शनिवार, 26 सितंबर 2020

बिहार विधानसभा आम निर्वाचन 2020 : कब कहाँ होंगे मतदान Bihar Legislative General Election 2020 : When, Where Will be Voting


बिहार विधानसभा आम निर्वाचन 2020 के पहले चरण का मतदान  28 अक्टूबर, दूसरे चरण का मतदान 3 नवंबर और तीसरे चरण का मतदान 7 नवंबर को होगा। चुनाव के नतीजे 10 नवंबर को आयेंगे।

पहले चरण का मतदान – 28 अक्टूबर


       बिहार में पहले चरण में 28 अक्टूबर को 71 विधानसभा सीटों पर मतदान होंगे। ये सीटें हैं- कहलगाँव, सुल्तानगंज, अमरपुर, धौरैया, बाँका, कटोरिया, बेलहर, तारापुर, मुँगेर, जमालपुर, सूर्यगढ़ा, लखीसराय, शेखपुरा, बरबीघा, मोकमा, बाढ़, मसौढ़ी, पालीगंज, बिक्रम, संदेश, बड़हरा, आरा, अगिआँव, तरारी, जगदीशपुर, शाहपुर, ब्रहमपुर, बक्सर, डुमरांव, राजपुर, रामगढ़, मोहनियां, भभुआ, चैनपुर, चेनारी, सासाराम, करगहर, दिनारा, नोखा, डिहरी, काराकट, अरवल, कुर्था, जहानाबाद, घोसी, मखदुमपुर, गोह, ओबरा, नवीनगर, कुटुम्बा, औरंगाबाद, रफीगंज, गुरूआ, शेरघाटी, इमामगंज, बाराचट्टी, बोधगया, गया टाउन, टिकारी, बेलागंज, अतरी, वजीरगंज, रजौली हिसुआ, नवादा, गोबिंदपुर, वारसलीगंज, सिकंदरा, जमुई, झाझा और चकाई।
 

दूसरे चरण का मतदान – 3 नवंबर


       दूसरे चरण में उत्तर बिहार के जिलों की 94 विधानसभा सीटों पर मतदान होंगे। ये सीटें हैं- नौतन, चनपटिया, बेतिया, हरसिद्धि, गोविंदगंज, केसरिया, कल्याणपुर, पिपरा, मधुबन, शिवहर, सीतामढ़ी, रून्नीसैदपुर, बेलसंड, मधुबनी, राजनगर, झंझारपुर, फुलपरास, कुशेश्वरस्थान, गौड़ाबौराम, बेनीपुर, अलीनगर, दरभंगा ग्रामीण, मीनापुर, कांटी, बरूराज, पारू, साहेबगंज, बैकुण्ठपुर, बरौली, गोपालगंज, कुचायकोट, भोरे, हथुआ, सिवान, जीरादेई, दरौली, रघुनाथपुर, दरौंदा, बड़हरिया गौरेयाकोठी, महराजगंज, एकमा, मांझी, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, गरखा, अमनौर, परसा, सोनपुर, हाजीपुर, लालगंज, वैशाली, महुआ, राजा पाकार, राधोपुर, महनार, उजियारपुर, मोहिउद्दीननगर, विभूतिपुर, रोसड़ा, हसनपुर, चेरिया बरियारपुर, बछवाड़ा, तेघड़ा, मटिहानी, साहेबपुर कमाल, बेगूसराय, बखरी, अलौली, खगड़िया, बेलदौर, परबत्ता, बिहपुर, गोपालपुर, पीरपैंती, कहलगाँव, भागलपुर, सुल्तानगंज, नाथनगर, अस्थावाँ, बिहारशरीफ, राजगीर, इस्लामपुर, हिल्सा, नालंदा, हरनौत, बख्तियारपुर, दीघा, बाँकीपुर, कुम्हरार, पटना साहिब, फतुहा, दानापुर, मनेर और फुलवारी सीट। 

तीसरे चरण का मतदान – 7 नवंबर


       तीसरे चरण में बिहार की 78 विधानसभा सीटों पर मतदान होंगे। ये सीटें हैं- वाल्मीकिनगर, रामनगर, नरकटियागंज, बगहा, लौरिया, सिकटा, रक्सौल, सुगौली, नरकटिया, मोतिहारी, चिरैया, ढाका, रीगा, बथनाहा, परिहार, सुरसंड़, बाजपट्टी, हरलाखी, बेनीपट्टी, खजौली, बाबूबरही, बिस्फी, लौकहा, निर्मली, पिपरा, सुपौल, त्रिवेणीगंज, छातापुर, नरपतगंज, रानीगंज, फारबिसगंज, अररिया, जोकाहाट, सिकटी, बहादुरगंज, ठाकुरगंज, किशनगंज, कोचाधामन, अमौर, बायसी, कसबा, बनमनखी, रूपौली, धमदाहा, पूर्णिया, कटिहार, कदवा, बलरामपुर, प्राणपुर, मनिहारी, बरारी, कोढ़ा, आलमनगर, बिहारीगंज, सिंधेश्वर, मधेपुरा, सोनबरसा, सहरसा, सिमरी बख्तियारपुर, महशी, हायाहाट, बहादुरपुर, केवटी, जाले, गायघाट, औराई, मीनापुर, बोचहाँ, सकरा, कुढ़नी, मुजफ्फरपुर, महुआ, पातेपुर, कल्याणपुर, वारिसनगर, समस्तीपुर, मोरवा और सरायरंजन सीट।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

वीरता व सेवा पुरस्कार २०२० की घोषणा Gallantry and Service Awards 2020 Announced

भारत में वीरता और सेवा पुरस्कारों की घोषणा हो गयी है। वीरता यानी गैलेंटरी पुरस्कारों की सूची में पहले स्थान पर जम्मू-कश्मीर पुलिस है। उन के खाते में ८१ मेडल गए हैं। दूसरे स्थान पर सीआरपीएफ (५५ मेडल) और तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश पुलिस (23 मेडल) है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने वीरता और सेवा (सर्विस) पुरस्कारों की सूची जारी की है।

सूची इस प्रकार है-

आंध्र प्रदेश पुलिस को १६,

अरुणाचल प्रदेश पुलिस को ४,

असम पुलिस को २१,

छत्तीसगढ़ पुलिस को १४,

गोवा पुलिस को १,

गुजरात पुलिस को १९,

हरियाणा पुलिस को १२,

हिमाचल प्रदेश पुलिस को ४,

झारखंड पुलिस को २४,

कर्नाटक पुलिस को १८,

केरल पुलिस को ६,

मध्य प्रदेश पुलिस को २०,

महाराष्ट्र पुलिस को ५८,

मणिपुर पुलिस को ७,

मिजोरम पुलिस को ३,

नगालैंड को १,

ओडिशा को १४,

पंजाब को १५,

राजस्थान को १८,

सिक्किम को २,

तमिलनाडु को २३,

तेलंगाना को १४,

त्रिपुरा को ६,

उत्तर प्रदेश पुलिस को १०२,

उत्तराखंड को ४,

पश्चिम बंगाल को २१,

अंडमान निकोबार पुलिस को २,

चंडीगढ़ पुलिस को १,

जम्मू-कश्मीर पुलिस को ९६,

दिल्ली पुलिस को ३५,

लक्षद्वीप पुलिस को २,

पुदुचेरी पुलिस को १,

असम राइफल्स को १०,

बीएसएफ को ५२,

सीआईएसएफ को २५,

सीआरपीएफ को ११८,

आईटीबीपी को १४,

एनएसजी को ४,

एसएसबी को १२,

आईबी को ३६,

सीबीआई को ३२ और

एसपीजी को ५ वीरता और सेवा पुरस्कार मिले हैं।

विदित हो कि इस साल यानी २०२० में २१५ वीरता यानी गैलेंटरी अवार्ड और ७११ सेवा यानी सर्विस एवार्ड बाँटे गये हैं।

बुधवार, 8 जुलाई 2020

भागलपुर में 9 से 12 व पटना में 10 से 16 जुलाई 2020 तक फिर लाॅकडाउन Lockdown in Patna From 10 to 16 July 2020

  • बिहार की राजधानी पटना में लगातार मिल रहे कोरोना संक्रमित मरीजों को देखते हुए जिला प्रशासन ने 10 से 16 जुलाई तक शहर को फिर से लॉकडाउन कर दिया है। डीएम कुमार रवि ने सात दिनों के लिए लॉकडाउन लगाने का आदेश बुधवार शाम को जारी किया। इस दौरान आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सभी सरकारी व निजी कार्यालय, धार्मिक स्थान आदि बंद रहेंगे। जिला प्रशासन ने इसके लिए आवश्यक दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं।

  • जारी आदेश के अनुसार लॉकडाउन के दौरान जिले में सुबह 6 से 10 बजे तक और शाम में 4 से 7 बजे तक अनिवार्य सेवा की दुकानें खुलेंगी। इसमें राशन, दूध, दवा जैसी जरूरी दुकानें शामिल हैं। बैंक, पेट्रोल पंप, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, ई-कॉमर्स से होम डिलीवरी को छूट दी गई है। जरूरी सामान की आपूर्ति को लेकर होम डिलीवरी पर जोर दिया गया है।  

  • वहीं सभी पूजा स्थलों को भी आमलोगों के लिए बंद करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा कंटेनमेंट जोन के बाहर के सारी गतिविधियां अनलॉक 2 के लिए जारी दिशा निर्देश के अनुसार ही चलेंगे। राजधानी पटना में बुधवार को रिकॉर्ड 237 कोरोना पॉजिटिव मरीजों की पहचान की गईं। वर्तमान समय में चार प्रकार के व्यक्तियों का टेस्ट हो रहा है। इसमें पहला मरीज के कांटेक्ट में आने वाले लोग शामिल हैं। दूसरा कंटेनमेंट जोन में रहने वाले लोग, तीसरा हेल्थ वर्कर तथा चौथा जिनमें बीमारी के लक्षण दिख रहे हैं। संपर्क चेन के लिए पर्याप्त संख्या में कर्मियों को सहभागी एवं सक्रिय बनाने का निर्देश दिया।


मंगलवार, 30 जून 2020

भारत में ये ५९ मोबाइल ऐप्लीकेशन्स प्रतिबन्धित 59 Chinese Mobile Apps Restricted in India

Here is the list of apps blocked by the government of India :

1. TikTok
2. Shareit
3. Kwai
4. UC Browser
5. Baidu map
6. Shein
7. Clash of Kings
8. DU battery saver
9. Helo
10. Likee
11. YouCam makeup
12. Mi Community
13. CM Browers
14. Virus Cleaner
15. APUS Browser
16. ROMWE
17. Club Factory
18. Newsdog
19. Beutry Plus
20. WeChat
21. UC News
22. QQ Mail
23. Weibo
24. Xender
25. QQ Music
26. QQ Newsfeed
27. Bigo Live
28. SelfieCity
29. Mail Master
30. Parallel Space
31. Mi Video Call – Xiaomi
32. WeSync
33. ES File Explorer
34. Viva Video – QU Video Inc
35. Meitu
36. Vigo Video
37. New Video Status
38. DU Recorder
39. Vault- Hide
40. Cache Cleaner DU App studio
41. DU Cleaner
42. DU Browser
43. Hago Play With New Friends
44. Cam Scanner
45. Clean Master – Cheetah Mobile
46. Wonder Camera
47. Photo Wonder
48. QQ Player
49. We Meet
50. Sweet Selfie
51. Baidu Translate
52. Vmate
53. QQ International
54. QQ Security Center
55. QQ Launcher
56. U Video
57. V fly Status Video
58. Mobile Legends
59. DU Privacy

