो सकता है। इस प्रकार मालूम होता है कि जहाँ सभी भावनाएँ (चैतन्यता) रहती हैं, वह सूक्ष्म शरीर है। शरीर की सभी स्वाभाविक क्रियाएँ जैसे ह्रदय की धड़कन, नाड़ी-चालन, रक्तचाप आदि पर सूक्ष्म शरीर का प्रभाव होता है। योग के माध्यम से सूक्ष्म शरीर पर नियंत्रण कर सभी स्वाभाविक क्रियाओं पर नियंत्रण किया जा सकता है। 

कारण शरीर / Causal Body

तीसरा शरीर कारण शरीर कहलाता है। कारण शरीर 'प्रकृति' का नाम है। सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण को सामूहिक रूप से 'प्रकृति' कहते हैं। ये अत्यन्त सूक्ष्मतम कण हैं जिनकी व्यापक चर्चा 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भगवान ने किया है। इसी प्रकृति को 'कारण-शरीर' कहा गया है। कारण-शरीर वेद में 'विज्ञानमय शरीर' कहते हैं। हम किसी भी जन्म में जो भी कार्य करते हैं, वे सभी जहाँ संचित होते हैं, वही कारण शरीर है। इस जन्म के कर्मों का लेखा भी इसी शरीर में संचित होता है। जन्म-जन्मान्तर के कर्मों (प्रारब्ध) का यही वहन करता है और उसका प्रतिफल वर्तमान स्थूल शरीर पर प्रकट होता है।
कारण शरीर ने सूक्ष्म शरीर को घेर के रखा है। इसे 'बीज शरीर' भी कहते हैं। इसमें शरीर और मन की वासना के बीज विद्यमान होते हैं। यह हमारे विचार, भाव और स्मृतियों का बीज रूप में संग्रह कर लेता है। मृत्यु के बाद स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है। इसके बाद सूक्ष्म शरीर कुछ माहों में कारण शरीर की ऊर्जा में शामिल हो जाता है। मृत्यु के बाद कारण शरीर एक से दूसरे स्थान पर जाता है और इसी के कारण पुनः स्थूल शरीर (अन्नमय कोश) व सूक्ष्म शरीर (मनोमय कोश) की प्राप्ति होती है, मतलब नया जन्म होता है। कारण शरीर कभी नहीं मरता, जब तक मोक्ष की प्राप्ति न हो जाय। कारण शरीर से ही परकाया प्रवेश किया जा सकता है। 
जब आत्मा स्थूल शरीर को छोड़ती है, उस समय को मृत्यु कहते हैं। मृत्यु के पश्चात आत्मा अपने साथ सूक्ष्म और कारण शरीर को ले जाती है। इस तरह एक से दूसरे जन्म में आत्मा  के साथ बुद्धि और मन भी जाते हैं। यही वजह है जन्म से ही नेत्रहीन व्यक्ति भी स्वप्न देख सकता है; क्योंकि उसके अवचेतन में पूर्व जन्मों की दृश्य-स्मृति शेष है। इस कारण ही कुछ में विलक्षण प्रतिभा भी दीख पड़ती है। मृत्यु के पश्चात स्थूल शरीर पृथ्वी पर ही रह जाता है जिसे 'पार्थिव शरीर' कहा जाता है। अन्तिम संस्कार पार्थिव शरीर का ही किया जाता है।
कारण शरीर स्थूल और सूक्ष्म शरीरों का कारण या करक है, इसलिए इसे कारण शरीर कहते हैं। ब्रह्म (आत्मा) सत्य है और उसके अतिरिक्त सब कुछ मिथ्या है। हमें अज्ञान के कारण आत्मा का अनुभव नहीं है। इसे ही 'श्रीमद्भगवद्गीता' में अविद्या कहा गया है। यह अविद्या कारण शरीर है, क्योंकि यह नित्य, आध्यात्मिक व पूर्ण सत्ता का अज्ञान ही है जिसने हमारी बुद्धि की कोलाहलपूर्ण इच्छाओं, मन के विचारों और शरीर के कर्मों को जन्म दिया है। विकार-रहित प्रकृति का बना होने के कारण ही कारण शरीर में पूर्णतया ज्ञान का अभाव होता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इस अवस्था को 'गाढ़ निद्रा' कहा है। सूक्ष्म और स्थूल शरीर इस अविद्या के ही कार्य हैं। मतलब यह कि तीनों शरीरों को अविद्या का समाहार कहा जा सकता है। इन तीनों से परे होकर ही सत्स्वरूप आत्मा का दर्शन सम्भव है। इसके लिए निरन्तर योग साधना आवश्यक है। सत्स्वरूप ब्रह्म एक है। वह सच्चिदानन्द, अनादि व अनन्त है। वह अविभाज्य भी है और विभाज्य भी। उनकी विभाज्य प्रवृत्ति के अंतर्गत मायिक शक्ति से ब्रह्माण्ड का निरन्तर विस्तार जारी है। माया की उपाधि से ब्रह्म को 'ईश्वर' कहा गया है। वास्तव में सभी प्राणियों के शरीर ब्रह्माण्ड के अंशभूत हैं। शरीर में व्याप्त ब्रह्म की उपाधि 'जीव' हो गयी। इस प्रकार एक ही ब्रह्म उपाधि भेद से ईश्वर और जीव रूप में भासित होता है। 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भगवान ने कहा है कि वह मनुष्य के हृदय में रहते हैं। 

शरीर के पञ्च कोश / Five Pounds of the Body

मनुष्य का पञ्च कोशों का समाहार है। पञ्च कोश वास्तव में शरीर का एक आयाम है। स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होते जानेवाले ये पञ्च कोश शरीर के ही आकार के होते हैं। ऊपर वर्णित तीनों शरीर (स्थूल, सूक्ष्म व कारण) पाँच कोशों के साथ मिलकर कार्य करते हैं।
(१) अन्न्मय कोश : भौतिक या सूक्ष्म शरीर ही अन्न्मय कोश है।
(२) प्राणमय कोश : पञ्चवायु (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान) से प्राणमय कोश बना है।
(३) मनोमय कोश : पाँच कर्मेन्द्रियों, मन और अहङ्कार वाला भाग मनोमय कोश कहलाता है। पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं-- वाक्, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ।
(४) विज्ञानमय कोश : पाँच ज्ञानेन्द्रियों और बुद्धि का अंश विज्ञानमय कोश है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं-- कान, त्वचा, नेत्र, जीभ और नाक।
(५) आनन्दमय कोश : आनन्दमय कोश को कारण शरीर कह सकते हैं। यह मूल  प्रकृति का भाग है।
इस प्रकार विदित होता है कि अन्नमय कोश ही स्थूल शरीर है। प्राणमयमनोमय और विज्ञानमय कोशों को एक साथ सूक्ष्म शरीर कहते हैं और आनन्दमय कोश ही कारण शरीर है। तीन शरीरों का विभाजन कोशों के अनुसार निर्धारित है। ये  कोश हमारी अनुभूति के अनुसार हैं, हम शरीर को इन रूपों में ही अनुभव करते हैं।
ध्यान करने में ये पञ्च कोश सहायता करते हैं। ध्यान करते समय सर्वप्रथम अन्नमय कोश पर चित्त को स्थिर करना चाहिए, जैसे भ्रूमध्य (भौहों के बीच में), नासिकाग्र पर, नाभि पर आदि। अन्नमय कोश पर जब चित्त स्थिर हो जाय तो इसके उपरान्त प्राणमय कोश यानी अपने श्वास-प्रश्वास पर ध्यान लगाना चाहिये। प्राणमय कोश पर जब चित्त स्थिर हो जाय तो इसके उपरान्त मनोमय कोश जो हिलने-डुलने, देखने-सुनने आदि का सङ्कल्प  करता है; उस पर ध्यान लगाना चाहिये। मनोमय कोश पर जब चित्त स्थिर हो जाय तो इसके उपरान्त विज्ञानमय कोश पर ध्यान लगाना चाहिये। संकल्प के बाद भी हमारी बुद्धि में विचार आ रहे होंगे तो समझिये कि यह विज्ञानमय कोश है। अब विचारों को रोकने के लिए ध्यान करना चाहिये। विचारों के स्थिर हो जाने पर आनन्द का अनुभव  होने लगता है। यही आनन्दमय कोश है। आनन्दमय कोश भी सत्य का भ्रम ही है। इससे आगे बढ़ने पर ही ब्रह्ममिलन यानी आत्मसाक्षात्कार या आत्मा का दर्शन सम्भव है।