सोमवार, 29 जून 2020

भारत की कुण्डली का सच

-अमित कुमार नयनन 

भारत की कुण्डली वृष लग्न की है और इस की राशि कर्क है। वृष स्थिर तो कर्क चर राशि है अतः स्थिर व चरात्मक दोनों प्रवृति का इस की प्रवृति व प्रकृति में समावेश होगा। वृष व कर्क दोनों ही राशियाँ स्वभाव से मृदु हैं, अतः इस देश की प्रकृति मृदु व स्नेहशील होगी व इस में सहनशीलता व विवेकशीलता अन्य देशों की अपेक्षा अधिक रहेगी। लग्नेश शुक्र का राशीश चन्द्र के साथ तृतीय भाव में युति इस के दीर्घकालिक अवस्था को सबलता से दर्शाता है । लग्न में लग्नेश शुक्र मित्र राहु अपनी उच्च राशि में बैठा है। इस प्रकार लग्न के लिए यह एक अच्छी स्थिति है। लग्नेश का तृतीय पराक्रम स्थान में सूर्य, चन्द्र, बुध, शनि के साथ बैठना व केतु से देखा जाना इस देश के विविध लोग और सभ्यता व संस्कृति के दर्शन को सरल तरीके से इंगित करता है। तृतीय में विविध प्रकृति के पंचग्रह की युति कुछ हद तक संत या एकाकी योग को भी बताता है। इस में भी संदेह नहीं कि भारत धर्म और अध्यात्म का धनी देश है। इस प्रकार इस की विविधता में एकता का बल लक्षित होता है जो कि पूर्णतया सही है।
     भारत भौगोलिक रूप से तीन दिशाओं पूर्व, पश्चिम, दक्षिण दिशा की ओर जल से घिरा प्रायद्वीप है जिस के एकमात्र उत्तर में विशालकाय हिमालय व भूखण्ड आदि हैं।
भारत की कुण्डली में तृतीय पराक्रम स्थान जितना प्रबल है, उतना ही चतुर्थ जनता, अचल सम्पत्ति व भूमि स्थान कमजोर है। तृतीय स्थान में जो ग्रह बल, पराक्रम आदि की वृद्धि कर रहे हैं, वही ग्रह जनता, अचल संपत्ति व भूमि के लिए बाधा भी दे रहे हैं; क्योंकि तृतीय स्थान, चतुर्थ स्थान का व्यय स्थान है। यह युति चूँकि कर्क राशि में बन रही है, अतः उत्तर दिशा भारत के लिए इस मामले में सदा चिन्ता का मसला रहेगा। तृतीय स्थान में पंचग्रह युति जहाँ बल व पराक्रम के लिए अच्छी है, वहीं यह अचल संपत्ति व भूखंड के लिए बिल्कुल सही नहीं है। इसी कारण तृतीयस्थ शनि महादशा  में पाक व चीन युुद्ध हुआ व तिब्बत एवं कैलाश व मानसरोवर जैसे भूखंड इस वक्त चीन के कब्जे में हैं। अतः कुल ९ महादशा ग्रहों में इन पाँच ग्रहों की दशा में सीमा विवाद अक्सर बना रहेगा। कुल १२० साल की महादशा में शनि १९ साल, बुध १७ साल, शुक्र २० साल, सूर्य ६ साल व चन्द्र १० साल आते हैं जो ८२ साल अर्थात् कुल दशा का दो-तिहाई से भी अधिक साल आते हैं। अतः संक्षेप में भारत को अपने दशाकाल में अक्सर सीमा व भूमि विवाद बना रहेगा और इन पाँच ग्रहों की दशा में यह विशेष होगा।
भारत की आज़़ादी के समय ज्योतिषियों द्वारा आज़ादी का निर्धारित किया गया समय पूर्ण शुभ न होने के कारण आज यह स्थिति है। यही पंचग्रह यदि लग्न, दशम् या एकादश में होते तो देश की स्थिति कुछ और होती। फिर भी बल व पराक्रम का स्थान मजबूत होने के कारण यह एक मजबूत देश है और रहेगा। 
चन्द्र महादशा
      २१ मई २०१५ से २१ मई २०२५ तक चल रही चन्द्र महादशा में चन्द्र महादशा की चन्द्र अंर्तदशा २१ मई २०१६ तक व्यतीत हो चुकी है। इस के उपरांत चन्द्र महादशा में मंगल अंतर्दशा से लेकर चन्द्र महादशा में अन्य समस्त अंतर्दशा का फल निम्न उल्लेखित है।
      चन्द्र महादशा की १० साल की महादशा पूर्णता के पश्चात् २१ मई २०२५ से ७ साल की मंगल महादशा २१ मई २०३२ तक चलेगी।
चन्द्र महादशा बनाम अंतर्दशा फल
भारत की जन्मकुण्डली में इस वक्त चन्द्र की महादशा चल रही है। यह स्वबल, पराक्रम, संचार की दशा है मगर साथ ही भूमि के लिए व्ययशील होने के कारण भूविवाद की उलझनें बनी रहेंगी। इस के साथ यह मानसिक कार्य, नेवी व स्त्रीशक्ति के लिए विशेष लाभ लेकर आयेगी। चन्द्र महादशा में मंगल की अंर्तदशा २१ मई २०१६ से २१ दिसंबर २०१६ तक रही है। मंगल द्वितीय भाव में व्ययेश होकर बैठा है, अतः अनपेक्षित विदेशी, एनआरआई, परदेस से सहयोग व आर्थिक लाभ अपेक्षित है। संतति भाव पर मंगल की दृष्टि खेल मुख्य रूप से आक्रामक खेलों के नजरिये से शुभ है। यद्यपि मंगल मारकत्व प्रभाव से भी देख रहा है, अतः खेल या फिल्म जगत की विशेष हस्ती का वियोग आदि अपेक्षित है। मंगल सप्तम का स्वामी होने के कारण साझेदारी, आयात निर्यात, इंटरनेशनल व्यापार आदि में प्रसार देता रहा है। मंगल का प्रभाव २१ दिसंबर २०१६ तक है। तत् चन्द्र महादशा में राहु की अन्तर्दशा २१ दिसंबर २०१६ से २१ जून २०१८ तक जारी रही। राहु लग्न में उच्च का हो तृतीयस्थ शुक्र का फल भी देता रहा। इस प्रकार यह संचार व्यवस्था के लिए अतिशुभ रहा। परिवहन, कूरियर, टेलिमीडिया, मीडिया जैसे क्षेत्रों में विशेष विकास होगा। फिल्म जगत के लिए भी यह एक शुभ व सुखद दौर रहा। इस प्रकार १८ माह की यह अंतर्दशा अपने शुभ प्रभाव के साथ जारी रही। तत् १६ माह की वृहस्पति अंतर्दशा का दौर २१ जून २०१८ से २१ अक्टूबर २०१९ तक मिश्रित रहा। एक ओर तो यह आर्थिक लाभ कराता रहा है मगर साथ ही साझेदार या साझेदारी या अन्यत्र समस्या भी देता रहा है। इसे मिश्रित कहा जा सकता है। तत् १९ माह के शनि अंतर्दशा का दौर २१ अक्टूबर २०१९ से २१ मई २०२१ तक होगा। यह भूविवाद, आतंकवाद आदि मुद्दों का समय है। यह देश में उथल-पुथल को भी दर्शा रहा है। यद्यपि समस्याओं का अंततः समाधान होगा मगर विशेषतः उत्तर-पश्चिम, पूर्वोत्तर भारत व विदेशी क्षेत्र में भारत को सावधान रहना होगा। सीमा विवाद के मामले में भारत को पूर्ण रूप से सतर्क रहने की ज़रूरत है। तत् 17 माह की बुध अंतर्दशा २१ मई २०२१ से २१ अक्टूबर २०२२ तक व्यापारिक संदर्भ की अतिशुभ दशा है। इस दरम्यान बैंकिंग सेक्टर, स्टॉक मार्केट, मनी मैटर्स, आर्थिक क्षेत्र में मुख्यतः प्रसार होगा। तत् ७ माह की केतु अंतर्दशा २१ अक्टूबर २०२२ से २१ मई २०२३ तक मिश्रित आक्रामक तेवर के साथ आयेगी। अच्छा व बुरा दौर आकस्मिक प्रभाव के साथ होगा। आकस्मिक उठापटक व अप्रत्याशित घटनाक्रम का समय है। तत् २० माह की शुक्र अंतर्दशा २१ मई २०२३ से २१ जनवरी २०२५ तक कला, सिनेमाई, मीडिया, संचार, परिवहन आदि के लिए सुफल लेकर आएगा। यह दौर मुख्यतः लव, रोमांस, स्त्री संबंधी सम मनोरंजक फिल्मों का होगा व ऐक्शन का कम प्रभाव होगा, ऐसी फिल्में ज्यादा प्रसार व उपलब्धि अर्जित करेंगी व भारतीय सिनेमा को समृध करेंगी। तत् ६ माह की सूर्य अंर्तदशा २१ जनवरी २०२५ से २१ जुलाई २०२५ भूविवाद के साथ स्वबल व पराक्रम की दशा भी होगी। यह एक राजनैतिक विकलता व सफलता का दौर होगा। 
     इसी के साथ तत् चन्द्र महादशा की १० साल की महादशा की अवधि पूर्णता उपरांत ७ साल की मंगल महादशा का आरंभ होगा।।

बुधवार, 10 जून 2020

कोरोना हाइलाइट्स Corona Highlights

-अमित कुमार नयनन 
     कोरोना ने काफी कम समय में कई बड़े कारनामे किये हैं। इस के सम्पूर्ण सन्दर्भ को एक बार में तो नहीं विश्लेषित किया जा सकता, फिर भी इस के कुछ विशेष विशेषताओं पर तो एक नज़र डाली ही जा सकती है।

कोरोना : एक जैविक हथियार

     इतिहास में हम ने विविध प्रकार के संहारक अस्त्र-शस्त्र के बारे में सुना है। पौराणिक काल में प्रक्षेपास्त्र, आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र और कलियुग में परमाणु बम, रासायनिक बम, वायरस बम आदि। इसी प्रकार कोरोना एक वायरस बम है। कोरोना एक जैविक हथियार है। कोरोना एक सामरिक अस्त्र है। 

कोरोना : साइलेण्ट कीलर

     कोरोना सायलेण्ट किलर के रूप में अपनी शीघ्रगामी शुरुआत करते हुए अचानक ही विश्व-पटल पर अपनी दस्तक देते हुए सम्पूर्ण विश्व में छा गया।

कोरोना स्पीड

     कोरोना की स्पीड मस्त है। इस की स्पीड तो नाम और काम दोनों स्तर पर कुछ ऐसी है कि पलक झपकते ही समस्त विश्व पर जिस गति से छा गया, उतने ही अल्प काल में उस से भी बड़े ऐसे-ऐसे कारनामे किये कि बस पूछिये मत। इस के गवाह आप और हम सभी हैं। इसे दुहराकर, बोलकर और सोचकर अपने आप को तकलीफ मत दीजिये; क्योंकि इस का तो कुछ बिगाड़ सकते नहीं, इसलिए उल्टा और भी ज़्यादा तकलीफ स्वयं को ही होगी। बस कोरोना के गुण-धर्म का बखान करते जाइये, तकलीफ अपने आप कम होती जायेगी। कोई कहे-न-कहे मगर यह एक प्राकृतिक सत्य है कि अगर आप के अन्दर दुश्मन को हराने की औकात न हो तो उसे हीरो की तरह स्वीकार कर लेना ही बेहतर होता है। इस प्रकार अपनी नाकामी भी छिप जाती है, साथ ही दुश्मन की बड़ाई कर उच्च स्तर के मानवीय गुणों के अध्येता और प्रणेता भी बन जाते हैं। इस दुश्मन को भले आनेवाले दिनों में शायद हम हरा भी डालें मगर इतने अल्प काल में इस ने जो जुल्म, जो कहर हम पर ढाये हैं, वे हमें ताउम्र याद रहेंगे। इस की याद की बानगी तब ही मिट सकती है, जब इस से भी बड़ा दुःख आ जाय। तो फैसला आप पर है कि आप इस दुःख और उस दुःख में कौन-सा दुःख आत्मसात् कर ‘सुखी’ होना चाहते हैं! इस के बावजूद आप के हाथ में कुछ भी नहीं है; क्योंकि होनी आप के और हमारे वश में नहीं है, हमें केवल कामना करने की छूट मिली है। इसलिए इस छूट को लूट लीजिये!     

इण्टरनेशनल सुपस्टार कोरोना

     कोरोना इण्टरनेशनल सुपर स्टार यूँ ही नहीं बना। इस के लिए उस ने बड़े-बड़े कारनामे किये हैं। घर के घर, देश के देश, परदेस के परदेस- सबकुछ पलक झपकते साफ-सुथरे कर दिये हैं, तबाह कर दिये हैं। इस के लिए उस ने सारा जहां छान मारा है। दुनिया की गली-कूचों तक में कूच कर दुनिया के छक्के छुड़ा दिये हैं। इस के कारनामों के आगे दुनिया के बड़े-बड़े दिग्गजों ने घुटने टेक दिये हैं और हथियार डाल दिये हैं। कुछ ने तो बिना लड़े ही हथियार डाल दिये हैं।  
     कोरोना एक इण्टरनेशनल सुपरस्टार बन चुका है। अपनी फिल्म का वह केन्द्रीय पात्र है जो हीरो और विलेन दोनों है। कोरोना को एक स्टार, एक विलेन के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। इस विलेन स्टार को ख़ुद ही यह पता नहीं है कि उस की उत्पति कब, क्यूँ, कहाँ, किसलिए हुई?

विश्वप्रसिद्ध कोरोना

     कोरोना विश्वप्रसिद्ध हो गया। उस ने अति अल्पकाल में ही अपने कारनामों से ऐसा विश्वव्यापी तहलका मचाया कि उस की चर्चा विश्व के कोने-कोने में होने लगी। 

कोरोना जगत

     सम्पूर्ण जगत कोरोना की मुट्ठी में आ गया है। एक पल ऐसा लगा था कि पलक झपकते दुनिया को लील लेगा मगर उस की यह लीला अभी बाकी है। वायरस के रूप में लीला बाकी है जबकि कोरोना के रूप में अभी गुंजाइश बची है।
     कोरोना ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि आविष्कार जब तक आप की मुट्ठी में है तब तक तो सब ठीक है, मगर जब आप आविष्कार की मुट्ठी में आते हैं तब क्या होता है!?

मंगलवार, 9 जून 2020

कोरोना कथा Corona Story

-अमित कुमार नयनन
     इन्सान ने कोरोना की पटकथा पहले ही लिख दी थी। आज नहीं तो कल, यह तो होना ही था। वह कल, आज बन गया है।

कोरोना इतिहास

     कोरोना पहले भविष्य था, फिर वर्तमान बना और इस के बाद इतिहास भी बन चुका है। कोरोना इतिहास बन चुका है और न सिर्फ इतिहास बन चुका है; बल्कि इतिहास बना भी चुका है। साथ ही समस्त मानव जाति को इतिहास बनाने पर तुला भी है।

कोरोना अध्याय

     कोराना! कोरोना वायरस! विश्व इतिहास में एक अध्याय और जुड़ गया। इतिहास के पन्नों में एक नाम और जुड़ गया। इस का आना जितना हैरतअंगेज रहा, छाना उतना ही विस्फोटक भी।

कोरोना विज्ञान 

     कोरोना ने विज्ञान में जीव विज्ञान का क्या महत्त्व होता है, यह भी बतला दिया।

इतिहास स्वयं को दुहरा रहा है...

     ऐसा विश्व में पहली बार नहीं है। ऐसा विश्व में पहले भी कई बार हो चुका है। इतिहास स्वयं को दुहरा रहा है। 
वर्तमान साक्षी है कि इतिहास स्वयं को दुहरा रहा है। इतिहास साक्षी है कि ऐसी घटनाओं का निराकरण भी दैवीय सहायताओं और किसी नव अवतार या नव प्रयासों से ही हुआ है। इस वक़्त संसार भी इसी प्रक्रिया में लगा हुआ है और इष्ट-प्रार्थना, समग्र प्रयास में संलग्न है, मग्न है।

कोरोना जन्माजन्म

     कहा जाता है कि होनहार पूत के पाँव पालने में ही दीख जाते हैं। जो जीवन में कुछ कर गुजरते हैं उन की झलक शुरू में ही मिल जाती है। बिल्कुल फिल्म के ट्रेलर की तरह। इस का प्रमाण समस्त विश्व है: वर्तमान है जो इतिहास रच चुका है।।
     कोरोना का जन्म आम बच्चों की तरह नहीं था। इस की उत्पति धमाके की तरह हुई और इस का विस्तार तहलके की तरह। इस का पहला जन्मदिन ही बड़ी ‘धूमधाम’ से मना। इसे समस्त विश्व ने एकसाथ मनाया। इस के जन्मदिन का ‘धूम-धड़ाका’ अब भी जारी है, इस की ‘धमा-चौकड़ी’ जो अब भी जारी है! इस ने अपने कई प्रतिरूप विकसित कर विश्व जनसंख्या को पीछे छोड़ अपनी चाण्डालचौकड़ी जो विकसित कर ली और अब ‘चाण्डालचौकड़ी की धमाचौकड़ी’ भी अब जारी है।

कोरोना उत्पति

     कलियुग की 21वीं सदी के आरम्भ में कोरोना ने भू्रण रूप में विकसित होना शुरू किया जिस की विधिवत् घोषित उत्पति सन् 2019 ईस्वी को वुहान (चीन) में हुई।

कोरोना लावारिस

    इस शिशु के साथ सब से रोमांचक बात यह है कि इस को सभी गोद लेना चाहते हैं मगर अपना बच्चा कोई नहीं कहना चाहता। विश्व के सभी देश, यहाँ तक कि अच्छे-बुरे सभी, राजशाहों, तानाशाहों के साथ आतंकवादी, खूनी सभी हैं, इसे स्वशक्ति का हिस्सा बनाना चाहते हैं मगर यह नहीं चाहते कि कोई इसे उन की ईज़ाद कहे। इस का नाम और लाभ सभी लेना चाहते हैं मगर बदनामी कोई भी अपने सिर नहीं लेना चाहता।  
     कोरोना! एक ऐसा अनाथ शिशु है जिस का जन्म पूरी दुनिया के सामने हुआ, फिर भी उस की जन्मतिथि, जन्मस्थान, जन्मदाता वगैरह के रूप में विविध कयास लगाये जा रहे हैं। कोरोना एक ऐसा लावारिस बन चुका है, जिस के लिए ला-वारिस का जुमला भी अख़्तियार किया जा रहा है।
     इण्टरनेशनल कोर्ट में बात पहुँच गयी है। इस के जन्मदाता, जन्मतिथि, जन्मस्थान वगैरह के बारे में खंगाला जा रहा है मगर विश्व के सारे तथाकथित इस मसले पर भ्रम और मतविभिन्नता के शिकार हैं। कोरोना जैसी जन्म से ही हिट, सुपरहिट, मेगाहिट पर्सनैलिटी को कोई भी अपना नहीं कहना चाहता। इस नन्हें शिशु को माता-पिता के रहते अनाथ कहना गलत न होगा। या फिर यह कइयों की नाजायज़ औलाद है। इस लापता का पता ढूँढना ही होगा।

कोरोना बायोडाटा

     कोरोना ने अपने जन्म से पूर्व, जन्म के साथ और जन्म के बाद जिस प्रकार के कारनामे किये हैं, कोरोना की कुण्डली के आगे नाग की कुण्डली भी कम है। कोरोना का बायोडाटा, कोरोना की जन्मकुण्डली तलाश की जा रही है। इस का जन्म कब और कहाँ हुआ? इस के जन्मसमय, जन्मतिथि, जन्मस्थान के बारे में पता किया जा रहा है। इस के जन्म के उद्देश्य वगैरह को जानने के लिए इस के अन्य पहलुओं पर भी फोकस किया जा रहा है। इसलिए कोरोना का जन्म कब, कहाँ, क्यूँ, किसलिए हुआ, यह भी पता किया जा रहा है-
नाम : कोरोना
वैज्ञानिक नाम : कोरोना वायरस
पूरा नाम : नोवेल कोरोना वायरस
जन्मस्थान : चीन/अमेरिका..... 
जन्मतिथि : 1930, 2002-2003 (अमेरिका), सितम्बर से दिसम्बर 2019 (वुहान-चीन).....
स्वभाव : स्पर्श करना
लक्ष्य : शरीर के अंग-अंग में घुसकर हलचल मचा देना, दिल को लाचार कर देना, किडनी को नष्ट-भ्रष्ट कर देना, अन्ततोगत्वा यमराज के दर्शन करा ‘मोक्ष’ का मार्ग प्रशस्त कर देना.....।

कोरोना महामारी 

     कोरोना वैश्विक महामारी है। मगर यह बिन बुलायी आफ़त नहीं; बल्कि बुलायी आफ़त है। इस पर ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है, बिल्कुल सही चरितार्थ होती है।
     कोरोना को जिस प्रकार वैश्विक महामारी घोषित कर प्रचारित किया जा रहा है, इसे वैश्विक कारिस्तानी कहकर प्रचारित किया जाय तो बिल्कुल सही सिद्ध होगा।
     कोरोना वायरस! असल में इस संक्रमण को वायरस संक्रमण के रूप में प्रचारित किया जा रहा है जबकि यह संक्रमण उस संक्रमण की देन है जो मानव मस्तिष्क से उपजी है। इसलिए यह मानव मस्तिष्क से उपजी मानवीय बनाम अमानवीय करतूतों की देन है। इसे अमानवीय करतूत कहा जाना बिल्कुल ग़लत न होगा; क्योंकि जब से इस की शुरुआत हुई है, यह आरम्भकाल से ही किसी-न-किसी की जान ले रहा है और इस का मीटर ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है।

कोरोना लक्षणम् 

     कोरोना के जो लक्षण हैं, आलसी और क्रोधी लोग के हैं। शरीर में, मांसपेशियों में दर्द होना, सिर में बेमतलब दर्द होना, जीभ में स्वाद न लगना, नाक में गन्ध महसूस न होना.....फलां-फलां बातों की पचहत्तर तरह की शिकायत.....खाँसी-जुकाम वगैरह आलसी और कामचोर लोग के लक्षण हैं। हृदय में दर्द, मस्तिष्क में तेज दर्द, पैरों में सूजन, साँस में समस्या, शरीर का कंपकंपाना, हृदयाघात वगैरह क्रोधी लोग के लक्षण हैं।

कोरोना युगान्धर Corona Saga

-अमित कुमार नयनन
     आज हम उस दौर में खड़े हैं, जब एक नया युग आरम्भ हो चुका है। 

युग परिवर्तन

     युग परिवर्तन हो चुका है। आप और हम इस युग के गुलाम हैं। ये कोरोना का युग है। यह कोरोना की दुनिया है।

विश्व चरण पादुका

     विश्व एक ऐसे चरण में कदम रख चुका है जो एक नये युग की शुरूआत है। यह शुरूआत अच्छा-बुरा कुछ भी हो सकता है।

इस बात से भला...

     इस बात से भला किसे ऐतराज होगा कि कोरोना से पहले और बाद की दुनिया एक-सी नहीं होगी! 
     इस बात से भला किसे ऐतराज होगा कि उस दौर से इस दौर में जो प्रवेश कर गये, वह इस के सूत्रधार हैं!
     इस बात से भला किसे ऐतराज होगा कि आप और हम जो कल की दुनिया में साथ थे, आज एक नयी दुनिया में भी साथ हैं!
     इस बात से भला किसे ऐतराज होगा कि कोरोना के आने से पहले दुनिया किस प्रकार बेफिक्र थी और आने के बाद किसी कदर फिक्रमन्द है।

कोरोना सिस्टम

     अगर हमें अपने लिए ज़िन्दगी चाहिए तो कोरोना सिस्टम के अनुसार ही जीना पड़ेगा। कोरोना अगर कहेगा कि उठ तो उठ और बैठ तो बैठ.....इधर चल तो इधर चल, उधर चल तो उधर चल.....। और जिस ने भी इस की अनदेखी की, उसे इस का फल भुगतना पड़ा। उदाहरण कई हैं और सभी जानते भी हैं।
     अगर आप को विश्वास नहीं तो इसे इस तरह देख लीजिये आप और हम पहले की तरह हाथ नहीं मिला सकते, गले नहीं लग सकते, गलबहियाँ नहीं कर सकते.....हालाँकि हमारे बीच का प्रेम वही है मगर उसे ज़माने की नज़र लग गयी है, अलबत्ता कोरोना की नज़र लग गयी है। आप दुनिया-जहान की बातें छोड़ दीजिये, आप को अपना ही चेहरा- आँख, नाक, मुँह, कान छूने से पहले सोचना है। क्या यह कम है? आप के और हमारे शरीर के अन्दर से बाहर और बाहर से अन्दर तक उस का साम्राज्य पहँुच चुका है। शरीर हमारा, दोस्त-यार, अड़ोसी-पड़ोसी, दुनिया-जहान हमारे.....राज कोरोना का! जिसे कुछ दिनों पहले तक हम जानते तक नहीं थे, किसी भूत की तरह प्रकट हो अचानक ही विश्व-सम्राट बन गया।

विश्व-सम्राट

     कुछ दिनों पहले तक इस का नाम कोई नहीं जानता था और आज यह विश्वसम्राट है। आज के समय में इसे भला कौन चुनौती दे सकता है। हर सम्राट के साथ इस सम्राट के भी अच्छे-बुरे पहलू हैं।
     विश्व-सम्राट कोरोना का राज शीघ्रातिशीघ्र साम्राज्य में बदल गया। प्रदेश, देश, परदेस की तमाम सीमाओं को पार कर सारे मापदण्डों और मानदण्डों को ध्वस्त कर समस्त विश्व पर छा गया। कोरोना ने अपनी विश्व-पताका कुछ इस तरह लहराया कि इस की ध्वज के आगे समस्त विश्व नतमस्तक हो गया।
     इस बात से कुछ लोग को ऐतराज हो सकता है कि कोरोना क्या चीज है? इस से पहले भी विश्व में महामारी आयी है जो इस से भी भयानक रही है। इस से भी ज़्यादा खौफ़नाक और विनाशक रही है। फिर यह इतना भयावह और आतंकित कैसे हुआ?
     तो ज़नाब! ज़वाब यह है कि कुछ दिन पहले डायरी के पन्ने उलटकर और कुछ दिन पहले की दिनचर्या पलटकर देख लीजिये। कुछ दिन पहले तक हम सभी अपनी मर्जी के मालिक थे। जो मनमर्जी आया, करते थे मगर आज अपनी मर्जी से विश्व, परदेस, देश, प्रदेश, क्षेत्र वगैरह दीन-दुनिया वगैरह समाज वगैरह.....वगैरह-वगैरह की तो बात ही छोड़ दीजिये, आप और हम अपनी मर्जी से बेफिक्र होकर अपना शरीर तक नहीं छू सकते। मनुष्य ने जब से धरती पर जन्म लिया था, तब से आजतक ऐसा कब हुआ था? वह भी समस्त विश्व में एकसाथ। वह भी एक ही समय में एकसाथ।
     एक प्रश्न यथोचित तौर पर कई लोग उठा सकते हैं कि विश्व में इस से पहले भी इस से भयानक और खौफ़नाक परिणाम देनेवाली बीमारियाँ हुई हैं और उन का अरसों और दसियों ही नहीं; बल्कि कुछ का तो सदियों तक प्रभाव रहा है तो फिर कोरोना उन से ज़्यादा भयावह कैसे हुआ? तो मैं ने कोरोना को भयावह से ज़्यादा विश्व-सम्राट की उपाधि दी है! आवश्यक नहीं जो ज़्यादा भयावह हो वही विश्व-सम्राट हो; बल्कि जिस की समस्त दुनिया पर चलती हो, समस्त विश्व पर प्रभाव और वर्चस्व हो, वह विश्व-सम्राट है!
     मानव सभ्यता के इतिहास में कोरोना से पहले भी कई प्रकार की महामारियाँ आयी हैं और संख्यात्मक और आनुपातिक दोनो ही रूपों से उन्होंने ज़्यादा विनाशक और घातक परिणाम दिये हैं मगर जो कोरोना ने कर दिया या कर दिखाया, वह किसी और बीमारी ने नहीं किया। सच कहा जाय तो कोरोना ने कई महामारियों के मुकाबले इन्सान का ज़्यादा कुछ नहीं बिगाड़ा। इस से पहले कई महामारियाँ इस से कई गुणा ज़्यादा घातक परिणाम दे चुकी हैं और कुछ दे भी रही हैं मगर फिर भी कोरोना ने वह किया जो किसी और बीमारी ने नहीं किया। कोरोना ने ज़्यादा कुछ नहीं किया, बस उस ने इन्सान को उस की औकात और जाति बता दी, जिस दुनिया में उस की तूती बोलती थी, उसी दुनिया में उस की पुंगी बजा दी।
     दरअसल, सब से ज़्यादा कत्ल करनेवाला राजा हो आवश्यक नहीं; बल्कि जिस का अपना इलाके और क्षेत्र में वर्चस्व और साम्राज्य हो, जिस का खौफ़ व डर हो, जिस के अनुसार लोग चलने को विवश हों- वह राजा है। तिसपर अगर यह मामला समस्त विश्व पर लागू हो तो निश्चित तौर पर वह राजा एक सम्राट है, विश्व सम्राट है! कोरोना इस विश्व व्यापक नजरिये से विश्व सम्राट है। 
     कोरोना ने एक ही काल में वह भी अति अल्प से भी अल्प काल में न सिर्फ़ समस्त विश्व पर अपना सिक्का जमाया; बल्कि उस का सिक्का समस्त विश्व में चल भी निकला। उस की तूती समस्त विश्व में बोलने भी लगी। इस ने न सिर्फ़ विश्व के व्यक्तिगत से लेकर समस्त स्तर पर विश्व की दिनचर्या बदल दी; बल्कि समस्त विश्व के समस्त क्षेत्र की जीवन-शैली, तौर-तरीकों, परम्परागत प्रणाली वगैरह को बदलकर रख दिया। जिस दुनिया पर कुछ दिनों पहले सिर्फ़-और-सिर्फ़ इन्सान राज कर रहा था, उस पर एक ऐसा नामाकूल राज करने लगा जिस का कुछ दिनों पहले तक लोग नाम तक नहीं जानते थे। इतने अल्प से भी अल्प काल में। मनुष्य सभ्यता के इतिहास से देखें तो यह सेकेण्ड का भी सौवाँ क्षण से भी कम प्रतीत होता है। समस्त विश्व में एक साथ। ऐसा कब, किस महामारी ने किया था? वे महामारियाँ समस्त विश्व पर या तो चरणबद्ध तरीके से छायी थीं या विश्व के अधिकाधिक क्षेत्र तक छायी थीं मगर समस्त विश्व पर एक ही समय में एक बार छाने जैसा वाक्या तो आजतक किसी लेख में कहीं लिखा या किसी का दिखा तो कहीं नहीं दीखता या मिलता।