महाप्रलय में सूक्ष्म शरीर से और मोक्ष मिलने पर कारण शरीर से मुक्ति 

जब इस सृष्टि के भौतिक जगत का विनाश  होता है तो भौतिक ऊर्जा के सभी तत्व परमात्मा  में ही समाहित  हो जाते हैं। महाप्रलय के दौरान आत्मा जड़ (निष्क्रिय) हो जाती है। महाप्रलय काल में सभी आत्माओं के स्थूल और सूक्ष्म शरीर नष्ट हो जाते हैं लेकिन कारण शरीर तब भी बना ही रहता है। ये पूर्व के सभी जन्मों  का चिठ्ठा लिये चलता है। इसलिए सृष्टि की पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) होने पर  आत्मा को सूक्ष्म और स्थूल शरीर उसके कारण शरीर के पास जमा प्रारब्ध (पूर्व जन्म के संस्कार) के अनुरूप ही मिलते हैं।  परमात्मा की प्राप्ति (मोक्ष) होने पर परमात्मा को प्राप्त आत्माओं के तीनों शरीर नष्ट हो जाते हैं। तब उसे दिव्य शरीर, दिव्य मन और दिव्य बुद्धि मिलती है। मोक्ष प्राप्त आत्मा इस प्रकार प्राप्त दिव्य चक्षुओं से प्रभु की लीला देखती है। श्रीमद्भगवद्गीता में उल्लेख है कि अर्जुन को भगवान कृष्ण अपना रूप दिखाने के लिए दिव्य चक्षु देते हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ-प्रकाश में दिव्य शरीर को 'तुरीय शरीर' कहा है।

तीन शरीर और व्याधियाँ / Three Bodies and Ailments 

ऊपर मैंने जिन तीन शरीरों की चर्चा की है, वे भौतिक शरीर के व्याधियों को प्रभावित करते हैं। सभी शारीरिक व्याधियाँ मात्र लक्षण होते हैं, कारण नहीं। व्याधियाँ उस प्रतिबंधित चेतना के लक्षण हैं जो प्रदूषित हो जाते हैं। सूक्ष्म शरीर या कारण शरीर तनाव में होगा तब रोग के लक्षण भौतिक शरीर पर प्रकट होंगे। चिकित्सा द्वारा भौतिक शरीर के कुछ व्याधियों पर ही नियंत्रण संभव है। सभी शारीरिक या मानसिक रोगों की चिकित्सा किसी भी पैथी में सम्भव नहीं है। पर, योग में कोई रोग लाइलाज नहीं है।
संपूर्ण आरोग्यता तभी सम्भव है, जब सूक्ष्म शरीर में स्थित व्याधि का मूल कारण ही जड़ से समाप्त कर दिया जाता है। कुछ व्याधियाँ उत्पन्न तो होती हैं भौतिक शरीर में लेकिन वह सूक्ष्म शरीर (अंतःकरण) से आगे बढ़कर कारण शरीर को भी प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे रोग व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। योग-ध्यान से इन्हें शीघ्र ठीक करना चाहिये। विकृत मानसिकता या भावनात्मक असंतुलन के कारण जो रोग सीधे सूक्ष्म शरीर में होते हैं, वे भौतिक शरीर के स्थायी व दीर्घकालिक रोग बनकर उभरते हैं। यों कारण शरीर से उत्पन्न रोगों का निवारण सबसे अधिक समय लेता है। कई बार कारण शरीर से उत्पन्न रोग भौतिक शरीर को अत्यन्त रुग्ण बनाकर उसे अंतिम अवस्था तक पहुँचा देते हैं।