सोमवार, 1 जून 2020

कोरोना समसामयिकी Corona Current Affairs

-अमित कुमार नयनन
     वह भी क्या दिन थे, जब हम अपनी मर्जी का करते थे। जो मन में आता था, करते थे। जो मन में नहीं आता था, नहीं करते थे। सारी दुनिया को अपनी बपौती समझ जो भी जी आता, करते रहे। बेख़ौफ़ हो घूमते थे।बिन्दास... बेखौफ... बेफिक्र... बेपरवाह!

जाने कहाँ गये वो दिन...

     हाय रे वायरस! तूने कर दिया जीवन में व्हाई (Why) रस। दुनिया रास-रंग के रस को तरस गयी। शृँगार रस से भरी ज़िन्दगी थी। ऐसी रसहीन ज़िन्दगी जीने से क्या फ़ायदा?
     हाय-हाय! हाय ड्यूट! हाय क्यूट! ऐसा कहती दुनिया अचानक ‘हाय-हाय’ पर उतर आयी। ‘काँय-काँय’ पर विवश हो गयी। मन तो कर रहा है कि सारी दुनिया पर चिल्लाएँ, ख़ुद पर झल्लाएँ! मगर होगा क्या? सुननेवाला कौन है- सड़कें तो वीरान पड़ी हैं, दीवारें ही सुनेंगी। मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारे- सब के कपाट बन्द हैं। भगवान के पास जाकर घण्टी भी नहीं बजा सकते; क्योंकि कोरोना ने सब की घण्टी बजा दी है और बजा दिया है बारह!

पीढ़ियों का फ़ासला

     अब तो यही लगता है कि आनेवाले दिनों में यदि बच गये तो आनेवाली पीढ़ियों को सुनाने के लिए हांेंगी कहानियाँ कि कोरोना से पहले हम ऐसे जीते थे और इस के आने के बाद ऐसे जीने लगे। पहले फ्री स्टाइल में जीते थे और फिर ‘रिरियाते स्टाइल’ में जीने को बाध्य हुए। नयी पीढ़ी से आगे कहेंगे- तुम्हें फर्क नहीं पड़ता; क्योंकि तुम्हारे लिए यही रियल स्टाइल है मगर मेरे लिए तो यह रील स्टाइल है। अभी से ही कोरोना से पहले का समय किसी सुखद फिल्म की तरह लगने लगा है।

अतीत और वर्तमान

     ‘‘वर्तमान, अतीत से ज़्यादा दुःखद हो तो अतीत कितना सुखद लगता है!’’ यादें...यादें तो लाइब्रेरी होती हैं- अच्छी बातों को महसूस कीजिये। अब ठण्डी साँस लेने से क्या फायदा? अब तो गर्म हवा आने लगी है। हमें इसी के साथ जीना होगा या फिर ऐसा करना होगा कि हम गर्म हवा में सुखपूर्वक जीने लायक बन जाएँ अथवा सब कुछ पहले की तरह हो जाय। ओह! फिर से एक ठण्डी आह आ ही गयी। बिन्दास जीवन लगता है कि बीते समय की बात हो गयी है।

रविवार, 31 मई 2020

कोरोनो और विश्वयुद्ध Corona & World War

-अमित कुमार नयनन 

विश्वप्रसिद्ध विनाशलीला

     विश्वप्रसिद्ध विनाश लीलाओं में एक अध्याय और जुड़ गया। क्या यह अन्त की शुरुआत है? अभी १०० वर्ष हुए हैं और दुनिया तृतीय विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी है।

पब्लिक

     प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध जिन्होंने भी नहीं देखा है, उन के लिए तृतीय विश्वयुद्ध देखने का यह ‘स्वर्णिम अवसर’ है। अलबत्ता कुछ लोग जो जीवन की शतकीय पारी खेल चुके और नॉटआउट हैं, उन के लिए तीनों विश्वयुद्ध देखने का ‘सौभाग्य’ प्राप्त होने जा रहा है। ईश्वर ने उन्हें तीनों विश्वयुद्धों का साक्षी होने और उन के गुण-धर्म वगैरह का आकलन और समीक्षा कर दुनिया को बताने, दुनिया का मार्गदर्शन करने के लिए उन्हें धरती पर भेजा है। अलबत्ता यह तभी हो पायेगा, जब वह इस युद्ध को पूरी तरह देखेंगे। अन्यथा तृतीय विश्वयुद्ध का हिस्सा तो वह बन ही चुके हैं, हम सभी की तरह।
     मेरे विचार से, युगदर्शन के रूप में सिर्फ़ एक विश्वयुद्ध देखनेवाले साधारण, दो विश्वयुद्ध देखनेवाले स्पेशल और तीनों विश्वयुद्ध देखनेवाले वीआईपी क्लास की श्रेणी में हैं। इस प्रकार तीनों विश्वयुद्ध देखनेवाले सब से सीनियर, दो विश्वयुद्ध देखनेवाले सीनियर और एकमात्र विश्वयुद्ध देखनेवाले जुनियर हैं।

१०० वर्ष में ही तीसरा विश्वुयुद्ध?

     अरे! इस क्रम में यह बात तो भूल ही रहा था कि १०० वर्ष में ही तीनों विश्वुयुद्ध की नौबत आ गयी! इस निर्णायक घड़ी में हमें सिर्फ़-और-सिर्फ़ सही फैसले लेने की ज़रूरत है। ये फैसले सही तभी हो सकते हैं, जब ये पूरी तरह पक्षपातरहित और तटस्थ हों। वक़्त पर सही फैसले लेना और सही समय पर सही फैसला लेना वास्तव में एक सही इंजीनियर का गुण होता है।

फैसला

     फैसला हमें करना है। सिर्फ़-और-सिर्फ़ हमें करना है। हमारा फैसला ही हमारे अच्छे-बुरे का फैसला करेगा। यही हमारे भविष्य की दिशा तय करेगा। इस से अच्छी बात क्या हो सकती है कि अपनी ज़िन्दगी के सारे फैसले हमारे हाथ में हैं और न सिर्फ़ हमारे हाथ में हैं; बल्कि उस के न्यायकर्ता भी हम ही हैं। हमारा भविष्य सिर्फ़-और-सिर्फ़ हम तय करते हैं!

शनिवार, 30 मई 2020

कोरोना इतिहास चलचित्र Corona History Channel

-अमित कुमार नयनन
     कोरोना ने दुनिया के लिए घर बैठे हिस्ट्री चैनल खोल दिया है। इस के आप दर्शक भी हैं और पात्र भी। 
     कोरोना ने हमें वर्तमान में स्थिर कर भविष्य के दर्शन पर रोक लगा दिया है। अल्पकाल के लिए ही सही लेकिन इतिहास की ओर धकेल दिया है। कोरोना ने एक ओर जहाँ अतीत के भविष्य की सभ्यता को स्थिर कर मानव को अतीत की परछायी दिखायी है, वहीं उस ने अतीत की यात्रा का फ्री ट्रैवल पैकेज भी दिया है।
     एक वक़्त था, जब मनुष्य धरती पर नया-नया आया था। तब सिर्फ़ जंगली जीव-जन्तु, जलचर, पक्षी वगैरह जीव रहते थे। फिर मनुष्य ने सभ्यता बनायी तो जंगल और जीव-जन्तु सिमट गये, दुबक गये।
     मनुष्य जब तक वाहन नहीं बनाया था, तब तक पैदल ही देश-परदेस की यात्रा करता था और वह भी बहुत ज़रुरत पड़ने पर। ध्यान से देखिये, कोरोना ने इतने ही समय में सब कुछ चलचित्र की तरह दिखला दिया जिस के असली पात्र आप और हम ही हैं।
     कोरोना ने अतीत की झाँकी दिखायी। कोरोना न इन्सान को घरों के अन्दर दुबककर रहने के लिए मज़बूर किया है। इस ने बताया और दिखाया- देखो! जब तुम धरती पर आये थे, तब यह दुनिया कैसी लगती थी और आज यह कैसी दीख रही है? तब पर्यावरण कैसा था, अब कैसा है?
     तब जीव-जन्तु और सभी प्राणी समस्त दुनिया में निर्भय हो विचरण करते थे। उस ज़माने में लोग पैदल ही देशाटन करते थे। आज की उन्नत दुनिया में वह दृश्य देख और जी लिया जैसा आरम्भिक काल में जीया था- सैकड़ों कोस पैदल.....। 
     इतिहास के मानव ने केवल इतिहास जीया था जबकि वर्तमान के मानव ने इतिहास और वर्तमान दोनों जीया है। इस प्रकार आज का मनुष्य वास्तव में इतिहास के मनुष्य से ज़्यादा सौभाग्यशाली है। यह सौभाग्य कोरोना की वज़ह से सम्भव हुआ है।
     कोरोना ने अतीत की झाँकी दिखायी है। अतीत का फ्री टूर पैकेज! एक रुपया भी खर्च नहीं और पूरी दुनिया ने एक साथ यात्रा कर ली अतीत और वर्तमान की। ...ओह! यह अनुभव तो सचमुच स्वर्णिम है!

शुक्रवार, 29 मई 2020

कोरोना और विश्व Corona & World

-अमित कुमार नयनन
     अब दुनिया पहले जैसी नहीं रही। देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान, कितना बदल गया इन्सान। इन्सान बदला, इसलिए उस के लिए दुनिया बदल गयी।
     वीराना! सारी दुनिया वीरान पड़ी हुई है। सारी दुनिया वीराना बन गयी है। दुनिया की सारी सड़कंे वीरान पड़ी हुई हैं। गली, कूचे, मुहल्लों में सन्नाटा पसरा हुआ है। सारी जगह वीरानगी छायी हुई है।
     ऐसा कैसे हो सकता है? ऐसा तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। ऐसा लगता है जैसे स्वप्न देख रहे हैं।
     कोराना ने पूरी दुनिया को कारावास में बदल दिया। सभी अपने घर में नज़रबन्द हैं। मानो सभी अपने ‘सेल’ में बन्द हों। हर कोई अपने आवास में रहकर भी मानो कारावास में बैठा है। सारी दुनिया अपने ही घर में नज़रबन्द है।   
     सावधान....विश्राम! कोरोना ने सारी दुनिया को सावधान कर दिया और दुनिया विश्राम पर चली गयी- अनिश्चितकाल के लिए।

कोरोना का विश्व

     यह कुछ समय पहले तक अस्तित्वविहीन, कुछ वर्षो पहले तक अज्ञात, कुछ महीनों पहले तक गुमनाम, कुछ दिनो पहले तक अनाम रहे कोरोना की दुनिया है!

विश्व नज़रबन्द

     विश्व ने समस्त विश्व में होनेवाली नकारात्मक गतिविधियों पर अपनी आँखें मूँद ली थी, इसलिए समस्त विश्व को आज अपने ही घर में नज़रबन्द होना पड़ा है। कोई गली, कोई मुहल्ला, कोई शहर बन्द करता है, यहाँ तो सारा विश्व ही बन्द है। आँखें मँूदने का आँखों देखा फल ऐसा मिलेगा, किस ने सोचा था? 
     विश्व का महत्त्वपूर्ण मसलों पर भी चुप रहना, अपराध या अपराधसम स्थितियों पर भी चुप्पी बाँधे रहना.....ने ही उसे इस स्थिति में पहुँचाया है। जब एकाएक वैश्विक आपदा आ गयी। यहाँ तक कि मनुष्य का अस्तित्व तक खतरे में पड़ गया।
     कोरोना के कई अर्थ निकाल रहे हैं भई! एक अर्थ यह भी है कि ‘कुछ करो नऽ’। जी हाँ! सारी दुनिया माथापच्ची में डूबी है। इस आफत से छुटकारा कैसे पाया जाय? कोरोना ने पहले ही शॉट में बाउण्ड्रीलाइन पार करा दुनिया को घर में घुसे रहने पर मज़बूर कर दिया।
     विश्व हक्का-बक्का है। काटो तो खून नहीं है। काटनेवाले को भी काटो तो खून नहीं है, फिर भी खून चूसनेवाला खूनी है। कल चमन था, आज यह सहरा हुआ! देखते-ही-देखते यह क्या हुआ? हम से क्या भूल हुई जो ये सजा हम का मिली, अब तो चारों ही तरफ बन्द हैं दुनिया की गली। गलियाँ सूनसान, दुनिया वीरान!

आँखों देखी

     इन्सान खुली आँखों से स्वप्न देख रहा है। उसे आँखों देखी पर विश्वास नहीं हो रहा है। उसे अभी आँखों के आगे कुछ नहीं सूझ रहा है। लोग को अपनी ही आँखों देखी पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कल तक जिस दुनिया में वह खुलकर जी रहे थे, अचानक उसे क्या हो गया? जिस दुनिया पर वे राज कर रहे थे, अचानक ही एक वायरस का गुलाम हो गया।
     कोरोना का जिस ने भी उपहास किया, स्वयं ही उपहास का पात्र हो गया। जिस ने भी उस का मज़ाक उड़ाया स्वयं ही मज़ाक का पात्र बन गया और जिस ने दाँत दिखाये, उस के करतब को देखकर दाँत निपोरने को विवश हो गये।

कोरोना कथानक

     ऐसा लगता है जैसे यह किसी कहानी का प्लॉट या फिल्म की स्क्रिप्ट है। मगर वास्तविकता यह है कि यह एक जीता जागता सच है!
     दुनिया अच्छी-खासी चल रही थी। अचानक ऐसा क्या हुआ कि सबकुछ थम-सा गया, चलती-फिरती ज़िन्दगी अचानक रूक-सी गयी। ऐसा लगा जैसे ज़िन्दगी में पाउज बटन दबा दिया हो। ज़िन्दगी फ्रीज हो गयी हो। जिं़दगी फ्रीज हो या कूलर.....माहौल बिल्कुल कूल नहीं है!

गुरुवार, 28 मई 2020

किस धातु के बर्तन हैं लाभदायक और कौन हानिकारक
Which Metal Utensils are Beneficial & Which are Harmful



-शीतांशु कुमार सहाय
     स्वस्थ रहने के लिए कई उपायों का पालन करना पड़ता है। पर, एक उपाय ऐसा भी है जिस पर आम तौर पर ध्यान जाता ही नहीं है। इस बुलेटिन में आप जानेंगे कि किस प्रकार बर्तन हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। जिन धातुओं के बर्तनों में हम भोजन पकाते हैं या भोजन ग्रहण करते हैं, उन के अंश भोजन में शामिल हो जाते हैं जो शरीर को लाभ या हानि पहुँचाते हैं। मतलब यह कि धातुओं का सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। किस प्रकार के बर्तन में भोजन पकाना चाहिये? किन धातुओं के बर्तन में खाने से शरीर नीरोग रहता है? किस धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या लाभ या हानि है? वह कौन धातु है जिस का बर्तन भारत के हर घर में है और वह सब से ज़्यादा हानिकारक है? इन सब के बारे में अभी तुरन्त आप जानेंगे.....


सोना Gold

     सब से पहले जानते हैं स्वर्ण अर्थात् सोने से बने बर्तन के बारे में। सोना गर्म धातु है। सोने से बने बर्तन यानी पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी अंग सुदृढ़, बलवान और स्वस्थ बनते हैं। आँखों की ज्योति बढ़ाने में सोने का महत्त्वपूर्ण योगदान है। त्वचा की झुर्रियों और बुढ़ापे के लक्षणों से शरीर को मुक्त रखने में सोना सक्षम है। 
     सोना बहुत महँगा धातु है। इसलिए अधिकतर लोग आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं होते कि सोने के पात्रों का उपयोग कर सकें। ऐसी स्थिति में अन्य लाभदायक धातुओं के पात्र में भोजन पकायें या खायें लेकिन सप्ताह में एक बार किसी साफ पत्थर पर सोने का बिस्कुट या सोने का कोई आभूषण रगड़कर उसे चाट लें तो सोने से होनेवाले सभी लाभों को आप प्राप्त कर सकते हैं। सोने के पात्र में मांस, मछली, अण्डा, अधिक खट्टे पदार्थ, दही आदि न रखें और न खायें।   

चाँदी Silver

     अब रजत अर्थात् चाँदी की चर्चा करते हैं। चाँदी को ठण्डा धातु माना जाता है। यह शरीर को आन्तरिक ठण्डक प्रदान करती है। शरीर को शान्त रखने में चाँदी सक्षम हैैै। चाँदी के बर्तन में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखें स्वस्थ रहती हैं और आँखों की रोशनी बढ़ती है। चाँदी पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियन्त्रित करती है। 
     सोने से सस्ती है चाँदी, फिर भी अधिकतर लोग इतने सामर्थ्यवान नहीं हैं कि चाँदी के बर्तन में भोजन बनायें और खायें। पर, कुछ उपाय तो किया ही जा सकता है। हर महीने हज़ारों रुपये दवाइयों पर खर्च करने से बचने के लिए चाँदी के बर्तनों पर कुछ हज़ार रुपये खर्च कर दीजिये। आप चाँदी के चम्मच, गिलास और कटोरी से इस की शुरुआत करें और स्वास्थ्य लाभ करते हुए प्रगति के पथ पर आगे बढ़ें। चाँदी के बर्तन में अण्डा या कोई मांसाहार, खट्टा पदार्थ, दही खाना वर्जित है।  

काँसा Bronze

     स्वर्ण और रजत की अपेक्षा काँसा सस्ता है। ताम्बे में राँगा मिलाने से काँसा बनता है। प्रत्येक भारतीय घर में काँसे के कुछ बर्तन मिल ही जाते हैं। काँसे के बर्तन में खाना पकाने और खाने से बुद्धि तेज होती है और रक्त में शुद्धता आती है। साथ ही रक्तपित्त तथा अम्लपित्त के रोग शान्त हो जाते हैं और भूख सामान्य रूप से बढ़ती है। एक प्रयोग के आधार पर कहा गया है कि काँसे के बर्तन में भोजन पकाने से केवल 3 प्रतिशत ही पोषक तत्त्व नष्ट होते हैं। काँसे के पात्र में पके भोजन बुद्धिवर्द्धक, स्वादिष्ट और रुचि उत्पन्न करनेवाले होते हैं। जो व्यक्ति उष्ण प्रकृतिवाले हैं, मतलब यह कि जिन्हें सामान्य लोग की अपेक्षा अधिक गर्मी लगती है या जिन्हें बात-बात पर क्रोध आता है, वे काँसे के पात्र में भोजन पकायें और खायें। जिन्हें किसी प्रकार का चर्मरोग है, यकृत यानी लीवर से सम्बन्धित रोग है या हृदय की कोई बीमारी है तो काँसे के पात्र स्वास्थ्यप्रद साबित होंगे। 
     याद रखिये, काँसे के बर्तन में खट्टे खाद्य पदार्थ नहीं परोसनी चाहिये। खट्टी चीजें काँसा धातु से प्रतिक्रिया कर विषैली हो जाती हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। 

ताम्बा Copper

     ताम्बे का बर्तन स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है। इस धातु के बर्तन में भोजन पकायें या खायें तो स्वास्थ्य सुधरता है, कई रोगों से मुक्ति मिलती है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति बढ़ती है, लीवर यानी यकृत से सम्बन्धित रोग दूर होते हैं और शरीर से विषैले तत्त्व निकल जाते हैं। 
    याद रखिये, ताम्बे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिये। इस से शरीर को नुकसान होता है। 

पीतल Brass

    काँसे की तरह ही पीतल भी मिश्र धातु है। ताम्बा और जस्ता मिलाकर पीतल का निर्माण होता है। पीतल के बर्तनों में पका भोजन खाने से कृमि रोग, कफ और गैस से जुड़ी समस्याएँ नहीं होतीं। पीतल धातु में भोजन जल्दी पकता है; क्योंकि यह तुरन्त गर्म हो जाता है। इस से ईंधन की बचत होती है और भोजन भी स्वादिष्ट बनता है। 
     जिन्हें कब्ज, गैस या पेट की कोई बीमारी है, उन्हें पीतल के बर्तन में भोजन ग्रहण करना चाहिये। पीतल में पका भोजन शरीर को अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा प्रदान करता है। पीतल का भोजन आँखों के लिए बहुत लाभदायक है। पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और भोजन करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। 
विशेषज्ञों की बात मानें तो पीतल में भोजन पकाने से केवल चार से सात प्रतिशत पोषक तत्त्व ही ख़त्म होते हैं, इसलिए इस में भोजन पकाना और खाना काफ़ी फायदेमन्द होता है। 
     याद रखें कि पीतल में दही या अन्य खट्टा पदार्थ नहीं रखना चाहिये।

लोहा Iron

     अब लोहे के बर्तन के सन्दर्भ में जानते हैं। लौह पात्रों में बने भोजन को ग्रहण करने से शरीर की शक्ति बढ़ती है। लौह्तत्त्व शरीर में ज़रूरी पोषक तत्त्वों को बढ़ाता है। लोहा कई रोगों को ख़त्म करता है। लोहे के बर्तन में पकाये भोजन को ग्रहण करने से पीलिया यानी जौण्डिस में लाभ होता है और यकृत स्वस्थ हो जाता है। साथ ही शरीर में सूजन वाले रोग और कामला रोग समाप्त हो जाते हैं। शरीर में अगर खून की कमी है, हीमोग्लोबिन की मात्रा कम है यानी एनीमिया रोग है तो लोहे के बर्तन में बना भोजन अमृत के समान है।
     याद रखिये, लोहे के पात्र में भोजन पकाना चाहिये मगर इस में खाना नहीं चाहिये। लोहे में खाने से बुद्धि कम होती है और मस्तिष्क का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा माना जाता है। 

इस्पात या स्टेनलेस स्टील Steel or Stainless Steel

     इस्पात या स्टेनलेस स्टील के बर्तन हानिकारक नहीं होते तो लाभदायक भी नहीं होते। स्टील के बर्तनों में भोजन पकाने से न पोषक तत्त्वों में कमी आती है और न ही वृद्धि होती है। वर्तमान में सभी घरों में स्टेनलेस स्टील के बर्तन मिलते हैं।

एल्युमीनियम Aluminium

     बॉक्साइट नामक खनिज से बनता है एल्युमीनियम। स्टील की तरह ही एल्युमीनियम ने अधिकतर भारतीय घरों में अपनी पैठ बना ली है। एल्युमीनियम वास्तव में आयरन और कैल्शियम को सोखता है, इसलिए एल्युमीनियम के बर्तनों का उपयोग नहीं करना चाहिये। एल्युमीनियम में भोजन पकाने और खाने से शरीर को केवल हानि ही है, लाभ कुछ नहीं। 
     अगर आप एल्युमीनियम का उपयोग करते हैं तो इस से होनेवाली हानि को भी जान लीजिये। इस से हड्डियाँ कमजोर होती हैं, मानसिक बीमारियाँ होती हैं, लीवर यानी यकृत और तन्त्रिका तन्त्र अर्थात् नर्वस सिस्टम को क्षति पहुँचती है, स्मरण शक्ति कमजोर होती है, अचानक वृक्क यानी किडनी फेल हो सकती है, यक्ष्मा यानी टीबी, दमा यानी अस्थमा, गैस्ट्रिक, मधुमेह यानी डायबिटीज जैसे घातक रोग हो सकते हैं। भोजन के माध्यम से एल्युमीनियम का अंश जब शरीर में पहुँचता है तो पाचनतंत्र, मस्तिष्क, हृदय, अन्तःस्रावी ग्रन्थियों और आँखों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
     एल्युमीनियम के बर्तनों में पकाने-खाने से मुँह में छाले, पेट का अल्सर, एपेण्डिसाइटिस, पथरी, माईग्रेन, जोड़ों का दर्द, सर्दी, बुखार, बुद्धि की कमी, अवसाद यानी डिप्रेशन, सिरदर्द, अतिसार यानी डिसेण्ट्री, पक्षाघात यानी लकवा आदि बीमारियाँ होने की सम्भावना ज़्यादा रहती है। हानिकारक पक्ष को जानकर कई लोग अपने घर में अब एल्युमीनियम के बर्तनों का प्रयोग नहीं करते। पर, उन के घरों में प्रेशर कूकर एल्युमीनियम के ही हैं। एल्युमीनियम के प्रेशर कूकर की जगह स्टील का प्रेशर कूकर उपयोग में लाएँ।
     याद रखिये, एल्युमीनियम के प्रेशर कूकर मंे भोजन पकाने से 85 से 90 प्रतिशत तक पोषक तत्त्व समाप्त हो जाते हैं। घर से अगर एल्युमीनियम धातु के बर्तन हटा दिये जायें तो निश्चय ही दर्जनों रोग भाग जायेंगे।