तीन शरीर पर विजय प्राप्ति / Triumph over Three Bodies

उत्तम गुरु के सान्निध्य में निर्बाध योग साधना करके जिन्हें स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर पर अधिकार प्राप्त हो गया है, वे जन्म-मरण के जंजाल से मुक्त हो गये हैं। ऐसे सिद्ध योगी केवल एक वासना के सहारे मात्र जनकल्याण के लिए ही संसार में सशरीर रहते हैं।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के जीवन की एक अद्भुत घटना है। उन्हें जो लोग बहुत निकट से जानते थे, उनको यह बात जानकर अत्यंत क्षोभ होता था कि रामकृष्ण जैसा परमहंस और समाधिस्थ योगी भोजन के प्रति बहुत लोलुप था। वे भोजन के लिए इतनी प्रतीक्षा करते थे कि कई बार उठकर रसोईघर में जाकर पत्नी शारदा को पूछते कि बहुत देर हो गयी, क्या बन रहा है? कभी-कभी तो ब्रह्म-चर्चा भी छोड़कर रसोईघर में पहुँच जाते। ऐसे में उन्हें पत्नी के अलावा शिष्यगण भी समझाते थे कि वे ऐसा न करें; क्योंकि लोग कहते हैं कि जिनकी भोजन-वासना शेष है, वह क्या ब्रह्म के बारे में सझायेगा!
स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने एक दिन पत्नी शारदा जो स्वयं भी सिद्ध योगिनी थीं, को अपनी भोजन-वासना के बारे में बताया-- जिस दिन मैं भोजन के प्रति अरुचि प्रकट करूँ, तू समझ लेना कि अब मेरे जीवन की यात्रा केवल तीन दिन शेष रह गयी हैं। जिस दिन भोजन के प्रति मेरी उपेक्षा हो, समझ लेना कि तीन दिन बाद मेरी मौत निश्चित है।
माता शारदा ने इसका अर्थ पूछा तो ब्रहमनिष्ठ स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने समझाया-- मेरी समस्त वासनाएँ क्षीण हो गयी हैं। मेरी सारी इच्छाएँ विलीन हो गयी हैं। मेरे सारे विचार नष्ट हो गये हैं। केवल जगत के हित के लिए मैं रूका हुआ हूँ। मैं मात्र एक वासना (भोजन-वासना) को जबर्दस्ती पकड़ा हुआ हूँ। मैं चेष्टा करके रूका हुआ हूँ।
एक दिन माता शारदा थाली लगाकर पति स्वामी रामकृष्ण के कमरे में गयीं। स्वामीजी बैठे हुए देख रहे थे। उन्होंने थाली देखकर आँखें बंद कर ली। लेट गए और पत्नी शारदा की तरफ पीठ कर ली। भोजन के प्रति अरूचि और तीन दिन बाद मौत की बात याद आते ही पत्नी के हाथ से थाली छूट गयी। वह रोने लगीं। पति ने रोने से मना किया और कहा कि वह जो कहती थीं, वह बात भी अब पूरी हो गयी- अन्तिम वासना (भोजन-वासना) भी अब समाप्त हो गयी। ठीक तीन दिन बाद स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने शरीर त्याग दिया। एक छोटी सी वासना को प्रयास करके वे रोके हुए थे। उतनी छोटी सी वासना जीवन यात्रा का आधार बनी थी। वह वासना भी चली गयी तो जीवन-यात्रा का आधार खत्म हो गया। जिस दिन अन्तिम  वासना भी क्षीण हो जाती है, उसी दिन जीवन की यात्रा खत्म होकर अनन्त की अन्तहीन यात्रा आरम्भ हो जाती है। उसके बाद न जन्म है और न मृत्यु। उसके बाद न एक है, न अनेक है। 

योग दिवस का इतिहास / History of Yog Day

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को 'अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस' (International yog day) या 'विश्व योग दिवस' (World yog day) के रूप में मनाने को गुरुवार 11 दिसम्बर 2014 ईस्वी को संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयार्क स्थित मुख्यालय में मान्यता दे दी। संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष सैम के. कुटेसा ने न्यूयार्क में इस आशय की घोषणा की। श्री कुटेसा ने कहा कि 170 से अधिक देशों ने 'अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस' के प्रस्ताव का समर्थन किया है जिससे पता चलता है कि योग के अदृश्य और दृश्य लाभ विश्वभर के लोग को कितना आकर्षित करते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी बधाई दी जिनकी पहल से 21 जून को हर साल अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया है। उन्होंने कहा कि सदियों से सभी वर्गों के लोग शरीर और मन को एकाकार करने में सहायक योग का अभ्यास करते आये हैं। योग विचारों एवं कर्म को सामंजस्यपूर्ण ढंग से एकाकार करता है तथा स्वास्थ्य को ठीक रखता है। इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा कि इस क्रिया (योग) से शान्ति एवं विकास में योगदान मिल सकता है। यह मनुष्य को तनाव से राहत दिलाती है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों से अपील की कि वे योग को प्रोत्साहित करने में मदद करें।