मिट्टी Soil

    प्राचीन काल में सब से पहले मनुष्य ने मिट्टी के बर्तनों का ही उपयोग करना सीखा। कालान्तर में धातुओं के प्रयोग होने लगे। मिट्टी के पात्रों में भोजन पकाने से ऐसे पोषक तत्त्व मिलते हैं, जो बीमारियों को शरीर से दूर रखते हैं। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी सिद्ध कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में पके भोजन को खाने से कई तरह के रोग ठीक होते हैं। 
     आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिये। भले ही मिट्टी के बर्तनों में भोजन पकाने पर अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है लेकिन इस से स्वास्थ्य को पूरा लाभ मिलता है। मिट्टी के बर्तन में पके खाद्य पदार्थ के १०० प्रतिशत पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं।
     मिट्टी में एण्टी एलर्जी तत्त्व होते हैं। पेट के रोगियों के लिए मिट्टी के बर्तन में खाना और पकाना फायदेमन्द होता है। मिट्टी के बर्तन भोजन को पौष्टिक बनाये रखते हैं। मिट्टी के बर्तनों में पके भोजन को ग्रहण करने से मासिक स्राव के दौरान होनेवाले रक्त प्रदर और नाक से खून आना जैसी समस्याओं से राहत मिलती है। 
   याद रखें, मिट्टी के बर्तन में प्रतिदिन भोजन नहीं करना चाहिये। पत्थर या मिट्टी के बर्तनों में नियमित भोजन करने से लक्ष्मी का क्षय होता है। दूध और दूध से बनी सामग्रियों के लिए सब से उपयुक्त है मिट्टी के बर्तन। 
     .....तो आप ने जान लिया कि आप के लिए कौन धातु लाभदायक है और कौन घातक। केवल घातक धातुओं को घर के बाहर कीजिये और परिवार के साथ जीवन का आनन्द लीजिये।

कोरोना लॉकडाउन Corona Lockdown

Lockdown-5

=

Unlock-1


-अमित कुमार नयनन
     कुछ दिनों पहले की ही बात है..... It was Just a Few Days Ago --जनता कर्फ्यू, लॉकडाउन-1, लॉकडाउन-2, लॉकडाउन-3, लॉकडाउन-4..... हमारे प्रिय प्रधानमंत्री भी कुछ कम नहीं हैं। उन्होने भी पहले ‘प्रथम दिन’ एक दिन का लॉकडाउन कर सारे देश को अपने ही घर में घुसवा दिया। फिर शाम होते ही देशवासियों के हाथ ताली बजवा दी, थाली पिटवा दी और फिर उन्हें उन के ही द्वारा अगले 21 दिनों के लिए अपने घरों कैद करवा दिया।
     देश के लोग अपनी ही इच्छित कैद के लिए अपने हाथों ताली बजाकर सहर्ष घर में घुस गये। इस तरह हर इन्सान अपने ही घर में नज़रबन्द हो गया। जनता पहले 1 दिन फिर दिन 21 दिन के बाद लॉकडाउन खुलने का इन्तज़ार कर ही रही थी कि 21 दिन का लॉकडाउन और बढ़ गया। हॉलीडे पिकनिक के साथ गुलामी का फ्र्री पैकेज साथ मिला था- ऐसा टूर पैकेज भला कब, किसे मिलता है! यह कोरोना ने सम्भव कराया। इस के लिए हम सभी को कोरोना का शुक्रगुज़ार होना चाहिये। उसे आभार प्रकट करना चाहिये। सारी दुनिया का हाल बेहाल कर उस ने चारा ही क्या छोड़ा था? इसलिए हमारे प्रधानमंत्री के पास चारा ही क्या बचा था? इसलिए कोरोना उत्पात तक के लिए उन्होंने हमारे हाथों ही ताली बजवा हमें हमारे ही हाथों अपने ही घर में कैद करवा दिया।
     पहले दिन तो लगा कि मजा आ रहा है। फिर लगा कि मजा तो सजा बन गयी। इस के बाद लगा, चलो! कुछ दिनों की बात है। उस के बाद फिर कुछ दिन आगे बढ़ा तो लगा कुछ दिन और सही। पर, अब भी बात हो रही है कि सबकुछ चरणबद्ध तरीके से खुलेगा, जहाँ आप के चरण से लेकर सबकुछ बँधे रहेंगे यानी पूरी सावधानी से। पहले की तरह कुछ भी नहीं रहेगा। सवाल है कि कितने दिन और? हर एक्सटेन्शन से हर किसी को टेंशन हो रही है तो जबाब है कोई जवाब नहीं।
     कोरोना से पहले अधिकतर लोग कर्फ्यू का मतलब ठीक से जानते थे, लॉकडाउन का नहीं। लॉकडाउन के अर्थ को सही पहचान सही मायने में कोरोना कृपा से कोरोना काल में मिली है। लॉकडाउन को सही मायने में कोरोना का शुक्रगुजार होना चाहिये। अन्यथा वह डिक्शनरी में उस शब्द की भाँति था जैसा कोई नेता पार्टी में रहकर भी गुमनाम रहता है। यह गुमनाम अब नामचीन हो गया है! रोमांचक बात यह कि नामचीन बनने की इस की शुरुआत चीन से ही हुई है! 
      लॉकडाउन जिस में पहले से ही ‘डाउन’ है, डाउनफॉल की शुरुआत है जिस ने अपने आरम्भ काल में ही समस्त विश्व को अपने घरों में रहने के लिए मजबूर कर दिया। 
     इशारा समझिए। दुनिया बदल चुकी है। जो स्वतंत्र जीवन हम जी चुके वह अतीत की बात है। इस दुनिया पर एक वायरस जन्म ले चुका है जिस के हम गुलाम हैं। अब हम वही करेंगे जो वह कहेगा, जो वह चाहेगा, जो वह.....गा!

मंगलवार, 26 मई 2020

कोरोना मण्डली Corona Mandali

-अमित कुमार नयनन
     कोरोना की कुण्डली में कोरोना की मण्डली का योग लिखा था। इसलिए कोरोना के जन्म के साथ ही कोरोना की मण्डली भी जगजाहिर हो गयी। भगवान शिव और माँ दुर्गा के पास जिस प्रकार भूत-प्रेत, पिशाच, योगिनी की मण्डली हैं, उसी प्रकार कोरोना की अपनी मण्डली है।
     कोरोना की अपनी मण्डली, अपना फोर्स है। अपना टास्क फोर्स है। जिसे टास्क मिला है कि सारी दुनिया को लाइनहाजिर करो। इसलिए कोरोना के सामने कोरोना मण्डली ने दुनिया को एक लाइन में लाइनहाजिर कर दिया। इस हाजिर-नाजिर के बाद दुनिया की हाजिरी के साथ दुनिया की क्लास लगनी तय थी। क्लास भी लगी फर्स्ट क्लास!
     कोरोना के पास चूँकि कई प्रकार की दैवीय शक्तियाँ हैं, इसलिए वह अपने साथ कोरोना मण्डली के रूप में कई भूत, प्रेत, गण, पिशाच, योगिनियाँ आदि लेकर घूम रहा है। एक ओर जहाँ इस के कई प्रतिरूप हैं, वहीं दूसरी ओर कई अवतार भी हैं। ये निरन्तर बढ़ते ही जा रहे हैं और खोजबीन के साथ लगातार सामने आते जा रहे हैं। दुनिया खोज में लगी है, कोरोना बीन बजा रहा है। खोजबीन!
     दुनिया चैन की वंशी बजा रही थी, चैन की नीन्द सो रही थी, कुम्भकर्णी नीन्द- तभी न जाने कहाँ से कोरोना नाम का असुर उस की चिरनिद्रा में खलल डालने आ गया। निद्रा बनाम चिरनिद्रा की चीर-फाड़ करने में लग गया। जो उस के अर्थात् कोरोना के साथ हुआ था, जो उस ने सिखा था- मानो दुनिया की सीख उसी पर आजमा रहा हो। दुनिया ने उस के साथ जो किया, वह वही उस के साथ कर रहा था। इसे कहते हैं- जैसे को तैसा और बोए को काटना।

सोमवार, 25 मई 2020

कोरोना वायरस- ३ : कलियुग के ऋषियों की तपस्या का परिणाम Coronavirus-3 : The Result of the Sages's Penance of Kali Yuga

कोरोनाशास्त्रम्-३

-अमित कुमार नयनन
     अमृत मन्थन प्रयोगशाला में कलियुग के ऋषि-मुनि तपस्या में लीन हैं। ईश्वर से वरदान प्राप्त कर विविध प्रकार की उपलब्धि प्राप्त कर रहे हैं। 
     यह दुनिया स्वर्ग के समान थी। इस पर धरती के इन्द्र दरबार लगा कई देवताओं से मिलकर राजकाज चला रहे थे। इस दरबार में सभी प्रकार के देवता विराजमान थे। सभी प्रकार के देवता दरबारी थे। इन के दरबार में इन के विविध कारनामों की अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। तभी कोरोना नाम का एक असुर न जाने कहाँ से इन की सभा में खलल डालने आ गया। इस असुर ने विविध देवताओं की आराधना कर विविध आसुरी शक्तियाँ हासिल कर ली थीं। उन्हीं आसुरी शक्तियों के बल पर वह अजेय हो गया था और स्वर्गरूपी विश्व में तहलका मचा रहा था। इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा था। एक बार फिर! एक बार फिर इन्हें त्रिदेव याद आये। मगर वरदान लेकर आये कोरोनासुर को स्थितियों के अनुसार समय से पहले ख़त्म करना सम्भव न था। उसे वरदान के सम्मान के साथ ही संहार किया जा सकता था।
     इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा था। स्वर्ग में अफरातफरी मच गयी थी। सारे देवता इधर-से-उधर भाग रहे थे। कोरोनासुर को वश में करना किसी एक देवता के वश में नहीं था। अपने कारनामों से समस्त विश्व को अचम्भित कर देनेवाला महाप्रतापी महादानव कोरोनासुर को वश में करने के लिए विश्व के सारे देवता तपस्या करने लगे। हालाँकि उन की तपस्या का ही एक परिणाम कोरोनासुर भी है। अब आगे-आगे देखिये होता है क्या...? 

ईश्वर और कोरोनासुर

     ईश्वर का नियम है कि जो भी मेहनत करता है, उसे वह उस का फल अवश्य देते हैं। इस क्रम में आसुरी शक्तियाँ भी उन से वरदान प्राप्त कर उस का दुरूपयोग करने की कोशिश करती हैं। अलबत्ता, बुरे का अन्त बुरा होता है- यह भी विधि का विधान है। अपने बुरे अन्त से पूर्व कोरोनासुर अपनी अँगुलियों के इशारे पर दुनिया को नचा रहा है। दुनिया को नाको चने चबवा रहा है।
     कोरोना वायरस शृंखला के पहले के दो भागों को भी पढ़ें ;-

कोरोना वायरस' - २ (कोरोनाशास्त्र - २) Coronavirus-2

कोरोना वायरस' - १ (कोरोनाशास्त्र - १) Coronavirus-1


भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता व धर्म चर्चा Discussion of Spirituality & Religion in Indian Culture

धर्म का केन्द्र और सारतत्त्व है प्रणव
-शीतांशु कुमार सहाय
     भारतीय संस्कृति में विभिन्नता उस का दूषण नहीं वरन् भूषण है। यहाँ सनातन यानी हिन्दू धर्म के अगणित रूपों और सम्प्रदायों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन, सिक्ख, इस्लाम, ईसाई, यहूदी आदि धर्मों की विविधता का भी एक सांस्कृतिक समायोजन देखने को मिलता है।
     हिन्दू धर्म के विविध सम्प्रदाय एवं मत सारे देश में फैले हुए हैं, जैसे वैदिक मत, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि पौराणिक धर्म, राधा-वल्लभ सम्प्रदाय, श्री सम्प्रदाय, आर्यसमाज, समाज आदि। परन्तु इन सभी मतवादों में सनातन धर्म की एकरसता खण्डित न होकर विविध रूपों में गठित होती है। यहाँ के निवासियों में भाषा की विविधता भी इस देश की मूलभूत सांस्कृतिक एकता के लिए बाधक न होकर साधक प्रतीत होती है।
     'अध्यात्म' शब्द अधि+आत्म– इन दो शब्दों से बना है। अधिक-से-अधिक आत्म अर्थात् स्वयं को समझना ही अध्यात्म है। आत्मा को आधार बनाकर जो चिन्तन या कथन हो, वह अध्यात्म है। भारतीय आध्यात्मिकता में धर्मान्धता को महत्त्व नहीं दिया गया। इस संस्कृति की मूल विशेषता यह रही है कि व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के अनुरूप मूल्यों की रक्षा करते हुए कोई भी मत, विचार अथवा धर्म अपना सकता है। यही कारण है कि यहाँ समय-समय पर विभिन्न धर्मों के उदय तथा साम्प्रदायिक विलय होते रहे हैं। 
    आध्यात्मिकता हमारी संस्कृति का प्राणतत्त्व है। इस में ऐहिक अथवा भौतिक सुखों की तुलना में आत्मिक अथवा पारलौकिक सुख के प्रति आग्रह देखा जा सकता है। चतुराश्रम-व्यवस्था (अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ व संन्यास आश्रम) तथा पुरुषार्थ-चतुष्ट्य (धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष) का विधान मनुष्य की आध्यात्मिक साधना के ही प्रतीक हैं। इन में जीवन का मुख्य ध्येय धर्म अर्थात् मूल्यों का अनुरक्षण करते हुए मोक्ष माना गया है।
     आज धर्म के जिस रूप को प्रचारित एवं व्याख्यायित किया जा रहा है उस से बचने की ज़रूरत है। धर्म मूलतः संप्रदाय नहीं है। ज़िंदगी में हमें जो धारण करना चाहिये, वही धर्म है। नैतिक मूल्यों का आचरण ही धर्म है। धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है जिस से चेतना का शुद्धिकरण होता है। धर्म वह तत्त्व है जिस के आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है। यह मनुष्य में मानवीय गुणों के विकास की प्रभावना है, सार्वभौम चेतना का सत्संकल्प है। 
     मध्ययुग में विकसित धर्म एवं दर्शन के परम्परागत स्वरूप एवं धारणाओं के प्रति आज के व्यक्ति की आस्था कम होती जा रही है। मध्ययुगीन धर्म एवं दर्शन के प्रमुख प्रतिमान थे- स्वर्ग की कल्पना, सृष्टि एवं जीवों के कर्ता रूप में ईश्वर की कल्पना, वर्तमान जीवन की निरर्थकता का बोध, अपने देश एवं काल की माया एवं प्रपंचों से परिपूर्ण अवधारणा। उस युग में व्यक्ति का ध्यान अपने श्रेष्ठ आचरण, श्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा अपने वर्तमान जीवन की समस्याओं का समाधान करने की ओर कम था, अपने आराध्य की स्तुति एवं जय गान करने में अधिक था।
     धर्म और अध्यात्म के मार्ग पर चलकर अगर भगवद्कृपा प्राप्त करनी है तो कोई परिश्रम करने की ज़रूरत नहीं है, केवल इन्द्रियों को वश में कर मन को शुद्ध रखने का प्रयास आज से ही आरम्भ के दीजिये।

बुधवार, 20 मई 2020

कोरोना परिचय Corona Introduction

-अमित कुमार नयनन
कोरोना कपोल-कल्पना, गल्प-गॉशिप नहीं है। यह एक जीती-जागती सच्चाई है। अजूबा है! कोरोना! यह नाम कुछ और भी हो सकता था, हो सकता है! इसे कुछ और नाम भी दिया जा सकता था मगर इस की क्षमता पर कोई-न-कोई प्रकृति का नुमाइन्दा इन्सान की क्लास लेने तो आने ही वाला था- यह या इस जैसा!

नोवेल बनाम नोबल कोरोना

नोवेल कोरोना कहीं से भी 'नोबल' नहीं है। इस का अर्थ यह मत समझिये कि इस में नो-बल है; क्योंकि इस में बल बहुत है। सोचिये कि जब यह दिखायी नहीं देता तब इस से विश्व में इतना भय व्याप्त है। अगर यह दिखायी देता तो भय कितना गुना अधिक होता!? 

असुर कोरोना

कोरोना एक असुर, एक दानव, एक राक्षस है! अतीत में शुम्भ-निशुम्भ, हिरण्यकशिपु, रावण जैसे न जाने कितने असुर पैदा हुए हैं। यह उसी असुर वंश की वंशावली का नया कलयुगी अवतार है। यह असुरों का नया कलयुगी उत्तराधिकारी है।

विलक्षण कोरोना

कोरोना जन्म से ही विलक्षण है। कोरोना में जन्मपूर्व और जन्मजात विलक्षण लक्षण हैं। इस में अधिकतर दैवीय लक्षण हैं। सच कहा जाय तो जिस प्रकार यह परिणाम दे रहा है, इस के लक्षण को दैवीय तो कतई नहीं कहा जा सकता; बल्कि कुलक्षण कहना ज़्यादा या बिल्कुल सही होगा। इसलिए यह कहा जाय कि इस के पास दैवीय शक्तियाँ हैं जिन का उपयोग वह असुर कार्य के लिए कर रहा है, तो बिल्कुल ग़लत न होगा।
कोरोना के अधिकतर कृत्य जो जन्मपूर्व व शिशुकाल में लक्षित हैं, वे श्रीकृष्ण के जन्मपूर्व, जन्म के साथ, जन्म के बाद की लीलाओं से मेेल खाते हैं। अलबत्ता श्रीकृष्ण भगवान थे, अतः उन्होंने अपनी महाशक्तियों का उपयोग विश्वकल्याण, विश्वरक्षा, अधर्म का नाश, धर्म की रक्षा, धर्म की स्थापना के लिए किया। चूँकि कोरोना असुर है, इसलिए वह अपनी शक्तियों का उपयोग मानव प्रताड़ना और विश्वविनाश के लिए कर रहा है। 

अदृश्य कोरोना

कोरोना का एक विशेष विशिष्ट गुण है कि यह दृश्य होकर भी अदृश्य है। इसे विशेष सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से देखा जा सकता है। विशेष भौतिक यन्त्रों से ही इस के लक्षणों की पहचान की जा सकती है। इस के चेहरे, लक्षण और स्वभाव के आकलन किये जा सकते हैं। हालाँकि इस के विविध व बहुरूपिया चरित्र के कारण इस का चेहरे, लक्षण और स्वभाव सभी परिवर्तनशील हैं। इस का कोई एक चरित्र नहीं है, इसलिए यह त्रियाचरित्र से भी ज़्यादा विचित्र है। कहा जाता है कि स्त्री का निर्माण करनेवाले ब्रह्माजी भी उस का चरित्र यानी त्रियाचरित्र नहीं समझ पाये। तो समझ लीजिये कि सृष्टि और ब्रह्माण्ड के जन्मदाता ब्रह्माजी भी इसे नहीं समझ पाये तो आप और हम क्या समझेंगे। इसलिए कोरोना हम सब को कुछ नहीं समझ रहा है। अब आप और हम भगवान भरोसे हैं!

रक्तचरित्र कोरोना

कोरोना जन्म से ही रक्तचरित्र, रक्तपिपासु और रक्तबीज है। इस प्रकार यह उस शैतान देवता की तरह हो गया है जिसे ज़िन्दा रहने के लिए रक्त-ही-रक्त चाहिये। वह रक्तवर्णी है। वह रक्तरंजित है। वह रक्तिम है। जहाँ रक्त-ही-रक्त के अलावा कोई भी रिक्त स्थान नहीं है। इसे जीने के लिए खून, खून, खून और बस खून ही चाहिये। मतलब यह कि यह दुनिया का खून पी रहा है।

बहुरूपिया कोरोना

कोरोना बार-बार अपने चेहरे बदल रहा है। वह कई चेहरों के साथ नरसिंहावतार की तरह भी प्रकट हो रहा है। कोरोना में रूप व लक्षण बदलने की विलक्षण क्षमता है। अतः इसे पहचाना जाना अब मुश्किल हो रहा है। इस अनविजिबल महाबली दैवी शक्तियों से लैस असुर का जो हर क्षण किसी-न-किसी की बलि लिये जा रहा है, को किस प्रकार वश में किया जाय, किसी को समझ नहीं आ रहा। इस के हाथों निरन्तर शहीद हो रहे लोग का बलिदान कहीं व्यर्थ तो नहीं जायेगा?

करामाती कोरोना

करामाती कोरोना की चमत्कारी शक्ति बढ़ती ही जा रही है। अब उस ने तैरना और उड़ना भी शुरू कर दिया है। सुना है कि अभी यह शुरूआती दौर में है। शुरुआती दौर में भी इस की गति बहुत तेज है। आगे और भी तेज होगी इस की गति। कोरोना को कुछ समय पहले जानता कौन था? आज सब जानता है। इसलिए कि इस की गति बहुत तेज है। कमर कस लीजिये, शुरुआती गति है यह, अभी सुपरफास्ट की स्पीड आनेवाली है।

कोरोना वंशावली

अजातशत्रु कोरोना

कोरोना के बारे में कहा जाता है कि जन्म के साथ इस ने अपने पिता को लील लिया था। यह अपने पिता की हत्या का कारण बना था, अतः यह पितृहन्ता है। इस ने अपने पिता की हत्या कर दी थी, अतः यह अजातशत्रु है। प्रयोगशाला में नवरूप में मूर्त्तरूप देकर जन्म दे रहे इस के पिता डॉ. ली वेनलियांग को उस के देश के शासकों ने बेटे कोरोना से पीड़ित होने का हवाला देकर परमगति पर भेज दिया था। यों कोरोना ने पिता के ‘परमार्थ’ के कारण अन्ततोगत्वा सद्गति प्रदान की थी। उस के पिता के परमार्थ का फल कोविड-19 का ‘उपहार’ इन दिनों पूरा विश्व ‘भोग’ रहा है। 

कलियुगी सन्तान

कोरोना कलियुग के उन देवताओं की नाज़ायज़ औलाद है जो स्वयं किसी असुर से कम नहीं है। इन्द्र जिस प्रकार स्वर्ग का सिंहासन बचाये रखने के लिए हमेशा येन-केन-प्रकारेण शक्तियाँ अर्जित-वर्द्धित करते रहने में व्यस्त और सजग रहते थे, उसी प्रकार कलियुग के देवताओं ने भी अति उत्साह में ऐसे महाशक्तिशाली असुर को जन्म दे डाला जो उन से भी ज़्यादा शक्तिशाली निकला। जो अलादीन के चिराग के जिन्न की तरह प्रभुत्वशाली था। दुनिया में प्रेत की तरह प्रकट हुआ यह वैताल अगिया-वैताल बन विश्वरूपी सोने की लंका में हनुमानजी की तरह जगह-जगह छलाँग लगाकर आग लगा रहा है। इसलिए दुनिया सोने लायक नहीं रही। दुनिया की आँखों की नीन्द गायब है; क्योंकि विश्व की जीती-जागती दुनिया में आग लग गयी है।

कोरोना बैटमैन Corona Batman

-अमित कुमार नयनन
     कोरोना के जन्म के लिए कभी प्रयोगशाला, कभी चमगादड़ तो कभी इस पर और कभी उस को दोष दिया जा रहा है। पर, इस सन्दर्भ में अपनी ग़लती कोई नहीं मानना चाहता। स्वयं को दोष कोई नहीं देना चाहता।
     कोरोना असल में चमगादड़ यानी बैट की जीन से बना वायरस-बैट है और कोरोना से प्रभावित हर एक मनुष्य बैटमैन है। कोरोना से प्रभावित दुनिया में बैट-मैन का मेला लग गया है और अभी गिनती जारी है। आप और हम कब फन्तासी की दुनिया से जुड़ गए और उस के जीते-जागते पात्र बन गये, पता भी नहीं चला, अलबत्ता इतनी मौतों के बाद मनुष्य को जीते-जागते पात्र कहना सही नहीं होगा। साथ ही यकीन मानिये, हम जो जीवन जी रहे हैं, वह कोई कपोल-कल्पना नहीं है। ...तो इस का मतलब यह हुआ कि यथार्थ की दुनिया में फन्तासी का विलय हो चुका है।    
     चमगादड़ की तो बात ही छोड़िये। चमगादड़ के अहोभाग्य कि विश्व में हॉरर फिल्मों के अलावा उसे मानव समाज ने कभी इतना सम्मान दिया हो। मानो इस से पहले धरती पर कभी चमगादड़ थे ही नहीं! उसे कभी इतना ख़ौफनाक समझा गया हो, ऐसा प्रमाण भी नहीं है। 
     कभी कैंसर और एड्स के विषाणु धरती पर नये थे, आज नोवेल कोरोना वायरस है। पर, इस से इतर चमगादड़ कब से विषाणु पैदा करने लगे? यह आश्चर्य भी है और प्रश्न भी। सच तो यह है कि मनुष्य के प्रयोग ने ही चमगादड़ों को इतना ख़तरनाक बना दिया।
     कुछ दिनों से चमगादड़ों को नोवेल कोरोना का बाप घोषित और सिद्ध कर दिया गया है। चमगादड़ की इस औलाद की सारी दुनिया दुश्मन बन गयी है। हर कोई इसे मिटा देना चाहता है। जल्द-से-जल्द इस का वज़ूद समाप्त कर देने को आतुर है। यह आतुरता इसलिए; ताकि इन्सान के काले कारनामों, ग़लत करतूतों और सनकी भूल का सबूत जल्द-से-जल्द नष्ट हो जाय। जिस प्रकार यह जल्द-से-जल्द प्रकट हो गया, उसी प्रकार जल्द-से-जल्द नष्ट हो जाय। ऐसी भी क्या जल्दी है? अभी तो शुरूआत है!

कोरोना, मनुष्य और चमगादड़

     इन्सान ने जिस प्रकार विविध जीवों का, चमगादड़ों का खून पीया था, उन्हीें के खून से सना और बना नोवेल कोरोना पिशाच बना इन्सानों का खून पी रहा है। कोरोना नरपिशाच बन चुका है।

कोरोना और चमगादड़

     कोरोना से कोरोना के स्वयं के अलावा एक और चरित्र को भी फायदा हुआ। कोरोना वायरस के कारनामों से जितना सम्मान चमगादड़ों को मिला है, उतना सम्मान चमगादड़ को कभी अपने कारनामों से नहीं मिला होगा!
     इन्सान ने पहले नरपिशाच की तरह चमगादड़ों का खून पीया फिर उसी को मेन विलेन बना दिया। उस पर प्रयोग ख़ुद किये और जब प्रयोग के परिणाम उलट आये तो अपने कुकर्मों का सारा दोष उस निरीह प्राणी पर थोप दिया- उन घोटालेबाजों की तरह जो अनाज की घोटालेबाजी की रपट लिखते समय चूहों का ज़िक्र करना कभी नहीं भूलते और फिर चूहों को ही मेन विलेन बना देते हैं।
     इन्सान चमगादड़ों को इस प्रकार दोष दे रहा है, मानो आज से पहले धरती पर चमगादड़ कभी थे ही नहीं। अचानक ही प्रकट हो गये, अचानक ही खूनी बन गये।

ब्रैम स्टोकर, ड्रैकुला, चमगादड़, कोरोना

     ब्रैम स्टोकर ने जब ‘ड्रैकुला’ लिखी होगी, तब सोचा भी नहीं होगा कि ड्रैकुला का सेनावाहिनी किरदार चमगादड़ फिल्मों का तो लोकप्रिय पिशाच पात्र बनेगा ही, साथ ही आनेवाले समय में वैज्ञानिकों का भी चहेता नरपिशाच बन जायेगा। आज यदि ब्रैम स्टोकर ड्रैकुला पर फिल्म लिखते तो चमगादड़ मण्डली को कोरोना मण्डली के साथ दिखाते ही या फिर आनेवाले समय में बै्रम स्टोकर की ड्रैकुला पर फिल्म बनी तो आश्चर्य नहीं कि इस के आनेवाले किसी सीक्वल में चमगादड़ मण्डली में कोरोना मण्डली के दर्शन हो जाय। 
     ...तो ब्रैम स्टोकर का कोरोना से और कोरोना का ब्रैम स्टोकर से कनेक्शन हो ही गया। अलबत्ता ब्रैम स्टोकर के समय कोरोेना का और कोरोना के समय ब्रैम स्टोकर का कोई कनेक्शन नहीं है फिर भी इन का एक-दूसरे से कनेक्शन हो ही गया। इसे कहते हैं कोरोना कनेक्शन। .....किस्मत कनेक्शन!

सोमवार, 18 मई 2020

कोरोना नामकरण Corona Nomenclature

-अमित कुमार नयनन
     कोरोना के नाम संस्कार का तो मामला कुछ ऐसा है कि इस का नामकरण काफ़ी पहले ही हो गया था मगर कुछ समय पहले तक लोग कोरोना का नाम तक नहीं जानते थे। अब यह नाम सब की ज़्ाुबान पर है, बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर है। पूरे विश्व में अब कोरोना का नाम ‘सम्मान’ से लिया जाता है। इस के प्रशंसकों, आलोचकों और विरोधियों की संख्या भी अनगिनत है।
     श्रीकृष्ण भगवान की तरह कोरोना के कई नाम हैं- कोरोना, को-रोना, कोरो-ना, को-रो-ना......आप समझेंग स्पेलिंग मिस्टेक हैं मगर सच मानिये, यक़ीन कीजिये मिस्टेक आप कर रहे हैं। ये सभी नाम कोरोना के ही हैं; क्योंकि कोरोना के कारनामों के हिसाब से उक्त सारे कोरोना पर पूरी तरह ठीक और सटीक बैठते हैं। 
कोरोना जहाँ इस का वैज्ञानिक नाम है, वहीं को-रोना का अर्थ रोना का संयुक्त अभ्यास भी है तो कोरो-ना का मतलब कुछ करो ना है जो कि सभी इस अदृश्य को देखते ही बोलना शुरू हो जाते हैं तो को-रो-ना इस का ज्योतिषीय नाम है।
     कोरोना में ‘कोरो’ अर्थात् ‘कुछ करो’ और ‘रोना’ पहले से ही लिखा है, इसलिए रोना इस में पहले से ही मौज़ूद है। ‘कोरोना’ में ‘रोना’ पहले से लिखा है, इसलिए दुनिया आज रो रही है।

कोरोना नामचीन

     कोरोना नामचीन है; क्योंकि उस का जन्म चीन में हुआ है। कोरोना नामचीन के नाम में जन्म से ही ‘नाम’ छिपा था, इसलिए चीन का ही कोरोना को जन्म देने का, नामवर करने का, नामचीन बनाने का जन्मसिद्ध अधिकार था। कोरोना को नामवर-नामचीन बनाने का ठेका चीन का था, इसलिए चीन ने कोरोना को नामचीन बनाने का ठेका लिया।  

नामचीन कोरोना

     कोरोना में एक अत्यन्त ही खास बात है और वह यह कि वह स्वयं तो नामचीन है ही; बल्कि जिस के साथ वह जुड़ जाता है, वह भी नामचीन हो जाता है।
इसे ऐसे देखिये-
     वुहान! जिसे दुनिया में कोई नहीं जानता था। जिस के बारे में विश्व का एटलस लेकर खोजना पड़ता था, बताना पड़ता था। वहाँ कोरोना का जन्म क्या हुआ, किसी अवतार की जन्मस्थली की भाँति वुहान प्रसिद्ध ही नहीं विश्वप्रसिद्ध हो गया। आज बच्चे-बच्चे से लेकर बची सारी दुनिया की ज़ुबान पर है। सारे लोग भले किसी देश की राजधानी के बारे में न बता पाएँ, मगर दुनिया में वुहान कहाँ पर है, ज़रूर बता देंगे।
     कोरोना जब देश से परदेस गया तो जिस देश और स्थान में गया, वह देश-स्थान भी प्रसिद्ध हो गया। इटली, स्पेन, इंग्लैंड, फ्रान्स, अमेरिका, रूस, भारत वगैरह-वगैरह। इन में छोटे-बड़े सभी देश हैं। ये सभी देश विश्व मानचित्र पर पहले से थे मगर सब ओर इन की ही चर्चा होने लगी। इन को कोरोना की कृपा से इन्हें तात्कालिक विश्वप्रसिद्धि तत्काल हासिल हो गयी। मानो आप के अप्लाई करने से पहले ही इण्टरनेशनल परमिट मिल गया हो।
     कोरोना किमजोंग के उत्तर कोरिया में, सऊदी अरब राजमहल, इंग्लैंड राजमहल, बोरिस जॉनसन, अमेरिका व्हाइट हाउस- जहाँ-जहाँ पहुँचता गया, उन्हें प्रसिद्ध करता गया।
     इस में भी सब से रोमांचक बात यह कि अगर यह जान ले भी लेता है तो भी शख्स मरणोपरान्त भी प्रसिद्ध हो जाता है। आप अगर बॉर्डर पर युद्ध में शहीद होते हैं तो भी शायद उतना सम्मान और प्रसिद्धि मिले न मिले, कोरोना से मरनेवाला नामचीन और अमर दोनांे हो जाता है। लोग कहते हैं- देखो! बेचारा कोरोना से मर गया। भले लोग ज़िन्दा में कोरोना मरीज से किसी अछूत की तरह व्यवहार करें मगर कोरोना से मरने के बाद कोरोना उन्हें मरणोपरान्त प्रसिद्धि के साथ सहानुभूति वोट भी दिलवा ही देता है। इस के साथ ही दुनिया कितनी मतलबी, वैरागी है, यहाँ अपना कोई नहीं, का सत्य दिखलाते हुए आप के मरने के बाद उस अंजाम तक भी लिये जाता है कि आप को कन्धा देने के लिए चार जन तक नहीं मिलते। इसलिए कोरोना मोक्षदायक कोरोना भी है। मोक्षदायक कोरोना का कहना है; बल्कि साफ कहना है कि कोई किसी के लिए जीता-मरता नहीं। यह दुनिया मतलबी है, ऐसी है, वैसी है। कोरोना कहता है- धरती पर अकेले ही आये थे तो अपने साथ औरों को क्यों घसीटना चाहते हो? अकेले आये हो तो अकेले ही.....समझ गये नऽ! हाँ! 
     कोरोना जहाँ प्रकट हुआ, उस ‘स्थान’, जिस से जुड़ा वह ‘विशेष’, जिसे कोरोना के कारण जीवन से मोक्ष मिला, ‘उसे’ भी कीर्ति प्रदान करता है।
     जिस प्रकार पारस के छुने से लौह भी स्वर्ण हो जाता है, उसी प्रकार कोरोना के होने मात्र से अज्ञात भी गुमनाम और नामचीन हो जाता है।
     इस समाज के कई लोग इस कारण भाग्यशाली और प्रसिद्ध हो गये, अज्ञात और गुमनाम नामचीन हो गये; क्योंकि सिर्फ़ कोरोना ने उन्हें छू लिया। इस समाज में बहुत सारे निठल्ले लोग हैं जो सिर्फ़ समाज पर ही नहीं, स्वयं पर भी बोझ हैं। ऐसे लोग सिर्फ़ इस कारण प्रसिद्ध हो गये; क्योंकि कोरोना ने उन्हें परमगति प्रदान कर दी। जीते-जी उन्हें भले लोग न जाने हों मगर मरने के बाद दुनिया उन्हें अवश्य जान गयी। अपने जीवन की कीमत आप ने भले न समझी हो मगर कोरोना ने बा-इज़्ज़त समझी कि मरने के बाद भी आप की कीर्ति दुनिया जान रही है।

कोरोना डाई हार्ड आशिक

     कोरोना एक डाई हार्ड आशिक भी है। एक ऐसा आशिक जो प्यार के लिए मरना और मारना भी जानता है। कोरोना का प्रेम अमर है। कोरोना का प्रेम अमरत्व प्रदान करता है। कुछ इस तरह कि अपने साथ लिये जाता है। एक बार इस ने जिसे अपना बना लिया, उस के लिए दुनिया बेगानी हो गयी। कोरोना एक सच्चे प्रेमी की तरह मरते दम तक साथ नहीं छोड़ता। कोरोना का कहना है- इस दुनिया में सिर्फ मैं तुम्हारा हूँ और तुम मेरे हो!

शनिवार, 16 मई 2020

अवतार-पुरुष Avatar Purush



-अमित कुमार नयनन
राम-कृष्ण अब झगड़ पड़े हैं,
बात-बात पर बिगड़ पड़े हैं;
कौन समझाये इन को आखिर
अवतार-पुरुष सब से बड़े हैं।

देख रहे कलियुग में आकर
पाप के नये-नये रास रचाकर,
लाइन में इस के हर एक खड़े हैं;
लगता है कल्कि के आने तक
कर अपना फैसला ख़ुद डालेंगे,
अवतार-पुरुष होने का नाता;
‘कल्कि’ को माना है भ्राता,
दुःख है समय से पहले हर डालेंगे।
कहते राम-कृष्ण घबराये हुए हैं,
पर देखते हैं कि
यहाँ तो कल्कि पहले से ही
अवतार महासम्मेलन बुलाये हुए हैं।

ऐ कल्कि!
अपनी तुम गद्दी बचा लो,
समय से पहले कल्कि-युग बुला लो।
यह कलियुग बड़ा इतरा रहा है,
तेरी इज़्ज़त बिखड़ा रहा है,
कल्कि-युग का दे दिलासा
कलियुग से भगा रहा है।
देख नहीं रहे,
कभी नहीं कोई भागा था इतना तेज
जितनी तेज यह भाग रहा है।
जब कोई नहीं बचेगा
तो वहाँ जाकर तू ख़ाक
मानवता के दुश्मनों को डसेगा।

अरे!
केवल पन्नों पर ही अपने अक्षर सँवारेगा,
तो याद रख वहाँ तू केवल मच्छर मारेगा।
याद रख कल्कि!
हमें स्थान भले ही युगों ने दिया है,
पर हम ने नहीं कभी ख़ुद का युगों में जिया।
यह अकाट्य सच है कि
हम ने युगों के घर में रहकर भी
हमेशा उन पर शासन किया है।
इतिहास ने हमेशा ही
हमें सार्वभौमिक और सार्वकालिक पाया है,
इस सत्य को आज तक
कोई नहीं झुठला पाया है।
मगर यह युग आज हमें झुठला रहा है;
कल्कि-युग का दिलासा दे
तुम्हें कलियुग से भगा रहा है।
इसलिए मेरी मानो,
समय से पहले कल्कि-युग बुला लो;
सारा सेहरा अपने नाम करवा लो।
-परशूराम ने डाँट लगायी,
साथ ही प्रेमपूर्वक सारी बात समझायी।

बात अवतारों को जँच गयी,
जो कि कलियुग तक भी पहुँच गयी।
कलियुग अवतारों की शक्ति जानता था;
जो युग-काल से ऊपर जीते हैं,
उन्हें भली-भाँति पहचानता था।
वह अविलम्ब महासम्मेलन में प्रकट हुआ-
हुजूर!
मेरे हेतु यह हाल विकट हुआ
मगर क्या करूँ?
मैं मज़बूर हूँ,
पाप के भार से चूर हूँ;
आपन बिना सोचे-समझे
तीनों युगों का भार मुझ पर डाल दिया है,
एक बार में कर बेहाल दिया है।
अब और ज़्यादा भार उठाने की
मुझ में शक्ति नहीं है,
मुझ में भी भक्ति नहीं है,
जो मेरे भाई सत्, त्रेता और द्वापर की आप में थी;
मगर याद रखिये-
हर एक की स्थिति दूसरे से बदला भी।
तीनों ने उत्तरोत्तर अधिक दुःख पाया है,
उन्हें आपन अपनी अँगुलियों पर नचाया है।
सारे भक्त आ गये नज़र में,
मगर इस ‘युग-भक्त’ का
आज तक न उद्धार हो पाया है।
मुझे जितना पिटना है, पिटिये,
सरेआम जलील कर घसीटिये;
मगर आज मैं फैसला कर ही लौटूँगा
या फिर यहीं मर मिटूँगा।
‘भठयुग’ आये न आये,
मुझे अफसोस न होगा;
मगर उसे दुःख उठाना पड़ा,
ऐसा कोई आक्रोश न होगा।
अवतार बड़ी दुविधा में थे,
कलियुग की भाँति विपदा में थे।

नरसिंह ने जुबान खोली-
कलियुग का संकट हल हो गया;
व्यर्थ ही मन बेकल हो गया।
मन में इक राह सूझी है,
मानव की छोटी बुद्धि है;
क्यों न इन्हें लड़वाकर ख़त्म कर डालें,
सेहरा अवतारों के सिर मढ़वा लें।
साथ ही
भठयुग का दुःख कलियुग को दे डालें,
सुखी बना भठयुग को डालें।
कलियुग को भाई की चिन्ता है,
इस तरह यह मसला भी हल हो जायेगा;
साथ ही भ्रातृ-पुण्य उठा
अवतारों से उपहारस्वरूप युग में जन्म पुनः जायेगा।
इस तरह एक पन्थ दो काज हो जायेगा,
कलियुग सुखी साथ ही 
कल्कि अवतार हो जायेगा।
कलियुग ने सिर ठोक लिया,
अवतारों ने फिर पोट लिया;
भठयुग का बोझ भी अब लद चुका था।

अवतारों ने अपनी ख़ातिर 
कलियुग को मरवा डाला;
कल्कि-युग दे युग का दिलासा,
पुनः हरा युगों को डाला।